लोकसभा के कार्य और शक्तियां

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संघीय संसद के निम्न सदन या लोकप्रिय सदन को लोकसभा का नाम दिया गया है। लोकसभा की सदस्य संख्या समय-समय पर परिवर्तित होती रही है। संविधान में उपबन्ध है कि लोकसभा के 530 से अधिक सदस्य राज्यों में प्रादेशिक निर्वाचन दलों से प्रत्यक्ष रीति से चुने जांएगें और 20 से अनाधिक सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करेगें जिनका निर्वाचन ऐसी रीती से होगा जैसे संसद विधि द्वारा उपबन्ध करे। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति आंग्ला-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधितव करने के लिए दो से अधिक सदस्य मनोनीत कर सकता है। इस प्रकार सदन की अधितम सदस्य संख्या 552 हो, ऐसी संविधान में परिकलपना की गई है लोकसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष 18 वर्ष की आयु प्राप्त व्यक्ति को वयस्क माना गया है। अब लोकसभा के सभी निवाचन क्षेत्र ‘एंकल सदस्यीय ‘ रखें गए है। 42वें संवैधानिक संशोधन के पूर्व तक लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष था, लेकिन इस संशोधन द्वारा लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया। अब 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पुन: यह 5 वर्ष कर दिया गया है।

लोकसभा के अध्यक्ष का पद

अध्यक्ष का पद संसदीय शासन प्रणाली में बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विश्व से जहां पर भी संसदीय पद्धति की सरकार है, वहां संसद के निम्न सदन के स्पीकर को विशेष महत्व और दर्जा प्राप्त होता है। संविधान के अनुसार, अध्यक्ष का निर्वाचन लोकसभा स्वयं करती है। अध्यक्ष निर्वाचन के समय से लेकर, उस लोकसभा के विघटन के बाद अगली लोकसभा की पहली बैठक से फौरन पहले तक अपने पद पर रहता है। वह दुबारा चुना जा सकता है।

अध्यक्ष की शक्तियाँ 

लोकसभा का सबसे महत्वशाली रूढ़िगत और औपचारिक प्रधान लोकसभा का अध्यक्ष है। सभा में उसका प्राधिकार सर्वोच्च है। यह प्राधिकार अध्यक्ष की अनन्य निष्पक्षता पर आधारित है। उसकी शक्तियों तथा उसके कर्त्तव्यों का उल्लेख नियमों में तथा कुछ हद तक संविधान में किया गया है। जिन नियमों के अनुसार उसे अपना काम करना होता है, वे नम्य है और कुछ मामलो में उसे अपने विवेक से काम लेना पड़ता है। उसके कर्त्तव्य बड़े कठिन है। उसके कार्य है:

सदन की बैठकों की अध्यक्षता करना

स्पीकर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य लोकसभा की बैठको की अध्यक्षता करना हैं। वह इस कार्य को बिना किसी पक्षपात के करता है। इस व्यवस्था को अधिक निश्चित बनाने के लिए ही उसे पद से हटाए जाने के लिए सदन के समस्त सदस्यों के बहुमत द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने की व्यवस्था की गई है ताकि वह किसी विशेष दल आदि के प्रभाव के अधीन न रहे। दोनों सदनों की सयुंक्त बैठकों की अध्यक्षता भी लोकसभा का स्पीकर ही करता है।

सदन को स्थगित करना 

स्पीकर को अधिकार है कि वह लोकसभा की गणपूर्ति न होने की हालत में सदन को स्थगित कर सकता है। इसी प्रकार सदन में गंभीर प्रकार के उपद्रव होने की हालत में भी वह सदन की कार्यवाही को निलंबित कर सकता है।

वाद विवाद का समय निश्चित करना 

सदन के नेता के परामर्श से स्पीकर राष्ट्रपति द्वारा सदन के आगे दिए भाषण पर वाद-विवाद का समय निश्चित करता है। वही राष्ट्रपति के भाषण से सम्बन्धित धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधन का रूप निर्धारित करता है।

सदन का कार्यकाल निश्चित करना

सदन के नेता की सलाह से स्पीकर सदन का कार्यक्रम तथा उसका क्रम निर्धारित करता है। वह निर्णय करता है कि कौन-सा बिल किस समय सदन के सम्मुख प्रस्तुत किया जाए या कौन-से विषय पर किस दिन बहस की जाए। सदस्यों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों और उनके उत्तरों के लिए भी समय और दिन स्पीकर ही निश्चित करता है।

सदन की कार्यवाही चलाना 

सदन की कार्यवाही संचालन करने की जिम्मेवारी स्पीकर की है। वह सदन के सदस्यों को भाषण देने की आज्ञा देता है और भाषण देने वालों को क्रम निर्धारित करता है। सदन के सदस्य स्पीकर को ही सम्बोधित करते है, एक दूसरे को नहीं। वह प्रश्न भी स्पीकर के द्वारा ही पूछते हैं, प्रत्यक्ष रूप मे नहीं। प्रस्तावों की स्वीकृति का निर्णय भी स्पीकर ही करता है। व्यवस्था प्रश्नों के बारे में भी स्पीकर का निर्णय अंतिम होता है।

यदि सदन की कार्यवाही में भाग लेने वाले किसी सदस्य को हिन्दी या अंग्रेजी भाषा न आती हो तो स्पीकर उसे अपनी प्रादेशिक भाषा में बोलने की आज्ञा दे सकता है। सदन के नियमों की व्याख्या का अधिकार भी स्पीकर को ही प्राप्त है और इस बारे में उसका निर्णय अंतिम होता है।

वित्तीय बिलों का प्रमाणित करना

संविधान के अन्र्तगत स्पीकर को यह प्रमाणित करने की शक्ति प्राप्त है कि विशिष्ट बिल वित्तीय बिल है या नही। इस बारे में उसका निर्णय अंतिम होता है। जिस बिल को वह वित्तीय बिल प्रमाणित कर दे वह केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नही। लोकसभा द्वारा पास होने के बाद राज्यपाल उसे 14 दिन से अधिक समय के लिए नहीं रोक सकती और लोकसभा की इच्छा के बिना न वह इसमें संशोधन कर सकती है।

बिलों से सम्बन्धित शक्ति 

कोई भी बिल स्पीकर की स्वीकृति के बिना लोकसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता स्पीकर ही बिल पर सदन का मतदान लेने के बाद उसे सदन द्वारा पास किया गया प्रमाणित करता है।

मतदान करवाना 

स्पीकर विभिन्न विषयों और बिलों पर वाद-विवाद समाप्त होने के पश्चात उस पर मतदान करवाता है और उसको परिणाम घोषित करता है।

स्थगन प्रस्ताव की स्वीकृति 

जनहित से सम्बन्धित महत्वपूर्ण विषयों पर सोच विचार करने के लिए रखे जाने वाले स्थगन प्रस्ताव के लिए स्पीकर की सहमति लेना अनिवार्य है। वह ऐसे प्रस्ताव पर होने वाले वाद-विवाद का समय निर्धारित करता है। इसी प्रकार किसी बिल के बारे में हो रही बहस पर स्थगन प्रस्ताव के लिए भी स्पीकर की सहमति लेना आवश्यक है।

अनुशासन बनाए रखना 

सदन में अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेवारी भी स्पीकर की ही है और उसे इसके लिए आवश्यक शक्तियां प्राप्त है। वह किसी सदस्य को उपद्रवी, आचार व्यवहार के लिए सदन से निकाल जाने का आदेश दे सकता है। यदि कोई सदस्य सदन की कार्यवाही में बाधा डाले तों स्पीकर उसे कार्यवंचित कर सकता है। उसकी आज्ञा के बिना कोई अज्ञात व्यक्ति सदन में प्रवेश नही कर सकता।

सदस्यों के अधिकार सुरक्षित रखना 

स्पीकर लोकसभा के सदस्यों के अधिकारों और विशेषाधिकारों को सुरखित रखता है। उसका यह कर्तव्य है कि बहुमत दल की तानाशाही स्थापित न होने दे कि कहीं अल्पमतों को दबा न दिया जाए। सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर ठीक ढंग से दिए जाएं इसकी जिम्मेवारी स्पीकर की है।

स्पीकर प्रश्नों की स्वीकृति का निर्णय करता है और ऐसे प्रश्नों को अस्वीकार भी कर सकता है जो सदन के नियमों के अनुकूल न हों। यदि कोई व्यक्ति या संस्था सदन के सदस्यों के विशेष अधिकारों का उल्लंघन करे तो स्पीकर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए उचित कार्यवाही करता है।

सदन के नियमों की व्याख्या करना 

सदन के नियमों की व्याख्या करने की शक्ति भी स्पीकर को ही प्राप्त है। इस बारे में उसके निर्णय को किसी न्यायपालिका में चुनौती नही दी जा सकती। जब स्पीकर कुछ कहने के लिए खड़ा होता है तो सब सदस्य अपनी सीटों पर बैठ जाते हैं-उस समय तक सदस्य सदन से बाहर नहीें निकल सकते जब तक कि स्पीकर अपना भाषण समाप्त न कर ले स्पीकर संसद और राष्ट्रपति के मध्य कड़ी का काम करता है। स्पीकर चाहे सदन के वाद-विवाद में भाग नही लेता और न ही साधारणतया वह मतदान में भाग लेता है परन्तु यदि किसी विषय के पक्ष या विपक्ष में समान मत पडे़ तो स्पीकर अपना निर्णायक मत (Costing vote) दे सकता है।

सदन की प्रवर समितियों (Select Committees) के अध्यक्ष की नियुक्ति भी स्पीकर ही करता है। ऐसी नियुक्ति वह समिति के सदस्यों में से ही करता है।

अध्यक्ष की वास्तविक स्थिति

अध्यक्ष सदन की प्रतिष्ठा, शक्ति तथा गौरव का द्योतक है। प0 नेहरू के शब्दों में,”अध्यक्ष सभा का प्रतिनिधी है। वह सभा की गरिमा और उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है और चूंकि सभा राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए एक तरफ से अध्यक्ष राष्ट्र की स्वतंत्रता और आजादी का प्रतीक बन जाता है। अत: यह उचित ही है कि अध्यक्ष का पद सम्मानित पद है। उसकी स्वतंत्र स्थिति है और उस पद पर वही व्यक्ति आसिन होने चाहिए जो साधारण रूप से योग्य तथा निष्पक्ष हो। लोकसभा के भूतपूर्व सचिव एमñएनñ कौल के अनुसार, “यद्यपि साधारणतया अध्यक्ष अध्यक्षता करता है। निगरानी रखता है तथा विवादों को नियन्त्रित करता है लेकिन उसकी स्थिति इतनी महत्वपूर्ण है कि किसी भी सकंट में उसकी शक्तियां राजनीतिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। .... यथार्थ में भारतीय ससंदीय व्यवस्था में लोकसभा का अध्यक्ष उस सन्तुलन-चक्र के समान है जिससे कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के सम्बन्ध में सरकार की और से मैं यह कहुंगा कि हम यह चाहेंगे कि मानवीय अध्यक्ष अब और हमेशा सदन की स्वतंत्रता की रक्षा प्रत्येक प्रकार के खतरे से करेंगें -कार्यपालिका के अतिक्रमण के खतरे से भी।” अध्यक्ष के निर्णय नजीरें है जिनसे आगे आने वाले अध्यक्षों, सदस्यों तथा अधिकारियों का पथ-प्रदर्शन होता है। ऐसी नजीरों का सग्रंह कर लिया जाता है और समय आने का यही या तो प्रक्रिया नियमों में परिवर्तित हो जाते है और या परिपातियों के रूप में इनका अनुसरण किया जाता है। अध्यक्ष के निर्णयों को केवल प्रस्ताव रखकर ही चुनौती दी जा सकती है, वैसे उन पर आपत्ति नहीं उठाई जा सकती। जो सदस्य अध्यक्ष के विनिर्णय पर विरोध प्रकट करता है वह सभा और अध्यक्ष के अवमान का दोषी होता है। अध्यक्ष अपने निर्णय के कारण बताने के लिए बाध्य नहीं होता। अध्यक्ष द्वारा दिए गए विनिर्णय या व्यय किए गए विचार या दिए गए वहमव्य की आलोचना नहीं की जा सकती। लोकसभा का अध्यक्ष भारतीय ससंदीय समूह का पदेन सभापति होता है जो भारत के अन्तर्ससदीय संघ के राष्ट्रीय समूह और राष्ट्रमण्डल संसदीय सस्ंथा की मुख्य शाखा के रूप में काम करता है। वह राज्यसभा के सभापति के परामर्श से विदेशों को जाने वाले विभिन्न संसदीय प्रतिनिधि मण्डलों के लिए सदस्यों का नाम निर्देशन करता है। कभी कभी वह स्वंय इन प्रतिनिधिमण्डलों का नेतृत्व करता है।

ससंदीय संचिवालय और सदन की इमारत अध्यक्ष के नियन्त्रण में होती है। इस दिशा में सारा प्रशासन अध्यक्ष के आदेश से ही चलता है। सदन के कार्यो कार्य को चलाने सम्बन्धी सारे अधिकार भी अध्यक्ष को प्राप्त होते है। प्रो0 पायली के अनुसार कुछ ही वर्षो के भीतर लोकसभा के अध्यक्ष पद ने सदन की गरिमा को अपनी निष्पक्षता द्वारा बनाए रखा है। शुरू में मावलकर जैसे अध्यक्ष इस विचारधारा के थे कि सदन में वह निर्दलीय व्यक्ति के समान अचरण करे, किन्तु सदन के बाहर वह दलगत निष्ठाएं रख सकता है परन्तु बाद के अध्यक्षों जैसे नीलम संजीव रही तथा गुरदयाल सिह दिल्लन ने अध्यक्ष पद धारण करते ही दल की राजनीति से सन्यासं ले लिया। अध्यक्ष को भारत में सांतवा स्थान प्राप्त है, जो सर्वोच्य न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर का है। अध्यक्ष को लोकसभा के अभिभवय का सा दायित्व निभाना होता है। सदन में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के बजाए स्वस्थ विचारों के आदान-प्रदान को समुचित अवसर प्रदान करना होता है।

लोकसभा की शक्तियां और कार्य

भारतीय ससंद के दो सदनों में लोकसभा लोकप्रिय सदन है क्योंकि इसके गठन का आधार जनसंख्या है और लोकसभा के सदस्यों को जनता के द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर निर्वाचित किया जाता है। संसदीय व्यवस्था का यह निश्चित सिंद्धान्त है कि काननू निर्माण और प्रशासन पर नियंत्रण की अन्तिम शक्ति लोकप्रिय सदन को ही प्राप्त होती है। लोकसभा की शक्तियों तथा उसके कार्यो का अध्ययन निम्न रूपों में किया जा सकता है।

विधायी शक्ति :-

संविधान के अनुसार भारतीय ससंद संघ सूची, समवर्ती सूची, अवशेष विषयों और कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर कानून का निर्माण कर सकती है। यद्यपि संविधान के द्वारा साधारण अवित्तीय विधेयकों के सम्बन्ध में लोकसभा और राज्यसभा को समान शक्ति प्रदान की गई है। संविधान में कहा गया है कि इस प्रकार के विधेयक दोनों में से किसी एक सदन में प्रस्तावित किए जा सकते है और दोनों सदनो से पारित होने पर ही राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए भेजे जांएगे, लेकिन इसके साथ ही दोनो सदनो में मतभेद उत्पन्न हो जाने पर राष्ट्रपति द्वारा देानों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाए जाने की व्यवस्था है और लोकसभा में रहस्य संख्या राज्यसभा की संख्या की दुगनी से भी अधिक होने के कारण सामान्यतया इस बैठक में विधेयक के भाग्य का निर्णय लोकसभा की इच्छानुसार ही होता है। इस प्रकार कानून निर्माण के सम्बन्ध में अन्तिम शक्ति लोकसभा के पास है और राज्यसभा साधारण अवित्तिय विधेयक को 6 मास तक रोके रखने के अलावा और कुछ नही कर सकती है। व्यवहार को अन्तर्गत अब तक महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जाते रहे हैं।

वित्तीय शक्ति :-

भारतीय संविधान द्वारा वित्तीय क्षेत्र के सम्बन्ध में शक्ति लोकसभा को ही प्रदान की गई है और इस सम्बन्ध में राज्यसभा की स्थिति बहुत गौण है। अनुच्छेद 109 के अनुसार वित्त विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते है, राज्यसभा में नही। लोकसभा से पारित होने के बाद वित्त विधेयक राज्यसभा में भेजा जाता है। और राज्यसभा के लिए यह आवश्यक है कि उसे वित्त विधेयक की प्राप्ति की तिथि के 14 दिन के अन्दर-अन्दर विधेयक लोकसभा को लौटा देना होगा। राज्यसभा विधेयक में संशोधन के लिए सुझाव दे सकती है, लेकिन इन्हें स्वीकार करना या न करना लोकसभा की इच्छा पर निर्भर करता है। संविधान यह भी व्यवस्था करता है कि यदि वित्त विधेयक प्राप्त होने के बाद 14 दिन के अन्दर राज्यसभा सिफारिशों सहित या सिफारिशों के बिना वित्त विधेयक लोकसभा को न लौटाए, तो निश्चित तिथि के बाद वह दोनों सदनों से पारित मान लिया जाएगा। वार्षिक बजट और अनुदान सम्बन्धी मांग की लोकसभा के समक्ष ही रखी जाती है और इस प्रकार के समस्त व्यय की स्वीकृति देने का एकाधिकार लोकसभा को ही प्राप्त है।

कार्यपालिका पर नियन्त्रण की शक्ति :-

भारतीय संविधान के द्वारा संसदात्मक व्यवस्था की स्थापना की गई है। अत: संविधान के अनुसार कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल ससंद (व्यवहार में लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। मन्त्रिमण्डल केवल उसी समय तक अपने पद पर रहता है जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो। ससंद अनेक प्रकार से कार्यपालिका पर नियंत्रण रख सकती है। संसद के सदस्य मन्त्रियों से सरकारी नीति के सम्बन्ध में व सरकार के कार्यो के सम्बन्ध में प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछ सकते है तथा उनकी अलोचना कर सकते है। ससंद सरकारी विधेयक अथवा बजट को स्वीकार करके, मन्त्रियों के वतेन में कटौती का प्रस्ताव स्वीकार करके अथवा किसी सरकारी विधेयक में कोई ऐसा संशोधन करके, जिससे सरकार सहमत न हो, अपना विरोध प्रदर्शित कर सकती है। वह कामरोकों प्रस्ताव (Adjourvment Motion) पास करके भी सरकारी नीति की गलतियों को प्रकाश में ला सकती है अन्तिम रूप से लोकसभा के द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव पास करके कार्यपालिका अर्थात मंत्रिमण्डल को उसके पद से हटाया जा सकता है।

संविधान संशोधन सम्बन्धी शक्ति :-

लोकसभा को संविधान में सशोधन और परिवर्तन करने का अधिकार प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार संविधान में सशोंधन कार्य संसद के द्वारा ही किया जा सकता है और इसी अनुच्छेद में उस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसे संविधान के संशोधनके सम्बन्ध में लोकसभा और राज्ससभा की स्थिति समान है। क्योंकि संविधान संशोधन विधेयक दोनों में से किसी भी सदन में प्रस्तावित किए जा सकते है और उन्हें तभी पारित समझा जाएगा, जबकि उन्हें संसद के दोनों सदन अलग-अलग अपने कुल बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दें। संविधान के अधिंकाश प्रावधानों में अकेली संघीय संसद के द्वारा ही परिवर्तन किया जा सकता है; केवल कुछ ही प्रावधानों में सशोंधन के लिए भारतीय संघ के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

निर्वाचक मण्डल के रूप में कार्य :

लोकसभा निर्वाचक मण्डल के रूप में भी कार्य करती है। अनुच्छेद 54 के अनुसार लोकसभा के सदस्य राज्यसभा के सदस्यों तथा राज्य विधानसभाओं के सदस्यों के साथ मिलकर राष्ट्रपति केा निर्वाचित करते है। अनुच्छेद 66 के अनुसार लेाकसभा और राज्यसभा मिलकर उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है। लोकसभा के द्वारा सदन के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को निर्वाचित किया जाता है तथा वह उन्हें पदच्युत भी कर सकती है।

जनता की शिकायतों का निवारण

लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित होकर आते है, अत: उनके द्वारा जनता की शिकायतें जनता के विचार और भावनांए सरकार तक पहुंचाई जाती है। लोकसभा के सदस्यगण इस बात की चेष्ठा करते है कि सरकार अपनी नीतियों का निर्माण एवं कार्यो का सम्पादन जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए करों।

विविध कार्य

लोकसभा कुछ अन्य कार्य भी करती है जो इस प्रकार है :
  1. लोकसभा और राज्यसभा मिलकर राष्ट्रपति पर महावियोग लगा सकती है।
  2. उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्यसभा प्रस्ताव पास कर दे, तो इस प्रस्ताव का लोकसभा द्वारा अनुमोदन आवश्यक होता है।
  3. लोकसभा और राज्यसभा मिलकर उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयो के न्यायाधीशों के विरूद्ध महाभियोगों का प्रस्ताव पास कर सकती है।
  4. राष्टपति द्वारा सकंटकाल की घोषणा को एक महीने के अन्दर-अन्दर संसद से स्वीकार कराना आवश्यक है अन्यथा इस प्रकार की घोषणा एक महीने बाद स्वंय ही समाप्त मान ली जाती है।
  5. राष्ट्रपति संर्वक्षमा (Amesty) देना चाहे तो उसकी स्वीकृति संसद से लेनी आवश्यक है।
लोकसभा की शक्तियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यदि संसद देश का सर्वोच्य अंग है, तो लोकसभा ससंद का सर्वोच्य अंग। जनता का प्रतिनिधि सदन होने के कारण लोकसभा ससंद का महत्वपूर्ण, शक्तिशाली एवं प्रभावशाली अंग है। व्यवहार की दृष्टि से यदि लोकसभा को संसद कह दिया जाए, तो अनुचित न होगा।

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