भारत चीन संबंध

अनुक्रम
भारत व चीन के संबंधों की शुरूआत मधुर संबंधों के साथ हुई। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व चीन महत्व से अनभिज्ञ नहीं था। चीन में आये क्रांतिकारी बदलाव का आंकलन भी भारत ने सही परिप्रेक्ष्य में किया, अत: दोनों के मध्य अच्छे संबंधों की शुरूआत हुई। यही नहीं, अक्टूबर 1949 को साम्यवादी चीन की स्थापना के बाद 30 दिसम्बर 1949 को उसे मान्यता प्रदान करने वाला, बर्मा (म्यांमार) के बाद, भारत दूसरा गैर-साम्यवादी देश था। यद्यपि इस पृष्ठभूमि में दोनों के मध्य दूरगामी मधुर संबंधों से इन्कार नहीं किया जा सकता, तथापि यह भी सत्य है कि दोनों के मध्य 1962 में युद्ध हुआ। अत: एक ओर ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का दौर रहा वहीं दूसरी ओर 14 वर्षों तक ‘संबंध रहितता’ का काल भी रहा। इन सभी उतार-चढ़ावों से युक्त संबंधों के अध्ययन हेतु दोनों देशों के रिश्तों का विस्तृत आकलन आवश्यक है, जो निम्न प्रकार से है-
1ण् संबंधों का स्वर्णिम युग (1949-1959)- दोनों देशों के बीच संबंधों का प्रथम दशक मैत्रीपूर्ण एवं सहयोगात्मक रहा है। इनकी मित्रता के स्वरूप की प्रगाढ़ता के कारण इसे ‘प्रमोद युग’ या ‘स्वर्णिम युग’ की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार के संबंधों हेतु कई प्रमुख कारक उत्तरदायी रहे हैं- प्रथम, भारत ने एक प्रजातांत्रिक देश होते हुए भी एक साम्यवादी देश को मान्यता ही नहीं प्रदान की अपितु सभी अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर इसकी मान्यता एवं सदस्यों की अन्य शक्तियों के समक्ष वकालत भी की। द्वितीय, भारत ने कई नीतियों के माध्यम से चीनी दृष्टिकोण एवं स्थितियों का समर्थन किया।

उदाहरणस्वरूप 1950 में कोरिया संकट के समय चीन को आक्रान्ता घोषित करने के प्रस्ताव का विरोध करके, 1951 में सॉनफ्रांसिस्को सम्मेंलन में जापान के साथ शांति संधि घोषणा पर हस्ताक्षर न करके तथा फोरमासा टापू को चीन में विलय करने का समर्थन करके भारत ने चीन के पक्षों को सदैव मजबूती प्रदान की। तृतीय, 29 अप्रैल 1954 को दोनों देशों द्वारा व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धान्त पर ‘पंचशील’ के नियमों का उल्लेख कर अपने संबंधों हेतु एक मजबूत ढ़ांचा तैयार कर लिया। शायद इसी कारणवश इस समय ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा बहुत सशक्त रूप में उभर कर सामने आया। चतुर्थ, दोनों देशों द्वारा विश्व शांति एवं कई प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर समान दृष्टिकोण अपनाना। मुख्य रूप से यह बात दोनों द्वारा साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व रंगभेद की नीतियों का विरोध करने तथा एशिया व अफ्रीकी देशों के मध्य सहयोग विकसित करने के रूप में अति स्पष्ट रूप में देखने को मिली। अन्तत: दोनों देशों के राजनैतिक नेतृत्व द्वारा परस्पर देशों की यात्राओं के कारण इनके बीच में आपसी समझ एवं सहयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

परन्तु उपरोक्त सहयोगात्मक प्रवृत्तियों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि इस युग में दोनों देशों के बीच कोई मतभेद विद्यमान नहीं थे। सहयोग के इन प्रबल तथ्यों के होते हुए भी कुछ विषयों पर दोनों के बीच मतभेद थे जो निम्न कारणों को लेकर थे- तिब्बत को लेकर दोनों की बीच मतभेद बने हुए थे। भारत जहां इसे चीन का ‘स्वायत क्षेत्र‘ मानता था वहीं चीन इसे अपना ‘अभिन्न’ अंग मानता रहा है। तिब्बत से भागने पर दलाई लामा को भी नई दिल्ली द्वारा शरण प्रदान करने पर दोनों के मतभेद स्प्ष्ट दिखाई देते थे। द्वितीय, चीन द्वारा अपने भौगोलिक नक्शों में भारत के लगभग 50,000 वर्ग मील के क्षेत्र को चीन का भाग दिखाने पर भी दोनों देशों के मध्य मतभेद बने रहे। अन्तत:, बाण्डुंग (इंडोनेशिया) में हुए अफ्रीकी व एशियाई देशों के सम्मेंलन में भी दोनों के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण खुल कर सामने प्रकट हुए।

अत: मूल रूप से यह काल दोनों देशों के मध्य स्वर्णिम युग था, परन्तु भारत में चीन के प्रति कुछ सन्देह की स्थिति भी कुछ हद तक थी। परन्तु यह उतनी उजागर नहीं थी कि इसे मतभेदों का नाम दिया जा सके। भारत द्वारा चीन के प्रति कठोर दृष्टिकोण न अपनाने के पीछे शायद दो प्रमुख कारण रहें होगें- पहला, भारत की समकालीन आर्थिक एवं सामरिक कमजोरी, तथा दूसरा नेहरू व कृष्णामेंनन का चीन की नीतियों के संबंध में गलत आंकलन।

2ण् संघर्ष का काल (1959.1962)- 1959 में तिब्बत के विद्रोह व उसके परिणामस्वरूप दलाई लामा द्वारा भारत में शरण लेने के बाद भारत व चीन के संबंध टकराव की ओर बढ़ने लगे तो अन्तत: 1962 के चीन द्वारा किए आक्रमण के बाद एक अत्यन्त जटिल व्यवस्था में परिवर्तित हो गए। इसलिए यह युग बढ़ते हुए विवादों (विशेषकर सीमा विवाद) व युद्ध का युग रहा है। चीन ने तिब्बत विद्रोह में भारत की भूमिका को साम्राज्यवादी ताकतों से मिलीभगत एवं भारत की विस्तारवादी नीतियों का परिणाम बताया। परन्तु भारत ने चीन के इन दोनों आरोपों का खण्डन किया।

तिब्बत के बाद चीन ने भारत की सीमाओं में घुसपैठ प्रारम्भ कर दी। इस समय चीन ने सीमाओं को लेकर भारत पर तरह-तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिए। इसकी विस्तृत जानकारी नेहरू द्वारा 14 दिसम्बर 1958 से 12 फरवरी 1960 तक चीन सरकार को लिखे गए पत्र व्यवहार से मिलती है। कुल मिलाकर 1958.59 में चीन ने भारत से लगी सीमाओं के पश्चिमी, मध्य व पूर्वी तीनों भागों पर कुछ न कुछ क्षेत्रों को अपनी ओर मिलाने की कार्यवाही शुरू कर दी। पश्चिमी क्षेत्र में आकसाई चीन में 1955 में चीन ने कुछ सड़कों का निर्माण कर लिया तथा 1958 में भारत के लद्दाख क्षेत्र में घुसपैठ करके कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। मध्य क्षेत्र में बड़ाहोती क्षेत्र को लेकर दोनों के मध्य विवाद रहा। भारत का क्षेत्र होने पर भी चीन बार-बार अपना नियंत्रण जताने लगा रहा। पूर्वी क्षेत्र में चीन ने भारत के लोंगजु क्षेत्र पर अपना कब्जा स्थापित कर लिया तथा मैकमोहन रेखा भी दोनों के मध्य विवाद का मुद्दा बनी रही।

लेकिन 20 अक्टूबर 1962 को चीन द्वारा भारत पर युद्ध करने से दोनों के बीच अत्यधिक दूरियां बन गर्इं। चीन ने इस युद्ध में भारत के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया। यद्यपि चीन ने 21 नवम्बर 1962 को एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी, परन्तु दोनों द्विपक्षीय संबंधों को गहरा धôा लगा। इस युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंध बिल्कुल समाप्त हो गए। भारत के एक बड़े भू-भाग पर चीन के कब्जे के कारण, सीमा विवाद दोनों के मध्य एक प्रमुख मुद्दा बन गया। 3ण् संबंध रहितता का काल (1962-1976). चीन युद्ध के बाद अगले 14 वर्षों का समय दोनों देशों के बीच संबंध रहितता का युग रहा। यद्यपि दोनों देशों ने राजनयिक संबंध तो समाप्त नहीं किए, परन्तु अपने-अपने राजदूतों को अवश्य वापिस बुला लिया तथा दूतावासों को बन्द कर दिया। कई प्रमुख कारणों से दोनों के मध्य दूरियाँ कम होने के स्थान पर और बढ़ती गई। प्रथम, अब दोनों के मध्य सीमा विवाद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया इसीलिए इसके समाधान के बिना अच्छे संबंधों की कल्पना करना कठिन था। कोलम्बों प्रस्तावों के आधार पर इस विवाद को इसलिए नहीं सुलझाया जा सका क्योंकि चीन ने कुछ शर्तें लगा दी थी। 1963 में दोनों सरकारों के मध्य हुए पत्र व्यवहारों का भी कोई संतोषजनक परिणाम नहीं निकला। चीन इस मुद्दे को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने हेतु भी सहमत नहीं हुआ। द्वितीय, 1963 में चीन व पाकिस्तान के मध्य क्षेत्रों के संबंध में हुए आदान प्रदान ने इनके तनावों को और बढ़ा दिया। 1963 में पाकिस्तान-चीन समझौते के अन्तर्गत पाकिस्तान ने ‘पाक अधिकृत काश्मीर’ का 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को देने से भारत ने गहरा रोष प्रकट किया। तृतीय, 1964 में चीन द्वारा परमाणु विस्फोट करने तथा 1965 में भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान का समर्थन करने से दोनों के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए। चतुर्थ, 1970 के दशक में अमेरिका-पाक-चीन त्रिकोणीय गठबंधन से दोनों के रिश्ते और खराब हो गए। क्योंकि यह गठबंधन पूर्वी सोवियत संघ के साथ-साथ भारत की घेराबन्दी करने हेतु भी विकसित किया गया था।

परन्तु 1971 में भारत-पाक युद्ध में भारत की जीत ने स्पष्ट रूप से दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति मजबूत करते हुए इसे एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसी काल में अमेरिका द्वारा चीन को मान्यता प्रदान करने से इसका संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्यता का मार्ग प्रशस्त हुआ। अत: दोनों देशों की स्थितियाँ मजबूत होने के कारण शायद दोनों द्वारा परस्पर रिश्तों में सुधार के प्रयास होने लगे। लेकिन 1974 में भारत द्वारा पोखरन-प् परमाणु विस्फोट करने तथा 1975 में सिक्किम को भारत का राज्य बना लेने से फिर दोनों के मध्य थोड़ा सा व्यवधान उत्पन्न हो गया। परन्तु यह स्थिति अधिक देर तक नहीं बनी रह सकी। दोनों देशों की विभिन्न बाध्यताओं एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में बदलावों के कारण 1976 में दोनों ने अपने मध्य दीवार को हटाकर पुन: राजनयिकों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया शुरू की। इस दृष्टि से अप्रैल 1976 में भारत ने एक लम्बे अन्तराल के बाद के.आर. नारायणन को चीन में अपना राजदूत नियुक्त किया। 4ण् वार्तालाप का काल (1976-1988) इस काल को दोनों देशों के मध्य ‘नई शुरूआत’ का युग कहा जा सकता है। इस युग को संबंधों के सामान्यीकरण के प्रयास हेतु अग्रसर होना भी माना जा सकता है। राजदूतों की परस्पर नियुक्ति से यह बात तो निश्चित ही थी कि दोनों राष्ट्र संबंधों में सुधार के इच्छुक हैं। इसके अतिरिक्त दोनों देशों में आये आन्तरिक बदलावों तथा अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के परिणामस्वरूप भी यह प्रक्रिया और मजबूत हुई।

आन्तरिक रूप से जहाँ 1976 में माओ-से-तुंग की मृत्यु के बाद नवीन नेतृत्व ने उदारीकरण की नीतियों को अपनाते हुए न केवल चार प्रमुख क्षेत्रों में आधुनिकरण (रक्षा, कृषि, उद्योग तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी) पर बल दिया, वहीं चीन की ‘सांस्कृतिक क्रांति’ की व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप चीन ने विश्व राजनीति में अपने अलग-अलग स्वरूप को छोड़कर विश्व के विभिन्न देशों से अति आधुनिकतम एवं उच्च दर्जे की प्रौद्योगिकी ग्रहण करना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित करने के साथ-साथ, पड़ोसियों से संबंध सुधारों पर भी बल दिया।

भारत ने भी अपनी आन्तरिक स्थिति को देखते हुए पड़ोसियों से संबंध सुधारने प्रारम्भ कर दिए जिसमें जनता दल के शासन काल में (1977-79) ‘पड़ोसियों’ के प्रति मधुर संबंध विकसित करने की नीतियों ने और मजबूती प्रदान की। इस सन्दर्भ में वाजपेयी ने विदेश मंत्री के तौर पर चीन की यात्रा भी की, परन्तु वह सफल न हो सकी। इसके बाद भी दोनों देशों के मध्य संबंध सुधार एवं सहयोग बढ़ाने का सिलसिला जारी रहा।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर, जहां एक ओर चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के साथ-साथ सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता भी मिल गई, वहीं भारत भी 1971 में अपनी जीत एवं 1974 के पोखरन-प् परीक्षण के बाद अधिक आश्वस्त दिखाई दिया। इसके अतिरिक्त, चीन व पूर्व सोवियत संघ के बीच सुधरते संबंधों ने भी दोनों के मध्य एक महत्वपूर्ण रूकावट वाले कारक को समाप्त कर दिया। इसके उपरान्त, 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में सैन्य हस्ताक्षेप को लेकर भारत-सोवियत संघ के बीच उभरते मतभेदों ने भी इसे चीन के निकट लाने में मदद की। इसके अलावा, चीन-अमेरिका के संबंधों में आई कटुता के कारण चीन भी भारत की ओर अधिक आकृष्ट हुआ।

इन कारणों से दोनों देशों ने अपनी चुप्पी तोड़ी और वार्ताओं का दौर प्रारम्भ हुआ। 1981 से 1987 तक दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ताओं के आठ दौर सम्पूर्ण हुए। इन वार्ताओं में दोनों ओर से स्पष्टीकरण देने के अलावा विभिन्न मुद्दों पर परस्पर सुझाव भी दिए। इसके साथ-साथ सीमाओं के सन्दर्भ में दोनों के बीच काफी जानकारियों का आदान-प्रदान हुआ तथा इससे दोनों के मध्य विश्वसनीयता बढ़ाने वाले कदमों (सी.बी.एम) का विकास हुआ। इन्हीं वार्ताओं एवं विश्वसनीयता के कदमों ने ऐसा ठोस आधार बनाया जिस पर आगे चलकर दोनों के मध्य सहयोग एवं सद्भावना की मंजिल खड़ी हो सकी।

उपरोक्त तथ्यों से यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि यह युग पूर्ण मतभेद रहित था। इसके विपरीत इस काल में दो प्रमुख विषयों को लेकर भारत व चीन के मध्य गहन मतभेद भी थे। सर्वप्रथम विवाद का विषय बाडडोंग में एमडोरंग चू घाटी में चीन द्वारा भारतीय सीमा में घुसपैठ का मामला था। जून 1986 में चीन ने इस विवादास्पद क्षेत्र में घुसपैठ कर कुछ सैन्य चौंकियां भी स्थित कर लीं। सूत्रों से पता चला है कि चीन ने वहां हेलीपैड भी बना लिया है। भारत के विरोध जताने पर भी चीन का रवैया नहीं बदला। उम्मीद की जाती है कि जब सम्पूर्ण सीमा विवाद सुलझेगा तभी इस समस्या पर भी शायद कोई आम सहमति बन जाए। दूसरा मुद्दा अरूणाचल प्रदेश को लेकर हुए मतभेद का है। जब भारत सरकार ने 20 फरवरी 1987 को अरूणाचल प्रदेश को भारतीय संघ के 24 वें राज्य के रूप मेंं घोषणा की तब चीन ने कड़ी आपत्ति उठाई यद्यपि बाद में भारत द्वारा आपत्ति उठाई जाने के कारण चीन ने इस मामले को अधिक तूल नहीं दिया।

परन्तु छोटे-छोटे मतभेदों के बावजूद यह काल दोनों देशों के भविष्य के संबंधों में प्रगाढ़ता विकसित करने हेतु अति महत्वपूर्ण रहा। एक तो इस युग में दोनों देशों के मध्य संबंध रहितता का दौर समाप्त हो गया जो बहुत सार्थक कार्य रहा। दूसरा इन वार्ताओं के दौर से आपसी गलतफहमियां दूर होने के साथ-साथ दोनों के बीच परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले कारकों में वृद्धि हुई। दोनों के बीच उत्पé इसी सद्भावना ने सहयोग की नींव रखी जिस पर आज दोनों के सहयोगी एवं मैत्रीपूर्ण संबंधों का भवन खड़ा है। अत: इस युग ने आने वाले सहयोगात्मक संबंधों हेतु पहली सीढ़ी का कार्य किया, जिससे दोनों के परस्पर मधुर संबंधों का मार्ग प्रशस्त हुआ।

5ण् सहयोगात्मक संबंधों ें का युग, 1988.1998. यह एक दशक का समय दोनों देशों के संबंधों में बदलाव का अति महत्वपूर्ण व प्रभावशाली काल माना जा सकता है। इस काल में दोनों देशों के संबंधों में सुधार विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम, आन्तरिक परिस्थितियों एवं दोनों के परस्पर दृष्टिकोणों में आए परिवर्तनों के कारण हुआ। इनके मुख्य कारण निम्नलिखित थे- प्रथम, अमेरिका की विदेश नीति में बदलाव से दोनों ही देशों ने अमेरिका को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। अमेरिका ने मानवाधिकार के नाम पर जहां एक ओर चीन की तियनामन चौंक (1989) की घटना की आलोचनाएँ की, वहीं दूसरी ओर कश्मीर के मुद्दे पर भी मानवाधिकारों के उल्लंघन की दुहाई दी। द्वितीय, 1991 में पूर्व सोवियत संघ के विघटन स्वरूप उत्पन्न स्थिति के कारण भी दोनों देशेां के बीच नजदीकियां और बढ़ीं। इस विघटन के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर चीन के मुख्य प्रतिद्वन्दी की समाप्ति हो गई, वहीं भारत का एक विश्वसनीय मित्र नहीं रहा। इसके साथ-साथ भारत-सोवियत मैत्री एवं चीन-सोवियत विवादस्वरूप चीन-भारत के मध्य रूकावट पैदा करने वाले कारक की भी समाप्ति हो गई। तृतीय, शीतयुद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में आये बदलाव स्वरूप विश्व में उभरती हुई एक ध्रुवीय व्यवस्था बनने की स्थिति के कारण दोनों राष्ट्र बहुधु्रवीय व्यवस्था बनाने हेतु सहयोगात्मक प्रयास के रूप में एकजुट होते प्रतीत हुए। इसके अतिरिक्त, दोनों ही देश वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था के स्थान पर एक न्यायोचित विश्व व्यवस्था बनाने हेतु एकमत प्रतीत हुए। चतुर्थ, विकास व आधुनिकरण की बढ़ती हुई बाध्यताओं तथा भूमण्डलीकरण के दौर में घटते हुए रक्षा खर्चों के कारण भी दोनों देशों के लिए परस्पर मधुर संबंध बनाना अनिवार्य था। पंचम, चीन द्वारा भारत के अपने पड़ोसियों से संबंधों के बारे में आया बदलाव भी इस हेतु काफी हद तक उत्तरदायी रहा है। अब चीन चाहता है कि भारत अपने पड़ोसियों से सभी मुद्दे द्विपक्षीय आधार पर सुलझायें। चीन इस सन्दर्भ में किसी भी प्रकार की नकारात्मक टिप्पणी से बचने लगा है। “ाष्ट, शीतयुद्धोत्तर युग में राजनीति के स्थान पर आर्थिक मुद्दों के महत्वपूर्ण होने के कारण दोनों देशों के बीच नवीन आर्थिक समीकरणों का उदय होना अनिवार्य बन पड़ा। अन्तत: नई परिवर्तित विश्व व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र की चुनौतियों, सार्थकता एवं भूमिका को लेकर भी दोनों के बीच आम सहमति बनती नजर आने लगी है।

उपरोक्त कारणों से दोनों देशों में बढ़ती नजदीकियों की परिचायक दोनों देशों के राजनैतिक नेतृत्व द्वारा की गई यात्रायें रहीं। इन यात्राओं में से राजीव गांधी (1988) व पी.वी. नरसिम्हा राव (1993) की चीन यात्राएँ तथा प्रधानमंत्री ली पेंग (1991) व राष्ट्रपति जिंयाग जमीन (1996) की भारत यात्राएँ ऐतिहासिक रही। राजीव गांधी की चीन यात्रा के दौरान पहली बार दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि वे सीमा विवाद को अलग रखकर अन्य मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के पक्षधर हैं। सीमा विवाद सुलझाने हेतु दोनों द्वारा ‘संयुक्त कार्यकारी दल’ का गठन किया गया जिनकी बैठक हर छ: माह बाद वैकल्पिक रूप से दोनों देशों की राजधानियों में हुआ करेंगी। इस ऐतिहासिक सहमति के अतिरिक्त, दोनों देशों के मध्य विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी, नागरिक उड्डयन तथा सांस्कृतिक सहयोग के समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए।

1993 में भारतीय प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की यात्रा को ‘एक मील के पत्थर’ की संज्ञा दी गई। इस यात्रा के माध्यम से राजीव गांधी द्वारा की गई पहल को स्थायित्व प्रदान करने के कदम के रूप में आंका गया। राजीव गांधी ने जहां सीमा विवाद को अन्य सहयोगात्मक कदमों से अलग रखने का प्रयास किया, वहीं इस यात्रा के द्वारा सीमा विवाद सुलझाने हेतु महत्वपूर्ण समझौते हुए जिनका उद्देश्य ‘परस्पर एवं समान’ सुरक्षा प्रदान करना था। इस यात्रा के दौरान ‘नियंत्रण रेखा संबंधित’ एक 9 सूत्री समझौता हुआ जिससे सीमा रेखा के पास शांति स्थापित करने की प्रक्रिया को बल मिला। सीमा पर शांति स्थापना की वैद्यता को स्वीकार करते हुए दोनों देश ‘नियंत्रण रेखा’ को स्वीकार करते हुए दोनों देश ‘नियंत्रण रेखा’ को ही वर्तमान सीमा रेखा मानने को तदर्थ रूप से तैयार हो गए। जब तक यह स्थाई रेखा नहीं बन जाती दोनों ही इसके पास शांति बनाएँ रखेंगे। चीन की ओर से यात्रा करते हुए प्रधानमंत्री ली पेंग ने दोनों देशों के मध्य विश्वसनीयता को बढ़ाने वाले कदमों को बढ़ावा दिया। दोनों देशों द्वारा ‘पंचशील’ के सिद्धान्तों में एक बार फिर आस्था व्यक्त करते हुए नई विश्व व्यवस्था के निर्णय में समान भागीदारी, निरस्त्रीकरण, उत्तर-दक्षिण विवाद में कमी, संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के पालन आदि विषयों पर सहयोग हेतु सहमति प्रकट की। तीन महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर करने के साथ-साथ, व्यापार विभिन्नीकरण तथा सीधे व्यापार पर बल दिया गया।

जियांग जमीन की भारत यात्रा राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से अति महत्वपूर्ण थी। राजनैतिक रूप से माओं के बाद जमीन भारत आने वाले ऐसे नेता थे जो राष्ट्रपति के साथ-साथ साम्यवादी दल के महासचिव एवं सेना नियंत्रण आयोग के अध्यक्ष भी थे। इन्होंने चार महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें से आपसी विश्वास बढ़ाने हेतु नियंत्रण रेखा संबंधित समझौता सामरिक रूप से अति महत्वपूर्ण हैं। व्यापारिक दृष्टि से भी पूंजीनिवेश पर नियंत्रण, जहाजरानी तथा व्यापार विभिन्नीरण के संदर्भ मेंं भी परस्पर सहमति हुई।

अत: इस एक दशक के काल में सामारिक रूप से भारत-चीन सीमा विवाद के बारे में ‘संयुक्त कार्यदल’ के गठन के साथ-साथ विभिन्न ‘विश्वसनीयता बढ़ाने वाले कदमों’ की स्थापना हुई । इन्हीं के कारण न केवल विवादास्पद सीमा रेखा पर शांति बनी रही, अपितु दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण संबंधों की रूपरेखा भी तैयार हुई दूसरे दोनों देशों के राजनेताओं की परस्पर यात्राओं द्वारा संस्थागत संबंधों का भी विकास हुआ। दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों, समुद्री जहाजों के आवागमन, समाचार एजेंसियों में सहयोग, शिक्षा तथा प्रोद्यौगिकी से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की सम्भावनाएँ बढ़ी। सांस्कृतिक रूप से भी एक दूसरे के यहां चीन महोत्सव (1992) तथा भारत महोत्सव (1994) के आयोजनों से जन साधारण में एक दूसरे के देशों के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी। अन्तत: इन मधुर सम्बन्धों का प्रभाव आर्थिक संबंधों के विकास पर पड़ा जिसकी झलक भारत-चीन के मध्य बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार से लगाई जा सकती है। ‘ स्त्रोत : आर.एस.यादव, ‘भारत की विदेश नीति : एक विश्लेषण’, इलाहाबाद, किताब महल , 2003 लेकिन संबंधों में इन सुधारों को भारत द्वारा 11 व 13 मई 1998 को किए गए परमाणु परीक्षणें के बाद बड़ा धôा लगा। इन परमाणु परीक्षणों के बाद चीन ने भारत द्वारा इन्हें स्थगित करने तथा व्यापक परमाणु िनेषेध संधि पर हस्ताक्षर करने पर बल दिया। परन्तु इस समय भारत के दृष्टिकोण से ही दोनों के मध्य ज्यादा दूरियाँ विकसित हुई। सर्वप्रथम, भारत के तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज ने चीन को भारत का दुश्मन नम्बर एक बताया। द्वितीय, भारत के प्रधानमंत्री द्वारा भी अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन को लिखे पत्र में इन परीक्षणों का औचित्य चीन से उत्पन्न सुरक्षा खतरों को ही ठहराया। अन्तत: इन परीक्षणों के स्पष्टीकरण हेतु भारत ने अपने विशेष दूतों को सभी परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की राजधानियों में भेजा, परन्तु ऐसा कोई दूत चीन नहीं भेजा। यद्यपि इन कारणों से दोनों के मध्य दूरियाँ, बन गई तथा ‘संयुक्त कार्य दल’ की कार्यवाही भी स्थगित कर दी गई, तथापि चीन की प्रतिक्रिया उतनी तीव्र नहीं रही। कई क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश की बाध्यताओं के कारण चीन भारत के साथ अधिक मतभेद नहीं बढ़ा सकता था। अत: मई 1998 के बाद रिश्तों में ‘अस्थाई तनाव अवश्य आ गया था जो अधिक समय तक नहीं बना रह सका।

6ण् नवीन साझेदारी की ओर अग्र्रसर, (1999-2003)- विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय बाध्यताओं एवं द्विपक्षीय बाध्यताओं के कारण दोनों के मध्य दूरियाँ नहीं रह सकी। दोनों देशों के नेताओं ने इस समस्या के समाधान हेतु परस्पर सद्भावना यात्राओं द्वारा इसे दूर करने के प्रयास किए। भारत की ओर से जसवन्त सिंह (1999 व 2002) आर.के. नारायणन (2002) जार्ज फर्नांडीज (2003) व अटल बिहारी वाजपेयी (जून 2003) ने चीन की यात्राएँ की। दूसरी ओर से भी तांग जिक्सुआन (1999), ली पेंग (2001) तथा झू रोंगजी (2002) ने भारत की यात्राएँ की। इन यात्राओं के माध्यम से दोनों देशों के बीच ‘संयुक्त कार्यवाही दल’ के माध्यम से सामारिक वार्ताओं का दौर प्रारम्भ हो गया, सीमा रेखा के मध्य भाग के नक्शों का आदान-प्रदान हुआ, राजनयिक संबंधों की स्वर्ण जयंती मनाना, तथा पंचशील के सिद्धान्तों में दोबारा आस्था व्यक्त की गई। इन सभी यात्राओं में जून 2003 की अटल बिहारी वाजपेयी की यात्रा अति महत्वपूर्ण रही। इस यात्रा के माध्यम से दोनों के बीच ‘नई साझेदारी’ विकसित करने हेतु 23 जून को “संबंधों के सिद्धान्त एवं व्यापक सहयोग” के दस्तावेज के अतिरिक्त अन्य सहयोग के समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए। इन समझौतों में एक समझौते के अन्तर्गत दोनों देशों के बीच नाथुला दर्रे के रास्ते सिक्किम से होते हुए एक नये व्यापारिक मार्ग को खोलने पर भी सहमति हुई। भारत द्वारा व्यापक दस्तावेज में ही तिब्बत को चीन का एक स्वायत क्षेत्र (चीन का अभिन्न अंग) मान लिया गया, तथा इस व्यापारिक समझौते से चीन द्वारा सिक्किम को भारत का अंग मानने की अप्रत्यक्ष कार्यवाही अवश्य शुरू हो गई। शायद निकट भविष्य में चीन भी सिक्किम पर भारत की प्रभुसत्ता को स्वीकार कर लेगा। एक अन्य महत्वपूर्ण समझौते के अन्तर्गत सीमा विवाद के समाधान में तीव्रता लाने हेतु दोनों ने अपने-अपने विशेष प्रतिनिधियों को नियुक्त करने का फैसला किया जो इस समस्या को राजनैतिक दृष्टिकोण से हल करने का प्रयास करेंगे। भारत की ओर से यह उत्तरदायित्व रक्षा सलाहकार ब्रिजेश मिश्र को सौंपा गया है जबकि चीन की ओर से वरिष्ठ उप-विदेश मंत्री दाई बिंगाओं यह जिम्मेंदारी निभायेगें। अत: इन यात्राओं ने, विशेषकर वाजपेयी की चीन यात्रा ने, इनके संबंधों को सुधारते हुए इनके मध्य एक ‘सहयोगी साझेदारी’ बढ़ाने का कार्य किया है।

इन पांच वर्षों में (1999-2003) दोनों के संबंधों में आर्थिक, सामरिक एवं राजनैतिक मधुरता का विकास हुआ है जो निम्न स्थितियों से स्पष्ट परिलक्षित होता है-

आर्थिक रूप से, भारत व चीन के बीच व्यापार में बढ़ोतरी निरंतर जारी रही है। भारत व चीन के बीच कुल व्यापार जहां 1999. 2000 में 27971 लाख डॉलर था वही 2000-01 में बढ़कर 23075, 2001-02 में 2923 तथा 2002-03 में 38667 लाख डॉलर हो गया। इन व्यापारिक संबंधों को तीव्रता प्रदान करने हेतु दोनों देशों ने मंत्रीस्तरीय ‘संयुक्त आर्थिक समूह’ (जे.ई.जी.) के महत्व को स्वीकारते हुए इसकी सातवीं बैठक एक वर्ष के अन्दर-अन्दर करने का फैसला किया है। इसके अतिरिक्त, व्यापार एवं अन्य आर्थिक सहयोग बढ़ाने हेतु दोनों देशों ने अपने-अपने अधिकारियों एवं अर्थशास्त्रियों का एक ‘संयुक्त अध्ययन दल’ (जे. एस.जी.) बनाने का फैसला भी किया है। इसके अतिरिक्त, दोनों देश अपने द्विपक्षीय मुद्दों एवं विकासशील देशों के हितों की पूर्ति हेतु ‘विश्व व्यापार संगठन’ की कार्यवाही में भी सहयोग पर सहमत हो गए हैं। अन्तत: प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान वाजपेयी ने भारत व चीन के संचार प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में व्यापक सहयोग की सम्भावनाओं पर बल दिया। उनका मानना था कि यदि दोनों देश सहयोग करें तो दुनिया के संचार प्रोद्यौगिकी के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर सकते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में दोनों एक दूसरे के पूरक है।

सामरिक रूप से यद्यपि परमाणु परीक्षणों पर रोक एवं भारत द्वारा सी.टी.बी.टी. पर हस्ताक्षर न करने के मामलों पर दोनों में अभी मतभेद बने हुए है, लेकिन फिर भी कई सामरिक विषयों पर सहयोग भी जारी है। उदाहरणस्वरूप, दोनों ही देश परमाणु हथियारों के पहले प्रयोग न करने के पक्षधर हैं। दोनों ही देश परमाणु प्रसार के हक में भी नहीं हैं। दोनों ही देश अपने सीमा विवाद को भी शीघ्र सुलझाना चाहते हैं। इसके लिए शीघ्र ही दोनों अपने पूर्वी व पश्चिमी क्षेत्र के नक्शों का आदान-प्रदान करेंगे। वाजपेयी की वर्तमान चीन यात्रा के समय इस सन्दर्भ में विशेष प्रतिनिधियों, की नियुक्ति भी उनकी इस दिशा में सकारात्मक सेाच का परिचायक है। दोनों ही देश अब परस्पर एक दूसरे से असुरक्षित महसूस करने के स्थान पर सहयोगी बनने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों के मध्य सामान्य सुरक्षा सहयोग के साथ-साथ सीमाओं के रास्ते व्यापारिक गतिविधियों के बढ़ने से भी जन मानस के बीच समझ तथा राज्यों के बीच विश्वसनीयता बढ़ेगी।

राजनैतिक रूप से, भी दोनों के परस्पर सम्बन्ध सही दिशा में प्रयासरत हैं। सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र की भूमिका के संदर्भ में दोनों ही एकमत हैं। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सशक्त करने तथा सुरक्षा परिषद् के प्रजातांत्रिकरण के पक्षधर हैं। इसके साथ-साथ दोनों ही निरस्त्रीकरण व अन्तरिक्ष के शान्तिपूर्ण प्रयोग हेतु संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से बहुपक्षीय वार्ताओं पर बल देते हैं। द्वितीय, यद्यपि स्पष्ट रूप से दोनों देशों ने स्वीकार नहीं किया है परन्तु दोनों ही भारत रूस चीन त्रिपक्षीय सहयोग बढ़ाने के पक्षधर है। पिछले कुछ वर्षों से भारत-चीन, भारत-रूस तथा रूस व चीन संबंधों में निरंतर सुधार इस ओर इशारा करते हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन की पिछली यात्रा चीन के रास्ते भारत आने से भी इन बातों को और बल मिलता है। तृतीय, दोनों देश शीतयुद्धोत्तर युग में बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था के पक्षधर हैं। सोवियत विघटन के बाद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व के प्रति दोनों ही आशंकित है। विशेषकर अफगानिस्तान व ईराक के घटनाक्रम के बाद दोनों के बीच शायद यह आशंका और अधिक मजबूत हो गई है। अन्तत: दोनों देश आज अन्तर्राष्ट्रीय आंतकवाद के खतरों से अवगत ही नहीं है बल्कि इसे विश्वशांति व सुरक्षा हेतु बड़े खतरे के रूप में देखते हैं शायद इसीलिए आतंकवाद पर नियंत्रण हेतु दोनों देश एकमत है तथा परस्पर सहयोग द्वारा इस स्थिति से निपटना चाहते हैं।

परन्तु उपरोक्त वर्णन का अर्थ यह नहीं है कि उत्तर-पोखरन प्प् काल में दोनों के बीच गतिरोध बिल्कुल समाप्त हो गये हैं। दोनों देश आज भी कई मुद्दों पर पूर्णत: सहमत नहीं है। आर्थिक रूप से आज भी दोनों के बीच बैकिंग व अन्य संस्थागत सुविधाओं का अभाव है। गुणवत्ता के बारे में पारदर्शिता, कारोबार से पहले शपथ पत्र हासिल करना, बैंकों के चीन में कारोबार करने, बाजार संबंधित दस्तावेजों का अंग्रेजी में न होना आदि अभी भी कई अड़चने हैं जो भारतीय व्यापार को चीन में प्रसारित करने के मार्ग में रूकावट है। इसके अतिरिक्त आज भी व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में बना हुआ है जिसे सुधारना अति अनिवार्य है। इसी प्रकार सामरिक क्षेत्र में आज भी परमाणु व प्रेक्षपास्त्रों के विकास एवं चीन द्वारा पाकिस्तान को इस प्रकार के शस्त्रों की आपूर्ति कराने के मुद्दों पर विभेद जारी है। राजनैतिक रूप से भी दोनों के मध्य आज भी विश्वसनीयता बनाने वाले कारक पूर्ण रूप से संतोषजनक नहीं हैं।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि पिछले 56 वर्षों के अंतराल में भारत-चीन संबंध उतार चढ़ाव वाले रहे है। यद्यपि पिछले 15 वर्षों से निरन्तर इनमें सुधार जारी है तथा काफी हद तक ये संबंध सहयोगात्मक बन रहें है। प्रधानमंत्री वाजपेयी की जून 2003 की यात्रा भी इस नवीन साझेदारी के रास्ते में एक महत्वपूर्ण पहल रही है। परन्तु दूरगामी शान्ति व सहयोग हेतु निम्न मुद्दों का स्थाई हल आवश्यक है। प्रथम दोनों देशों को शीघ्र-अति शीघ्र अपेन सीमा विवाद को हल करना होगा। द्वितीय, चीन को स्पष्ट रूप से सिक्किम को भारत का अंग मानना पड़ेगा। तृतीय, चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों एवं परमाणु सहयोग गतिविधियों को रोकना होगा। चतुर्थ, म्यांमार के माध्यम से हथियार देने या इस देश से हिन्द महासागर में अपनी सैन्य क्षमता का विकास करने पर भी चीन को रोकना होगा ताकि भारत अपने आप को असुरक्षित महसूस नहीं कर सके। अन्तत: आर्थिक सहयोग हेतु व्यापार के ढ़ाचों को सुदृढ़ करते हुए चीन के पक्ष में हुए व्यापार संतुलन को ठीक करना होगा। दोनों देशों के मध्य व्यापार मात्रा को बढ़ाना होगा तथा पूंजीनिवेश एवं संयुक्त उद्यमों के विकास के मार्ग प्रशस्त करने होंगें इन्हीं उपायों के माध्यम से दोनों देशों के मध्य दूरगामी मधुर संबंधो की स्थापना की जा सकती है। यद्यपि दोनों राष्ट्र इस ओर प्रयासरत हैं परन्तु इन दोनों के मध्य विभिन्न क्षेत्रों में हुए विकास की गति पर ही दोनों के भावी संबंधों की दिशा तय होगी। यह सत्य है कि वर्तमान में दोनों ही देश इस ओर साकारात्मक पहल कर रहे हैं।

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