चिरस्थायी विकास का अर्थ एवं परिभाषा

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चिरस्थायी विकास की अवधारणा की उत्पति

इस अवधारणा का विकास पिछले दो दशकों में उत्पन्न विचारों का परिणाम है। वास्तव में 1972 की स्टोकहोम कान्फ्रेंस (Stockholm Conferece) में ‘पर्यावरण’ सम्बन्धी विषय अन्र्तराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में उभरकर आया। इसके बाद यूनाइटेड नेशनस इन्वायरनमैन्ट प्रोग्रोम United Nations Enviorment Programme (UNEP) के द्वारा तैयार की गई अपनी 10 वर्षीय रिर्पोट (1972-82) में पर्यावरण को दो भागों में बांटा-प्राकृतिक पर्यावरण एंव सामाजिक पर्यावरण । प्राकृतिक पर्यावरण में यू.एन.ई.पी ने प्राकृतिक तत्व जैसे कि पानी, भूमि हवा, वन एंव वन्य जीवन को सम्मिलित किया जबकि सामाजिक पर्यावरण में मानव जनसंख्या, स्वास्थ्य, कृषि, संस्कृति, उद्योग, संसाधन, परिवहन , पर्यटन एंव समाज के वे सभी तत्व जो मानव जीवन केा प्रभावित करते हैं। इस कान्फ्रेन्स में गरीबी, असमानता एंव अविकास जैसी समस्याओ को चिरस्थाई विकास के मार्ग में पहली बार मुख्य बाधा के रूप में देखा गया। इसके साथ साथ विकसित एंव विकासशील देशों के पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याएं भी इस कान्फ्रेंस में चर्चा का मुख्य मुद्दा बनाई गई।

इसके पश्चात् Sustainable development की अवधारणा को 1980 में वल्र्ड कन्र्जवेसन स्टेटजी (World Conservation Streategy) के द्धारा और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया। इस streategy का मुख्य उद्देश्य Eco-system की सीमाओं को मध्यनजर रखते हुए मानवीय जीवन में गुणात्मक सुधार लाने से था। वास्तव में चिरस्थाई विकास एंव बेहतर पर्यावरण प्रबन्ध के सम्बन्ध में Concrete नीति अपनाया जाना, वल्र्ड कमीशन आन इन्वार्यमैन्ट एण्ड डव्लैपमैन्ट (World Commission on Envirnment and Development ) द्वारा 1987 में पेश की गई ब्रेटलैण्ड रिर्पोट (Brandtland Report) का ही परिणाम है। यह रिर्पोट , इस कमीशन के चैयरमैन Bradtland जो नार्वे के प्रधानमंत्राी थे, के नाम से जानी जाती है। Brandtland कमीशन ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि अगर आज की मानव पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, पर्यावरण प्रदुषण , भौतिक संसाधनों का दुरूपयोग , गरीब लागों की उपेक्षा, इत्यदि इसी तरह से करती रही, तो वो दिन दूर नहीे जब मानवीय जीवन की गुणात्मकता का स्तर बहुत ही कम हो जाएगा। इस स्तर की गिरावट को विराम देने की दिशा में इस कमीशन ने 'Sustainable Development' नामक शब्द का विकास किया। इस रिर्पोट में विकसित (North) एंव विकासशील (South) देशों की इस सन्दर्भ में जिम्मेदारियों का जिकर करने के साथ-साथ कुछ तरीके अपनाए जाने की दिशा मे सुझाव भी दिए गए।

Barandtland रिर्पोट का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह रहा कि इसने जून 1992 में दूसरी यू.एनकान् फ्रेंस आन इन्वार्यन्मैन्ट एण्ड डव्लैपमेन्ट (U.N. Conference on Enviornment - Development) जोकि ब्राजील की राजधानी रायों डी जेनेरियों (Rio de Jenrio ) में हुई, के लिए आधार तैयार किया। इसे (Earth Summit) या रायो कान्फ्रेन्ंस ( Rio Conference) के नाम से भी जाना जाता है। चिरस्थाई विकास की दिशा में Earth Summit वास्तव में एक बहुत बड़ी छंलाग थी और इसने विश्व के लोगों द्धारा ऐसी विकास प्रक्रिया जो आने वाली पीढ़ियों के साथ भेदभाव न करे , को अपनाए जाने की आवश्यकता के बारे में जागरूक करने की दिशा में मील के पत्थर का काम किया। इसकी महता इस बात से स्पष्ट है कि पहली बार सामाजिक पर्यावरण के सन्दर्भ में Global Concern महसूस किया गया और ऐसा माना गया कि बेहतर सामाजिक पर्यावरण का विकास ही Sustaibble Development की दिशा एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हो सकता है। यह कान्फ्रेन्स Global Participation की दृष्टि से अपने आप मे अलग तरह की थी। इस कान्फ्रेन्स में 116 देशों के राजनयिक लगभग 7000 पत्रकार, 150 देशों के लगभग 10,000 अधिकारीगण और लगभग 15,000 जागरूक नागरिक एंव सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यह कान्फ्रेन्स अब तक की सबसे बड़ी कान्फ्रेन्स मानी जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव व गिरते हुए पर्यावरण के स्तर के मध्यनजर प्रत्येक राष्ट्रीय सरकार द्वारा इस कान्फ्रेन्स के बाद पर्यावरण बचाव व इसे बेहतर बनाने की दिशा में कुछ नीतियां अपनाई गई। 1992 की इस Earth Summit में कुछ कहावतों जैसे कि "Think globally, act globally" and "Take Rio back home" आदि का जन्म हुआ। इस प्रकार Rio Conference में विकास के सन्दर्भ में एक नए Paradigm जो कि Enviornment friendly विकास पर अधिक जोर डालता है, का विकास किया गया। इस नए Paradigm को Sustainable Development के नाम से जाना जाता है।

चिरस्थायी विकास: अर्थ एवं परिभाषा

साधारण तौर पर Sustainable Development से तात्पर्य विकास की एक ऐसी प्रक्रिया से है जो न केवल Eco-friendly है बल्कि पर्यावरण के अनुरूप बदलाव लाकर मानवीय जीवन में गुणात्मक सुधार को बढ़ावा देती है।
Brundtland Commission के अनुसार Sustainable Development वह “विकास है जो आज की पीढ़ी के उद्देश्यों की प्राप्ति, जिससे आने वाली पीढ़ियों की योग्यता, ताकि वे अपने आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें, से समझौता किए वगैर करती है।

चिरस्थायी विकास के सामने चुनौतियाँ

पर्यावरण प्रदूषण 

पर्यावरण प्रदूषण चिरस्थाई विकास के सामने एक गंभीर चुनौती है। इस प्रदूषण ने पूरे ग्लोब के पर्यावरण के लिए संकट खड़ा कर दिया है। इसके लिए निम्नलिखित पहलू जिम्मेदार हैं:-

ग्रीन-हाउस प्रभाव

फाासिल फ्यूलस (Fossil fuels) के जलने के कारण, वायुमण्डल में कार्बनडाइआक्साइड गैस की मात्रा में बढ़ोतरी हुई है और इससे पृथ्वी का वातावरण (Climate) काफी हद तक गर्म हो गया है। यह ग्रीन हाऊस प्रभाव कहलाता है। कुछ विद्वानों का मानना है पृथ्वी के वातावरण में यह गर्मी इसी तरह बढ़ती रही तो सन् 2030 तक पृथ्वी का तापमान 1.5 सैण्टीग्रेड से लेकर 4.5º सैटीग्रेड तक बढ़ जाएगा। Global Warming के कारण सर्द ऋतु छोटी और गर्मी की ऋतु बड़ी हो जाएगी जिसके कारण कृषि क्षेत्रा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त वनस्पति एंव वन्य-जीवन पर भी इसका विपरीत असर होगा।

Global Warming का जल-चक्र (Water cycle) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ता जाएगा, उतनी ही मात्रा में बर्फ अधिक पिघलेगी और अधिक बर्फ पिघलेगी तो अधिक जल नदियों में होगा जिससे नदियों के आस-पास के क्षेत्र जल मग्न होगें और लोगों को बाढ़ जैसी समस्या का सामना करना पड़ेगा। इसके साथ-साथ वह यह जल Sea Level को भी बढ़ा देगा और अगर Sea Level बढ़ा तो तटीय क्षेत्र (Costal areas) जल मग्न हो जाएगें जिससे मानवीय जीवन प्रभावित होगा।

ओजोन परत का विघटन

वायुमण्डल के समताप मंडल (Stratosphere) में ओजोन गैस (3) की एक परत पाई जाती है जो सूर्य से निकलने वाली हानिकारक किरणें , जिन्हें अल्ट्रावायलैट किरणें (Ultraviolet Rays) कहते हैं, केा अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखती है। लेकिन आजकल ओजोन परत का विघटन होने के कारण मानवीय जीवन के लिए असुरक्षा कk खतरा उत्पन्न हो गया है। ओजोन परत के विघटन का प्रमुख कारण रफैजिरेट्रस (Refrigerators) में क्लोरोफ्लोरो कार्बन (Chlorofloro Carbon) का बढ़ता हुआ प्रयोग है। वैज्ञानिक इस बात पर एकमत हैं कि अगर ओजोन गैस की परत का विघटन बढ़ा तो इसका नुकसान न केवल मानव को ही होगा बल्कि पशु, पक्षी पेड़ पौधे इत्यादि भी इसके नुकसान से नहीं बच सकेगें। इस परत का विघटन skin cancer को बढ़ावा देता है।

अम्लीय वर्षा

अम्लीय वर्षा भी पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा देती है। Fossil Fuels के जलने से वायुमण्डल में सल्फर व नाइट्रोजन के आक्साइडस उत्पन्न होते हैं। जब इन गैसों के ये आक्साइड (oxides) वायुमण्डल में सूर्य की रोशनी एंव नमीके साथ क्रिया (Reaction) करते हैं तो अम्ल का निर्माण करते हैं। सल्फर के आक्साइड सूर्य की रोशनी में पानी (अथवा नमी) से क्रिया करके सल्फ्यूरिक एसिड (H2So4) अर्थात् गन्धक का अम्ल पैदा करते हैं तथा नाईट्रोजन के आक्साइड नाइट्रिक एसिड (HNo3) अर्थात् शोरे के अम्ल को पैदा करते हैं। इसके पश्चात् वर्षा,धुन्ध, कुहरा या वर्फवारी के साथ जमीन पर आ जाते हैं। इसे अम्लीय वर्षा के नाम से जाना जाता है। इस वर्षा के कारण नदी व नालों की मछलियाँ मर जाती हैं तथा कुछ वृक्षों एंव फसलों की Growth रूक जाती है। इस प्रकार वन्य जीवन एंव वनस्पति के लिए यह अम्लीय वर्षा घातक सिद्ध होती है।

वायु-प्रदूषण 

औद्योगिकरण के विकास के परिणामस्वरूप उद्योग जगत का विकास हुआ तथा उत्पादन का स्तर भी काफी हद तक बढ़ा। लेकिन बढ़ते औद्योगिकरण ने पर्यावरण प्रदुषण की समस्या को अत्याधिक बढ़ावा दिया है। फैक्ट्ररियों की चिमनियों से, कारखानों से , वाहनों आदि से निकलने वाले धुएं ने वायु-प्रदुषण की समस्या को गम्भीर बना दिया है। इस धुएं में जहरीलें तत्वों के कुछ फ्यूमस (fumes of toxic substances) पाए जाते है जो स्वास्थय सम्बन्धी अनेक बिमारियों को जन्म देते हैं। पर्यावरण में लगातार वायु प्रदूषण की बढ़ोतरी स्वच्छ मानव जीवन के लिए जी का जंजाल बन चुका है।

जल-प्रदूषण

औद्योगिक विकास ने जैसे स्वच्छ हवा को प्रदुषित किया है वैसे ही जल भी इससे अछुता नहीं रहा है। आज मानव के सामने पीने योग्य पानी की अपर्याप्त मात्रा में उपलब्धता एक विकट समस्या बनती जा रही है। फैक्ट्ररी व कारखानों आदि ने स्वच्छ पानी को गन्दा बना दिया है।

वनों की कटाई

पर्यावरण प्रदूषण को जन आवश्यताओं की पूर्ति हेतु लगातार की गई वनों की कटाई से भी काफी बढ़ावा मिला है। वनों की कटाई ने पर्यावरण पर काफी गहर प्रभाव डाला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह समस्या वातावरण में अत्याधिक बदलाव पैदा करके वर्षा की मात्रा में कमी लाने में नुकसान करेगी। इसके परिणामस्वरूप पीने योग्य स्वच्छ पानी की supply पर गहरा असर पड़ेगा।

पैस्टीसाइडस

आधुनिक युग में विशेष तौर पर कृषि क्षेत्रा में (Pesticides) का प्रचलन व इस्तेमाल काफी हद तक बढ़ा है जिसने पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को गम्भीर बना दिया है। डब्लू. एच. ओ. (WHO) के अनुमान के अनुसार दुनिया के लगभग आधा मिलियन लोग बाहर के देशों से मंगवाई हुई पैस्टीसाइडस का जहर खा रहे हैं तथा उनमें से अधिकतर तीसरी दुनिया के देशों में निवास करते है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पर्यावरण का लगातार गिरता स्तर (Sustainable Development) के सामने मानव जीवन को बचाने की दिशा में एक अहमभूत चुनौती बन गया है।

जनसंख्या विस्फोट

जनसंख्या विस्फोट की भयावह समस्या आज Sustainable Development के सामने एक गम्भीर चुनौती के रूप में खड़ी है। विशेषकर विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि की दर में काफी बढ़ोतरी हुई है। जनसंख्या में अत्याधिक बढ़ोतरी 21वीं सदी की सबसे अहम विडम्बना है। प्रत्येक देश (विकसित एंव विकासशील) में जनसंख्या की वृद्धि का प्रभाव, विकास सम्बन्धी गतिविधियों, प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग, भूमि का प्रयोग, सिंचाई व्यवस्था आदि पर स्पष्ट रूप से झलकता है। 1970 से 1990 के अन्तराल में विश्व की जनसंख्या 40 प्रतिशत बढ़ गई है। हांलाकि गरीब देशों में Infant Mortality की भी अहम समस्या बनी हुई है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 34 विकासशील देशों में 10 प्रतिशत बच्चे पांच वर्ष की आयु तक मौत का शिकार हो जाते है।
विकासशील देशों में आज भी एक मिलियन से ज्यादा लोग अत्याधिक गरीबी में जीवनयापन करते हैं। लगभग 1ण्5 विलियन लोगों को इन देशों में स्वच्छ पीने योग्य पानी की उपलब्धता नहीं है। इसके साथ-साथ लगभग 2 विलियन लोगों को सफाई एंव स्वास्थय जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि मानवता का एक बहुत बड़ा भाग आज सामाजिक, आर्थिक , सांस्कृतिक राजनैतिक एंव पर्यावरण की दृष्टि से unsustainable है।

भूमि व पानी सम्बन्धी संसाधनों पर दबाव ?

भूमि व पानी जैसे संसाधनों पर लगातार बढ़ता दबाव भी ustainable Develpment के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। पिछले 40 वर्षों में संसार में पानी के संसाधनों का प्रयोग तीन गुने से अधिक हो गया है। संसार का काफी क्षेत्र जैसे कि उत्तरी अमेरिका, केन्द्रीय अमेरिका, दक्षिण -पूर्व एशिया एंव दक्षिण -पश्चिमी अमेरिका में पानी की भारी किल्लत है। संसार के काफी भागों से प्रति वर्ष लगभग 338 मिलियन टन औद्योगिक व मानवीय अवशिष्ट पदार्थ, कृषि खाद व पैस्टीसाइडस, अम्लीय वर्षा इत्यादि पानी जमीन को प्रदुषित करते हैं।

इसके अतिरिक्त आज औद्योगिकरण के प्रसार एंव बढ़ती जनसंख्या के लिए घर निर्माण हेतु उपजाऊ भूमि का काफी हद तक प्रयोग कर लेने के कारण कृषि योग्य भूमि पर दबाव बढ़ा है। इसके साथ जनसंख्या विस्फोट के कारण खाने की अधिक मांग व प्राकृतिक आपदाओं ने कृषि सम्बन्धी समस्या को ओर अधिक बढ़ा दिया है।

राजनेताओं का अपरिपक्व, स्वाथपूर्ण एव संकुचित दृष्टिकोण

Sustainale Development के सामने विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों के राजनेताओं का अपरिपक्व, स्वार्थपूर्ण एंव संकुचित दृष्टिकोण है। इस दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप इन देशों में राजनेता adhocism में विश्वास करते हैं। इनके द्वारा तैयार की गई नीतियों के उद्देश्य दूरगामी न होकर संकुचित होते हैं। यहां पर नेतागण आम आदमी के विकास की बजाय उसके शोषण में ज्यादा Busy रहते है। इसके साथ-साथ उनमें Commitment की भावना का भी अभाव है। इसी कारण इन देशों में Sustainble Development के सामने चुनौतियों को दूर करने के लिए बेहतर अधिनियमों के निर्माण में ये राजनेता अपने दृष्टिकोण के कारण फेल ही रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण प्रयोग

मानव के द्वारा आर्थिक विकास करने की होड़ में संसाधनों का अविवेकपूर्ण प्रयोग भी Sustainable Development के सामने एक मुख्य चुनौती है। मानव आज प्रकृति का अधिक से अधिक शोषण करके अपना विकास करना चाहता है। आज प्रकृति आर्थिक दिशा में प्रगति करने की सोच से मानवीय भूख (Human Greed) का शिकार है। इस सम्बन्ध में महात्मा गांधी का मानना है कि प्रकृति मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है लेकिन प्रत्येक मानव की ळतममक का नहीं। मानव प्राकृतिक संसाधनों का अधिक से अधिक शोषण व अविवेकपूर्ण प्रयोग करके आर्थिक विकास को आकाश की ऊचांईयों पर ले जाना चाहता है। मानव का यह लालच ही Sustainable Development की सबसे बड़ी चुनौती है।

चिरस्थायी विकास की चुनौतियों को दूर करने हेतु कार्ययोजनाएं

Sustainable Development के सामने जो चुनौतियाँ है उन्हें निम्नलिखित कार्ययोजनाएं अपनाकर कुछ हद तक दूर किया जा सकता है।
  1. जनसंख्या नियन्त्रण सम्बन्धी प्रबन्धन (Population Stabilizaion management)
  2. Non-Renewable संसाधनों का कम से कम प्रयोग (Little use of non-renewable Resources)
  3. पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा एंव जानकारी की उपलब्धता Providing Enviornmental education and Awareness
  4. Non-Polluting एवं Renewable ऊर्जा के स्त्रोतों का विकास (Development of non-polluting, renewable energy system)
  5. अवशिष्ट पदार्थो का पुन-चक्र (Recycling of wastes & residues)
  6. पर्यावरण सम्बन्धी कानूनों को update करना (Updating Enviornmental Laws)
  7. राजनीति की दूरदर्शिता (Far sighted vision of Politics)

जनसंख्या नियन्त्रण सम्बन्धी प्रबन्ध

Sustainable development के सामने सबसे प्रमुख चुनौती जनसंख्या विस्फोट की है।इस तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए कुछ ठोस उपाय करना अति आवश्यक है। जनसंख्या नियन्त्रण हेतु विशेषकर विकासशील देशों में कुछ ऐसी नीतियाँ तैयार की जाएं ताकि जनसंख्या की गति को स्थिरता प्रदान की जा सके।

Non-Rebewable संसाधनों का कम से कम प्रयोग

ऊर्जा के ऐसे स्त्रोत व साधन जिन्हें Renew (पुन: नया न कर पाना) ना किया जा सके, का कम से कम प्रयोग किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर कोयला, डीजल, पैट्रोल आदि संसाधनों Non-renewable होने के कारण, इन्हें Renew नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त ऐसे संसाधनों का प्रयोग प्रदुषण भी फैलाते हैं। अत: ऊर्जा के इन स्त्रोतों का प्रयोग कम से कम किया जाना चाहिए।

पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा एव जानकारी:-

पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा एंव जानकारी का जन-साधारण में फैलाव भी पर्यावरण प्रदुषण जैसी गम्भीर समस्या को काफी हद तक हल करने में सक्ष्म है। अशिक्षा एंव द्ररिद्रता के कारण विकासशील देशों में पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा एंव जानकारी का पर्याप्त अभाव है। इस अज्ञानता के कारण जल प्रदूषण , वायु प्रदूषण , पैस्टीसाइडस का अधिकाधिक प्रयोग , वनों की कटार्इ्र आदि समस्याओं को बढ़ावा मिला है। जन साधारण तक पर्यावरण संरक्षण व बचाव की आवश्यकता के विषय में जानकारी व शिक्षा प्रदान करके भी , इसे प्रदुषित होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में सभी स्कूलों एंव कालेजों में पर्यावरण सम्बन्धी विषय को अनिवार्य विषय के रूप में अपनाया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ गांव के स्तर पर भी सम्बन्धित अधिकारियों के माध्यम से अधिक से अधिक जानकारी दी जानी चाहिए।

Non-Polluting एवं त्मदमूंइसम ऊर्जा स्त्रोतों का विकास:-

Sustainable Development के सामने खड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए ऐसे ऊर्जा स्त्रोतों का विकास करना अत्याधिक आवश्यक है जिन्हें Renew किया जा सके तथा जो प्रदूषण भी न फैलाते हों। उदाहरण के तौर पर Solar Energy (सौर ऊर्जा) का प्रयोग इस दिशा में अधिकाधिक सहायक होगा। सौर ऊर्जा Renewable भी है तथा प्रदुषण भी नहीं फैलाती। इसके साथ पण-बिजली (पानी से बिजली तैयार करना) इसका अन्य उदाहरण है। ऐसे ऊर्जा स्त्रोतों का अधिक बढ़ावा देने से पर्यावरण प्रदूषण जैसी गम्भीर समस्या से निपटा जा सकता है।

अवशिष्ट पदाथों का पुनचक्र

अवशिष्ट पदार्थों का diposal सही प्रकार से न होने के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या काफी हद तक बढ़ गई है। इस समस्या का समाधान अवशिष्ट पदार्थों को कम से कम मात्रा में पैदा करने से हो सकता है। अवशिष्ट पदार्थ कम मात्रा में उत्पन्न हों, उसके लिए उनकी Recycling करना अति आवश्यक है। इस समस्या के समाधान में जन साधारण का योगदान आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है कि अवशिष्ट पदार्थों के उत्पन्न होते ही उसकी छंटाई - Edible (खाने योग्य) एंव Non Edible (न खाने योग्य) के रूप में की जानी चाहिए। खाने योग्य अवशिष्ट पदार्थों को पशु इत्यादि को खिलाकर गोबर आदि के रूप में परिवर्तित किया जा सकता हैं। Non-edible Products जैसे कि खाली माचिस, फ्यूज बल्ब, पोलिथिन प्लास्टिक सीसा व लोहे का प्रयोग मे न आने वाला समान, बेकार कागज, सभी प्रकार की पैकिंगस को सम्बन्धित फैक्ट्री में वापस भेजा जा सकता है जिससे उन सबका पुन: इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रकार हम Land Pollution जैसी समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।

पर्यावरण सम्बन्धी कानूनों में आवश्यक फेर बदल:-

पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्या को हल करने की दिशा में पर्यावरण सम्बन्धी कानूनों में आवश्यक फेरबदल भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। इन सभी कानूनों को Update करके आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाना अति आवश्यक है। इसके साथ-साथ इन कानूनों का पालन विशेष तौर पर विकासशील देशों में कड़ाई से किया जाना चाहिए और इन्हें लागू करते समय किसी प्रकार की ढील नही बरती जानी चाहिए।

राजनैतिक दूरदर्शिता:-

Sustainable Development की चुनौतियों को दूर करने में राजनैतिक दूरदर्शिता का होना भी अहमभूत भूमिका निभा सकता है।लगभग सभी विकासशील देशों में इसका प्राय: अभाव देखने को मिलता है। लेकिन इन देशों के राजनेताओं को स्वार्थपूर्ण बातों से ऊपर उठकर ऐसी नीतियों का निर्माण करना चाहिए जिनके परिणाम दूरगामी हो और जो पर्यावरण बचाव व संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।

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