वृत्ति नियोजन एवं विकास का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएँ

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वृत्ति प्रबन्ध के दो महत्वपूर्ण तत्व वृत्ति नियोजन तथा वृत्ति विकास है। अपने सामान्य अर्थ में वृत्ति प्रबन्ध में कर्मचारियों द्वारा स्वयं वृत्ति के प्रति संवेदनशीलता एवं प्रयत्न तथा संगठन द्वारा वृत्ति प्रबन्ध में उन मार्गो का नियोजन एवं विकास किया जाता है जिनके द्वारा कर्मचारी अपनी वृत्ति आकांक्षाओं को पूरा करेगा तथा इसमें कर्मचारियों को सिखाना, मन्त्रणा, उसकी पदोन्नति की सम्भावनाओं का मूल्यांकन, पदों पर कर्मचारियों का चयन जैसे कार्य सम्मिलित होते है। वृत्ति प्रबन्ध के विकास पक्ष द्वारा किसी संगठन में कर्मचारियों की योग्यताओं तथा उपलब्ध पदों एवं पारितोषक में संतुलन स्थापित किया जाता है।

वृत्ति प्रबन्ध, प्रबन्ध विकास का पर्याय नहीं है। ये दोनो अवधारणायें एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। प्रबन्ध विकास का उद्देश्य वैयक्तिक तथा समूह अध्ययन द्वारा प्रबन्धकों की कुशलता एवं योग्यता में अभिवृठ्ठि के कार्यक्रमों की व्यवस्था करना है। दूसरी ओर वृत्ति प्रबन्ध का लक्ष्य ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण करना है जो कर्मचारियों की ध्येय प्राप्ति एवं उनके संतोष में सहायक हो। वृत्ति प्रबन्ध कर्मचारीगण एवं संगठन दोनों की सहयोगी एवं सयुक्त क्रिया है।

अभी कुछ समय पूर्व तक वृत्ति नियोजन से तात्पर्य कर्मचारी द्वारा स्वंय वृत्ति सम्बन्धी विचार एवं निर्णयन से लिया जाता था। ऐसा माना जाता था कि वृत्ति व्यक्तिगत विषय है और स्वयं व्यक्ति अपनी पद-स्थिति को विकसित करने के लिए उत्तरदायी है। वृत्ति नियोजन केवल कर्मचारी का कार्य है तथा संगठन की इसमें कोई भूमिका नहीं है। किन्तु अब यह विचारधारा स्वीकार नहीं की जाती। कर्मचारियों के वृत्ति नियोजन का उत्तरदायित्व अब संगठन पर विशेषरूप में आ गया है। इस उत्तरदायित्व के अधीन यह अनुभव किया गया है कि अपने कर्मचारियों के लिए वृत्ति नियोजन करना केवल कर्मचारियों के ही हित संरक्षण के लिए नहीं, अपितु संगठन के लाभ के लिए भी आवश्यक है। किसी संगठन में सम्मिलित होने पर कर्मचारी अपने वृत्ति को ध्यान में रखते है तथा यह आशा करते है कि संगठन उनके वृत्ति में आवश्यक सहायता एवं सहयोग प्रदान करेगा। ऐसा सहयोग कर्मचारियों के लिए वृत्ति विकास के कार्यक्रमों द्वारा प्रदान किया जाता है।

वृत्ति विकास को, वृत्ति प्रबन्ध के अंग के रूप में वैयक्तिक योग्यता का अपेक्षाओं एवं कृत्य पारितोषक से संतुलन कहा गया है। यह संगठन के दृष्टिकोण से संभावित कृत्य-श्रृंखला के नियोजन की प्रक्रिया है, ऐसा नियोजन जिसके अधीन यह निश्चय किया जाता है कि एक कर्मचारी अपने आजीविका काल में किन पदों तक पहुँच सकता है तथा उसमें इस बीच आवश्यक कृत्य-कौशल उत्पन्न करने के लिए किन विकास कार्यक्रमों का सहारा लिया जाए। वृत्ति विकास एक सतत क्रिया है तथा इसका सम्बन्ध कर्मचारी विशेष से भी है। व्यक्तिगत रूप में कर्मचारी अपने वृत्ति के सम्बन्ध में विकल्पों में से सही विकल्प का चयन करना है तथा वृत्ति विकास की दिशा को नियिन्त्रत करने का प्रयत्न करता है। वृत्ति की उपलब्ध सीढियों पर अवसरानुसार बढ़ने के लिए जो अपने को निरन्तर तैयार करता रहता है। अपने इस प्रयास में कर्मचारी को संगठन द्वारा बनाये गये वृत्ति विकास कार्यक्रमों से विशेष सहायता प्राप्त होती है। संगठन द्वारा बनाये गये वृत्ति विकास कर्मचारी की वैयक्तिक वृत्ति-आकांक्षा को वृत्ति-सीढियों पर बढ़ने के अवसर प्रदान करते है। ये कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल, व्यवहार मे परिवर्तन एवं विकास की व्यवस्था करते है। ऐसे कार्यक्रम स्वं विकास को प्रोत्साहित करते है तथा कृत्य-मंत्राणा एवं कृत्य-गतिशीलता की संगठन में व्यवस्था करते है। वृत्ति विकास, कार्यक्रम वर्तमान समय मे सेविवर्गीय कार्यो में अनेक अन्य कार्य जैसे मानव शक्ति नियोजन, कृत्य विश्लेषण तथा निष्पादन मूल्यांकन की भाँति ही महत्व रखते है।

वृत्ति विकास एक प्रक्रिया है जो तीन सम्बठ्ठ उप-क्रियाओं के संयोजन से निर्मित है। ये तीन सम्बठ्ठ उप-क्रियाओं के संयोजन से निर्मित है। ये तीन सम्बठ्ठ उप-क्रियायें है, (अ) समाजीकरण क्रिया, (ब) वृत्ति चयन क्रिया तथा (स) वातावरण परिवर्तन क्रिया। समाजीकरण क्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति अपने सहयोगियों एवं सहवर्गियों के सम्पर्क द्वारा स्वयं को सामाजिक वातावरण के अनुकूल बनाता है। वृत्ति चयन क्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति उपलब्ध वृत्तियों में से अनुकूल वृत्ति का चयन करता है। कृत्य गतिशीलता सामाजिक वातावरण में पविर्तन लाती रहती है, अत: वातावरण परिवर्तन से आये सामाजिक वातावरण से संतुलन आवश्यक हो जाता है। वृत्ति विकास के ये तीनों अंग कर्मचारी के वृत्ति नियोजन एवं विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखते है।

वृत्ति नियोजन एवं विकास की परिभाषा

वृत्ति नियोजन एवं विकास की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषायें :-
  1. हेनेमन तथा श्वाब: ‘‘वृत्ति प्रबन्ध में उस मार्ग का नियोजन होता है जिस पर कर्मचारीगण यात्रा करते हैं जिसमें सिखाना, मन्त्रणा तथा कर्मचारी का पदोन्नति मूल्यांकन, उन पदों का चयन जिन पर कर्मचारी बढ़ेगा, कृत्य से पृथक प्रशिक्षण तथा उसके द्वारा भौगोलिक स्थानान्तरण सम्मिलित हैं।’’
  2. मेन्सफील्ड: ‘‘वृत्त विकास एक प्रक्रिया है जिसमें वैयक्तिक अनुभव अवधारणा तथा वृत्ति का लोक-दर्शनीय पक्ष, जीविका स्थितियों की प्रत्येक उत्तरोत्तर मंजिल को प्रवाहित बनाने के लिए प्रति प्रभावित करते हैं।’’
  3. शुलर: ‘‘यह वयैक्तिक आवश्यकताओ योग्यताओ, तथा ध्यये तथा सगंठन की कृत्य अपेक्षाओं एवं कृत्य-पारितोषक के अभिज्ञान की क्रिया है तथा फिर उत्तम संरचित वृत्ति विकास कार्यक्रमों द्वारा योग्यताओं का अपेक्षाओं एवं पारितोषण से मिलान है।’’
  4. मिडिलमिस्ट, हिल एवं ग्रीयर: ‘‘वृत्ति विकास किसी व्यक्ति के लिए किसी संगठन में उसके सेवाकाल में धारण की जाने वाली सम्भावित कृत्य श्रृंखला का नियोजन तथा उत्पन्न अवसरों के अनुसार आवश्यक कृत्य कौशल प्रदान करने के लिए विकास व्यूह रचनाओं की प्रक्रिया है।’’

वृत्ति नियोजन एवं विकास की विशेषताएँ

उपरोक्त परिभाषाओं की व्याख्या करने पर वृत्ति नियोजन एवं विकास के महत्वपूर्ण तत्व या विशेषतायें हैं’-
  1. वृत्ति नियोजन एवं विकास स्वयं कर्मचारी तथा संगठन दोनों का उत्तरदायित्व है। कर्मचारी के दृष्टिकोण से वृत्ति उसके सम्पूर्ण सेवाकाल में पद विकास एवं वृद्धि के लिए निरन्तर प्रयास है जिसके आधीन वह अपना कौशल तथा अनुभव बढ़ाता है ताकि अवसरानुसार वह उसका लाभ उठा सके एवं पद चरणों पर अग्रसर हो सके। संगठन के दृष्टिकोण से वृत्ति नियोजन एवं विकास कर्मचारी की उसके ध्येय में सहायता करना एवं ऐसी व्यवस्था करना है जो उसके पद वृद्धि एवं विकास में आने वाली बाधाओं को दूर कर सके।
  2. वृत्ति नियोजन एवं विकास ऐसी क्रिया है जो वैयक्तिक इच्छाओं, आकांक्षाओं, एवं लक्ष्यों का अध्ययन एवं संगठन में विविध कृत्यों की अपेक्षाओं का अध्ययन करके इनमें सामंजस्य स्थापित करती हैं।
  3. वृत्ति नियोजन एवं विकास किसी संगठन में कार्यरत कर्मचारियों की सेवा-यात्रा के मार्ग का निर्धारण है जो यह स्पष्ट करता है कि कर्मचारी अपनी वृत्ति के किस उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।
  4. वृत्ति नियोजन एवं विकास द्वारा कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल एवं व्यवहार में शिक्षण व्यूह रचनाओं द्वारा इस प्रकार के परिवर्तन लाये जाते हैं।
  5. वृत्ति नियोजन तथा विकास एक सतत प्रक्रिया है।
  6. वृत्ति नियोजन तथा विकास का लक्ष्य प्रभावी एवं कुशल कर्मचारियों का विकास है ताकि अधिक उत्पादन एवं उत्पादकता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
  7. वृत्ति नियोजन एवं विकास कार्यक्रम सेविवर्गीय प्रबन्ध का अन्य प्रबन्धकीय कार्य यथा, मानवशक्ति नियोजन, कृत्य विश्लेषण, निष्पादन मूल्यांकन की भांति एक महत्वपूर्ण कार्य है।
  8. वृत्ति का संगठन द्वारा प्रबन्ध कार्य मात्रा ‘प्रबन्ध विकास’ नहीं है। वृत्ति प्रबन्ध एवं प्रबन्ध विकास के लक्ष्य समान नहीं होते। प्रबन्ध विकास का ध्येय ऐसे कार्यक्रम का निर्माण होता है जिनके द्वारा प्रबन्धकीय कौशल को बढ़ाया जा सके। वृत्ति प्रबन्ध इससे आगे बढ़कर संगठनात्मक उद्देश्यों की प्रभावी प्राप्ति तथा कर्मचारियों की सेवा-संतुष्टि पर बल देता है।

वृत्ति नियोजन एवं विकास के कार्य

वृत्ति नियोजन तथा विकास सम्बन्धी संगठन द्वारा सम्पन्न किये जाने कार्यों में कार्य सम्मिलित हैं।
  1. कर्मचारी की उसके सेवाकाल में वृत्ति नियोजन में सहायता करना।
  2. ऐसे वृत्ति मार्गों अथवा पथों की व्यवस्था करना जिन पर चढ़कर कर्मचारी आगे बढ़ सकें।
  3. ऐसे आंतरिक वातावरण की स्थापना करना जिसमें कर्मचारी अपने योगदान को मात्रा कृत्य ही न समझें अपितु वृत्ति के रूप में लें।
  4. संगठन में कर्मचारियों के लिए स्व-विकास की अवस्थायें उत्पन्न करना।
  5. कर्मचारियों के लिए वृत्ति मन्त्रणा, कृति गतिशीलन, पदोन्नति मूल्यांकन आदि ऐसे उपकरणों की व्यवस्था करना जो उसके वृत्ति विकास में सहायक हों।
  6. ऐसी वृत्ति सूचना प्रणाली का विकास करना जो वृत्ति पथ, पदारोहण, प्रतिस्थापन आदि सूचनाओं का बैंक हो। इस सूचना बैंक में वैयक्तिक कौशल सूची तथा कृत्य स्थितियों का सही तथा सम्पूर्ण ब्यौरा उपलब्ध हो।

वृत्ति नियोजन एवं विकास कार्यक्रमों के लाभ

वृत्ति नियोजन एवं विकास संगठन तथा कर्मचारी दोनों के लिए अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करते हैं:-

कर्मचारियों के लाभ

वृत्ति नियोजन तथा विकास कार्यक्रम से कर्मचारियों को प्राप्त होने वाले लाभ है:-
  1. यह कार्यक्रम कर्मचारी को अपने कौशल, शक्ति एवं कमजोरियों से अवगत करते रहते हैं।
  2. इनके द्वारा कर्मचारी अपनी छिपी इच्छाओं एवं ध्येय को सही प्रकार समझ पाता है।
  3. कर्मचारी को उसके लिए उपलब्ध वृत्ति अवसरों की जानकारी हो जाती है।
  4. यह कार्यक्रम कर्मचारी को अपनी अपेक्षाओं एवं योग्यताओं को उपलब्ध अवसरों के अनुकूल बनाने में सहायता करता हैं।
  5. वृत्ति परिवर्तनों से कर्मचारी के समायोजन में सहायता प्रदान करते हैं।
  6. कर्मचारी में वृत्ति उन्मुखी भावना जाग्रत करते हैं।
  7. कर्मचारी की कृत्य गतिशीलता में अभिवृद्धि करते हैं।
  8. संगठन के प्रति कर्मचारी में रुचि एवं उसके हित संरक्षण के प्रति कर्मचारी को अधिक संवेदनशील बना देते हैं।
  9. कर्मचारी को अधिक उत्पादनशील एवं संतुष्ट बना देते हैं।

संगठन को लाभ

संगठन को इससे लाभ होते हैं:-
  1. कर्मचारियों का अधिक प्रभावी उपयोग सम्भव होता है।
  2. उच्च पदों के लिए भावी प्रबन्धकों की जानकारी उपलब्ध हो जाती है।
  3. रोजगार के समान अवसर की कर्मचारियों की इच्छा पूर्ण हो जाती है।
  4. संगठन की छवि में सुधार होता है।
  5. कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है जिसका लाभ संगठन को प्राप्त होता है।
  6. कर्मचारी उत्पादकता में वृद्धि होती है।
  7. व्यवसाय के लाभ बढ़ते हैं।
  8. कर्मचारी अनुपस्थिति में कमी आती है।

प्रभावी वृत्ति नियोजन एवं विकास की पूर्व-अपेक्षायें

वृत्ति नियोजन एवं विकास कार्यक्रमों को बनाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। एक प्रभावी वृत्ति नियोजन एवं विकास कार्यक्रम कुछेक आधारभूत तत्वों पर आधारित होता है। प्रभावी वृत्ति नियोजन एवं विकास के निर्माण की पूर्ण-आवश्यकतायें इस प्रकार हैं:-
  1. यह संगठन की यथार्थ अवस्था को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।
  2. वृत्ति कार्यक्रम सभी प्रकार के कर्मचारियों के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
  3. वृत्ति कार्यक्रम नियमित एवं सतत क्रिया के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
  4. वृत्ति कार्यक्रम को शीर्ष प्रबन्ध का पूर्ण समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
  5. वृत्ति कार्यक्रम का समन्वय सेविवर्गीय प्रबन्ध के अन्य कार्य तथा मानवशक्ति नियोजन, कृत्य विश्लेषण, निष्पादन मूल्यांकन आदि के साथ होना चाहिए।
  6. इन कार्यक्रमों में पदोन्नति तथा प्रगति के अतिरिक्त अन्य कर्मचारी विकास कार्यक्रमों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  7. इन कार्यक्रमों में कर्मचारी मन्त्रणा तथा सूचना प्रणाली को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए।
  8. कार्यक्रमों में कर्मचारियों की अपेक्षाओं एवं योग्यताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

वृत्ति नियोजन एवं विकास का उत्तरदायित्व

वृत्ति नियोजन एवं विकास के प्रति दो पक्ष उत्तरदायी माने जाते हैं:
  1. स्वयं कर्मचारी
  2. संगठन
प्रत्येक कर्मचारी अपनी वृत्ति के प्रति जागरूक रहता है तथा इस बात के लिए प्रयत्नशील रहता है कि अपने सेवाकाल में उसका वृत्ति विकास उसकी आशा के अनुकूल हो। दूसरी ओर संगठन कर्मचारी को उसके वृत्ति नियोजन एवं विकास में अपना समर्थन वृत्ति नियोजन एवं विकास कार्यक्रमों के निर्माण द्वारा प्रदान करता है, इस प्रकार एक ओर कर्मचारी वैयक्तिक वृत्ति नियोजन तथा व्यूह रचना करता है तो दूसरी ओर संगठन अपने कर्मचारी वर्ग के लिए वृत्ति पथों का निर्माण एवं उनकी जानकारी कर्मचारियों को प्रदान करके, उन्हें उच्च पदों के लिए अनुकूल बनने में सहायता करता है।

अत: वृत्ति नियोजन कार्मिक एवं संगठन दोनों के लिए लाभदायक प्रक्रिया है।

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