विदेशी सहायता क्या है?

In this page:


विदेशी आर्थिक सहायता से आशय पूँजी और प्राविधिक ज्ञान का रियायती शर्तो पर एक देश से दूसरे देश को किया जाने वाला हस्तांतरण है। हस्तांतरण की यह प्रक्रिया विश्व पूँजी और श्रम बाजार में प्रचलित शर्तो से आसान शर्तो पर होता है। विदेशी आर्थिक सहायता की अवधारणा में एक निहित तत्व यह है कि हस्तांतरित होने वाले संसाधनों में सहायता का तत्व अवश्य होना चाहिए। यदि किसी राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र को कठोर शर्तो पर संसाधनों का भारी मात्रा में हस्तांतरण किया जाता है तो उसे विदेशी आर्थिक सहायता की कोटि में नहीं रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि प्राप्त सहायता प्राप्तकर्ता देश के लिए लाभदायक हो तथा आर्थिक सहायता की मात्रा भले ही कम हो, लेकिन सहायता की प्रकृति इस प्रकार अवश्य होनी चाहिए जो प्राप्तकर्ता देश के आर्थिक विकास में स्थायी अनुकूल प्रभाव डाले। सरल रूप में यह कहा जा सकता है कि ‘‘विदेशी आर्थिक सहायता बाह्य पूँजी का वह अंश है जो किसी देश को रियायती शर्तो पर ऋण तथा अनुदान व भेंट के रूप में प्राप्त होती हैं।’’ शर्त के अनुसार ऋण का भुगतान प्राप्तकर्ता देश को स्वदेशी मुद्रा में या विदेशी विनिमय के माध्यम से आसान किश्तों पर तथा नीची ब्याज दर पर करना पड़ता है। दूसरी ओर अनुदान व भेंट के रूप में प्राप्त विदेशी सहायता का भुगतान प्राप्तकर्ता देश को नहीं करना पड़ता है।

विदेशी सहायता का औचित्य

सभी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की आकांक्षा तीव्र आर्थिक विकास करना है और वे पिछड़ेपन से जन्य आर्थिक विकास स्तर के अन्तराल को अत्यन्त कम समय में घटाना चाहते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में वे विदेशी सहायता की अपेक्षा करते हैं। विदशी सहायता का औचित्य इस प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता हैं।

1. विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विकास प्रक्रिया के प्राथमिक चरण में विदेशी आर्थिक सहायता का औचित्य इस कारण माना जाता है, क्योंकि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के विकास प्रयासों के कार्यान्वयन में एक महत्वपूर्ण समस्या विनियोग-योग्य संसाधनों के कमी की होती हैं। विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्तकर्ता देश के विनियोग-योग्य संसाधनों में वृद्धि उत्पन्न करती हैं। इस माध्यम से गरीब देश पूँजीगत उपकरण, प्राविधिक ज्ञान एवं आवश्यक वित्त प्राप्त करके अपनी विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करने में समर्थ हो जाते हैं।

2. आधुनिक युग में उत्पादन तकनीक का तेजी से सुधार हो रहा है। विदेशी सहायता के माध्यम से विकासशील अर्थव्यवस्था को दुर्लभ उत्पादन तत्व के रूप में तकनीकी ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। उत्पादन तकनीक का परम्परावादी और अपेक्षाकृत कम सक्षम होना विभिन्न विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए सामान्य बात है। विदेशी सहायता के माध्यम से सरलतापूर्वक विकसित देशों के विभिन्न क्षेत्रों के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी का आयात किया जा सकता है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से उनके विकास अनुभव और दीर्घकालीन शोध प्रयासों के धनात्मक परिणामों का सुगमतापूर्वक विकासशील देशों में हस्तांतरण किया जा सकता हैं। श्रेयस्कर तो यही होता है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के अनुरूप प्रौद्योगिकी का विकास घरेलू क्षेत्रों में ही किया जाये। लेकिन यह प्रयास अधिक समय की अपेक्षा करता है और इतने अधिक समय तक विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में प्रतीक्षा करने की स्थिति में नहीं है। अतएव वे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के शोध अनुभवों का लाभ प्राप्त कर सकती हैं।

3. विश्व के विभिन्न विकासशील देश अपने प्रारम्भिक विकास चरणों में बहुधा गैर-निर्मित पदार्थो, विशेषकर कच्चे पदार्थो का निर्यात करते हैं और बदले में विभिन्न निर्मित वस्तुओं का आयात करते हैं। विदेशी व्यापार की अपेक्षित अवस्था तो वही है जब निर्यातों से आयातों का भुगतान हो जाये। लेकिन विकासशील देशों के आयात उनकें निर्यातों की तुलना में अधिक होते हैं। इस कारण उनके समक्ष विदेशी विनियम प्राप्त करने की समस्या बनी रहती है। विदेशी आर्थिक सहायता के माध्यम से वे विदेशी विनियम की प्राप्ति कर लेते हैं और भुगतान संतुलन के घाटे को पूरा करने या कम करने में सफल हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त विदेशी सहायता द्वारा वे अपनी उत्पादक क्रियाओं का प्रसार करके आयात प्रतिस्थापन की और अग्रसर हो सकते हैं।

सहायता देने वाले देशों की विचारधारायें

सम्प्रति सहायता प्रदान करने वाले देशों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है : सहायता संघ के देश, समाजवादी देश और अन्य देश। सहायता संघ के देशों और समाजवादी देशों की सहायता प्रदान करने के प्रति पृथक्-पृथक् विचारधारायें हैं।

सहायता संघ के पश्चिमी देशों में आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, जापान, नीदरलैण्ड, नावें, स्वीडेन, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका सम्मिलित हैं। ‘अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक’ तथा ‘अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ’ द्वारा दी जाने वाली सहायता भी इसी वर्ग की है। इनकी आर्थिक सहायता का दृष्टिकोण इस उपागम पर आधारित है कि विश्व के बहुत बड़े क्षेत्रा में गरीबी और दुर्दशा की स्थिति विद्यमान है और कहीं की भी गरीबी सर्वत्रा की समृद्धि के लिए खतरा है। अतएव विकसित देशों को आर्थिक सहायता के माध्यम से गरीब देशों की गरीबी का निवारण करना चाहिए। गरीबी से आशय समाज में ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की कमी से है जो व्यक्ति की आधरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बद्ध हैं। प्रारम्भिक अवस्था में उन वस्तुओं और सेवाओं की पूर्ति का पक्ष कृषिक्षेत्रा से सम्बद्ध होता है। अत: सहायता के प्रति पश्चिमी विचारधारा यह मानती है कि सहायता कार्यक्रमों में कृषि विकास कार्यक्रमों को वरीयता दी जानी चाहिए। यह विचारधारा आधारिक अवस्थापना के अतिरिक्त औद्योगिक विकास के लिए निजी क्षेत्राक को अधिक महत्व देती है और यह मानती है कि सरकार का उत्पादन क्षेत्रा में प्रवेश या उसके द्वारा उद्योगों का स्थापित किया जाना संसाधनों की बर्बादी हैं। आर्थिक सहायता के प्रति समाजवादी देशों की विचारधारा उक्त पश्चिमी उपागम से पृथक् है। समाजवादी देशों-जिनमें बुलगारिया, हंगरी, चेकोस्लोवकिया, पोलैंड, यूगोस्लाविया और रूस सम्मिलित हैं की आर्थिक सहायता नीति इस उपागम पर आधारित है कि दीर्घकाल तक विभिन्न विकासशील अर्थव्यवस्थायें औपनिवेशिक शासन के अधीन रही हैं और वे पश्चिमी पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के उद्योगों के लिए कच्चे पदार्थो के पूर्ति का स्रोत और उनके निर्मित सामानों का बाजार मात्रा रही हैं। इस कारण उनकी गरीबी का मुख्य कारण उनका दीर्घकालीन आर्थिक शोषण रहा है। अतएव आर्थिक सहायता के प्रति समाजवादी विचारधारा का लक्ष्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को शोषण से मुक्त करना हैं। इसके लिए वे इन अर्थव्यवस्थाओं के आधारभूत क्षेत्रों को विकसित करने के लिए अधिक तत्परता प्रदर्शित करते हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की निर्भरता का कारण उनमें अवस्थापनागत सुविधाओं और आधारिक उद्योगों की कमी है। विदेशी आर्थिक -सहायता के माध्यम से प्रगति होने पर विकासशील अर्थव्यवस्थायें प्राप्त सहायता का भुगतान आन्तरिक उद्योग-निर्मित सामानों के निर्यात से कर सकेंगी। अत: उन्हें ऋणों के भुगतान के लिए विदेशी विनिमय की आवश्यकता में कमी आ जायेगी। उस प्रक्रिया से सहायता और व्यापार का सामंजस्य स्थापित हो जायेगा।

सहायता संघ और समाजवादी देशों के अतिरिक्त आस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, ईराक, ईरान आदि ऐसे देश हैं जिनकी आर्थिक सहायता उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही हैं। उस विश्लेषण से यह प्रतीत होता है कि आर्थिक सहायता के प्रति दो भिन्न-भिन्न प्रमुख विचारधारायें हैं और विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के सहायता-कार्यक्रम अपनी-अपनी विचारधाराओं से विशिष्टत: प्रभावित होते हैं। वे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की समस्याओं के निदान के लिए अपनी-अपनी नीतियों को अधिक श्रेयस्कर और प्रभावी सिद्धकरने का प्रयास करते हैं। परन्तु विचारधारा की विभिन्नता के बावजूद उनमें एक समान अंतर्निहित तत्व यह है कि वे सभी आर्थिक सहायता देने के लिए अग्रसर हो रहे हैं।

भारत में विदेशी सहायता

स्वतंत्राता के बाद भारत ने प्रत्येक समूह से उनकी पृथक् विचारधाराओं के बावजूद आर्थिक सहायता प्राप्त की है। स्वतंत्राता के समय भारत का आर्थिक विकास स्तर निरपेक्षत: नीचा था। इसी कारण कृषि उत्पादन का स्तर भी अत्यन्त नीचा था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कृषि, उद्योग, परिवहन, अनुसंधान और प्रोद्योगिकी में भारी विनियोग की आवश्यकता थी। स्वतन्त्राता के समय रिजर्व बैंक में सिक्के, स्वर्ण एवं अन्य कीमती धातुओं के रूप में शीघ्र विनियोग योग्य 11800 करोड़ रूपये की राशि थी। इसके अतिरिक्त 1273 करोड़ रूपये की धनराशि युद्ध पूर्व ऋण, ब्रिटिश साम्राज्य के पास जमा डालर, ब्रिटिश शासन की देनदारी के रूप में प्राप्त हुयी। देश के विभाजन के फलस्वरूप विस्थापितों के पुनर्वास और विविध अपरिहार्य विकास कार्यो में व्यय के कारण उक्त धनराशि अधिक समय के लिए पर्याप्त न थी। इस कारण भारत ने विदेशी सहायता के प्रति प्रोत्साहनात्मक दृष्टिकोण अपनाया। 1949.50 से विदेशी सहायता का प्रवाह आरम्भ हुआ।

विदेशी व्यापार से 1950.51 तक प्राप्त राशि और अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी धनराशि के अतिरिक्त 32 करोड़ रूपये का ऋण विदेशी सहायता के रूप में हम ले चुके थे। अप्रैल, 1951 से नियोजित आर्थिक विकास की प्रक्रिया आरम्भ हुई जिसमें विविध प्रयोजनों के लिए अधिक विनियोग की आवश्यकता अनुभव हुई। स्वतन्त्राता के बाद और विशेषकर नियोजित विकास प्रक्रिया में हमारें निर्यात व्यापार की मात्रा और संरचना में उल्लेखनीय सुधार हुआ। उत्पादन तथा उत्पादिता बढ़ी। लेकिन इसके बाद भी विविध आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में प्रभूत मात्रा में विदेशी आर्थिक सहायता लेनी पडी। विदेशी सहायता का उपयोग ऊर्जा, इस्पात उद्योग और कृषि विकास के लिए किया गया। लगातार कई वर्षो तक खाद्यान्नों के आयात के लिये पी. एल. 480 के माध्यम से आर्थिक सहायता ली गयी। स्वतन्त्राता के बाद 1993.94 तक सहायता प्रद़ान करने वाले सभी देशों के द्वारा भारत को कुल 133982 करोड़ रूपये की पूँजी अधिकृत की गयी।

विदेशी सहायता के प्रभाव

विदेशी सहायता के निष्पादन स्तर की भौतिक माप करना कठिन है, क्योकि विभिन्न उद्योगों और क्षेत्रों के विकास एवं प्रसार में विदेशी सहायता के निष्पादन स्तर को गुणात्मक आधार पर राष्ट्र के विकास लक्ष्यों और विदेशी सहायता में निहित संकल्पनाओं के आधार पर आँका जा सकता है। भारत में विदेशी सहायता ने कई महत्वपूर्ण निर्माण एवं विकास की योजनाओं में सहायता की है। इसने मशीनरी, खाद्यान्न और अन्य विकास सामग्री की आपूर्ति में सहायता की। रूस की सहायता द्वारा भिलाई और बोकरों इस्पात कारखानों को स्थापित किया गया। दुर्गापुर और राउरकेला इस्पात काखानों के लिए क्रमश: इंग्लैंड़ और पश्चिमी जर्मनी से सहायता मिली। तेल परिष्करण इकाइयों के लिए रूस और इंग्लैंड से सहायता मिली है। कागज, उर्वरक, विद्युत और अल्यूमिनियम उद्योगों के लिए अमरीका से सहायता मिली है। प्रत्येक पंचवष्र्ाीय योजना में सार्वजनिक विनियोग का एक भाग विदेशी सहायता पर निर्भर रहा है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विदेशी सहायता ने विनियोग स्तर बढ़ाने, परियोजनाओं को पूरा करने और तकनीकी सेवाओं के रूप में भारत की सहायता की हैं।

विभिन्न अर्थव्यवस्थायें विकास प्रयासों द्वारा विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मध्य व्याप्त आर्थिक विकास स्तर के अंतराल की समस्या घटाना चाहती हैं। गरीबी, बेरोजगारी और भुगतान सन्तुलन में घाटे की समस्या का निदान करना चाहती हैं। इसी सन्दर्भ में विदेशी सहायता का प्रयोग किया गया है। यदि इन उद्देश्यों के परिप्रेक्ष्य में विदेशी सहायता का विश्लेषण किया जाये तो यह प्रतीत होता है कि इससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके हैं। नियोजनकाल में यद्यपि भारत के विविध सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में प्रगति हुई है, लेकिन कई विकसित देशों की तुलना में इसका आय अन्तराल बढ़ गया है। पिछले तीन दशक में भारत में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर
1.25 प्रतिशत प्रतिवर्ष से अधिक नहीं रही है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति अत्यन्त अनुकूल रहती है। सतत् आ रही विदेशी सहायता के बावजूद भारत में गरीबी, बेरोजगारी और अल्प विकास की समस्या बनी है।

आर्थिक सहायता से विविध उद्योगों की स्थापना और आयात प्रतिस्थापन के प्रयासों के बाद भी भारत की निर्धनता और विदेशों पर आयात की निर्भरता बढ़ती गयी। फलत: विदेशी विनियम के सन्दर्भ में सतत् घाटे की स्थिति बनी है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं से मिलने वाली सहायता निर्धारित मान की तुलना में अत्यन्त कम रही है। विकसित देशों से गरीब देशों को मिलने वाली सहायता अंकटाड द्वारा निर्धारित दरों से भी कम रही है। 1964 में अंकटाड ने निर्धारित किया था कि विकसित देशों को अपने सकल राष्ट्रीय उत्पादन का कम-से-कम एक प्रतिशत भाग सहायता के रूप में विकासशील देशों को देना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1974 में यह प्रस्ताव पारित किया कि विकसित देशों को अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 0.7 प्रतिशत भाग विकासशाील देशों को सहायता के रूप में देना चाहिए। लेकिन विकसित देशों से मिलने वाली सहायता इस घटी हुई दर के तुल्य भी न हो सकी। विकसित देशों से मिलने वाली सहायता उनके सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 0.35 प्रतिशत के आस-पास ही रही है। यह अनुमान किया गया है कि वर्तमान दशक में उनके सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 0.40 प्रतिशत भाग से अधिक राशि विदेशी सहायता के रूप में न आ सकेगी। इस प्रकार अब विकासशील देशों का विकास विकसित देशों की तथाकथित उदारता के आधार पर नहीं हो सकता हैं।

इस विश्लेषण से प्रतीत होता है कि विदेशी सहायता की उपयोगिता विकास सन्दर्भो में कम हो जाती है। विदेशी सहायता अपने आप में विकासशील देशों के लिए सहायता हो सकती है, बशर्ते कि किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो और सहायता मूल रूप में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली के अनुरूप हो। सहायता का मुख्य भाग अनिबद्ध सहायता के रूप में होना चाहिए। ताकि प्रयोग में किसी प्रकार की बाध्यता न हो। विदेशी सहायता प्रचलित विकास प्रविधि को गति प्रदान करने के लिए होनी चाहिए, न कि अपने देश के आर्थिक प्रारूप को आरोपित करने के लिए। सहायता प्रदान करने वाले राष्ट्रों को अपने गैर-आर्थिक उद्देश्यों को भी आरोपित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इन सबके साथ यह भी आवश्यक है कि विदेशी सहायता के रूप में मान्य विकसित राष्ट्र अपने सकल राष्ट्रीय उत्पादन का कम-से-कम 0.7 प्रतिशत भाग अवश्य दें और आख्रथक सहायता के साथ-साथ सहायता देने वाले देशों की मन:स्थिति भी सहायता देने की हो

इस समय विश्व के 140 देश विकासशील देश की कोटि में है जिनमें विश्व की कुल 75 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन वे विश्व की सम्पत्ति के केवल 20 प्रतिशत भाग के स्वामी हैं। विश्व के संसाधनों पर समग्र मानवीयता का अधिकार है। देश की राजनैतिक सीमा बनाकर प्रकृतिजन्य सम्पदा से विश्व के बहुत बड़े जन-समूह को वंचित करना मानवता के हित में नहीं हैं। प्रकृति जन्य सम्पदा पर सबका समान अधिकार है। इस परिप्रेक्ष्य में यह सोचना नितान्त भ्रामक है कि एशिया, अफ्रीका, लेटिन अमेरिका या दक्षिणी गोलार्ध के गरीब देशों के रहतेµजहाँ कि अधिकांश जनसंख्या गरीबी, कुपोषण, भुखमरी ओर अशिक्षा का शिकार हैµदुनिया के कुछ विकसित हिस्से दीर्घकाल तक समृद्धि और वैभव पूर्ण विलासी जीवन बिता सकते हैं।

विदेशी सहायता की विसंगतियाँ

भारत को विदेशी सहायता के माध्यम से विभिन्न विकास कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में सुविधा मिली है। आधारिक अवस्थापना के निर्माण, कृषि विकास और प्राविधिक शिक्षा के सुधार में उल्लेखनीय सुविधा मिली हैं। लेकिन विदेशी सहायता अब विभिन्न समस्याओं का विशिष्ट कारण भी बन रही है। विदेशी सहायता जन्य कुछ विशिष्ट कठिनाइयों और समस्याओं का यहाँ विश्लेषण किया गया है-

1.विदेशी सहायता के माध्यम से विभिन्न सहायता प्रदान करने वाले देश प्राप्तकर्ता देश पर विभिन्न प्रकार के अनपेक्षित आख्रथक और राजनैतिक दबाव डालते हैं। यद्यपि ऋण समझौतों पर इस प्रकार की कोई दृश्य शर्त नहीं होती है। परन्तु ऋण प्राप्त करने वाले देश को ऋण प्राप्ति हेतु विभिन्न कसौटियों को पूरा करना होता है। सहायता प्रदान करने वाला देश यह उम्मीद करता है कि ऋण लेने वाला देश एक विशेष प्रकार की आख्रथक नीति अपनाये। विश्व बैंक द्वारा भारत के आख्रथक विकास की समीक्षा करना और उसके बाद रुपये के मूल्य में 36ण्5 प्रतिशत के अवमूल्यन की सिफारिश करना उनके अप्रत्यक्ष दबाव का एक प्रमुख उदाहरण है। 1971 में भारत पर पाकिस्तान के आक्रमण के समय अमरीका ने भारत को विदेशी सहायता बन्द कर देने की धमकी दी थी। तारापुर का ऊर्जा संयंत्रा विदेशी सहायता न मिलने का शिकार रहा। इसके लिए अपेक्षित र्इंधन मिल सकने की सम्भावना अभी हाल के प्रयासों के फलस्वरूप हुई है। बहुधा विदेशी सहायता की प्रकृति अनिश्चित होती है। इस परिप्रेक्ष्य में किसी भी विकास योजना के किसी समय स्थगित या अवरुद्ध हो जाने की सम्भावना सदैव बनी रहती है। विदेशी सहायता पर निर्भरता जितनी ही अधिक होती है, सहायता देने वाले देशों का दबाव और धमकी उतनी ही अधिक और अधिक प्रभावी होती है।

2. सहायता प्रदान करने वाले देशों की एक मुख्य प्रकृति यह होती हे कि वे प्रदत्त सहायता का मुख्य भाग शर्तयुक्त सहायता के रूप में देते हैं। विदेशी सहायता के रूप में सहायता प्राप्तकर्ता देश विदेशी सहायता का प्रयोग किसी विशेष परियोजना के लिए तथा किसी विशेष देश से सामग्री खरीदने के लिए ही कर सकते हैं। शर्तयुक्त सहायता के माध्यम से ऋणदाता देश अधिक मजबूत स्थिति में हो जाता है और इसके माध्यम से वह अपने अप्रचलित साज-सामान, मशीनरी और अप्रचलित तकनीक को विकासशील देशों में भेज देता है। पहले विदेशी सहायता के नाम पर मशीन या अन्य सामग्री देना और फिर मशीनों के कल-पुर्जे एवं उसके रख-रखाव की सामग्री को ऊँची कीमत पर बेचना और लाभ कमाना विकसित अर्थव्यवस्था के लिए सामान्य बात है। शर्तयुक्त सहायता के माध्यम से अपने देश के कूड़े की कीमत लेना और अपना वर्चस्व स्थापित करना ही विकसित अर्थव्यवस्थाओं की नियति है। 1965.66 और 1966.67 में अमरीका ने पी0एल0 480 के माध्यम से सहायता के नाम जो गेहूँ हमें दिया, यद्यपि उस समय हमें अत्यन्त जरूरत थी, वह संभवत: वहाँ जानवरों के प्रयोग के ही लायक था। विदेशी सहायता के छद्मवेश में उसने इससे भी लाभ अख्रजत कर लिए। इसी प्रकार कुल सहायता का बहुत छोटा भाग अनुदान और शर्तहीन सहायता के रूप में मिला है। भारत की कुल प्रयुक्त विदेशी सहायता का केवल 31.9 प्रतिशत भाग शर्तहीन सहायता और केवल 11.3% भाग अनुदान के रूप में मिला है।

3. सामान्य रूप में विकसित अर्थव्यवस्थाओं का यह दावा होता है। कि वे ऋण प्राप्तकर्ता देश की जरूरत की प्रकृति के अनुसार ऋण देते हैं। लेकिन वास्तविक कार्यविधि इससे भिन्न होती है। सहायता के रूप में ऋण लेने वाले देश में विभिन्न विकसित अर्थव्यवस्थाओं और मौद्रिक संस्थाओं के प्रतिनिधि आते हैं और वे सहायता की योजनाओं पर विचार करते हैं जो किसी-न-किसी रूप में सहायता प्रदान करने वाले देश के हितों की रक्षा करते हैं अथवा उसके लिये लाभदायक होते हैं। सहायता प्रदान करने वाले देश या उसके विशेषज्ञ इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि सहायता इस प्रकार दी जाय ताकि सहायता ग्रहण करने वाले देश में सहायता देने वाले देश की प्रशंसा हो, उत्कृष्टता स्थापित हो और सहायता लेने वाले देश का आख्रथक ढांचा सहायता दाता देश के आख्रथक ढाँचे का अनुकरण करें। इस प्रक्रिया से वस्तुत: सहायता प्राप्त करने वाला देश, सहायता देने वाले देश के आर्थिकउपनिवेश बन जाते हैं, जबकि दावा यह किया जाता है कि सहायता सम्बद्ध देश की आवश्यकता के अनुरूप प्रदान की जाती है। इसे उनके हित के लिए दिया जाता है। हस्त-शिल्प, कुटीर उद्योगों, ग्रामीण आयुर्वेदीय स्वास्थ्य सेवाओं तथा परम्परागत उत्पादन तकनीक को विकसित करने के लिए अपेक्षित विदेशी सहायता नहीं मिली। उन्नत पश्चिमी स्वास्थ्य सेवाओं और प्राविधिक ज्ञान के लिए विदेशी सहायता मिली। इसके दूरगामी प्रभाव इस प्रकार रहे है कि भारतीय हवा, मिट्टी और पानी में पले-बढ़े युवा डाक्टर ओर प्रविधि-विशेषज्ञ जब देश के विकास प्रयास में कुछ योगदान करने लायक हो जाते है तो विदेश में जाकर रहने के प्रति विशेष तत्परता दिखाने लगते हैं। विभिन्न बड़े संयंत्रों में विदेशी सहायता की बैसाखी पर सवार विदेशी तकनीशियन और प्रशासनिक अधिकारी अपना वर्चस्व बनाये रखते हैं।

4. विदेशी सहायता के माध्यम से आयातित मशीनरी ओर उपकरणों के लिए भारत को ऊँची कीमत देनी पड़ी है। उससे यह संदेहास्पद प्रतीत होता है कि भारत को जो आख्रथक सहायता मिली है, उसका मुख्य प्रेरक तत्व विकास को प्रोत्साहन देना रहा है। सत्यता तो यह प्रतीत होती हे विदेशी सहायता में कोई शर्त ऐसी अवश्य होती हे जो सहायता प्रदान करने वाली सरकार के हितों को पोषण करती है। टेरेसा हेयटर ने अपनी एक पुस्तक ‘एंड ऐज इम्पीरियलिज्म’ में लिखा है की सहायता बिना शर्त के वित्तीय संसाधनों का विकसित देशों से विकासशील देशों के लिए हस्तांतरण नहीं हैं। उनके अनुसार साधारणतया सहायता से सम्बद्ध शर्तें स्पष्ट रूप से और प्रत्यक्षत: उन सरकारों के हितों की पूख्रत के लिए होती हैं जो सहायता प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए साधारणतया सहायता के दाता देश के वस्तुओं और सेवाओं की खरीद के लिए सहायता का उपयोग किया जाना चाहिये। “अमरीका की सहायता को अमरीकी जहाजों से ही ले जाना चाहिये।” इस कथन में पूर्ण सत्यता न भी हो तो भी यह विदेशी सहायता कि नियति का स्पष्ट परिचायक है।

5. विदेशी सहायता के सन्दर्भ में एक मुख्य समस्या विदेशी ऋण के पुनर्भुगतान के कठिनाई की है। पुनभ्र्ाुगतान की प्रक्रिया में पूँजी और ब्याज वापसी की समस्या है। अधिकतर विदेशी सहायता से प्राप्त राशि उन परियोजनाओं में प्रयुक्त हुई जिनकी परिपक्वता अवधि अधिक है। फलत: प्रतिफल प्राप्ति में विलम्ब होता है और दूसरी ओर ब्याज एवं पूँजी सहित ऋण भार बढ़ता जाता हैं। इस परिप्रेक्ष्य में सम्प्रति कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न ही गयी है जिसके कारण कुल विदेशी सहायता का बहुत बड़ा भाग विदेशी ऋण के पूँजी और ब्याज के भुगतान के प्रति चला जाता है। एक ओर ऋण के कम लाभदायक उपयोग और अधिक परिपक्वता अवधि ओर दूसरी ओर ब्याज की ऊँची दर और कठिन भुगतान की शर्तें आदि के कारण पूँजी पर प्रतिफल अत्यन्त कम हो जाता है। इस कारण ऋणों की वापसी की समस्या अत्यन्त कठिन होती जा रही है। वर्ष 1985.86 तक विदेशी सहायता के रूप में प्राप्त कुल 46565.3 करोड़ रुपये में से 1985.86 तक कुल 14495 करोड़ रुपये की राशि ऋण भुगतान के रूप में वापस की जा चुकी हैं। प्रत्येक वर्ष विदेशी सहायता की प्रभूत धनराशि विदेशी ऋण के परिशोधन में ही चली जा रही है। वर्ष 1985.86 में प्राप्त कुल विदेशी सहायता 5398.9 करोड़ रुपये में से 1366.6 करोड़ रुपये ऋण परिशोधन के रूप में ही चली गयी। अर्थात् उस वर्ष प्राप्त कुल विदेशी सहायता का केवल 75 प्रतिशत भाग ही विकास कार्यों में प्रयोग किया जा सका है। इससे यह प्रतीत होता है कि विदेशी सहायता का परिमाण बढ़ने के बावजूद विकास कार्यों में प्रयोज्य विदेशी सेवाओं का बोझ उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है जिसके भुगतान के लिए हम अपने दैनिक प्रयोग की विभिन्न अति-आवश्यक वस्तुयें यथा चाय, चीनी, तिलहन, कहवा आदि का निर्यात अत्यन्त नीची कीमतों पर करते हैं।

उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारत में विदेशी सहायता का अधिक सकारात्मक प्रभाव नहीं रहा है। वस्तुत: देश को सहायता नहीं, बल्कि व्यापार की वृद्धि करके विकास मार्ग को तीव्र करना होगा। आन्तरिक संसाधनों को देश कि आवश्यकताओं के अनुरुप आन्तरिक प्रौद्योगिकी के आधार पर विदोहन कर उत्पादन और उत्पादिता बढ़ायी जा सकती है। उक्त समस्त विश्लेषण यह निर्देश करता है कि कोई भी सहायता और अनुदान बिना दबाव व शर्त के नहीं दिया जाता है। यदि कदाचित् ऐसा हो भी तो अनुदान देने वाले देशों में मनोवैज्ञानिक अहंकार पैदा हो जाता है। अनुदान प्राप्तकर्त्ता की प्रकृति याचक जैसी हो जाती है जो उसकी मन:स्थिति ओर कार्यविधि पर किसी-न-किसी रूप में अवांछित प्रभाव डालती है।

Comments