कंपनी प्रवर्तक के कार्य, प्रकार, अधिकार, दायित्व

प्रवर्तक वह व्यक्ति हैं जो कम्पनी का निर्माण करता है या उसमें सहायता करता है। प्रवर्तक एक व्यक्ति, फर्म व्यक्तियों का समूह या कम्पनी कोई भी हो सकता है। लेकिन निर्माण या प्रवर्तन से संबंधित प्रत्येक व्यक्ति प्रवर्तक नहीं होता है। लेकिन अधिवक्ता पर वकील, जो प्रवक्ता की ओर प्रस्तावित कम्पनी के प्रवर्तन से संबंधित आवश्यक दस्तावेज तैयार करता है, कंपनी प्रवर्तक नहीं है। इसी प्रकार लेखापालक मूल्यांकनकर्ता, इंजीनियर जो पेशेवर रूप में सहायक होते हैं, प्रवर्तक नहीं माने जाते। 

कंपनी प्रवर्तकों के प्रकार

1. पेशेवर प्रवर्त्तक (Professional Promoter): पेशेवर प्रवर्तक वह व्यक्ति अथवा कम्पनी होते हैं जिनका मुख्य कार्य कमीशन के बदले में नई कम्पनियों की स्थापना/प्रवर्तन करना होता है। कम्पनी का प्रवर्तक करना इनका मुख्य व्यवसाय होता है।

2. सामयिक प्रवर्तक (Occasional Promoter): यह वह प्रवर्तक होते हैं जो अपने व्यवसाय के साथ-साथ कभी-कभी कम्पनी के प्रवर्तन का कार्य भी करते हैं। इनका प्रमुख व्यवसाय कम्पनियों का प्रवर्तन नहीं होता है।?

3. वित्तीय प्रवर्तक (Financial Promoter): यह प्रवर्तक प्रवर्तन कार्य में वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।

4. विशेष संस्थाएँ (Specialised Institutions): कुछ इस प्रकार की संस्थाएँ होती हैं जो कम्पनियों के निर्माण/प्रवर्तन के लिए स्थापित होती हैं।

कंपनी प्रवर्तक के कार्य

कौन-कौन से कार्य प्रवर्तकों को करने पड़ते हैं यह उनके द्वारा स्थापित की जाने वाली कम्पनी के परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए कम्पनी प्रवर्तकों के कार्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। इसके द्वारा किये जाने वाले कार्यो का नीचे दिया गया है:

1. नियोजनः- कम्पनी के निर्माण का विचार बनाना और उसकी सम्भावनाओं को देखना। क्या करना है, कब करना है कैसे करना है और कहाँ करना है आदि का निर्णय प्रवर्तक द्वारा किया जाता है। 

2. नामकरण- कम्पनी का नाम, उद्देश्य एवं पूंजी का निर्धारण करना। वह कम्पनी के उद्देश्यों तथा उसके पंजीकृत कार्यालय के स्थान का निर्धारण करता है। 

3. आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करना- कम्पनी किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की सम्पत्ति या व्यवसाय खरीदना चाहती है तो प्रवर्तक आवश्यकतानुसार सहायता करता है।

4. प्रपत्रों को तैयार करनाः- कम्पनी के कुछ प्रपत्रों को जमा करना पड़ता है। इनमें पार्षद सीमानियम तथा पार्षद अन्तर्नियम मुख्य है पार्षद सीमा नियम, पार्षद अन्तर्नियम एवं प्रविवरण तैयार करना।

5. पूँजी की व्यवस्थाः- पूंजी निर्गमन की व्यवस्था करना। प्रवर्तक का जनता से पूंजी प्राप्त करने के लिये प्रविवरण को तैयार तथा निर्गमन करते है। इसके बावजूद समामेलन के पूर्व में व्ययों को पूरा करने के लिये प्रारंभिक पूँजी की व्यवस्था करनी पड़ती है।

6. संचालकों की सलाहः- प्रवर्तक कम्पनी में प्रथम संचालकों की निर्धारित करते है तथा उनसे संचलाकों को उसके कार्य करने के लिये उनकी अनुमति लेते है। कभी कभी वे स्वयं कम्पनी के संचलाक बन जाते है।

7. नियुक्तियाँः- प्रवर्तक कम्पनी के बैंकर, अकेक्षक, विधि परामर्शदाता तथा दलाल की नियुक्ति करते है। कम्पनी के समामेलन के लिये प्रवर्तक पूर्व समामेलन या प्रारंभिक संविदा करते है।

कंपनी प्रवर्तकों के अधिकार 

1. वैधानिक प्रारम्भिक व्यय प्राप्त करने का अधिकार: कम्पनी के समामेलन के पूर्व प्रवर्तकों को विविध प्रकार के व्यय करने पड़ते हैं। ये व्यय कम्पनी के लिए उस समय किये जाते हैं जब कम्पनी का अस्तित्व नहीं होता और, परिणमस्वरूप, इनके सम्बन्ध में प्रवर्तकों तथा कम्पनी के बीच कोई अनुबन्ध नहीं होता। ऐसी दशा में, व्यावहारिक और नैतिक स्थिति यह है कि प्रवर्तकों के व्ययों का भुगतान प्राय: कम्पनी कर देती है। अन्यथा भविष्य में नई कम्पनियों की स्थापना के लिए प्रवर्तक आगे नहीं आयेंगे।

2. सह-प्रवर्त्तकों से आनुपातिक राशि प्राप्त करने का अधिकार: यदि प्रविवरण में मिथ्यावर्णन के आधार पर सह-प्रवर्तकों में से किसी एक प्रवर्तक को क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है तो वह प्रवर्तकों से आनुपातिक राशि प्राप्त कर सकता है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्रवर्त्तकों द्वारा कमाए गए गुप्त लाभों के लिए भी प्रवर्तक व्यक्तिगत तथा संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं।

3. पारिरमिक पाने का अधिकार (Right to Get Remuneration): प्रवर्तक कम्पनियों का निर्माण करने व चलाने में कठिन परिश्रम करते हैं इसलिए कम्पनियाँ उन्हें उनके प्रतिफल के रूप में पारिरमिक देती हैं। प्रवर्तकों द्वाराकी गई सेवाओं के लिए पारिश्रमिक उन्हें निश्चित धन के रूप में अथवा कम्पनी के लिए खरीदी गई सम्पत्ति को अधिक मूल्य पर बेचकर अथवा ऐसी सम्पत्ति पर एक निश्चित दर से कमीशन देकर अथवा कम्पनी में कोई महत्वपूर्ण पद देकर दिया जा सकता है। परिश्रमिक नकद अथवा अंशों एवं ऋण-पत्रों के रूप में भी दिया जा सकता है।

कंपनी प्रवर्तकों के दायित्व

प्रवर्तकों के महत्वपूर्ण दायित्वों को नीचे समझाया गया है-

1. गुप्त लाभ प्रकट करने तथा भुगतान करने का दायित्व : कम्पनी स्थापित होने के बाद कम्पनी की ओर से यदि प्रवर्तकों ने कोई गुप्त लाभ कमाया है, तो उन्हें इसका हिसाब कम्पनी को देना पड़ेगा और यह सब गुप्त लाभ कम्पनी को वापिस करना होगा।

2. बिना विवरण दिए हुए सम्पत्ति के क्रय से होने वाली हानि के लिए दायित्व : यदि प्रवर्तक कम्पनी को बिना पूरा विवरण दिए किसी सम्पत्ति का क्रय करते हैं और उससे कम्पनी को हानि होती है, तो कम्पनी इस हानि के लिए प्रवर्तकों पर मुकदमा चला सकती है और वे उनके लिए उत्तरदायी होंगे।

3. अनुबंधों के पूरा न होने तक दायित्व: कम्पनी की ओर से जो अनुबंध प्रवर्तक के साथ किए जाते हैं प्रवर्तक उनके लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है जब तक अनुबन्ध पूरा न हो जाए।

4. प्रविवरण में कपट के लिए दायितव : प्रवर्तक जो कम्पनी के प्रविवरण के निर्गमन में भाग लेते हैं, प्रविवरण में किए गए कपट के लिए अंशधारियों के प्रति उत्तरदायी होते है।

5. मृत होने पर दायित्व : यदि किसी प्रवर्तक की मृत्यु हो जाती है तो उसके द्वारा दिए जाने वाले रूपयों के लिए कम्पनी के प्रति उत्तरदायी होती है।

6. दिवालिया होने पर दायित्व : किसी प्रवर्तक के दिवालिया हो जाने पर उसकी सम्पत्ति कम्पनी के लिए उत्तरदायी होती है।

7. कपट या कर्त्तव्य-भंग की दशा में दायित्व : यदि प्रवर्तकों के कपट या कर्त्तव्य-भंग के कारण कम्पनी को कोई हानि उठानी पड़ती है तो प्रवर्तक इस हानि की पूर्ति के लिए उत्तरदायी होते हैं।

8. प्रविवरण की वैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति न होने पर दायित्व : यदि प्रविवरण की वैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण अंशधारियों को कोई हानि उठानी पड़ती है तो प्रवर्तक अंशधारियों के प्रति इस हानि के लिए उत्तरदायी होते है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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