औद्योगिक नीति 1985 क्या है?

अनुक्रम
देश में आर्थिक विकास की प्रक्रिया को गतिमान करने, औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि करने तथा राष्ट्रीय संसाधनों के उच्चतम प्रयोग की दृष्टि से वर्ष 1985 में महत्वपूर्ण घोषणाएँ एवं निर्णय किये गये। इस दशक के प्रारम्भ से ही सरकार ने औद्योगिक नीति को अत्यन्त विवेकपूर्ण बनाने का प्रयास किया है। इस औद्योगिक नीति के प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किये गये-
  1. आर्थिक विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करना,
  2. गतिशील औद्योगिक वातावरण का निर्माण करना, तथा
  3. विकास, विनियोग व उत्पादन की गति को तीव्र करना।
1985 की औद्योगिक नीति, 1980 की औद्योगिक नीति के मार्गदश्री सिठ्ठान्तों के अनुसार निर्धारित की जाती रहेगी। लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु सरकार ने महत्वपूर्ण संशोधन कियें हैं-

उद्योगों का विशद् वर्गीकरण 

लाइसेन्स सम्बन्धी प्रक्रियाओं को सुप्रवाही बनाने, संसाधनों की क्षमताओं का उच्चतम प्रयोग करने तथा उत्पादन में तीव्र वृठ्ठि करने की दृष्टि से 1985 में भी उद्योगों के विशद् वर्गीकरण की योजना जारी रखी गई है। इससे उत्पादकों को अपने उत्पादमिश्र को बाजार की माँग के अनुरूप समायोजित करने का लाभ मिल सकेगा। इस योजना को अब 25 उद्योगों में भी विस्तारित किया गया है। इसमें से कुछ उद्योग इस प्रकार हैं-मशीनी औजार, मोटरीकृत चार पहिया वाहन, कागज और लुग्दी, रसायन, पैट्रोरसायन और उर्वरक, मशीनरी उद्योग, कृषि मशीनरी, डीजल इंजन, क्रेन, टाइपराइटर, विद्युत उपकरण, रेल माल डिब्बा व सवारी डिब्बा आदि।

इस व्यापक वर्गीकरण के फलस्वरूप औद्योगिक उपक्रम प्रत्येक वस्तु का उत्पादन करने के लिए आवेदन करने की बजाय अब सामान्य वर्ग की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए स्वतन्त्रा रूप से आवेदन कर सकेंगे। यह सुविधा विद्यमान लाइसेन्स प्राप्त औद्योगिक इकाइयों को भी उपलब्ध रहेगी और उनके आवेदन पर विचार करते समय एक सरलीकृत प्रक्रिया अपनायी जायेगी। यह उद्योगों की ‘ब्रॉड बैण्ंिडग’ योजना है।

उद्योगों को लाइसेन्स मुक्त करना

मार्च, 1985 में सरकार ने उद्योगों की 25 विशद् श्रेणियों को लाइसेन्स मुक्त कर दिया है। अब इन श्रेणियों के उद्योगों को ‘औद्योगिक अनुमोदनों के सचिवालय’ में केवल अपना पंजीयन करवाना होगा, औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) आधिनियम के अन्तर्गत अब इनके लिए लाइसेन्स प्राप्त करना अनिवार्य नहीं होगा। फिर भी यह लाइसेन्स मुक्ति इन शर्तों के अधीन प्राप्त होगी-
  1. औद्योगिक उपक्रम एम.आर.टी.पी. अधिनियम और विदेशी मुद्रा अधिनियम की सीमा के अन्तर्गत नहीं आता हो।
  2. उत्पादित की जाने वाली वस्तु लघु क्षेत्रा के लिए आरक्षित न हो।
  3. औद्योगिक उपक्रम निम्न क्षेत्रों में स्थापित न हो अथवा इन क्षेत्रों में स्थापित करने का विचार नहीं हो-
  4. 1981 में भारत की जनगणना में निर्धारित 10 लाख से अधिक ही जनसंख्या वाले शहर की सीमा के भीतर, अथवा
  5. उक्त जनगणना में निर्धारित 5 लाख से अधिक की जनसंख्या वाले शहर की नगरीय सीमा के भीतर। सरकार ने जून, 1985 में 82 वृहत् औषधियों (Bulk Drugs) तथा इनके निरूपणों (Formulations) को भी लाइसेन्स की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया।

पिछड़े़ क्षेत्रो में उद्योगों की स्थापना पर लाइसेन्स की छूट 

सरकार पिछड़े हुये क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना एवं विकास पर विशेष जोर दे रही है। ऐसे क्षेत्रों में उद्योग लगाने पर लाइसेन्स प्राप्त करने की आवश्यकता नही होगी। एमआर. टी.पी. अधिनियम की धारा 21 व 22 के भीतर छूट प्राप्त 27 उद्योगों में से 22 उद्योगों को लाइसेन्स मुक्त करने की योजना दिसम्बर, 1985 में लागू कर दी गई, बशर्ते कि ऐसे औद्योगिक उपक्रम क्रेन्दीय सरकार द्वारा घोषित पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करना चाहते हों।
यह योजना इन पाँच उद्योगों में लागू नहीं की गई-(क) अकार्बनिक उर्वरक, (ख) ड्रग्स और फर्म इन्टरमीडिएट्स, (ग) अखबारी कागज, (घ) पोर्टलैण्ड सीमेन्ट, और (ड़) मोटरीकृत चार-पहिया वाहन।

लघु उद्योग की निवेश सीमा में वृद्धि

लघु एवं सहायक उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए इनकी परिसम्पतियों में किये जाने वाले पूँजी विनियोग को बढ़ा दिया गया है। लघु उद्योगों के लिए निवेश की सीमा 20 लाख रूपये से बढ़ाकर 35 लाख रूपये कर दी गई है और सहायक उद्योगों (Ancillary Industries) की निवेश सीमा 25 लाखा रूपये से बढ़ाकर 45 लाख रूपये कर दी गई है।

दूर-संचार उपकरण उद्योग में गैर-सरकारी क्षेत्र की भागीदारी

दूर-संचार उपकरण उद्योग की स्थापना व संचालन सरकारी क्षेत्रा के लिए आरक्षित है। किन्तु उत्पादन बढ़ाने के दृष्टिकोण से सरकार ने यह निर्णय लिया है कि-
  1. स्विचिंग और ट्रान्शमीशन उपकरण के उत्पादन में निजी क्षेत्रा की इकाइयों का सहयोग लिया जा सकता है। लेकिन इस भागीदारी मे कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सा केन्द्र/राज्य सरकारों को होना चाहिये और अधिकतम 49 प्रतिशत हिस्सा गैर-सरकारी संस्थाओं का हो सकता है,
  2. गैर सरकारी क्षेत्रा को ग्राहकों के परिवार में स्थापना के लिए टेलीफोन उपकरण, टेलिप्रिन्टरों, आँकड़ा संचार उपकरण अािद जैसे दूर-संचार के उपकरणों का उत्पादन करने की अनुमति दी जा सकती है।

‘उद्योग रहित जिलों व पिछड़े़ क्षेत्रों का विकास

पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापना हेतु लाइसेन्स जारी करने में प्राथमिकता की नीति अपनाई गई। सरकार ने 87 जिलों को ‘उद्योग रहित जिलें’ (No Industries Districts) घोषित कर दिया है। सरकार ने यह निर्णय लेकर परिशिष्ट- I से भिन्न उद्योगों (लद्यु क्षेत्रा के लिए अनारक्षित) की स्थापना के लिए एम.आर.टी.पी. उपक्रमों द्वारा पूरे किये जाने वाले अनिवार्य निर्यात दायित्व को वर्ग ‘ख’ और वर्ग ‘ग’ (पिछड़े जिले) में 50 प्रतिशत से घटाकार 25 प्रतिशत और वर्ग ‘क’ जिलों में 30 प्रतिशत घटाकर शून्य कर दिया गया है।

परिशिष्ट.I को संशोधन

1973 में कई उद्योगों की घोषणा की गई थी, जिसमें MRTP तथा FERA अधिनियमों के अन्तर्गत आने वाले बड़े ओैद्योगिक उपक्रम व कम्पनियाँ अन्य उपक्रमों के साथ भाग ले सकेंगी। अपै्रल, 1982 में इस सूची की समीक्षा करके इसमें संशोधन कर दिया गया था। इस सूची में 31 दिसम्बर, 1985 को पुन: संशोधन करके कुछ नये उद्योग शामिल किये गये हैं। इसमें सम्मिलित, कुल उद्योगों की संख्या 30 है।

अतिरिक्त क्षमताओं के पुन

पृष्ठांकन की उदार योजना: क्षमता के पुन: पृष्ठांकन की योजना सर्वप्रथम अप्रैल, 1982 में तीन वर्ष के लिए लागू की गई थी। इस योजना के अन्तर्गत यह प्रावधान रखा गया था कि औद्योगिक उपक्रम अपने लाइसेन्स में अंकित क्षमता को पिछले किन्हीं 5 वर्षो के दौरान प्राप्त किये गये उच्चतम उत्पादन में उसका 1/3 जोड़कर पुन: पृष्ठांकित करवा सकते थे बशर्ते कि यह लाइसेन्स प्राप्त क्षमता में उसका 25 प्रतिशत जोड़ने पर उससे अधिक न हो।

इस योजना के अनुसार जिन औद्योगिक उपक्रमों ने 31 मार्च, 1985 से पहले किन्हीं 5 वर्षो के दौरान लाइसेन्स प्राप्त क्षमता का 80 प्रतिशत या उससे अधिक प्राप्त किया है (जबकि पिछली योजना में 94 प्रतिशत निर्धारित किया गया था केवल वे ही अपनी क्षमता का पुन: पृष्ठांकन करवा सकेंगें।

पुन: पृष्ठांकित की जाने वाली क्षमता का निर्धारण, पिछले किन्हीं 5 वर्षो के दौरान प्राप्त किये गये उच्चतम उत्पादन में उसका 1/3 जोड़कर किया जायेगा। ये औद्योगिक इकाइयाँ जो पुन: पृष्ठांकित क्षमता प्राप्त कर लेंगी, आगे के वर्षो में और पुन: पृष्ठांकन के लिए अपने लाइसेन्स प्रस्तुत कर सकेंगी, जिसे उनके द्वारा प्राप्त की गई क्षमता में 1/3 जोड़कर पुन: पृष्ठांकित कर दिया जायेगा। यह योजना 1985-90 की अवधि तक के लिए जारी रहेगी। यह योजना औद्योगिक उपक्रमों के लिए लागू नहीं होगी-
  1. लघु उद्योग क्षेत्रा के लिए आरक्षित उद्योग,
  2. 21 चुने हुए उद्योग, जहाँ कच्चे माल की नितान्त कमी है अथवा जिनसे प्रदूषण फैलने की उच्च सम्भावना है,
  3. वे उद्योग जिनमें उनकी अवस्थापना सम्बन्धी कई कठिनाइयाँ हैं,
  4. दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले शहरी स्थलों में स्थित उपक्रम,
  5. एम.आर.टी.पी./फेरा कम्पनियाँ।

आधुनिकीकरण व उपकरणों के प्रतिस्थापना को बढ़ा़ावा: 

उद्योग में आधुनिकीकरण और मशीनों केा बदलने के कार्य में तेजी लाने की दृष्टि से सरकार ने एक सरलीकृत प्रक्रिया अपनाने की घोषणा की है। यह सुविधा उन उपक्रमों को दी जायेगी जहाँ आधुनिकीकरण अथवा नवीकरण करने के फलस्वरूप लाइसेन्स प्राप्त क्षमता में 49 प्रतिशत तक वृठ्ठि हो जाती है। ऐसे मामलों में स्थापना-स्थल संम्बन्धी बाधाएँ लागू नहीं होंगी।

रूग्ण उद्योगों का पुनस्र्थापन 

बीमार उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार समय-समय पर प्रभावी उपाय करती रही है। जनवरी, 1985 तक 30 औद्योगिक उपक्रमों की प्रबन्ध व्यवस्था, उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के अनुसार की जा रही थी। अक्टूबर, 1981 में सरकार ने औद्योगिक रूग्णता सम्बन्धी मार्गदश्र्ाी नीतियों का निर्माण किया था।

सरकार ने जिन बीमारी औद्योगिक उपक्रमों का प्रबन्ध अपने हाथ में ले रखा है, उनमें से 26 उपक्रमों के प्रबन्ध अधिग्रहण (Takeover) की अवधियाँ 1 अप्रैल, 1985 से बढ़ा दी गई थीं।

बीमार उद्योगों के लिए सुधारात्मक, उपचारात्मक व अन्य आवश्यक वैकल्पिक उपायों का शीघ्र निर्धारण करने व निर्धारित उपायों का तेजी से क्रियान्वयन करने के उछेश्य से सरकार ने ‘‘रूग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष्ेष प्रा्रा्रावधान) अधिनियम, 1985’ पारित किया है। इस अधिनियम में एक ‘औद्यैद्यागिक एवं वित्तीय पुर्निर्माण बोर्ड की स्थापना का प्रावधान किया गया है।

हस्तशिल्प, हथकरघा, लघु और ग्रामोद्योगों का विकास 

इन उद्योगों के विकास से क्षेत्रीय सन्तुलित विकास एवं उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जा सकता है। सरकार ने अपनी औद्योगिक नीति में इन उद्योगों को विकसित करने के लिए विशेष कदम उठाये हैं। इनमें प्रमुख हैं-प्रशिक्षण तथा उद्यमिता विकास कार्यक्रम, आधुनिकीकरण कार्यक्रम, प्रोद्योगिकी उन्नयन, साहसियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, शिक्षित बेरोजगार युवकों के लिए स्व-रोजगार की योजना आदि। वर्ष 1985-86 के दौरान स्व-रोजगार योजना की समयावधि और आगे बढ़ा दी गई है, जिसमें 2.5 लाख उद्वमों को लक्ष्य रखा गया है।

उद्योगवार नीतियों की घोषणा

उद्योगों के प्रमुख क्षेत्रों में सरकार ने अपनी उद्योगवार नीतियाँ घोषित की है। इससे उन उद्योगों के क्षेत्रा में नवीन वस्तुओं का उत्पादन करने, नये बाजारों को खोलने तथा उस उद्योग की गम्भीर समस्याओं के निवारण में सहायता मिल सकेगी।

जून, 1985 में सरकार ने नई वस्त्र नीति’ की घोषणा की है। इस नीति का प्रमुख उछेश्य उचित मूल्य पर श्रेष्ठ किस्म के कपड़े का उत्पान करना है। यह नीति हथकरघा बुनकरों के हितों के संरक्षण पर भी जोर देती है। दूसरे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रा-चीनी के लिए भी अभी हाल में ही सरकार ने एक दीर्घकालीन नीति की घोषणा की है। इसके अन्तर्गत गन्ने की पूर्ति को बढ़ाने तथा चीनी के अधिकांश भाग को खुले बाजार में बेचे जाने पर जोर दिया गया है। इस नीति के अन्तर्गत वर्ष 1985-86 के लिए गन्ने का न्यूनतम वैधानिक मूल्य जो कि 14 रूपये प्रति क्विन्टल था, बढ़ाकर 16. 50 रूपये प्रति क्विन्टल कर दिया है। साथ ही चीनी मिलों द्वारा दी जाने वाली लेवी को 65 प्रतिशत से घटाकर 55 प्रतिशत कर दिया गया है।

सरकार ने अब ‘इलेक्ट्राोनिक्स नीति’ की घोषणा भी की है। इस नीति से इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग की टैक्नालॉजी, विनियाग, उत्पादन, नवीकरण आदि पहलुओं में सुधार सम्भव होगा।

वन भूमि का वनरोपण से भिन्न प्रयोग के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व स्वीकृति

वनों के संरक्षण के लिए भी इस औद्योगिक नीति में पर्याप्त व्यवस्था है। वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2 के अनुसार वन भूमि का वनरोपण से भिन्न प्रयोग करने के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। केन्द्र सरकार की अनुमति के बिना वन भूमि के विविधकरण के सम्बन्ध में राज्य सरकार अथवा किसी प्राधिकरण के द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता है। औद्योगिक विभाग के प्रशासनिक नियन्त्राण में जो संस्थाएँ कार्य कर रही हैं, उन सभी को यह सलाह दी गई है कि वे वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का दृढ़ता से पालन करें। इन संस्थाओं को यह सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिये गये हैं कि वे वन भूमि में कोई परियोजना प्रारम्भ करने की अनुमति न दें जब तक कि राज्य अथवा संघ शासित प्रदेश सरकार यह सूचित नहीं कर देती है कि सम्बन्धित पार्टियों ने केन्द्र सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली है।

प्राद्यौगिकी विकास

औद्योगिक नीति का एक उद्देश्य देश में प्राद्योगिकी का विकास करना तथा उस उद्योगों में पय्र क्ु त करने के लिए उद्यमियों को प्रोत्साहित करना है। जहाँ टैक्नोलॉजी का आयात करना आवश्यक हो, वहाँ यह सुनिश्चित करने के सभी प्रयास किये जाने चाहिए कि वह उच्चतर स्तर की और आवश्यकता व साधनों के अनुरूप हो। प्रौद्यागिकीय उन्नयन के तीव्र कार्यान्वयन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया कि अगस्त, 1985 के पश्चात् जारी किये गये विदेशी सहयोग स्वीकृतियों के मामले में विदेशी सहयोग समझौतों को रिकार्ड पर नहीं लाया जाना चाहिए।

वर्ष 1985 के अन्तर्गत की गई औद्योगिक नीति की विभिन्न घोषणाओं से देश में विकासोन्मुख वातावरण का निर्माण हुआ है। इन प्रभावकारी नीतिविषयक उपायों से उत्पादन मे आने वाली बाधाओं को दूर करने की क्षमता का उपयोग बढ़ाने, उत्पादकता में वृद्धि करने, प्रतियोगिता का उचित आधार निर्मित करने, नई तकनीक को अपनाने तथा औद्योगिक विकास की गति को तेज करने की दिशा में एक आधारभूत बल मिला है। राष्ट्रीय प्राथमिकताओं एवं सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप वर्तमान औद्योगिक नीति को अधिक उदार बना दिया है। फलस्वरूप विनियोग एवं पूँजी के प्रवाह में वृठ्ठि हुई है तथा उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है।

इस औद्योगिक नीति की घोषणा के फलस्वरूप औद्योगिक विकास के सभी स्तरों पर पर्याप्त कुशलता एवं तेजी आयी है। इस औद्योगिक नीति के फलस्वरूप सातवीं पंचवष्र्ाीय योजना के विकास लक्ष्यों, अवस्थापना सम्बन्धी सुविधाओं का विस्तार, उत्पादकता का उच्च स्तर, उत्पादन के तत्वों की बेहतर क्षमता, उद्योगों का आधुनिकीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी, न्यूनतम लागत व उच्च किस्म आदि को प्राप्त किया जा सका है।

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