भारत पाकिस्तान संबंध

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दो पड़ोसी देशों के मध्य विवादास्पद संबंधों की लम्बी शृंखला वाले उदाहरणों में भारत-पाकिस्तान संबंध अति प्रमुख हैं। दोनों के मध्य ऐतिहासिक समानता, सांस्कृतिक एकरुपता, भौगोलिक सामीप्य, आर्थिक अन्त: निर्भरता आदि के बावजूद मित्रता के बजाय ‘ दूर के पडोसियों’ वाले सम्बम्ध बने हुए है। 1947 से आज तक इनके संबंध स्पर्धा, संघर्ष एवं युद्धों के दायरे से बाहर नहीं निकल पाए हैं। अध्ययन की सुविधा हेतु इनके संबंधों में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण पाँच निम्न चरणों में किया जा सकता है।

विभाजन व प्रारम्भिक अलगाव, (1947-54) 

भारत व पाकिस्तान स्वतन्त्र राष्ट्र के रुप में विभाजन, नरसंहार एवं वैमनस्य के दौर से गुजर कर आये। इसीलिए दोनों के संबंधों की शुरुआत मित्रता की बजाय द्वेषपूर्ण संबंधों से हुई। विभाजन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दो ने इनके रिश्तों को जटिल एवं अविश्वसनीयता पूर्ण बना दिया। प्रथम विभाजन के बाद पंजाब व बंगाल की सीमाओं का निर्धारण; सेनाओं का बटवारा; असैनिक सेवाओं का विभाजन; तथा, सरकारी सम्पदा एवं देनदारी की समस्या ने इनके रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर दी। द्वितीय विभाजन के दौरान दोनों ओर से भारी मात्रा में मुसलमानों तथा हिन्दू व सिखों का पलायन हुआ तथा जो एक दुसरे के यहाँ रह गये वे वहां अल्पसंख्यक बन गये। इन अल्पसंख्यकों एवं शरणार्थियों को समस्याओं ने भी दोनों देशों में दूरियाँ पैदा की। तृतीय सिन्धु एवं उसकी सहायक नदियों के पानी के बटवारे को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद रहा। लगभग 12 वर्षों के विवाद के बाद दोनों देशों की दूरदर्शिता एवं विश्वबैंक की भूमिका के बाद 1960 में यह समस्या हल कर ली गई। चतुर्थ विभाजन में पूर्व में बंगाल व पश्चिम में पंजाब के विभाजन के साथ-साथ कई क्षेत्रों के निर्धारण की समस्या अभी भी बनी रही। यद्यपि रेडक्लिफ कमीशन द्वारा यह मामला काफी हद तक हल कर लिया गया, लेकिन सीमाओं को रेखांकित करके सीमाबन्दी करना इतना सरल नहीं था अत: यह समस्या भी दोनों के मध्य तनाव का कारण रही। पंचम दोनों देशों में पलायन के बाद विस्थपितों द्वारा छोड़ी गई सम्पति के आंकलन, वितरण, हर्जाने आदि को लेकर भी मतभेद बने रहे। अन्तत: दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण विवाद कश्मीर को लेकर हुआ। प्रारम्भ में कश्मीर राज्य ने दोनों देशों से अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखा। लेकिन जब पाकिस्तान की सेना ने कबाईलों के भेष में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया तब वह 26 अक्तूबर 1947 को सम्पन्न सन्धि के अन्तर्गत भारत का हिस्सा बन गया। परन्तु तब तक पाकिस्तान आधे कश्मीर पर कब्जा कर चुका था जिसे ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ कहते हैं। तब से लेकर आज तक कश्मीर पर अपने आधिपत्य को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव नहीं अपितु युद्ध भी हो चुके हैं। अत: विभाजन के उपरान्त उत्पन्न समस्याओं से यह स्पष्ट है कि दोनों देशों के संबंधों की शुरुआत सुखद नहीं रही। यद्यपि कश्मीर के विवाद को छोड़कर कुछ समस्याओं का समाधान तुरन्त एवं कुछ समस्याओं का समाधान कुछ वर्षों बाद हो गया, तथापि दोनों देशों के मध्य आपसी अविश्वास एवं असहयोग बना रहा। इसके परिणामस्वरुप दोनों देशों ने परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों का समर्थन ही नहीं किया अपितु विरोधाभास पूर्ण विदेश नीतियों का अनुसरण किया। आन्तरिक परिस्थितियों में भी सकारात्मक परिवर्तन की बजाय नकारात्मक पहलुओं का ही वर्चस्व बना रहा। अत: दोनों देशों के मध्य दूरियाँ बढ़ती गई तथा सहयोग की सम्भावनाओं का अभाव रहा।

संघर्षपूर्ण संबंध, (1955-1971) 

यह काल दोनों देशों के संबंधों में अति नाजुक बल्कि संघर्ष की चरम सीमा वाला युग रहा। इस दौरान न केवल तनावपूर्ण सम्बन्ध रहे, अपितु द्वन्द्वात्मक स्वरुप भी दो युद्धों (1965 व 1971) के रूप में उभर कर आया। इन दो युद्धों के कई निकटवर्ती एवं दूरगामी परिणाम सामने आये। इस काल में इन संघर्षपूर्ण रिश्तों के लिए कई प्रमुख कारण उत्तरदायी रहे हैं। प्रथम 1954 व 1955 में पाकिस्तान द्वारा अमेरिका समर्थित सीएटो व सैंटो गठबन्धनों में शामिल होने से भारत की विदेश नीति की विपरीत धारा में भाग ले लिया। जहां भारत इन सैन्य गुटों से दूरियाँ बनाने का पक्षधर था, वहीं पाकिस्तान उन गठबन्धनों का हिस्सा बन गया। द्वितीय पाकिस्तान चीन के मध्य मित्रतापूर्ण संबंधों का भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा क्योंकि भारत व चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद संबंध विच्छेद हो गए थे। इसके अतिरिक्त 1963 में चीन के साथ हुए सीमा समझौते के अन्तर्गत पाकिस्तान ने ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ की 5180 वर्ग किलोमीटर भूमि चीन को हस्तांतरित कर देने से दोनों के संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ा। तृतीय 1965 में पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध युद्ध की कार्यवाही ने दोनों के संबंधों को और खराब कर दिया। यद्यपि पूर्व सोवियत संघ की मध्यस्थता के द्वारा 10 जनवरी 1966 के ताशकन्द समझौते से शान्ति स्थापित हो गई परन्तु इस मन मुटाव से आपसी अविश्वास और अधिक बढ़ गया। चतुर्थ 1970-71 में पाकिस्तान का आन्तरिक घटनाक्रम चुनाव मार्शल लॉ लागू होना पूर्वी पाकिस्तान से भारी मात्रा में शरणार्थियों का भारत के विरूद्ध पाक-चीन-अमेरिका त्रिगुट बनना आदि ऐसे कारण रहे जिन्होंने दोनों देशों के तनावों को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। अन्तत: 3 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर सीधे युद्ध की कार्यवाही कर दी। इस 14 दिन चले युद्ध में भारत की निर्णायक जीत हुई तथा पाकिस्तान दो राज्यों- पाकिस्तान व बांग्लादेश - के रुप में बट गया। अन्तर्राष्ट्रीय समीकरणों में भी काफी बदलाव देखने को मिले। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान की आन्तरिक स्थिति व दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति में भी बदलाव आया। इस प्रकार दोनों देशों के मध्य संबंधों का यह चरण संघर्षात्मक होने के साथ-साथ अति जटिल रहा है। इस दौर में दोनों के बीच कटुता व वैमनस्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया था। दोनों युद्ध द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टियों से कई प्रकार से महत्वपूर्ण रहे लेकिन इनके माध्यमों से भी दोनों के मध्य स्थाई शान्ति या सहयोग को किसी भी प्रकार से बढ़ावा नहीं मिला। कश्मीर जैसी अडिग समस्या के समाधान हेतु भी कोई पहल नहीं की जा सकी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध ने तो दोनों के मध्य सभी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। परन्तु इसने पाकिस्तान की आन्तरिक स्थिति में प्रमुख बदलाव लाने के साथ-साथ दक्षिण एशिया का भौगोलिक मानचित्र ही बदल कर रख दिया। इन्हीं बदली हुई स्थिति के कारण दक्षिण एशिया में भारत एक शक्ति के रुप में उभर कर आया। इन सबके परिणामस्वरुप नए द्विपक्षीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समीकरणों ने जन्म दिया, जिसने दोनों के संबंधों में नई पहल करने की परिस्थितियों को जन्म दिया।

तनाव शैथिल्य का दौर, (1972-1979)

1971 के युद्ध के बाद थोड़े से समय तक दोनों देशों ने सकारात्मक रिश्तों की पहल की जिसके परिणामस्वरुप दोनों के मध्य तनाव शैथिल्य का दौर आया। शायद यही एक संक्षिप्त काल था जिस दौरान दोनों देश कम-से-कम शत्रुता वाले संबंध नहीं रखते थे। बदली हुई राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों ने दोनों देशों को वास्तविक धरातल पर आकर अपने संबंधों का आंकलन करने पर बाध्य किया। इसके परिणामस्वरुप निम्नलिखित कदमों के कारण दोनों के बीच नजदीकियाँ बनी। प्रथम 3 जुलाई 1972 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ‘शिमला समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अन्तर्गत दोनों देशों ने आपसी विवादों को द्वि-पक्षीय आधार पर हल करने के सिद्धान्त पर सहमति व्यक्त की। द्वितीय इसके बाद बांग्लादेश को भी विश्वास में लेकर युद्धबन्दियों की समास्या का समाधान किया गया। तृतीय 22 फरवरी 1974 को पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश को औपचारिक मान्यता देने के बाद तीनों राष्ट्रों के रिश्तों में सुधार आया। चतुर्थ 1974 व 1975 में भारत व पाकिस्तान के बीच कुछ व्यापारिक तथा परस्पर आदान प्रदान के समझौतों पर हस्ताक्षर करने से मधुर संबंध बने। पंचम 1976 में फिर दोनों देशों के मध्य कुछ व्यापारिक एवं गैर व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। षष्ट 14 मई 1976 को हुए समझौते के अन्तर्गत पुन: राजदूतों का आदान-प्रदान प्रारम्भ हुआ।

उपरोक्त कारणों से दोनों देशों के मध्य दूरियां कम हुई तथा मित्रतापूर्ण सम्बन्धों की शुरुआत हुई। लेकिन 1977 में दोनों देशों में आन्तरिक परिवर्तन हुए। पाकिस्तान में 5 जुलाई 1977 में लोकतांत्रिक रुप से निर्वाचित भूट्टो सरकार का तख्ता पलट कर जरनल जियाउलहक ने सत्ता सम्भाल ली। परन्तु इस घटना का दोनोंं देशों के द्वितीय-पक्षीय मुद्दों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। इसका प्रमुख कारण यह हुआ कि भारत में भी लम्बे अन्तराल के बाद कांग्रेस दल को सत्ता से बाहर कर जनता पार्टी की सरकार बनी। इस सरकार की विदेश नीति के एजेन्डा में ‘पड़ोसियों से मधुर संबंध’ बनाना वरीयता का विषय था। अत: पाकिस्तान से भी संबंधों को सुधारना चाहते थे। इसीलिए शायद जियाउलहक द्वारा भुटटों को मृत्युदंड देने को भी वहां का आन्तरिक मामला बताकर प्रतिक्रिया व्यक्त की। इसके अतिरिक्त, इस युग में दोनों देशों ने ‘सलाल बिजली परियोजना’ पर सहमति व्यक्त करते हुए संबंधों को और मधुर बना दिया। इस प्रकार,1972. 79 का युग दोनों के बीच तनाव रहित एवं मित्रता हेतु प्रयासरत संबंधों का युग माना जा सकता है।

उतार-चढ़ा़व का दौर, (1980-98) 

यह काल पुन: संघर्ष काल के रूप में उभर कर आया, जिसमें एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ दोनों ही देश परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़े हुए। इस प्रकार इस काल में अनेक प्रकार के घटनाक्रम हुए जिससे दोनों देशों में तनाव व शान्ति का मिश्रित दौर चला।

इनके बीच तनाव बढ़ने के ये प्रमुख कारण थे -ऋप्रथम ,1979 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप कर शीतयुद्ध को इन दोनों राष्ट्रों के करीब ला दिया। परन्तु इसका लाभ पाकिस्तान को मिला क्योंकि पाकिस्तान इस समय अमेरिका की रणनीति वाला अग्रिम राष्ट्र बन गया। इसी कारण इसे अमेरिका से भरपूर आर्थिक सहायता एवं हथियार प्राप्त हुए जिससे भारत के विरूद्ध इसकी स्थिति मजबूत बन गई। दूसरी ओर इस घटनाक्रम से भारत व सोवियत संघ के बीच रिश्तों में दरारें पड़ गई क्योंकि भारत इस समस्या को राजनैतिक दृष्टि से हल करने का पक्षधर था, न कि सैन्य साघनों द्वारा। द्वितीय इस काल में पाकिस्तान ने न केवल पंजाब व कश्मीर में आंतकवादियों को सहायता प्रदान की, अपितु अपने क्षेत्र में आंतकवादी प्रशिक्षण शिवरों का आयोजन भी किया। यद्यपि सिंध व बलुचिस्तान में हो रहे अलगाववादियों के आन्दोंलनों को सहायता प्रदान करने के भी आरोप पाकिस्तान ने भारत पर लगाये, जो प्रमाणिक नहीं थे। इस प्रकार के आरोपों-प्रत्यारोपों के कारण दोनों के मध्य दूरियाँ अवश्य उत्पन्न हो गई। तृतीय, अफगानिस्तान की घटना के पश्चात दोनों देशों के मध्य हथियारों की होड़ को भी बढ़ावा मिला। एक और अमेरिका ने पाकिस्तान को 1979 में 400 मिलियन डॉलर (जो पाकिस्तान ने ठुकरा दी) 1981 में 4.2 बिलियन डॉलर तथा, 1988 में 402 बिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की। अमेरिका ने इस सहायता के अन्तर्गत एफ 16 लड़ाकू विमान, सी हॉक प्रक्षेपास्त्र, आवाक्स पूर्व चेतावनी लड़ाकू विमान, साईडवाइडंर प्रक्षेपास्त्र, पनडुब्बियाँ आदि प्रदान की। दूसरी और भारत को भी पूर्व सोवियत से 1980 में 1.6 बिलियन डॉलर तथा 1981 में 3 बिलियन डॉलर के हथियारों की आपूर्ति के समझौतों पर हस्ताक्षर किए। चतुर्थ, दोनों देशों द्वारा परमाणु क्षमता विकसित व हासिल करना भी इन दोनों के गैर-मैत्रीपूर्ण संबंधों का परिचायक है। भारत द्वारा 1974 में पोखरन-I में शान्तिपूर्ण उद्देश्यों हेतु किए गए परिक्षण के पश्चात दोनों देशों में परमाणु शाक्ति प्राप्ति की होड़ लग गई। भारत के कार्यक्रमों के जवाब में पाकिस्तान ने विदेशों से चोरी की गई तकनीकों के माघ्यम से अब्दुल कादिर खान के नेतृत्व में 1984 में परमाणु कार्यक्रमों हेतु ‘यूरेनियम संवर्द्धन’ क्षमता तथा 1979 में परमाणु बम्ब की क्षमता प्राप्त कर ली। इससे दोनों के बीच सन्देह की स्थिति और गम्भीर हो गई। पंचम, परमाणु क्षमता के साथ-साथ प्रक्षेपास्त्र विकसित करने हेतु भी दोनों में होड़ लग गई। जहां भारत ने अपने ‘एकीकृत प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम’ के माध्यम से माध्यम से पाँच-अग्नि, पृथ्वी, त्रिशुल, नाग, आकाश-प्रक्षेपास्त्र विकसित करने के प्रयास किए, वहीं पाकिस्तान ने चीन व उत्तरी कोरिया से प्रक्षेपास्त्रों का आयात चोरी छिपे मंगाना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रक्रिया ने भी दोनों के मध्य अविश्वास प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। षष्ट, हिन्दमहासागर में बाह्य ताकतों की सेनाओं की उपस्थिति को लेकर भी दोनों के विरोधी दृष्टिकोण रहे। भारत इस क्षेत्र के सैन्यीकरण के हमेशा विरूद्ध रहा है, जबकि अफगानिस्तान के सन्दर्भ को लेकर अमेरिका इस क्षेत्र में 19 देशों की एक ‘सामरिक केन्द्रीय कमाण्ड’ व्यवस्था का पाकिस्तान एक सदस्य रहा। सप्तम 1984 से 1987 तक सियाचीन ग्लेशियर को लेकर भी भारत व पाकिस्तान के मध्य विवाद की स्थिति बनी रही। यह क्षेत्र सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण है। इस पर 1947 से 1984 तक भारत का कब्जा रहा, परन्तु 1984 में अचानक पाकिस्तान द्वारा कब्जा करने की कोशिश से दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। यद्यपि 1987 में यह शान्त हो गया, लेकिन इसका पूर्ण हल दोनों की सीमाओं के आंकलन के बाद ही हो पायेगा। अष्टम 1987 में दोनों देशों द्वारा परस्पर किया जाने वाला वार्षिक सैन्य अभ्यास भी तनाव का कारण बन गया था। भारत ने तीन वर्ष बाद पाकिस्तान सीमा के निकट 1987 में ब्रासटेक ‘नामक सैन्य अभ्यास करने की योजना बनाई। भारत इस महत्वपूर्ण अभ्यास के द्वारा अपने सभी आधुनिकतम शस्त्रों की विश्वसनीयता जानना चाहता था। परन्तु पाकिस्तान को इससे खतरे की आशंका हो गई तथा उसने भी अपनी सीमा में ‘जरबेमोमिन’ अभ्यास शुरू कर दिया। अत: दोनों द्वारा किये जाने वाले अभ्यास से एक बार फिर युद्ध की सम्भावनाएँ दिखाई देने लगी।

उपरोक्त विषयों पर मतभेदों का अर्थ यह नहीं था कि दोनों देशों कें मध्य आम सहमति का बिल्कुल अभाव था। बल्कि कुछ मुददों पर दोनों के बीच इस समय में समझौते ते भी हुए एक दूसरे के परमाणु संयन्त्रों पर हमला न करने, सैन्य अभ्यासों की पूर्व जानकारी देने सैन्य डायरेक्टरो के मध्य सीधी टेलीफोन सेवा, वायु सीमा के प्रयोग की अनुमति, रासायनिक हथियारों के प्रयोग पर निषेध आदि मुद्दों पर दोनों के बीचे पूर्ण सहमति बन गई। परन्तु कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास दोनों देशों को करने पड़ेंगे।

शीतयुद्धोत्तर युग में जहां सारी दुनिया में मूलभूत परिवर्तन देखने को मिले वैसी स्थिति भारत-पाक संबंधों में दृष्टिगोचर नहीं रही। ऐसा शायद इसलिए नहीं हो सका क्योंकि दोनों के मध्य अवरोधक पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए थे। इसके अतिरिक्त, विभिन्न विश्वास पैदा करने वाले कदमो का विकास तथा विभिन्न दृष्टिकोणो में परिवर्तन अभी तक शायद नहीं हो पाया था। निम्नलिखित तत्वों ने इस प्रकार के संबंधों हेतु प्रमुख कारकों का कार्य किया-प्रथम, शीतयुद्धोत्तर युग में कश्मीर में आतंकवाद तथा उसे सीमापार से सहयोग की प्रक्रिया में बदलाव नहीं आया। द्वितीय दोनों देशों ने अपनी पुरानी वैमनस्य पूर्ण नीतियों का त्याग नहीं किया। तृतीय 6 दिसम्बर 1992 की बाबरी मस्जिद तोड़ने की घटना ने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों को और मजबूत किया। चतुर्थ, 12 मार्च 1993 में हुए बम्बई बम्ब विस्फोटो ने धार्मिक कट्टरता को चरम सीमा पर पहुंचा दिया। पंचम पाकिस्तान द्वारा अमेरिका से हथियार प्राप्त करने के कारण दोनों देशों के मध्य अविश्वास और बढ़ गया।षष्ट, सोवियत संघ के विघटन के बाद पाकिस्तान मध्य एशियाई बनाने गणराज्यों के साथ विशिष्ट गठबन्धन बनाने में लीन हो गया। अत: इन सभी कारणों से शीतयुद्धोत्तर युग में शान्ति का लाभांश भारत व पाकिस्तान संबंधों तक नहीं पहुँचा।

भारत में संयुक्त मोर्चा की सरकार, निशेषकर इन्द्रकुमार गुजराल के समय द्वारा पड़ोसियों से मित्रता पूर्वक सबंधो हेतु ‘गुजराल सिद्धान्त’ स्थापित किया गया। इसके अन्तर्गत अपने पड़ोसियों को एक तरफा रियायत देकर भारत ने उनसे मधुर संबंधों का प्रयास किया। इस प्रयास के बावजूद कश्मीर, सियाचीन, बुलर, टुलबुल सिंचाई परियोजना, सर क्रिक आदि समस्याओं के स्थाई समाधान के बिना दोनों देशों के बीच दूरगामी संबंधों की कामना करना व्यर्थ है। इस प्रकार शीतयुद्धोत्तर युग में भी कई मुद्दों पर दोनों देशों की समान बाध्यताएँ एवं जरूरतें होने के बावजूद भी दोनों के बीच महत्वपूर्ण अवरोधक तत्व व्याप्त हैं। भविष्य में दोनों के बीच मधुर संबंधों एवं मित्रता हेतु बाहय एवं आन्तरिक तत्वों में परिवर्तन होना अनिवार्य है, वरना शीतयुद्धोत्तर युग में भी इस दोनों राष्ट्रो के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति जारी रहेगी।

मई 1998 में हुए पोखरण-II व छगाई में हुए परमाणु विस्फोटो के बाद यह परिवर्तन देखने को मिला। शायद पहली बार दोनों शस्त्र होड़ में एक दूसरे से बराबरी पर आ गये थे। इसके अतिरिक्त, अन्तर्राष्ट्रीय दबाव का सामना भी दोनों को ही समान रूप से परेशान कर रहा था। शायद इसी कारण से दोनों वार्ताओ हेतु सहमत हो गए। फरवरी 1999 में वाजपेयी की लाहौर यात्रा व बस राजनय के अन्तर्गत दोनों के मध्य लाहौर घोषणा पत्र, सहमति के ज्ञापन, एवं संयुक्त वक्तत्व पर आम सहमति बन सकी। अत: इस उतार-चढाव के दौर में दोनों के वैमनस्य संबधो से सदभावना तक की यात्रा कई कारकों के सकारात्मक व नकारात्मक परिणामों के कारण हुई।

कारगिल युद्ध से पुन: संबंध स्थापना तक (1999-2003)

लाहौर यात्रा से उत्पन्न आशावादी संबंधों की परिणति अधिक देर तक न रह सकी। लाहौर भावना के क्रियान्वयन से पूर्व ही पाकिस्तान द्वारा भारत पर कारगिल युद्ध थोंप कर आपसी संबंधों को पुन: वैमनस्य पूर्ण बना दिया। कई सन्दर्भो में यह युद्ध 1948, 1965, 1971 के समकक्ष ही था। इस युद्ध ने यह भी साबित कर दिया कि भारत-पाक संबंधों में हमेंशा संघर्ष से शान्ति व फिर संघर्ष ही मात्र विकल्प है सहयोग नहीं।

यहां यह महत्वपूर्ण नहीं है कि किन कारणो से पाकिस्तान ने भारत पर युद्ध किया या भारतीय गुप्तचर व्यवस्था पाकिस्तान की इस घुसपैठ के बारे में समय पर पता क्यो नहीं लगा सकी। यह भी अब ज्यादा अर्थ नहीं रखता कि भारत ने पूरा संयम बरतते हुए किस प्रकार अन्तत: पाकिस्तानी सेना को नियन्त्रण रेखा के पार भेजा तथा अपना क्षेत्र खाली कराने में सफलता प्राप्त की। परन्तु यह सत्य है कि उपरोक्त युद्ध के बहुत से निकटवर्ती एवं दूरगामी परिणाम निकले जिनका दोनों देशों के संबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इनमें से मुख्य केन्द्र बिन्दु बातें निम्न रही-प्रथम इस युद्ध से यह भ्रम टूट गया कि देनों देशों की परमाणु क्षमता इनके मध्य एक निरोधक का कार्य कर सकती है। द्वितीय इससे लाहौर भावना के शान्ति व सुरक्षा पर पडने वाले दूरगामी प्रभावों का अन्त हो गया अर्थात लाहौर भावना निरस्त हो गई। तृतीय, कटटरवाद का गम्भीर खतरा भारत के निकट पड़ोस में स्थापित हो गया। चतुर्थ पाकिस्तान द्वारा मुजाहीदीन, तालिबान एवं कई इस्लामी संगठनों के तालमेल से यह संकेत मिले कि अब यह संकट दोनों देशों की सीमाओं तक सीमित नह रह कर पश्चिमी एवं मध्य एशियाई गणराज्यों एवं दक्षिण एशिया से जुड़कर अत्यन्त गम्भीर बन गया। पंचम इससे भारत-पाक विवादों के अन्तर्राष्ट्रीय करण एवं बाहय हस्तक्षेप की सम्भावनाएं बढ़ गई। अन्तत: इस युद्ध ने भारत-पाक संबंधों में पिछले कुछ वर्षो से स्थापित सभी विश्वसनीयता बढ़ाने वाले कदमो की पहल को समाप्त कर दिया।

कारगिल युद्ध के तुरन्त बाद 12 अक्तूबर 1999 में पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट कर सैनिक शासन की स्थापना हो गई। इस प्रक्रिया से दोनों के रिश्तों में सुधार की सम्भावनाओं को और धक्का लगा। पाकिस्तान के सैनिक शासक जरनल परवेज मुशरफ की कारगिल युद्ध में मुख्य भूमिका के कारण मामलों और गम्भीर हो गया। आतंकवादी घटनाओ में और बढ़ोतरी होने लगी। 1 अक्टूबर को जम्मु विधानसभा पर आतंकवादी हमले एवं दिसम्बर में आई सी-814 विमान के कन्धार अपहरण ने संबंधों में और कड़वाहट पैदा कर दी। यह तनाव का दौर पूरे वर्ष 2000 में बना रहा।

इस तनावपूर्ण स्थिति को सामान्य करने हेतु, कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय दबावों के कारण शायद भारत ने रिश्तों में सुधार की पहल की। इस पहल के अन्तर्गत 14,16 जुलाई 2001 में ‘आगरा शिखर वार्ता’ का आयोजन किया गया। भारत द्वारा इस यात्रा की सफलता की कामनाओं के बावजूद यह सम्मेंलन विफल रहा। इसकी विफलता में कई कारणो का योगदान रहा जिनमें मुख्य रूप से वार्ताओं के प्रारम्भ होने से पूर्व विषय सूची तय करना; जनरल मुशर्रफ द्वारा कश्मीर को केन्द्र बिन्दु मानना; भारत में आकर भी पाकिस्तानी शासक द्वारा राजनयिक प्रोटोकॉल का पालन न करना आदि। यद्यपि यह सम्मेलन विफल रहा लेकिन सरकार ने अपनी सफाई में इसे वार्ताओं की पहल प्रक्रिया में रूप में लिया।

इससे भी गम्भीर मामला 13 दिसम्बर 2001 को पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा संसद पर किया गया हमला था। इस हमले के परिणामस्वरूप दोनों देशों के संबंध सुधार की प्रक्रिया को गहरा आघात पहुंचा। इसके कारण दोनों देशों के मध्य बस, रेल व हवाई सेवाये बन्द कर दी गई, भारतीय उच्चायुक्त को वापिस बुला लिया गया, उच्चायोग में स्टाफ की संख्या आधी कर दी गई, तथा दोनों देशों के परस्पर वायुमार्गों के प्रयोग को समाप्त कर दिया गया। इस सबसे गम्भीर भारत ने सीमाओं पर फौजों की तैनाती के साथ ‘‘आपॅरेशन पराक्रम’’ शुरू कर दिया। दोनों देशों के बीच तनाव और बढ गया। दानो देशों द्वारा परस्पर प्रक्षेपास्त्रों के परीक्षणों को तीव्र करने से दोनों के बीच होड़ बढ़ गई। दोनों के मध्य बातचीत बिल्कुल समाप्त हो गई। परन्तु कई अन्तर्राष्ट्रीय दबावों, संसांधनों पर बढ़ते खर्च सेना की तैनाती से विशेष परिणाम न आने आदि कारणो से शायद 16 अक्टूबर 2002 को फौजों की वापसी शुरू हो गई। अन्तत: 18 अप्रैल 2003 को श्रीनगर में अपनी आम सभा में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पुन: पहल कर पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढाया है। इसके बाद दोनों के बीच बस सेवा प्रारम्भ हो गई है। रेल यातायात व वायुमार्ग भी जल्द खुल जायेंगे। दोनों देशों के उच्चायुक्तों ने अपना-अपना कार्यभार सम्भाल लिया है। इन सभी विश्वसनीयता बढ़ाने वाले कदमों के बावजूद भी दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य करने हेतु समय लगेगा।

भविष्य में भारत व पाकिस्तान के संबंधों का सामान्य एवं अन्तत: मधुर होना विभिन्न कारको की भूमिकाओं पर निर्भर करेगा-प्रथम पाकिस्तान में प्रजातन्त्र की बहाली दोनों देशों के दूरगामी एवं स्थाई रिश्तों के लिए अति अनिवार्य है। द्वितीय, दोनों ही देश तीसरे देश की मध्यस्थता से कितना ही इन्कार करे, परन्तु दोनों ही आज अमेरिका की भूमिका से काफी हद तक प्रभावित हुए है। तृतीय, वर्तमान समय में दोनों देशों के आर्थिक कारकों का दबाव समूह के रूप में कार्य करना भी इनके संबंधों में बदलाव ला सकता है। चतुर्थ दोनों ही देशों को कश्मीर समेत सभी मुददों पर एक समग्र रूप में प्रयास हेतु एक दिशा निर्देश पर सहमति व्यक्त करनी होगी। पंचम, दोनों देशों को नियन्त्रण रेखा के सही निर्धारण एवं आंकलन पर सहमत होना होगा। अन्तत: दोनों देशों द्वारा शिमला समझौता एवं लाहौर घोषणा के ढ़ाचो को स्वीकारते हुए उनकी भावनाओं के अनुरूप ही बातचीत का दायरा तय करना पडेगा।

परन्तु वर्तमान संबंधों की स्थिति को देखते हुए यह सब इतना सरल नहीं लगता। दोनों देशों के संबंधों के इतिहास के देखते हुए भी इस प्रकार की सम्भावनाएं बहुत कम है। यद्यपि इनके जटिल मतभेदों से परस्पर द्विपक्षीय ही नहीं अपितु क्षेत्रीय व अन्यर्राष्ट्रीय राजनीति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसीलिए दोनों की परस्पर बाध्यताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय एवं विश्वस्तरीय ताकतें भी इन पर दबाव बनाये हुए हैं परन्तु इन सबका कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा तथा इनके भावी संबंध किसी प्रकार के होंगे यह सिर्फ समय ही बतायेगा।

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