ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System) क्या है?

अनुक्रम
ऑपरेटिंग सिस्टम सिस्टम सॉफ्टवेयर है, इसकी मदद से ही कोई कंप्यूटर काम कर सकता है। इस लिहाज से कोई भी ऑपरेटिंग सिस्टम वह माध्यम है, जो उपयोगकर्ता और कंप्यूटर के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है। यहां यह बिन्दु अति महत्वपूर्ण है कि ऑपरेटिंग सिस्टम के बिना किसी उपयोगकर्ता के लिए कंप्यूटर से अभीष्ट कार्य करा पाना असंभव तो नहीं है, लेकिन बेहद कठिन जरूर है। ऑपरेटिंग सिस्टम का महत्व इससे समझा जा सकता है कि यह उपयोगकर्ता (User) के आदेशों, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर पर दर्ज निर्देशों को कंप्यूटर तक पहुंचाने और प्रोसेसिंग के बाद मिलने वाले परिणाम और अन्य सूचनाओं को वापस उपयोगकर्ता तक पहुंचाने का काम करता है। इसके अलावा किसी खास कार्य के निष्पादन या मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ता ने जो प्रोग्राम तैयार किए हैं, उन्हें शुरू कराने से लेकर पूरी प्रक्रिया के बाद खत्म कराने तक की जिम्मेदारी भी ऑपरेटिंग सिस्टम पर होती है। हार्डवेयर के सभी संसाधनों को जरूरत पड़ने पर प्रोग्राम के लिए उपलब्ध कराना और उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी डाटा को सुरक्षित रखने का काम भी ऑपरेटिंग सिस्टम की मदद से ही संभव हो पाता है। ऑपरेटिंग सिस्टम, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर, उपयोगकर्ता और कंप्यूटर के बीच संबंध को निम्न ग्राफ से समझा जा सकता है:

ऑपरेटिंग सिस्टम का इतिहास और विकास

वर्ष 1950 में अस्तित्व में आए प्रारंभिक कंप्यूटर में कोई ऑपरेटिंग सिस्टम तो नहीं था, लेकिन इनमें रेजीडेंट मॉनीटर (Resident Monitor) नाम का खास फंक्शन मौजूद था, इसकी वजह से कंप्यूटर की कार्यक्षमता, एक्यूरेसी (Accuracy) और गति (Speed) में भी खासी बढ़ोतरी हुई। इसके बाद ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System) के विकास पर कंप्यूटर अनुसंधानकर्ताओं का ध्यान गया। वर्ष 1960 तक कंप्यूटरों में बैच प्रोसेसिंग, इनपुट-आउटपुट इंटरप्ट, बफरिंग जैसे कार्य करना संभव हो गया था। हालांकि, अब भी यह सिंगल टास्किंग मशीन (Single Tasking Machine) ही थी, यानी कंप्यूटर पर एक समय में एक ही काम कर पाना संभव हो सकता था।

1. मेनफ्रेम ऑपरेटिंग सिस्टम (Mainframe OS) - 

वर्ष 1980 में पर्सनल कंप्यूटर के विकास से पहले सुपर और मेनफ्रेम कंप्यूटर ही अस्तित्व में थे। चूंकि सुपर कंप्यूटर बेहद महंगे थे, लिहाजा मेनफ्रेम कंप्यूटर ही अधिकतर प्रयोग किए जाते थे और ऑपरेटिंग सिस्टम भी मेनफ्रेम कंप्यूटरों के लिए ही विकसित हुए। मेनफ्रेम कंप्यूटरों के लिए कब-कैसे ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास हुआ, यह समझा जा सकता है:

1. वर्ष 1950 - रेजीडेंट मॉनीटर फंक्शन

2. वर्ष 1995 - आईबीएम ने अपने मेनफ्रेम कंप्यूटर आईबीएम-704 के लिए शेयर (SHARE) ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किया। आईबीएम के आईबीएम-709 और आईबीएम-7090 मने फ्रेम कंप्यूटरों में भी यही ऑपरेटिंग सिस्टम प्रयोग किया गया, हालांकि जल्द ही कंपनी ने एक और नया ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित कर लिया, जिसे आईबीएम-709, 7090 और 7094 मेनफ्रेम कंप्यूटरों पर इस्तेमाल किया गया। इस ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम था आईबीसिस या आईबीजॉब (IBSYS/ IBJOB)

3. वर्ष 1960 - आईबीएम कंपनी ने हर तरह के काम के लिए एक सिंगल ऑपरेटिंग सिस्टम (Single Operating System) तैयार किया, जिसे नाम दिया गया ओएस-360 (OS360) आईबीएम का यह ऑपरेटिंग सिस्टम आज के दौर के सभी ऑपरेटिंग सिस्टम का मूलाधार है। खास बात यह है कि उस वक्त इस ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए प्रोग्राम इस तरह लिखे गए थे कि यह सिस्टम आज के दौर के कंप्यूटरों पर भी आसानी से चलाया जा सकता है।

4. वर्ष 1961 - ओएस-360 की खासियत यह थी कि यह पहला ऐसा सिस्टम था जो उपयोगकर्ता की जरूरत के मुताबिक संसाधनों को उपलब्ध कराने के अलावा डाटा को मेन और सहायक मेमोरी में सेव करने में मदद करता था। यह पहला सिस्टम था, जिसके जरिये फाइल लॉकिंग (File Locking) का काम संभव हो सका। कालान्तर में आईबीएम के दूसरे जितने भी ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित हुए, वे सभी दरअस ओएस-360 में ही कुछ सुधार कर तैयार किए जाते रहे। दूसरी ओर 1960 में ही कंट्रोल डाटा ऑपरेशन्स (Control Data Oprations) और मिनोसेटा यूनिवर्सिटी के संयुक्त प्रयासों से बैच प्रोसेसिंग के मकसद से एक ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित किया गया। 

इसका नाम था स्कोप (SCOPE) बरॉज कॉरपोरेशन ने बी5000 नाम से नया मेनफ्रेम कंप्यूटर पेशकया जो मास्टर कंट्रोल प्रोग्राम (MCP) नाम के ऑपरेटिंग सिस्टम से सुसज्जित था। यह दुनिया का पहला ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम था, जिसके लिए पहली बार हाई लेवल लैंग्वेज (High Level Language) ESPOL में प्रोग्राम लिखे गए थे। यही नहीं, इस मशीन में पहली बार वर्चुअल मेमोरी का भी इस्तेमाल किया गया था। यह अपने दौर का बेहद क्रान्तिकारी कदम था। शायद यही वजह थी कि उस दौर की सबसे बड़ी कंप्यूटर निर्माता कंपनी ने अपने हार्डवेयर प्रोजेक्ट एएस400 (AS400) के लिए बरॉज कॉरपोरेशन से इस ऑपरेटिंग सिस्टम के इस्तेमाल की इजाजत मांगी, लेकिन कंपनी ने इनकार कर दिया। एमसीपी का इस्तेमाल आज भी यूनिसिस क्लियरपाथ कंप्यूटरों में किया जा रहा है। दूसरी ओर, बाद में आईबीएम ने सीपी-67 नाम से अपने सिस्टम पर काम किया, जो वर्चुअल मेमोरी (Virtual Memory) पर फोकस था।

5. वर्ष 1970 - 1961 से 1970 तक ऑपरेटिंग सिस्टम के विकास को लेकर लगातार शोध होते रहे। हर पुराने सिस्टम में कुछ संशोधन कर जल्द ही नया सिस्टम तैयार कर लिया जाता था। इस कड़ी में यह साल भी शामिल रहा। इस वर्ष कंट्रोल डाटा कॉरपोरेशन और मिनोसेटा यूनिवर्सिटी ने क्रोनोर और एनओएस सिस्टम पेश किए। इनकी खासियत टाइमशेयरिंग और एक साथ कई काम किया जाना थी। कंट्रोल डाटा ने ही बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ इलियोनिस के साथ मिलकर प्लेटो (PLATO) नाम से ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किया, जिसकी मदद से पहली बार रियल टाइम चैटिंग और मल्टी यूजर ग्राफिकल गेम्स जैसे फीचरों का सफल निष्पादन संभव हो सका। प्लेटो अपने दौर का सबसे आधुनिक ऑपरेटिंग सिस्टम बन गया।
इसी साल पहली कॉमर्शियल कंप्यूटर निर्माता कंपनी यूनिवैक (UNIVAC) ने एक्जेक (EXEC) नाम से ऑपरेटिंग सिस्टम की एक सीरीज पेश की जो रियल टाइम बेस्ड (Real Time Based) थी। इसी तरह जनरल इलेक्ट्रिक और एमआईटी ने जनरल कांप्रेहेन्सिव ऑपरेटिंग सिस्टम (GCOS) तैयार किया। वहीं, डिजिटल इक्विपमेंट कॉरपोरेशन ने टॉप्स-10 (TOPS-10) और टॉप्स-20 (TOPS-20) जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किए जो मुख्यत: विश्वविद्यालयों के लिए खासे उपयोगी साबित हुए। इनके अलावा भी कई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम लगातार विकसित किए जाते रहे।

2. माइक्रो कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम (Micro Computer OS)

माइक्रो कंप्यूटर या पर्सनल कंप्यूटर का विकास आईबीएम कंपनी ने 1980 में किया था। उस वक्त यह सिर्फ प्रयोग के तौर पर तैयार किए गए थे। शुरूआती दौर में पर्सनल कंप्यूटरों में अधिक क्षमता भी नहीं थी, लिहाजा इनके लिए अलग से ऑपरेटिंग सिस्टम की जरूरत महसूस नहीं की गई, क्योंकि तब कंप्यूटरों का दैनन्दिन जीवन में कोई विशेष उपयोग नहीं किया जाता था। हालांकि, तब भी इन कंप्यूटरों में रॉम यानी मेमोरी उपलब्ध रहती थी। उस दौर में इन कंप्यूटरों को मॉनीटर (Monitor) कहा जाता था।

पर्सनल कंप्यूटर के प्रारंभिक दौर में पहला ऑपरेटिंग सिस्टम था सीपी-एम (CP-M) जो डिस्क ऑपरेटिंग सिस्टम (Disk Operating System) था। लेकिन जल्दी ही माइक्रोसॉफ्ट ने अपना ऑपरेटिंग सिस्टम एमएस-डॉस (MS-DOS) पेश किया। लांचिंग के साथ ही यह सिस्टम सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि आईबीएम कंपनी ने अपने माइक्रो कंप्यूटरों के लिए इसी ऑपरेटिंग सिस्टम का चयन किया, जिसे तब आईबीएम डॉस या पीसी डॉस (IBM-DOS or PC-DOS) भी कहा जाता था।

दूसरी ओर, कंप्यूटर निर्माता दूसरी बड़ी कंपनी एप्पल (Apple Inc) ने भी लगभग आईबीएम के समानांतर एप्पल मेकिनटोश (Apple Macintosh) नाम से अपना माइक्रो कंप्यूटर पेश किया। इस कंप्यूटर की खासियत थी इसका ऑपरेटिंग सिस्टम मैकिन्टोश ऑपरेटिंग सिस्टम, जिसे मैक ओएस (MAC OS) भी कहा जाता है। इस ऑपरेटिंग सिस्टम की मदद से एप्पल कंपनी अपने पर्सनल कंप्यूटर में ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (Graphical User Interface- GUI) देने में सफल रही। इस इंटरफेस का तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है, जिसके तहत उपयोगकर्ता मशीन पर चल रहे प्रोग्राम को आइकन (Icons) की मदद से पहचान सके, ताकि उसे काम करने में आसानी हो। सबसे खास बात यह थी कि अपने इस नये प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए एप्पल कंपनी ने अपने शुरूआती पर्सनल कंप्यूटर प्रोजेक्ट एप्पल 2 (Apple II) को बंद कर दिया था। 

वर्ष 1985 में 32 बिट आर्किटेक्चर और पेजिंग क्षमता वाली इनटेल 80386 सीपीयू चिप ने पर्सनल कंप्यूटर के विकास में नयी क्रान्ति पैदा की। दरअसल, इस चिप के इस्तेमाल के बाद ही पर्सनल कंप्यूटर मेनफ्रेम और मिनी कंप्यूटरों की तरह मल्टी टास्किंग (Multi Tasking) ऑपरेटिंग सिस्टम को चलाने लायक बन सका। इस बिन्दु को ध्यान में रखते हुए माइक्रोसॉफ्ट कंपनी ने वीएमएस (VMS) ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने वाले डेविड कटलर को अपने साथ जोड़ लिया और उन्हें माइक्रोसॉफ्ट के पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम (DOS) को आगे बढ़ाते हुए विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम (Windows Operating System) को तैयार करने की कमान सौंप दी गई। दूसरी तरफ एप्पल कंपनी के सह संस्थापक स्टीव जॉब्स का ध्यान भी इनटेल 80386 चिप ने खींचा। स्टीव ने नेक्स्ट कंप्यूटर नाम से अपनी अलग कंपनी बनाई और इसके तहत नेक्स्टस्टेप (NEXTSTEP) ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किया। कालान्तर में एप्पल ने यह सिस्टम खरीद लिया और मैकिनटोश के साथ इसका उपयोग किया। मौजूदा पर्सनल कंप्यूटरों में अधिकतर इस्तेमाल होने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम विंडोज और मैकिनटोश ही हैं। हालांकि, लाइनक्स (LINUX) यूनिक्स (UNIX) भी ऑपरेटिंग सिस्टम हैं, लेकिन पर्सनल कंप्यूटरों में इनका बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार

ऑपरेटिंग सिस्टम को इनकी कार्यक्षमता और इनकी कार्यशैली के आधार पर दो अलग तरह से बांटा जा सकता है। यूनिट के इस हिस्से में दोनों तरीकों से ऑपरेटिंग सिस्टमों को आसानी से जान सकेंगे। कर्यक्षमता के आधार पर ऑपरेटिंग सिस्टम को छह प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है। ये हैं एकल एवं बहुल कार्य (Single and Multi Tasking) एकल एवं बहुल उपयोगकर्ता (Single and Multi Users), वितरित सिस्टम (Distributed), टेंपलेटेड (Templated), एंबेडेड (Embedded), लाइब्रेरी (Library) और रियल टाइम (Real Time) ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार  होते हैं -

1. एकल एवं बहुल कार्य (Single and Multi Tasking) -

शुरूआत करते हैं एकल एवं बहुल कार्य सिस्टम से। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि सिंगल ऑपरेटिंग सिस्टम वे सिस्टम हैं, जो एक समय में एक ही काम करने में सक्षम हैं, दूसरी ओर मल्टी टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम उपयोगकर्ता को एक ही वक्त में एक से अधिक काम करने की क्षमता प्रदान करते हैं। मल्टी टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम टाइम अचीविंग (Time Achieving) के जरिये ऐसा कर पाते हैं। लेकिन इसमें भी ऑपरेटिंग सिस्टम दो तरह से काम करते हैं। पहला है प्रीएंप्टिव और दूसरा को-ऑपरेटिव। प्रीएंप्टिव (Preemptive) ऑपरेटिंग सिस्टम के तहत प्रोसेसर में हर प्रोग्राम के लिए टाइम शेयर (Time Share) कर लिया जाता है, जिससे प्रोसेसर तय समय में एक के बाद एक हर प्रोग्राम पर काम करता है। लेकिन, इसमें परेशानी यह होती है कि एक प्रोग्राम की प्रोसेसिंग पूरी होने के बाद ही दूसरा शुरू हो सकता है। यानी उपयोगकर्ता को दूसर े प्रोग्राम पर जाने के लिए इंतजार करना होता है। 

इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम हैं लाइनक्स (Linux), यूनिक्स (Unix), सेालरिस (Soalaris), अमीगा (Amiga) दूसरी ओर, को-ऑपरेटिव ऑपरेटिंग सिस्टम में हर काम को इस तरीके से प्रोसेस किया जाता है कि प्रोसेसर में हर काम के लिए अलग टाइम स्लॉट तय करने के साथ प्रोसेसिंग को भी बांट दिया जाता है। इससे एक ही समय में एक साथ अलग-अलग काम करना संभव हो पाता है। विंडोज 16-बिट ऐसा ही ऑपरेटिंग सिस्टम है। हालांकि, विंडोज का 32-बिट ऑपरेटिंग सिस्टम और विंडोज 9ग् ऑपरेटिंग सिस्टम प्रीएंप्टिव सिस्टम थे।

2. एकल एवं बहुल उपयोगकर्ता (Single and Multi Users) -

एकल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम एकल उपयोगकर्ता के लिए ही उपयोगी होता है। हालांकि, यह भी बहुत अधिक सुविधाएं प्रदान नहीं करता, फिर भी इतनी सहूलियत जरूर होती है कि इसमें एक साथ कुछ प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। दूसरी ओर, मल्टीटास्किंग यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम एक से अधिक उपयोगकर्ताओं को डिस्क स्पेस (Disk Space) सुविधा के जरिये कंप्यूटर (Interact) करने की सुविधा प्रदान करता है। इससे इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम पर एक साथ कई उपयोगकर्ता एक ही समय पर काम करने में सक्षम होते हैं। इसी तरह टाइम शेयरिंग ऑपरेटिंग सिस्टम भी खास तरीकों से प्रोसेसर टाइमिंग, प्रिंटर, मास स्टोरेज और अन्य संसाधनों का एलॉकेशन (Allocation) करता है, जिससे एक ही समय पर अलग-अलग उपयोगकर्ता अलग-अलग संसाधन का उपयोग अपने अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने में कर सकें।

3. वितरित सिस्टम (Distributed) -

इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम को सिंगल एंड मल्टीटास्किंग-यूजर का वृहद और विस्तृत स्वरूप माना जा सकता है। दरअसल, इस सिस्टम के जरिये ऐसे कई कंप्यूटरों को साथ जोड़ा जा सकता है, जो दरअसल भौतिक रूप से एक-दूसरे से दूर हों। यह काम नेटवर्किंग (Networking) के जरिये किया जाता है, जिसकी प्रक्रिया को हम आगे जानेंगे। वस्तुत: इस तरह के सिस्टम का विकास ही नेटवर्किंग की अवधारणा के बाद हुआ। इसके जरिये एक ही समय में एक साथ कई सारे कंप्यूटरों को ऑपरेट किया जाना संभव हो सका। कंप्यूटरों पर को-ऑपरेशन (Co-operation) के तहत होने वाले काम को ही वितरित सिस्टम कहा जाता है।

4. टेंपलेट  (Templated) -

टेंपलेट का शाब्दिक अर्थ होता है खास पैटर्न (Pattern) यानी किसी खास मकसद की पूर्ति के लिए तैयार किया जाने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम। यह ऑपरेटिंग सिस्टम वितरित सिस्टम का और अधिक परिष्कृत स्वरूप है। मुख्यत: इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग इंटरनटे बेस्ड (Internet Based) क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing) में किया जाता है। इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम में किसी भी डाटा, सूचना को वर्चुअलाइज (Virtualize) कर लिया जाता है। इसके बाद यह डाटा या सूचना सर्वर (Server) तक पहुंचा दिया जाता है, जहां वह स्टोर रहता है। अब भविश्य में जब भी किसी उपयोगकर्ता को किसी खास डाटा की आवश्यकता होती है तो टेंपलेट ऑपरेटिंग सिस्टम की मदद से वह आसानी से उसे सर्वर से हासिल कर लेता है।

5. एंबेडेड ऑपरेटिंग सिस्टम एंबेडेड (Embeded System) -

कंप्यूटरों के लिए बनाए जाते हैं। एंबेडेड कंप्यूटरों का अर्थ उन कंप्यूटरों से है, जिनका निर्माण कुछ खास मकसद से किया जाता है, जो कम आकार, कम स्पेस और कम संसाधनों के बावजूद सुरक्षित और विश्वसनीय तरीके से उपयोगकर्ता के निर्देशों का पालन कर सकें।

उदाहरण के लिए इसे पीडीए (Personal Digital Assistant) से समझा जा सकता है। पीडीए दरअसल एक मोबाइल डिवाइस है, जो इंटरनेट से जुड़ सकती है, डाटा और सूचनाएं संग्रहीत कर सकती है और उपयोगकर्ता की जरूरत के मुताबिक जानकारी उपलब्ध करा सकती है। यही वजह है कि पीडीए को हैंडहोल्ड पीसी (Handhold PC) भी कहा जाता था। हालांकि वर्ष 2010 के बाद स्मार्टफोन के विकास और आईफोन ऑपरेटिंग सिस्टम (i-OS) और एंड्रॉयड (Android) के विकास के बाद पीडीए का उपयोग काफी कम, लभगग नगण्य, रह गया।

6. रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम (Real Time Operating System) -

 इस तरह के ऑपरेटिंग सिस्टम यह सुनिश्चित करते हैं कि उपयोगकर्ता जो काम करना चाहता है या जो डाटा इस्तेमाल करना चाहता है, वह निश्चित समयावधि में परिणाम के रूप में उसके सामने उपलब्ध हो। ये ऑपरेटिंग सिस्टम सिंगल टास्किंग भी हो सकते हैं और मल्टी टास्किंग भी। अंतर सिर्फ यह होता है कि मल्टी टास्किंग होने की स्थिति में ये ऑपरेटिंग सिस्टम निर्धारित कलन विधियों (Scheduled Algorithms) की मदद से लक्ष्य हासिल करता है। कलन विधियां, गणितीय शब्द है।

ये दरअसल किसी एप्लीकेशन प्रोग्राम के वे स्टेप हैं, जिनपर चलकर प्रोसेसर उपयोगकर्ता को अभीष्ट परिणाम उपलब्ध कराता है। एल्गोरिथम में भी ये ऑपरेटिंग सिस्टम दो तरह से काम करते हैं। पहला है इवेंट ड्राइवन सिस्टम (Event Driven System) इसके तहत ऑपरेटिंग सिस्टम उपयोगकर्ता की ओर से मिले आदेशों को प्राथमिकता (Priority) के क्रम में तय करता है और एक के बाद एक तय समय में इन्हें पूरा करता है। वहीं, टाइम शेयरिंग सिस्टम (Time Sharing System) में कार्यों के लिए समय निर्धारण किया जाता है।

7. लाइब्रेरी (Library) -

लाइब्रेरी ऑपरेटिंग सिस्टम भी मुख्यत: कंप्यूटर नेटवर्किंग से जुड़ा हुआ है। यह सिस्टम दरअसल किसी खास तरह की नेटवकिर्ंग में इस्तेमाल किए जाने वाले सभी ऑपरेटिगं सिस्टमों का एक समूह है, जो लाइब्रेरी के स्वरूप में उपलब्ध रहता है।

प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम के नाम

कंप्यूटर के विकास के अनुक्रम में ही ऑपरेटिंग सिस्टमों का भी विकास तेजी से हुआ। जिस हिसाब से जरूरतें बढ़ती गई, उसी हिसाब से लगातार शोध और अनुसंधानों की मदद से ऑपरेटिंग सिस्टमों की ईजाद कर समस्याओं का हल निकाला जाता रहा। कुछ प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम के नाम के बारे में हम यहां जानने का प्रयास करेंगे:

1. यूनिक्स (Unix)

मल्टीटास्किंग, मल्टीयूजर कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम है, जिसे 1970 में अमेरिका की अमेरिकन टेलीफोन एंड टेलीग्राफ कंपनी (AT&T) की बेल रिसर्च लैब (Bell Lab) में केन थॉमसन, डेनिस रिची की टीम ने तैयार किया था। टीम ने यूनिक्स सिस्टम बनाने का प्रोजेक्ट 1968 में शुरू किया था। शुरूआत में यह ऑपरेटिंग सिस्टम असेंबलिंग लैंग्वेज (Assembling Language) में लिखा गया था, जो उस समय प्रोग्रामिंग की प्रचलित भाषा थी। प्रारंभ में यह ऑपरेटिंग सिस्टम सिर्फ बेल लैब के ही कार्यों के निष्पादन के लिए तैयार किया गया था। बाद में एटीएंडटी ने यह ऑपरेटिंग सिस्टम अन्य संस्थाओं को भी देना शुरू किया। इसके लिए यूनिक्स के एकेडमिक और कॉमर्शियल दो वर्जन तैयार किए गए। इसके शुरूआती उपयोगकर्ताओं में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, माइक्रोसॉफ्ट, बर्कले, आईबीएम, सन माइक्रोसिस्टम्स जैसी कंपनियां रहीं। यूनिक्स अपनी खास पद्धति पर काम करता है, जिसे अकसर कंप्यूटर विशेषज्ञ यूनिक्स फिलॉसफी (Unix Pholosophy) भी कहते हैं। यह सिस्टम उपयोगकर्ता को ऐसे टूल्स (Tools) का समूह उपलब्ध कराता है, जिनमें से हरेक एक खास फंक्शन (Function) को पूरा करते हैं। इसके अलावा यह इन सभी टूल्स की मदद से संयुक्त यूि नफाइड फाइल सिस्टम और शेल (Shell) कमांड सिस्टम भी विकसित करता है, जिससे वर्कफ्लो (Workflow) में मदद मिलती है। बेहतरीन कार्यक्षमता और उपयोगकर्ता के लिए खासा मददगार साबित हुआ यूनिक्स पहला पोर्टेबल ऑपरेटिंग सिस्टम (Portable Operating System) माना जाता है। यही वजह है कि इसके बाद विकसित हुए अधिकतर ऑपरेटिंग सिस्टमों का मूल आधार यूनिक्स ही रहा। यही नहीं, समय के साथ जैसे-जैसे प्रोग्रामिक भाषाएं विकसित होती रहीं, वैसे-वैसे हर भाषा में यूनिक्स को हर बार नये स्वरूप में तैयार किया गया।

2. यूनिक्स  लाइक फैमिली (Unix स्पाम Family) -

यूनिक्स कंप्यूटर के विकास का बड़ा आविष्कार था। मेनफ्रेम और मिनी कंप्यूटरों के लिहाज से यह बेहद उपयोगी था, जहां बल्क डाटा (Bulk Data) आता था।एटीएंडटी-बेल रिसर्च लैब में विकास के बाद यूि नक्स के टे्रडमार्क द ओपन गु्रप ने हासिल कर लिए, जिसने एचपी, आईबीएम, एप्पल और सन माइक्रोसिस्टम्स को यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को अपने कंप्यूटरों में प्रयोग करने को ही अधिकृत किया है। ऐसे में यूनिक्स से मिलते-जुलते ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार करने शुरू किए गए। यूनिक्स के समकक्ष कई नये ऑपरेटिंग सिस्टम उभरकर सामने आए, जिन्हें यूनिक्स लाइक फैमिली कहा जाता है। इनमें लाइनक्स (Linux), वी सिस्टम (V System), बीएसडी (BSD) शामिल हैं। इनमें से अधिकतर का उपयोग एकेडमिक संस्थाओं, इंजीनियरिंग कंपनियों के सर्वर में किया जाता है।

3. लाइनक्स (Linux)

यह ऑपरेटिंग सिस्टम फिनलैंड के एक इंजीनियरिंग छात्र लाइनस टोर्वेल्ड्स ने तैयार किया। पढ़ाई के दौरान एक प्रोजेक्ट पर काम करते हुए लाइनस ने अपने इस ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में एक अखबार में जानकारी प्रकाशित की। हालांकि, तब तक यह पूरी तरह तैयार नहीं हुआ था, लेकिन अखबार में प्रकाशन के बाद कई विशेषज्ञ, इंजीनियरिगं छात्रों ने लाइनस को इस प्रोजेक्ट में मदद की, अपेक्षित सुधार किए, जिसके बाद लाइनक्स सिस्टम वजूद में आया। लाइनक्स को यूनिक्स लाइक ऑपरेटिंग सिस्टम माना जाता है, लेकिन अपनी तरह के दूसरे सिस्टम से लाइनक्स इस लिहाज में अलग है कि इसे बनाने में यूनिक्स कोड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ओपन लाइसेंस मोड होने के कारण लाइनक्स कोड अध्ययन और सुधारीकरण के लिए भी खुला है। अपनी इसी खूबी के कारण लाइनक्स सुपर कंप्यूटरों से लेकर स्मार्टवॉच तक का ऑपरेटिंग सिस्टम बन गया। मल्टीटास्किंग, मल्टीयूजर सर्वर से लेकर मोबाइल फोन जैसे एंबेडेड कंप्यूटरों में भी लाइनक्स का पूरा इस्तेमाल किया जाता है। गूगल क्रोम और क्रोम ब्राउजर भी लाइनक्स आधारित हैं।

4. मैक ऑपरेटिंग (Mac-OS) -

मैकिन्टोश ऑपरेटिंग सिस्टम (Macintosh Operating System) एप्पल कंपनी की ओर से तैयार किया गया ऑपरेटिंग सिस्टम है। ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI) आधारित यह पहला ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं था, लेकिन जीयूआई का पहला सबसे अधिक लोकप्रिय सिस्टम बना। मैक से पहले 1980 में जेरॉक्स कॉरपोरेशन (Xerox Corporation) ने सबसे पहले जीयूआई पर शोध किया। इस शोध से सिद्ध हुआ कि हाथ में पकड़े जा सकने वाले किसी साधन (Tool) की मदद से कंप्यूटर को निर्देश समझाना अधिक आसान और सुगम है। कंपनी ने अपने इस शोध के आधार पर अपना खुद का कंप्यूटर जेरॉक्स स्टार (Xerox Star) भी लांच किया, लेकिन इसमें जीयूआई सिस्टम यानी ग्राफिकल यूजर इंटरफेस की परिकल्पना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी थी। दूसरी ओर, एप्पल भी इसी विषय पर शोध कर रहा था और उसने संपूर्ण जीयूआई आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम यानी मैक तैयार कर बाजी मार ली। एप्पल ने वर्ष 1984 में अपना पहला मैक ऑपरेटिंग सिस्टम पेश किया था, जिसे बाद में परिष्कृत किया जाता रहा।

5. माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़ (Microsoft Windows) -

पर्सनल या माइक्रो कंप्यूटर आज डेस्कटॉप (Desktop) या लैपटॉप (laptop) के रूप में लगभग हर घर में इस्तेमाल हो रहा है। और जब भी हम अपना डेस्कटॉप या लैपटॉप खोलते हैं तो उसमें हमें विंडोज 7, 8 या एक्सपी ही बतौर ऑपरेटिंग सिस्टम नजर आती है। इसकी वजह यह है कि दुनियाभर के कुल वेब कनेक्टेड कंप्यूटरों में से 88.9 प्रतिशत में विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल किया जाता है। 
माइक्रोसॉफ़्ट विंडोज़


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