मानव संसाधन नियोजन क्या है?

अनुक्रम
मानवीय संसाधनों के नियोजन से अभिप्राय उस कार्यक्रम से है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों की प्राप्ति, विकास एवं उपयोग से सम्बन्धित है। इस कार्यक्रम मे जनशक्ति का मूल्यांकन, पूर्वानुमान तथा प्राप्ति उपलब्धि के स्त्रोतों की खोज की जाती है। इस प्रकार मानवीय संसाधनों का नियोजन श्रमिक वर्ग का विवेकपूर्ण उपयोग करने का माध्यम है। आधुनिक औद्योगिक जगत में बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा तकनीकी परिवर्तन के कारण मानवीय संसाधन नियोजन का महत्वपूर्ण स्थान है।

मानवीय संसाधन नियोजन की परिभाषा

  1. वेट्र (Vetter) के अनुसार - मानवीय संसाधन नियोजन, ‘‘वह प्रक्रिया’’ (Process) है जिसके द्वारा प्रबन्धक यह निश्चित करता है कि संस्था को अपनी उपलब्ध जनशक्ति स्थिति से इच्छित/वांछित जनशक्ति स्थिति की तरफ कैसे जाना चाहिये। नियोजन के द्वारा प्रबंन्ध उचित स्थान पर, उचित समय पर, उचित संख्या में, उचित ढंग से ऐसे व्यक्ति रखने का प्रयास करता है जो इस प्रकार काम करें कि संस्थान और व्यक्ति दोनों ही दीर्घकालीन लाभ प्राप्त कर सकें।’’
  2. ब्रूस पी0 कोलमन (Bruce P. Collman) के अनुसार - ‘‘जनशक्ति नियोजन, जनशक्ति की आवश्यकताओं तथा उन्हें पूरा करने के साधनों को निश्चित करने की प्रक्रिया है जिससे उपक्रम/संस्थान की समन्वित योजना चलायी जा सकें।’’
  3. मैकबीथ (Mc'Beath) के अनुसार - ‘‘जनशक्ति नियोजन मे दो चरण (Phases) सम्मिलित है। प्रथम चरण, नियोजनकाल में सभी प्रकार और स्तरों के श्रमिकों के लिए जनशक्ति की आवश्यकताओं के विस्तार में नियोजन से सम्बन्धित होता है, तथा द्वितीय चरण-नियोजित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी साधनों से संस्था को उचित तरह के व्यक्ति दिलाने के लिए जनशक्ति पूर्तियों के नियोजन से सम्बन्धित है।’’
  4. एडबिन बी0 गिसलर (Geislor, Edwin, B.) के अनुसार - ‘‘जनशक्ति नियोजन (भविष्य के लिए अनुमान लगाने, विकास करने तथा नियंत्राण करने सहित) वह क्रिया (Process) है जिसके द्वारा कोई संस्थान यह निश्चित करता है कि संस्थान में उचित स्थान पर उचित सस्थान मे ठीक संख्या में ठीक प्रकार से, ठीक तरह के व्यक्ति उन कार्यो को करने के लिए लगे है जिनके लिए आर्थिक दृष्टि से वे सबसे अधिक लाभकारी है।
जनशक्ति नियोजन/मानवीय संसाधन नियोजन की विभिन्न परिभाषाअेा से यह स्पष्ट होता है कि मानवीय संसाधन नियोजन के अन्तर्गत कर्मचारियों का प्रभावपूर्ण उपयोग, भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाने की आवश्यकता और इन्हे पूरा करने के लिए उचित नीतियों एवं कार्यक्रमों का विकास तथा समस्त क्रिया की समीक्षा एवं नियन्त्राण करना अवश्य सम्मिलित होना चाहिए।

मानवीय संसाधन नियोजन के उद्देश्य

  1. व्यक्तियो/कर्मचारियों के लिए काम के अवसर उपलब्ध करना,
  2. भविष्य में होने वाले कार्यो एव उनकी आवश्यकताओं को ज्ञात करना तथा जनशक्ति की आवश्यकताओं का पहले से पूर्वानुमान करना।
  3. वर्तमान में उपलब्ध मानवीय संसाधनों का विकास करना।
  4. वर्तमान एवं भावी कर्मचारियों का प्रभावपूर्ण उपयोग करना।
  5. आज की आवश्यकतानुसार मानवीय नियोजन को सफल बनाना।

मानवीय संसाधन नियोजन की आवश्यकता

एक सफल प्रबन्धक काम करने के वातावरण को अच्छा बनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त करने में सफल होता है। मानवीय संसाधन नियोजन की दृष्टि से पदों का सृजन करना, पद को समाप्त करना, पद कार्य आंबटन आदि आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उचित व्यक्ति को उचित कार्य पर नियुक्त करने के लिए मानवीय संसाधन नियोजन आवश्यक है। मानवीय संसाधन नियोजन की आवश्यकता के कारण है:-
  1. जनशक्ति की आवश्यकताओं का उचित पूर्वानुमान करना - किसी भी कर्मचारी को आवश्यकता से अधिक एवं रूचि के विरूद्ध कार्य नहीं सौपां जा सकता। जनशक्ति का पूर्वानुमान उत्पादन की मात्रा पर आधारित होता है। अधिक उत्पादन के लिए अधिक जनशक्ति की आवश्यकता होती है। लेकिन अन्य कारण भी जनशक्ति की मात्रा को प्रभावित करते है जैसे स्वचालित यन्त्रों का प्रयोग, कार्य के प्रति रूचि, आदि। प्रबंन्धकों को जनशक्ति आयोजन के समय संगठन के आन्तरिक और बाहरी स्त्रोत दोनों का ध्यान रखना चाहिए।
  2. भर्ती एवं चयन नीति को ठोस रूप प्रदान करने के लिए - मानवीय संसाधन नियोजन के द्वारा इच्छित मात्रा मे कर्मचारियों का चयन सम्भव होता है। उचित आयोजन के अभाव में योग्य व्यक्ति नहीं चुने जा सकते और जनशक्ति के लिए बार-बार साक्षात्कार, चयन आदि करते रहने से शक्ति, समय एवं धन का अपव्यय होता है।
  3. व्यवसाय की आकार वृठ्ठि के अनुुसार, जनशक्ति प्रबन्ध- व्यवसाय के आकार में वृठ्ठि के साथ-साथ श्रम-साधनों की अधिक आवश्यकता होती है। जनशक्ति आयोजन के आधार पर उचित मात्रा में, उचित योग्यता वाले तथा उचित पदों पर व्यक्ति नियुक्त किये जायेंगे।
  4. जनसंख्या की कमी अथवा जनाधिक्य के कारण होने वाले दुष्प्रभाव से बचना- संस्था में आवश्यकता से अधिक व्यक्तियों की नियुक्ति तथा आवश्यकता से कम व्यक्ति रखना दोनों ही हानिकारक है। जनशक्ति आयोजन से इन दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है।
  5. विकास कार्यक्रमों को प्रभावी बनाना - जनशक्ति आयोजन द्वारा वर्तमान में उपलब्ध कर्मचारियों की सेवाओं का अधिकतम एवं विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सकता है और कर्मचारी विकास की योजनाएँ बनाई जा सकती है।
  6. श्रम लागत में कमी करने के लिए- विकास कार्यक्रमों और नियोजित कर्मचारी नियुक्ति के प्रभाव के प्रति इकाई श्रम लागत कम की जा सकती है। इससे उत्पादन विवेकपूर्ण होता है।

मानवीय संसाधन नियोजन के तत्व

जनशक्ति आयोजन द्वारा कर्मचारियों की वर्तमान एवं भावी आवश्यकता का उचित अनुमान लगाया जा सकता है तथा ऐसे अनुमानों का मूल्यांकन भी किया जा सकता है। जनशक्ति आयोजन में तत्व सम्मिलित है-
  1. वर्तमान जनशक्ति की सही गणना करना - संस्था की योजनाएं तभी सफलतापूर्वक कार्य कर सकती है जब उसका आधार मजबूत हो। कार्यशील आयु वर्ग मे पायी जाने वाली जनसंख्या, जनसंख्या आंकड़ों का कार्य, तकनीक, व्यावसायिक-अभिरूचि सम्बन्धी जानकारी के आधार पर संस्था स्तर पर सही ढंग से जनशक्ति नियोजन किया जा सकता है।
  2. भावी जनशक्ति की आवश्यकताओ का अनुमान- वर्तमान तथा भावी जनशक्ति के अनुमान सही होने पर ही नियोजन हो सकता हैं। बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार भविष्य के लिए अनुमान लगाना आवश्यक है। उद्योगों, उत्पादन क्रियाओं तथा संचार सुविधाओं में होने वाले परिवर्तनों के अतिरिक्त जनशक्ति का अभाव अथवा वृठ्ठि का सही अनुमान फर्म के विकास कार्यक्रम को अधिक प्रभावी बना सकता है।
  3. जनशक्ति विकास की आवश्यकता का अनुुमान - जनशक्ति विकास के कारण श्रम की परिमाणात्मक आवश्यकता कम होती है। इससे श्रमिक की योग्याता, कार्य-कुशलता तथा कार्यदक्षता में वृठ्ठि होती है। विद्यमान जनशक्ति के विकास का आशय वर्तमान में होने वाले जनशक्ति अपव्यय को कम करना हैं।

मानवीय संसाधन नियोजन के स्तर

मानवीय संसाधन नियोजन के स्तरों को चार स्तरों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. राष्ट्रीय स्तर पर - राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय संसाधन नियोजन सामाजिक दृष्टिकोण से किया जाता है जिसके अन्तर्गत कर्मचारियों को पर्याप्त मात्रा में रोजगार उपलब्ध करने, आर्थिक उन्नति के कार्यक्रम, शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएं आदि दी जाती है।
  2. क्षेत्रीय स्तर पर - क्षेत्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारें ग्रामीण/कृषि, औद्योगिक कर्मचारियों तथा नौकरी पेशे वालो की आवश्यकताओं की पूर्ति मानवीय संसाधन नियोजन करता है।
  3. औद्योगिक स्तर पर - इस स्तर पर यह ध्यान रखा जाता है कि संख्या को अधिक से अधिक लाभ हो। इस स्तर पर यह प्रयास किया जाता है कि मानवीय संसाधन नियोजन का दुरूपयोग कम होता है तथा कर्मचारी वर्ग अपने कार्य मे पूरी तरह प्रशिक्षित हो तथा उद्योग की आवश्यकता की पूर्ति करने में समर्थ हो।
  4. व्यक्तिगत इकाई के स्तर पर - इस स्तर पर मानवीय संसाधनो की विभिन्न आवश्यकताओं को विभिन्न विभागों से जोड़ दिया जाता है।

मानवीय संसाधन नियोजन के रूप

मानवीय संसाधन नियोजन के तीन रूप हो सकते है:-
  1. अल्पकालीन नियोजन- अल्पकालीन नियोजन उन दशाओं में किया जाता है जब संस्था में किसी विधि पर प्रयोग किया जा रहा हो या नई तकनीकी के अनुसार प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध होने के समय तक की व्यवस्था करनी हो। अल्पकालीन आयोजन एक अथवा दो वर्ष की अवधि से अधिक के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  2. मध्यकालीन नियोजन - मध्यकालीन आयाजे न साधरणत: पर्यवेक्षकीय स्तर के पदों के लिए किया जाता है क्योंकि निम्नतम वर्ग के श्रमिकों को अधिक से अधिक प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। पर्यवेक्षकीय तथा प्रबन्धक स्तर के पदों पर कार्य करने वाले कर्मचारी या तो सीधी भर्ती द्वारा लिये जा सकते है अथवा पदोन्नति द्वारा। मध्यकालीन जनशक्ति आयोजन के लिए विस्तृत आंकड़ो की आवश्यकता नहीं होती। ऐसा नियोजन सामान्य अनुभव के आधार पर किया जा सकता है। 
  3. दीर्घकालीन नियोजन - दीर्घकालीन मानवीय संसाधन नियोजन द्वारा संगठन को दृढ़ आधार मिल जाता है। दीर्घकालीन उद्देश्यों की पूर्ति किसी संस्था का नीति सम्बन्धी निर्णय कहा जा सकता है। दीर्घकालीन आयोजन द्वारा व्यवसाय में स्थिरता लाने तथा प्रत्येक पद के लिए योग्य व्यक्ति को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। अल्पकाल अथवा मध्यमकाल आयोजन में तत्कालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए खाली पद की अपेक्षा किसी व्यक्ति को नियोजित करने की नीति हो सकती है। किन्तु दीर्घकालीन नियोजन की दृष्टि से प्रत्येक पद पर योग्य व्यक्ति ही होना चाहिए।

मानवीय संसाधन नियोजन से लाभ

यद्यपि भारतीय प्रबन्धक मानवीय संसाधनों के नियोजन के क्षेत्रा के प्रति अधिक सजग नहीं रहे है फिर भी कुछ बड़े उद्योग ने मानवीय संसाधनों का नियोजन किया है। उन्हें इसके बहुत लाभ प्राप्त हुए है। इस प्रकार के नियोजन के निम्नलिखित लाभ होते है।
  1. भविष्य की मानवीय संसाधनों की आवश्यकता का पूर्वानुमान लगाकर उपलब्ध जनशक्ति की पदोन्नति करने के लिए अवसर प्रदान होता है। परिणामस्वरूप उपलब्ध जनशक्ति को काम के प्रति प्रेरणा मिलती है और संस्था में अच्छा वातावरण बनता है।
  2. दीर्घकालीन मानवीय संसाधनों के नियोजन से उनकी आवश्यकताओं का पूर्वानुमान हो जाता है जिसके फलस्वरूप क्षतिपूरक लागतों (Compensation Cost) का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है।
  3. विशेषकर भारत जैसे देश के लिए मानवीय संसाधनों के नियोजन से एक विशेष लाभ और भी है, हमारे देश में एक ओर बेरोजगारी की समस्या है और दूसरी और प्रबन्धकीय योग्यताओं, निपुणताओं की बहुत अधिक कमी है। इसलिये इस विषम परिस्थिति में कार्यरत और काम पर लगने वाले कर्मचारियों/श्रमिकों की योग्यताओं और निपुणता का विकास करना बहुत आवश्यक है और यह विकास मानवीय संसाधनों के नियोजन से ही संभव है।
  4. मानवीय संसाधनों के नियोजन से उपलब्ध जनशक्ति की कमियों को निष्पादन मूल्यांकन (Performance Appraisal) द्वारा पता लगाकर प्रशिक्षण कार्यक्रम के द्वारा इस कमी को दूर किया जा सकता है।
  5. मानवीय संसाधनों के नियोजन से श्रमिकों एवं कर्मचारियों की कमियांँ (Shortages) तथा आधिक्यों (Surpluses) को दूर किया जा सकता है।

मानवीय संसाधनो के नियोजन की सीमाएँ

  1. पहले से पूर्वानुमान की कुछ कठिनाइयाँ और सीमाएं होती है जैसे-दीर्घकालीन पूर्वानुमान, तकनीकी, आर्थिक दशाओं और श्रमिकों की दशाओं में परिवर्तन होने के कारण सही नहीं होते है। परिणामस्वरूप मानवीय संसाधनों का नियोजन गलत होने की संभावना बनी रहती है।
  2. मानवीय संसाधनों के नियोजन के अन्तर्गत पूर्वानुमानों में त्राुटियाँ नियोजन के त्राुटिपूर्ण ढंग के कारण पाई जाती है।
  3. उच्च प्रबन्धकों को सहयोग/समर्थन न मिलने के कारण मानवीय संसाधनों के नियोजन के प्रति उत्तरदायी व्यक्तियो में निराशा की भावना फैलने का भय रहता है।
  4. संख्या से सेवानिवृत्त (Retire) होने वाले कर्मचारी, इस्तीफा और मृत्यु के कारण रिक्त स्थानों (Vacant posts) का पूर्वानुमान लगाना सम्भव हो सकता है किन्तु इस बात का पता लगाना कि किस कर्मचारी के स्थान पर किस कर्मचारी की आवश्यकता होगी, का पूर्वानुमान बहुत कठिन है।

मानवीय संसाधनों के नियोजन के लिए आधारभूत बातें

मानवीय संसाधनो की नियोजन क्रिया (Process) में वेट्टर (Vetter) ने सम्भावित आवश्यकताओं को मापने, पूर्वानुमान लगाने, नियंत्रण करने तथा नियोजन की क्रियाओं के महत्व पर बल दिया है। इस प्रकार मानवीय संसाधनो के नियोजन में चार आधारभूत बातें (Four Basic Steps) सम्मिलित है:-
  1. सर्वप्रथम मानवीय संसाधनों की आवश्यकताओं का पूर्वानूमान लगाना (Anticipating Human Resource Needs)
  2. कार्य की आवश्यकताओं एवं विवरणों का नियोजन करना (Planning of Job Requirement and Description)
  3. भर्ती के लिए पर्याप्त साधनों का चुनाव करना (Selecting adequate sources of Recruitment)
  4. आवश्यक मानवीय संसाधनों के स्वभाव/प्रकृति को निश्चित करने के लिए निपुणताओं का विश्लेषण करना (Analysing skill to determine the nature of Human Resource Needs)

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