महर्षि वाल्मीकि का इतिहास

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रामायण के रचनाकार महर्षि वाल्मीकि ने स्वयं अपने को प्रचेता का दशम पुत्र बतलाया है। महर्षि के विषय में अन्य प्रामाणिक जानकारी के सूत्रा का अभाव होते हुए भी यत्रा-तत्रा प्राप्त सामग्री के आधार पर उनके जीवन का एक संक्षिप्त चित्रा प्रस्तुत किया जा सकता है। महर्षि वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण के घर हुआ था, किन्तु उनके आचार-विचार ब्राह्मणोचित नहीं थे। उनका जन्म का नाम अग्नि शर्मा था। वह पिता की आज्ञा के उपरान्त भी वेदाभ्यास नहीं करते थे। एक बार उनके देश में बहुत समय तक पानी नहीं बरसा। अत: उनके परिवारीजन देश के अन्य लोगों के साथ दक्षिण दिशा को चले गये। जहां उनका परिवार विदिश वन में आश्रम बना कर रहने लगा । वहां अग्नि शर्मा का चोर-डाकुओं का साथ हो गया, और वह उस जंगल में लोगों को लूटने लगा। एक बार जंगल में उन्होनें सप्तर्षियों को देखा। वाल्मीकि ने उनको भी लूटना चाहा। मुनियों ने उन्हें रोकते हुए पूछा कि तुम ऐसा पाप-कर्म क्यों करते हो उन्होनें मुनियों को बताया कि उनके परीवारीजन आदि भूखे हैं तथा उन्हीें का भरण-पोषण करने के लिए वह गिरि कानन में घूमते हैं। इस पर निश्चल भाव से मुनियों ने कहा कि जाओ और अपने परिवार वालों से पूछो कि तुम जिनके लिए प्रतिदिन पापों का संचय कर रहे हो वे सब उन पापों के भागी है अथवा नहीं। वाल्मीकि ने अपने घर जाकर यह प्रश्न पूछा तो परीवारीजनों ने उत्तर दिया कि तुम्हीं पाप करते हो तथा तुम्हीं उसके फल के भागी होगे। ऐसा सुनकर वह लौटे और धनुषादि का परित्याग करके उन्होंने मुनियों को दण्डवत् प्रणाम किया तथा रक्षा करने की याचना की।इस पर मुनियों ने उन्हें एकाग्र मन से ‘राम राम’ को सदा उल्टा करके जपने का उपदेश दिया तथा यह कहकर चले गये कि जब तक हम पुन: लौटकर न आवें तब तक वह यही जपते रहें। वाल्मीकि ने एकाग्र मन से वैसा ही किया। इस प्रकार शान्त होकर बहुत समय तक बैठे रहने से उनके ऊपर ‘वल्मीक’ (दीमक की बाँबीं) एकत्रा हो गर्इ। समय व्यतीत होने पर सप्तर्षि फिर लौट कर आये, उन्होंने वाल्मीकि को उठाया और कहा कि हे मुनीश्वर तुम वाल्मीकि हो क्योंकि तुम्हारा यह दूसरा जन्म ‘वल्मीक’ से हुआ है।

प्रचलित जनश्रुति एवं कृत्तिवासीय रामायण के अनÍुसार वाल्मीकि का बचपन का नाम रत्नाकार था तथा जंगल में उनकी भेंट नारद से हुर्इ थी। महाभारत में भी कर्इ स्थानों पर वाल्मीकि के नाम का उल्लेख मिलता है। द्रोणपर्व में तो रामायण के एक श्लोक का उनके नाम सहित वर्णन भी मिलता है। रामायण के अनुसार वाल्मीकि एक ऋषि थे, जिनका आश्रम तमसा नदी के तट पर था। एक बार महर्षि नारद उनके आश्रम पर आये। वाल्मीकि ने उनसे किसी पुरूष के चरित्रा के विषय में पूछा ताकि वह उस एक काव्य लिख सकें इस पर नारद ने उन्हें राम का चरित्रा सुनाया। वाल्मीकि के जीवन के सम्बन्ध में एक घटना और प्रसिद्ध है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर प्रात: स्नान करने के लिए गये। वहां उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने निकट ही एक वृक्ष की डाल पर बैठे क्रोंच पक्षी के जोडे़ में से एक को मार दिया। मादा क्रोंच के शोक ने महर्षि वाल्मीकि के कोमल और दयालु हृदय को विचलित कर दिया। उन्होंने बहेलिये को बहुत काल तक दु:खी रहने का शाप दिया :

मा निषाद प्र्तिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत् क्रौचमिथुनादेकेकेकमवधी: काममोेिहितम्।।

वाल्मीकि का यह श्लोक विश्व का सबसे प्रथम काव्य माना गया है, तथा इसके कारण ही वाल्मीकि को आदि कवि माना जाता है। रामायण में उल्लेख है कि ब्रह्मा वाल्मीकि के इस श्लोकबद्ध काव्यानुभूति युक्त शाप को सुन कर प्रसन्न हुए और इस श्लोक की परम्परा को आगे बढ़ाने की इच्छा से उनके सम्मुख उपस्थित होकर आशीर्वाद देते हुए आदेश दिया कि वे इसी छन्द में, नारद के बताये अनुसार राम के चरित्रा पर आधारित एक काव्य की रचना करें।

जहां महर्षि वाल्मीकि के सम्बन्ध में किसी भी बाह्य साक्ष्य का अभाव है, वहां उन्होने रामायण में भी अपने जीवनवृत्त का भी कोर्इ उल्लेख नहीं किया है। फिर भी वाल्मीकि रामायण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वह राजा दशरथ के सखा थे। राम, लक्ष्मण और सीता ने उनके आश्रम में जाकर उनसे भेंट की थी। राम ने जब सीता को घर से निकाल दिया था तब वह महर्षि के आश्रम में जाकर रही थीं। यहीं पर उन्होंने लव और कुश को जन्म दिया था। लव और कुश ने वाल्मीकि की रामायण को बहुत ध्यान से सुना और कंठस्थ कर अश्वमेध यज्ञ के समय गाकर सुनाया तथा महर्षि वाल्मीकि के साथ उस समय सीता भी राम के दरबार में आर्इ थी, तथा महर्षि ने सीता की पवित्राता की साक्षी भरे दरबार में दी थी।

महर्षि वाल्मीकि के जीवन से सम्बन्धित इन घटनाओं की प्रामाणिकता निर्विवाद रूप से स्वीकार नहीं की जा सकती। अनेक आधुनिक शोधकर्ता वाल्मीकि को राम का समकालीन नहीं मानते तथा रामायण में प्राप्त उल्लेखों को मूल रामायण के अंश के रूप में स्वीकार नहीं करते। चित्राकूट के निकट राम के साथ भेंट होने की घटना का वर्णन भी केवल दाक्षिणात्य पाठ में ही मिलता है। किन्तु महर्षि के जीवन वृत्तान्त के सम्बन्ध में व्यक्त आशंकाओं एवं संदेहों के कारण उनके द्वारा लिखित पुस्तक के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता। आज भी प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रकाश डालने वाले ग्रन्थों में रामायण का स्थान बहुत ऊंचा है।

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