मानव संसाधन विकास अवधारणा, प्रकृति एवं क्षेत्र

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आम बोलचाल की भाषा में ‘मानव संसाधन विकास’ (ह्यूमन रिसोर्ट डिवेलपमेंट) के नाम से लोकप्रिय हो रही यह अवधाराण किसी संगठन में कार्यरत कर्मिकों के विकास तथा कल्याण को सर्वाधिक महत्व प्रदान करती है। मानवों को संगठन का मूल्यवान तथा असीमित क्षमताओं से युक्त, संसाधन मानकर उसके सर्वांगीण विकास की प्राथमिकता प्रदान करने की यह अवधाराणा कुछ दशक पूर्व ही स्वीकार की गई थी। मानव संसाधन के विकास की ओर सर्वप्रथम औद्योगिक संस्थानों में ध्यान दिया गया। पश्चिमी देशों में आरम्भ हुई औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् मनुष्य (श्रमिक) को कल कारखानों में मशीन की तरह उपयोग में लाने की प्रवृत्ति सभी देशों मे विद्यमान थी। कच्चे माल को वास्तविक उत्पादन के रूप में प्रस्तुत करने हेतु मशीन तथा मनुष्य दोनों महत्वपूर्ण संसाधन माने जाते थे। ए. डब्ल्यू. टेलर की ‘वैज्ञानिक प्रबन्ध’ विधि के माध्यम से जहाँ एक ओर मशीन, तकनीक, पर्यवेक्षण तथा कार्य प्रणाली को सुदृढ़ किया जाने लगा वहीं श्रमिकों को आर्थिक लाभ प्रदान करके अधिक उत्पादन के प्रयास किए जाने लगे किन्तु हार्वर्ड विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री जार्ज एल्टन मेयो द्वारा सन् 1927-32 में अमेरिका की वेस्टर्न इलेक्ट्रिकल्स कम्पनी में किए गए होथोर्न प्रयोगों के पश्चात् परम्परागत प्रबन्ध मान्यताएँ दम तोड़ने लगी। प्रयोगों के पश्चात् यह सिठ्ठ हो गया कि किसी भी संगठन में कार्यरत कर्मचारियों की कार्यक्षमता तथा संतुष्टि वहाँ के वातावरण, पर्यवेक्षण, नेतृत्व सहित सामाजिक-मानसिक कारणो पर भी अत्यधिक निर्भर करती है। स्पष्ट है कि मनुष्य को मशीन की तरह उपयोग मे लाने की अपेक्षा उसकी भावनाओं, व्यवहार, रूचि, समूह-स्थिति इत्यादि को समझना आवश्यक है।

मानव संसाधन विकास की अवधारणा कार्मिकों के विकास को सर्वांगीण दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास करती है। इस अवधारणा में यह मानकर चला जाता है कि कर्मिकों की संतुष्टि तथा उत्पादन बढ़ाने से पूर्व सम्बन्धित संगठन में ऐसा वातावरण होना चाहिए जिसमें कार्मिकों की क्षमताएं स्वत: ही बढ़ती रहें इसके लिए आवश्यक है कि कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, पदोन्नित सहित अन्य विविध पक्षों पर गंभीरता पूर्वक ध्यान दिया जाए। इस अवधारणा को किसी संगठन में क्रियान्वित करने से पूर्व एक सुस्पष्ट तथा सुसंगठित मानव संसाधन विकास विभाग या इकाई की स्थापना की जाती है जो मानव संसाधन से सम्बन्धित सभी कार्य कुशलतापूर्वक पूर्ण कर सके। इस प्रकार मानव संसाधन विकास वह प्रक्रिया है जिसमें किसी संगठन के कर्मचारियों की एक नियोजित ढंग से इस प्रकार से सहायता की जाती है कि वे नवीन कार्य आवश्यकताओं एवं उच्चतर दायित्वों के प्रति कौशल प्राप्ति तथा एक संगठनातमक संस्कृति को विकसित करने में रूचि ले सकें जिससे कि संगठन के लक्ष्य तथा कार्मिकों की संतुष्टि का स्तर ऊँचा हो जाए। सामान्यत: मानव संसाधन विकास प्रक्रिया के निम्नलिखित लक्ष्य होते है:-
  1. कार्मिकों की व्यक्तिगत क्षमताओं को विकसित करना;
  2. कार्मिकों के वर्तमान पद दायित्वों के अनुरूप उसकी क्षमताओं को विकसित करना;
  3. कार्मिकों से भविष्य में अपेक्षित दायित्वों के अनुरूप उसकी क्षमताओं को विकसित करना;
  4. कार्मिकों तथा इकाई के मध्य आपसी सामंजस्य स्थापित करना;
  5. संगठन की प्रत्येक इकाई के मध्य आपसी सामंजस्य स्थापित करना;
  6. संगठन के सम्पूर्ण स्वास्थ्य को उच्च स्तरीय बनाना, जिससे कि व्यक्तिगत तथा सामूहिक क्षमताओं में अभिवृठ्ठि हो तथा संगठन को लक्ष्य प्राप्ति में सहायता मिल सके।
मानव संसाधन विकास प्रक्रिया के तहत किसी कार्यालय, कारखाने या संगठन को इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है कि कार्मिक विकास हेतु एक उपयुक्त वातावरण उत्पन्न हो सके। इसे संगठनात्मक विकास कहा जाता है। कार्मिकों को पर्याप्त परामर्श तथा अवलोकन के माध्यम से सहायता प्रदान की जाती है साथ ही प्रत्येक कार्मिक की क्षमताओं का आकलन तथा उसके द्वारा संपादित कार्य का वास्तविक मूल्यांकन भी किया जाता है। इसी प्रकार कार्मिकों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, पुरस्कार प्रदान करने के अतिरिक्त आवश्यकतानुसार कार्य स्थल या कार्य की प्रकृति भी परिवर्तित की जाती है। संगठन की प्रत्येक इकाई के बीच समन्वय बनाने के लिए संचार की व्यावहारिक नीतियाँ भी क्रियान्वित की जाती है। अनुसंधान तथा नवाचारों को भी पर्याप्त स्थान दिया जाता है। औद्योगिक सम्बन्धों को मधुरता प्रदान करने के लिए ‘ओक्टापैक’ संस्कृति (Openness, Confrontation, Trust, Authenticity, Proaction, Autonomy, Collaboration) को प्रमुखता से लागू किया जाता है।

उपयुर्क्त वर्णित अवधारणा संगठनात्मक स्तर पर मानव संसाधन विकास को वर्णित करती है। व्यापक तथा मानसिक स्तर पर मानव संसाधन विकास में निम्नांकित पक्ष समाहित हैं, जिनका विकास किया जाना चाहिए-
  1. शिक्षा एवं आवास
  2. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
  3. समाज कल्याण
  4. सामाजिक सुरक्षा
  5. सामाजिक न्याय तथा सामाजिक कानून
  6. मानवाधिकार
  7. पोषण एवं पेयजल
  8. रोजगार तथा समानता।
  9. अन्य सामाजिक सेवाएँ।
अत: राष्ट्रीय विकास का मुद्दा हो या किसी सार्वजनिक या व्यक्तिगत संगठन विकास का, केवल भौतिक साधनों या पूंजी पर निर्भर नहीं किया जा सकता। बल्कि मनुष्य सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान मशीनी युग में भी मानवीय प्रयासों के अभाव में कोई कार्य सम्पन्न नहीं किया जा सकता, क्योंकि मशीनों के संचालन हेतु भी मानव संसाधन की आवश्यकता है। जिस प्रकार किसी भी राष्ट्र या औद्योगिक, व्यापारिक एवं प्रशासकीय संगठन में मानव संसाधन सबसे महत्त्वपूर्ण अवयव होता है। अन्य संसाधन जैसे भूभाग पूंजी, सामग्री, इमारतें, मशीनरी आदि तब तक उत्पादन एवं संचालन में असमर्थ हैं जब तक सुयोग्य व्यक्तियों द्वारा किसी सेवा एवं उत्पादन हेतु सक्रिय नहीं किये जाते। मानव मस्तिष्क ही प्रकृति की एकमात्रा ऐसी संरचना है जिसमें चिंतन मनन एवं कार्य की क्षमता है किसी भी औद्योगिक, व्यापारिक एवं प्रशासकीय संगठन में गुणवत्ता एवं उत्पादन उसमें कार्यरत कार्मिकों की प्रतिभा एवं क्षमता पर ही निर्भर करता है। मानवीय संसाधन विकास, अर्थात् श्रमिकों एवं कार्मिकों की क्षमता प्रतिभा एवं ज्ञान में वृठ्ठि ही किसी उद्योग या संगठन का सांगठनिक विकास के लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है।

टी. एन. छाबरा का कथन सर्वथा उचित है कि किसी कार्यालय के विकास के लिए उसमें कार्यरत मानवों का विकास सर्वप्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि है अत: भारत की बौठ्ठिक, तकनीकी एवं उद्यमी प्रतिभा का लाभ पूर्णरूपेण तभी संभव है जब मानव संसाधन विकास के द्वारा इन प्रतिभाओं को और विकसित किया जाए। प्रस्तुत अध्ययन में हमारा संबंध दूसरे स्तर अर्थात् व्यस्टि स्तर से है।

प्रो0 फ्रेड्रिक हरबोसन के अनुसार, ‘राष्ट्रो के धन का अन्तिम आधार मानवीय साधन है। पूंजी तथा प्राकृतिक साधन उत्पादन के निष्क्रिय साधन है। इसके विपरीत मानवीय साधन सक्रिय है। ये पूंजी को जमा करते है, प्राकृतिक साधनों का शोषण करते है, इस रूप में एक प्रबन्धक जितना अधिक मानवीय साधनों को जानने तथा प्रयोग करने में कार्यकुशल होगा उतना ही अधिक वह अपने कार्य में कुशल होगा। वास्तव में किसी भी उपक्रम की कार्यकुशलता उसके मानवीय साधनों की श्रेष्ठता पर ही आधारित होती है। ‘उत्पादन की तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो, उत्पादन सामग्री चाहे कितनी भी उच्च स्तर की हो, इन सभी का अधिकतम कुशलतापूर्वक प्रयोग बिना अच्छे कर्मचारियों के नहीं हो सकता। केवल उत्पादन ही नहीं बल्कि व्यवसाय के क्रय, विक्रय, वित्त, अनुसंधान आदि सभी विभागों की कार्यकुशलता मानवीय साधनों की कार्यकुशलता पर आधारित होती है। हर संस्था की समस्या यह है कि किस तरह श्रमिकों का हार्दिक सहयोग प्राप्त किया जाए।

टी. एन. छाबड़ा का मत है कि मानव संसाधन विकास एक नवीन अवधारणा है जिसकी उत्पति 1970 दशक के मध्य हुई, 1980-1990 मे इसे पर्याप्त लोकप्रियता मिली, भारत में भी 1985 मे केन्द्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थापना की गई समष्टि (Macro) एवं व्यस्टि (Micro) दोनों स्तरों पर इस धारणा का प्रयोग किया जाता है। जहाँ प्रथम से इसका अभिप्राय एक राष्ट्र के नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से संबंधित सभी विकास कार्यो से है वहाँ द्वितीय से अभिप्राय एक संगठन में कार्यरत कार्मिकों एवं प्रबंधको के विकास से है ताकि गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृठ्ठि हो सके।

सांगठनिक संदर्भ में मानव संसाधन विकास कार्मिकों के क्षमता एवं प्रतिभा, विकास गत्यात्मकता, प्रोत्साहन, प्रभाविकता, मनोबल, कुशलता, गुणवत्ता, विकास के लिए एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। बाजारी स्थितियों में परिवर्तन, कार्मिकों की बढ़ती आकांक्षाएं एवं प्रबंधीय व्यवस्था में परिवर्तन का सामना करने के लिए मानव संसाधन, विकास अति आवश्यक है।

विभिन्न विद्वानों जैसे T.V. Rao, Ishwar Dayal के अनुसार मानव संसाधन विकास, ‘‘एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जो एक संगठन के कार्मिकों के लिए एक नियोजित ढंग से निम्न विषयों में सहायक हैं।’’
  1. कार्मिकों के वर्तमान एवं भविष्य के कृत्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक क्षमताओं में वृद्धि करना।
  2. व्यक्ति की आय योग्यताओं का विकास एवं व्यक्ति और संगठन के विकास के उद्देश्य के लिए आंतरिक गुणों की खोज एवं विकास करना।
  3. एक सांगठनिक संस्कृति का विकास करना जिसमें निरीक्षक एवं अधिनस्थ संबंध, टीम कार्य का विकास एवं विभिन्न उप-इकाईयों में सहयोग घनिष्ठ, व्यावसायिक कल्याण, प्रोत्साहन एवं कार्मिकों के स्वाभिमान में बढ़ोतरी हो।
ईश्वर दयाल के अनुसार:- According to Ishwar Dayal मानव संसाधन विकास से अभिप्राय है:
  1. व्यक्ति को उसके कृत्य एवं पर्यावरण में सही स्थापित करने के तरीके।
  2. सही कार्मिक को अपने कार्य के विभिन्न पक्षों में समाहित होना।
  3. कार्मिकों की योग्यताओं में वृद्धि में अत्यधिक रुचि रखना आदि।
अत: संक्षेप में मानव संसाधन विकास वह विषय है जो मानव कार्मिक एवं प्रबंधकों तथा संगठन के विकास से संबंध रखता है।

मानव संसाधन के विकास की प्रकृति

व्यवस्था स्वरूप -

T.N.Chhabra ने मानव संसाधन विकास प्रकृति के दो पक्षों पर विचार किया है। मानव संसाधन विकास को विस्तृत मानव संसाधन व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु कहा जा सकता है। जिसका संबंध संगठन के सदस्यों की प्रतिभा के विकास एवं प्रशिक्षण से है। मानव संसाधन विकास संगठन की एक उप-व्यवस्था है जो अन्य उप-व्यवस्थाओं जैसे उत्पादन, वित्त, बाजार आदि से एकीकृत है। मानव संसाधन विकास पर एक पूर्ण व्यवस्था के रूप में भी विचार किया जा सकता है जिसमें कई अन्य परस्पर निर्भर उप-व्यवस्थाएं हैं। जिनमें निष्पादन मूल्यांकन, क्षमता मूल्यांकन, भूमिका विश्लेषण, प्रशिक्षण, कृत्य संवृद्धि, संचार आदि शामिल हैं। एक मानव संसाधन व्यवस्था के रेखांकन के लिए इन उप-व्यवस्थाओं में सही संपर्क की आवश्यकता है। यह सम्पर्क कई तरह से स्थापित किए जा सकते हैं जो कि व्यवस्था के घटकों पर निर्भर करते हैं। 2ण् व्यवहारिक विज्ञान की जानकारी (Behavioural Science Knowledge): दूसरा पक्ष है व्यवहारिक विज्ञान का ज्ञान। मानव संसाधन विकास लोगों के विकास के लिए व्यवहारिक विज्ञान के सिद्धान्त एवं अवधारणाओं का प्रयोग करता है। व्यक्तियों, समूहों एवं संगठनों के विकास के लिए मानव संसाधन विकास मनोविज्ञान, समाज शास्त्रा एवं मानव विज्ञान से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग करता है।

मानव संसाधन विकास एक सतत प्रक्रिया है।

मानव संसाधन विकास is a continuous process. मानव संसाधन विकास  एक गत्यात्मक पूर्व-सक्रिय प्रक्रिया है। तथा यह कार्मिकों के निरन्तर विकास में विश्वास रखता है एवं जोर देता है ताकि एक संगठन के कार्य संचालन मे आने वाली असंख्य चुनौतियों का सामना कर सके। मानव संसाधन विकास  तंग, प्रक्रिया, नीतियां विभिन्न संगठनों की परिस्थितिनुसार भिन्न-भिन्न होती है। मानव संसाधन विकास  उप-व्यवस्थाएं सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों से गहरी जुड़ी होती है।

जीवन गुणवत्ता

मानव संसाधन विकास की प्रासांगिकता मानव जीवन विकास की गुणवत्ता में है। सांगठिनक स्तर पर इसका संबंध कार्य जीवन में सुधार (कार्मिकों का) ताकि कार्मिकों में संतुष्टि प्राप्ति एवं उत्पादन के उच्च स्तर को प्राप्त किया जा सके।

मानव संसाधन विकास का क्षेत्र

मानव संसाधन विकास मानव संसाधन के उपार्जन, विकास, मुआवजे, रख-रखाव और प्रयोग से संबंध रखता है। इसका प्रयोग कार्य व्यक्ति, समुह एवं सांगठनिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मानव संसाधन का सही तरीके से विकास करना है। यदि मानव संसाधन प्रबंधन से इसकी तुलना की जाए तो यह उसका एक भाग हैं वास्तव में मानव संसाधन विकास  मानव संसाधन के सही प्रबंधन में सहायक है तथा साथ ही मानव संसाधन विकास  प्रबंधन के सभी कार्यों के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है।

मानव संसाधन विकास  क्षेत्र का हम निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णन कर सकते हैं-
  1. मानव संसाधन के विकास के लिए निहित आयामों एवं संभावनाओं में कार्मिकों की नियुक्ति।
  2. संगठन के वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकास की क्षमता रखने वाले कार्मिकों का चयन।
  3. कार्मिकों का व्यक्ति समूह के सदस्य एवं संगठन के सदस्य के रूप में निष्पादन का विश्लेषण, मूल्यांकन एवं विकास करना।
  4. निष्पादन सलाह, निष्पादन परामर्श एवं निष्पादन साक्षात्कार के द्वारा कार्मिकों की अपने उच्च अधिकारियों से शिक्षण में सहायता।
  5. सभी कार्मिकों का नई तकनीकी ज्ञान एवं प्रतिभा की प्राप्ति के लिए प्रशिक्षण।
  6. कार्मिकों में प्रबंधन एवं व्यवहारिक प्रतिभा एवं ज्ञान का विकास।
  7. कार्मिकों की जीवनचर्या नियोजन एवं विकास प्रोग्राम लागू करना।
  8. उत्तराधिकारी नियोजन करना एवं कार्मिकों का इस हेतु विकास करना।
  9. सांगठनिक विकास के माध्यम से कार्मिकों का व्यवहार परिवर्तन।
  10. समूह गत्यात्मकता अन्र्त एवं अन्तरा समूह अन्त:क्रिया के द्वारा कार्मिक शिक्षण।
  11. सामाजिक एवं कार्मिक अन्त:क्रिया एवं प्रोग्रामों के माध्यम से सीखना।
  12. कृत्य चक्र, कृत्य समृद्धिकरण एवं कृत्य सशक्तिकरण द्वारा ज्ञान अर्जित करना।
  13. कार्मिकों के प्रबंधन में सहभागिता।
  14. गुणवत्ता सहभागिता एवं कार्मिकों के लिए प्रबंधन में सहभागिता के लिए स्कीमों आदि द्वारा सीखना।
संक्षेप में मानव संसाधन विकास  का क्षेत्र मानव संसाधन विकास की समस्त गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।

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