काला धन क्या है? काले धन का आकार

By Bandey No comments
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अत्यन्त सरल और सामान्य भाषा में यह कहा जा सकता है कि काले धन का सम्बन्ध उसके अवैधानिक अर्जन से है। प्रत्येक
अर्थव्यवस्था में काले धन की संरचना में अवैधानिक सौदों, अवैधानिक सम्पत्ति और अवैधानिक आयें सम्मिलित होती हैं। इन संघटक
तत्वों को इस प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है। माना, किसी वस्तु पर बिक्री कर लगाया गया है जिसके लिये एक
निर्धारित छूट की राशि है। यह राशि 4 लाख रुपये के मूल्य की हैं। किसी व्यापारी के कुल विक्रय का मूल्य 10 लाख रुपये है
जिसमें से वह केवल 7 लाख रुपये के मूल्य के बिक्री की सूचना बिक्रीकर अधिकारी को देता है। यह अवशिष्ट 3.00 लाख रुपये
के मूल्य का सौदा अवैधानिक व काले सौदे की कोटि में होगा। काले धन की अर्थव्यवस्था का दूसरा अति प्रमुख संघटक तत्व
अवैधानिक व काली संपत्ति है। इस प्रकार की संपत्ति बिना कर चुकाये एकत्र की जाती है। माना किसी व्यक्ति की सम्पत्ति 4
लाख रुपये के मूल्य की है, परन्तु वह कर अधिकारी के समक्ष 2 लाख रुपये के सम्पत्ति की ही सूचना देता है। इस स्थिति में शेष
2 लाख रुपये की सम्पत्ति अवैधानिक व काली सम्पत्ति के रूप में होगी। इसी प्रकार, माना, आयकर से करमुक्त आय सीमा
40,000 रुपये वार्षिक है। किसी व्यक्ति की वार्षिक आय 70,000 रुपये हैं। यदि वह केवल 60,000 रुपये का आयकर प्रस्ताव
आयकर अधिकारियों के समक्ष देता हैं। तब शेष 10,000 रुपये अवैधानिक व काली आय के रूप में हैं।

विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की भांति भारत में भी अवैधानिक संपत्ति और अवैधानिक सौदों के सम्यक् आंकड़े उपलब्ध नहीं है,
यद्यपि उपलब्ध होने चाहिये। इस कारण अवैधानिक, आय को ही काले धन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। काली संपत्ति और
काले सौदों की अधिकता अत्यधिक है। इस कारण उनका वास्तविक आकलन अत्यन्त कठिन लगता है। इस सरलीकृत परिप्रेक्ष्य
में काले धन से आशय उन समस्त आयों से है जिनमें अवैधानिकता का कोई भी अंश पाया जाता है। इस प्रकार की आयें अवैधानिक
क्रियाओं यथा, जुआ, तस्करी, सट्टा, काला बाजार, घूस, पगड़ी आदि से सम्बठ्ठ हो सकती है। इनके अतिरिक्त कुछ आय प्राप्ति
की प्रक्रिया में पूर्णत: वैधानिक होती हैं। यथा डाक्टर, वकील, इंजीनियर, सलाहाकार एवं निजी सेवायें प्रदान करने वाले अन्य
विशेषज्ञों की सेवाओं की आयें। परन्तु व्यय की प्रक्रिया में इनमें से कुछ लोगों की कुछ आमदनी काले धन का स्वरूप धारण कर
लेती हैं जब वे अपनी समस्त आय को आयकर अधिकारियों के समक्ष प्रेषित प्रस्ताव में प्रस्तुत नहीं करते हैं। इसी प्रकार व्यापारी
एवं उत्पादक भी कर देने के भय से कर अधिकारियों को अपनी सम्पूर्ण आय का विवरण नहीं प्रस्तुत करते। वैधानिक और नैतिक
आधार पर कमाई गयी आय भी काले धन में परिवर्तित हो जाती है, यदि उस आय से कालाबाजारी और तस्करी से कोई वस्तु
खरीदी जाती है। सिद्धान्तत: एक वर्ष में अर्जित इन समस्त अवैधानिक आयों का योग अर्थव्यवस्था की वर्ष भर की काली आय
कहलाती हैं। इस विश्लेषण से यह प्रतीत होता है कि काले धन को दो रूपों में देखा जा सकता है, प्रथम अवैधानिक स्रोतों से
कमायी गयी आय और द्वितीय वैधानिक स्रोतों से प्राप्त, परन्तु अवैधानिक मदों पर अंशत: व पूर्णत: व्यय की गयी राशि।

काले धन का आकार

भारतीय अर्थव्यवस्था काले धन के दुष्परिणामों से अत्यन्त गंभीर रूप से त्रस्त है। यद्यपि भारत में कालेधन की समस्या
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से ही विद्यमान है, परन्तु इसकी तीव्रता पिछले 4 दशकों में अत्याधिक बढ़ी हैं। कई वर्ष पहले काले
धन की समस्या को ‘भूमिगत अर्थव्यवस्था’ के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है। परन्तु अब यह भूमिगत अर्थव्यवस्था समानान्तर
अर्थव्यवस्था के रूप में प्रयुक्त होने लगी है। समानान्तर अर्थव्यवस्था का आशय है समान गति से समान अंतर के साथ समान
दिशा में चलती हुयी अवैधानिक आर्थिक गतिविधियां। भारतीय संदर्भ में समानान्तर अर्थव्यवस्था से यह आशय है कि भारत में
वैध अर्थव्यवस्था के साथ-साथ एक अवैध अर्थव्यवस्था कार्यरत है। काले धन की यह अवैधानिक आर्थिक क्रिया नियमित
अर्थव्यवस्था के अनुरूप कार्य करती है। यह समान रूप से शक्तिशाली है। यह वैध अर्थव्यवस्था से कभी नहीं मिलती है।
कभी-कभी तो यह कह दिया जाता है कि इस समानान्तर अर्थव्यवस्था ने सार्वभौम अर्थव्यवस्था के समान रूप धारण कर लिया
है क्योंकि इसकी प्रभाविता नियमित क्रियाओं की तुलना से अधिक हैं। काले धन की समस्या नितांत विशिष्ट प्रकार की है।
सामान्यत: बेरोजगार, गरीबी, बीमारी आदि के दुष्परिणाम उन्हें ही वहन करने होते हैं जिनका उन पर प्रकोप होता है। परन्तु
काले धन की समस्या का दुष्परिणाम उन लोगों को नहीं वहन करना पड़ता जिनके पास काला धन है, बल्कि इसके दुष्परिणाम
उन्हें भुगतने पड़ते हैं जिनके पास यह नहीं है। विभिन्न नियम और करभार से अपने को बचाये रखते हुए काले धन के स्वामी
विलासितापूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। समाज की और विदेशी कोई भी वस्तु उनके लिये अप्राप्य नहीं है। इनके अतिरिक्त
मेहनत, ईमानदारी और नैतिक आधार पर आय अर्जित करने वाले काला धन के स्वामियों के द्वारा उत्पन्न की हुई परिस्थिति
के कारण जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं के लिये भी परेशान रहते हैं। जीवनदायी वस्तुओं में भी मिलावट आदि के कहर गरीब
जन समुदाय को वहन करना पड़ता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में काले धन की विद्यमानता के विविध अनुमान किये गये हैं। जो अनुमान इस संदर्भ में किए गए
हैं, उनके निष्कर्ष पृथक्-पृथक् हैं और वे परस्पर तुलनीय नहीं हैं। परन्तु इन सब से एक बात यह स्पष्ट होती है कि देश में
काले धन की समस्या भयावह है। काले धन के अनुमान की प्रक्रिया में सामान्य रूप से उस वर्ष के राष्ट्रीय आय के आंकड़ों
पर ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रीय आय के आंकड़ों के संदर्भ में यह अनुमान किया जाता है कि वर्तमान कर-संरचना के परिप्रेक्ष्य
में यदि कर अपवंचन न हो तो इसका कितना अंश कर प्रस्ताव में प्रस्तुत किया जाएगा और फिर यह देखा जाता है कि वर्ष
में राष्ट्रीय आय का कितना अंश कर प्रस्तावों में आया। इसके लिए राष्ट्रीय आय के आंकड़ों को कृषि आय और गैर-कृषि आय
वर्गों में बांटा जाता है। चूंकि कृषि आय कर सीमा से मुक्त है, इसलिए कर योग्य गैर-कृषि आयों पर ध्यान दिया जाता है।
इसके कई अनुमानों में से कुछ का संदर्भ यहां दिया गया है। डा. डी. के. रंगनेकर ने यह अनुमान लगाया कि 1965.66 में काले
धन की मात्रा 2350 करोड़ रुपयें थी। यह 1973.74 में 580 करोड़ रुपये हो गयी। इसके पश्चात् भी यह क्रमश: बढ़ती रही
और 1980.81 में 18241 करोड़ रुपये हो गयी।1 अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष ने अनुमान लगाया कि भारत में सकल राष्ट्रीय आय का
लगभग 50 प्रतिशत भाग काले धन के रूप में विद्यमान है। चालू कीमतों के आधार पर 1982.83 में सकल राष्ट्रीय उत्पाद का
मूल्य 145141 करोड़ रुपये था। इस आधार पर लगभग 72000 करोड़ रुपये काले धन के रूप में था। नेशनल इन्सटीट्यूट
ऑफ पब्लिक फिनान्स एन्ड पालिसी, नई दिल्ली से प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 18 से 21 प्रतिशत
भाग तक काला धन अर्थव्यवस्था में विद्यमान हैं। इस रिपोर्ट में समानान्तर अर्थव्यवस्थाओं के संघटकों के केवल एक भाग को
लिया गया है। तस्करी एवं अन्य अवैधानिक क्रियाओं से सृजित काले धन को इसमें नहीं सम्मिलित किया गया है, जबकि इनका
मूल्य सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 18 प्रतिशत भाग से अधिक होगा। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि संस्थान का काले
धन के लिए किया गया अनुमान अल्प अनुमान का द्योतक है। काले धन का आधार अर्थव्यवस्था में उक्त से अपेक्षाकृत अधिक
है। यदि अनुमान की सत्यता व काले धन की मात्रा पर ही विशेष ध्यान न दिया जाये तो काले धन की समस्या के विश्लेषण
हेतु उक्त इन्स्टीट्यूट द्वारा किए गए काले धन के अनुमान सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 18 प्रतिशत और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के
अनुमान सकल राष्ट्रीय उत्पाद के 50 प्रतिशत सीमा में विद्यमान किसी राशि व प्रतिशत को लिया जा सकता है। इन उच्चतम
और निम्नतम सीमाओं के भीतर कोई भी प्रतिशत लिया जाये तो भी यह स्पष्ट है कि भारत में काले धन की मात्रा अत्यधिक
है जो जन-सामान्य के लिये कठिनाई उत्पन्न कर रही है। वित्त और काले धन पर संसदीय समिति ने यह अनुमान लगाया कि
1980.81 की कीमतों पर काले धन की मात्रा से 3,00,000 करोड़ रुपये थी और प्रचलित कीमतों पर इसकी मात्रा 11,00,000
करोड़ रुपये थी।

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