विराम चिन्ह के प्रकार

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पठन करते समय गति, प्रवाह व स्पष्टता लाने हेतु कुछ नियमों का पालन किया जाता है, अगर हम उन नियमों का पालन
ना करें तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हमें कब, कहां, और कैसे बोलना है ताकि हमारी भाषा व मनोभाव व विचार ठीक
तरह से सम्प्रेषणीय हो इसके लिए विराम चिन्हों का प्रयोग करना पड़ता हैं यथा-हम किसी को रोके रखना चाहते हैं परन्तु
उच्चारित ऐसे करते हैं, रोको मत, जाने दो ठीक उच्चारित करने के लिए रोको, मत जाने दो ऊपर वाला वाक्य अर्थ को
अनर्थ कर रहा है।

बोलते, पढ़ते या लिखते समय हमें रूकने की आवश्यकता होती है- कभी श्वास लेने के लिए तो कभी अर्थ बोध के लिए।
इस रूकने को विराम कहते हैं। अर्थ बोध के लिए जहाँ हम रूकते हैं वहां विराम-चिन्हों का प्रयोग किया जाता है।
विराम-चिन्हों के प्रयोग से अर्थ में स्पष्टता आती है, उच्चारण में सुविधा मिलती है। हिन्दी भाषा में इन विराम चिन्हों
का प्रयोग किया जाता है।

विराम चिन्ह के प्रकार

  1. पूर्ण विराम: प्रत्येक वाक्य की समाप्ति पर पूर्ण विराम ( । ) लगाया जाता है- यथा ‘राम दिल्ली जाता है।’
  2. अल्पविराम: जहाँ भावभिव्यक्ति करते समय बहुत कम रूकना पड़ता है, वहाँ अल्प विराम ( , ) लगाया जाता है-
    ‘मोहन, सोहन दोनों एक कक्षा में पढ़ते हैं।’ राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुधन राजा दशरथ के पुत्र थे।
  3. अर्द्ध विराम: जहाँ अल्पविराम से अधिक और पूर्ण विराम से कम रूकना पड़े वहाँ अर्द्ध विराम ( ; ) का प्रयोग होता
    है। इसका प्रयोग उदाहरण सूचक ‘जैसे’ शब्द से पूर्व प्राय: किया जाता है- “कोई शब्द व्यक्ति, वस्तु या स्थान आदि
    का बोध कराए उसे संज्ञा कहते हैं; जैसे – राम, मोहन, पुस्तक, दिल्ली आदि।”
  4. प्रश्न सूचक विराम: प्रश्नसूचक (?) वाक्य के अन्त में प्रयुक्त होता है। यथा “क्या तुम कल विद्यालय गये थे?”
  5. विस्मयादि बोधक: (!) हर्ष, विषाद, घृणा, आश्चर्य, भय, चिन्ता प्रकट करने वाले वाक्यों या वाक्यांशों के अन्त में वाह!
    बहुत सुन्दर लड़की है। विस्मय: ऐ! वह फेल हो गया। किसी व्यक्ति विशेष को सम्बोधित किया जाता है, उसमें विस्मयादि बोधक! लगता है- सुनीता! इधर आओ! 
  6. अपूर्ण विराम: किसी बात या उक्ति को अलग करके बताना हो तब अपूर्ण विराम ( : ) का चिन्ह लगाया जाता है-
    उदारणार्थ ‘किसी ने ठीक कहा है: ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।’
  7. रेखिका: शीर्षक या उपशीर्षक के आगे रेखिका का प्रयोग होता है- यथा – अध्यापक ने कहा- बच्चों, खेलने के लिए
    बाहर मैदान में चलो! किसी अवतरण को उद्घृत करते समय लेखक के नाम से पूर्व। – यथा -‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो।’’ प्रसाद जी।
  8. द्वि-बिन्दु रेखिका: किसी बात को समझाने के लिए क्या कोई उदाहरण देना हो तो द्वि-बिन्दु (:-) रेखिका का प्रयोग
    करते हैं। उदाहरणार्थ:- ‘जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता का बोध कराए, उसे विशेषण कहते हैं। जैसे:- कोयल काली है आम पीला है फूल लाल है
  9. योजक एवं विभाजक: युग्म रूप में जिन शब्दों का प्रयोग हो यथा धीरे-धीरे, जल्दी-जल्दी जहाँ शब्दों को जोड़ा
    जाए यथा माता-पिता, भाई-बहन, राजा-प्रजा।
  10. संक्षेपक: किसी व्यक्ति, वस्तु या संगठन के नाम को संक्षेप में लिखने के लिए संक्षेपक ( 0 ) का प्रयोग होता है- यथा उत्तर प्रदेश-उ0 प्र0 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-आ0 रा0 शु0 अटल बिहारी वाजपेयी-अ0वि0वा0
  11. त्रुटिपूरक या हंस पद: लिखते समय जब कोई पद छूट जाता है, तब उसके उचित स्थान यह चिन्ह (^) लगाकर
    छुटा हुआ अंश ऊपर लिख दिया जाता है यथा ‘रमा ने अपने भाई को पत्र लिखा।’
  12. अवतरण चिन्ह: लेखक या कवि का कथन उसी के शब्दों में उद्घृत करने में अवतरण चिन्ह (“ “) का प्रयोग होता
    है- तिलक ने कहा – “स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।” सुभाष ने कहा-’’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’’
  13. कोष्ठक: इस में वह सामग्री जो वाक्य का अंग नहीं होती एवं नाम इत्यादि को स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक चिन्ह
    ( ) का प्रयोग किया जाता है। तथागत (भगवान बुद्ध) के उपदेश मानने योग्य है। बापू (महात्मा गांधी) ने सदैव सत्य व अहिंसा का पालन किया।
  14. इति श्री: इस चिन्ह का ( – 0 – ) प्रयोग किसी लेख या रचना के अन्त में किया जाता है।

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