सामंतवाद का उदय, स्वरूप एवं विकास

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अनुक्रम
यूरोप और ऐशिया के सामान्यत: मध्यकाल के युग को सामंतवाद कहा जाता है क्योंकि इसका उदय, विकास और हृास इसी
काल में हुआ। इस शब्द की विभिन्न परिभाषाएं हैं क्योंकि विभिन्न विद्धानों ने इसकी अलग-अलग व्याख्या की है। इसका प्रयोग
ऐतिहासिक विकास की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के सन्दर्भ में किया जाता है और ये अवस्थाएं कालक्रम के अनुसार विभिन्न
स्थानों पर अलग-अलग कालों में अस्तित्व में आई। जैसे यूरोप में आमतौर पर पांचवी शताब्दी से 15वीं शताब्दी तक यूरोपीय
समाज को सामंतवाद कहा जाता है। जबकि एशिया में इसकी शुरूआत तीसरी से पांचवी शताब्दी एक समान नहीं था तथा
विभिन्न देशों के लोग इसके बदलते स्वरूप के साथ-साथ बदलते गए। मध्यकाल में जो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और
सांस्कृतिक उन्नति और परिवर्तन हुए उनका आधार ही सामंतवाद था।

सामंतवाद का अभिप्राय 

Oxford Dictionary-आक्सफोर्ड डिक्शनरी में Feudal – फ्यूडल शब्द से अभिप्राय: Vassal तथा राजा के बीच सबंधों को स्थापित
करने की नीतियों से लिया गया है। March Bloch मार्क ब्लाख के शब्दों में यूरोपिय सांमतवाद कृषि दासता प्रधान था जिसमें
ये लार्ड को बगैर वेतन श्रम-सेवा प्रदान करते थे, कृषक जमीन से बंधे हुए थे तथा वे उच्च जातियों और योद्धाओं की बात
मानने को बाध्य थे।

विभिन्न इतिहासकारों द्वारा सामंतवाद की अलग-2 व्याख्याएँ दी गई है। एक सुझाव यह भी है कि सामंतवाद ऐसी अवस्था
को दर्शाता है जिसमें सैनिकों की सहायता से जमीनों पर अधिकार कर लिया जाता था यह दर्शाता है कि इसमें सैन्य संगठन
की भी भागीदारी होती थी लेकिन सामंतवाद शब्द से अभिप्राय: हमें विशेष सैनिक बंधन नही लेना चाहिए। जहां तक कृषक
और जमीन का ताल्लुक था दोनों के बीच अनेक बंधन थे जैसे सैनिक, राजनैतिक और आर्थिक। दरअसल ये बंधन प्रत्येक देश
मे अलग-2 थे। सैन्य संगठन सामान्यत: एक जैसा ही था। राम शरण शर्मा के अनुसार यूरोप के सामंतवाद की तरह भारतीय
सामंतवाद का भी आर्थिक मर्म भूस्वामी मध्यवर्ग का उदय था जिसके कारण किसान कृषिदासों की अवस्था में पहुँच गए। क्योंकि
उनके एक-स्थान पर आने जाने की पांबदी लगा दी गई, उनसे अधिक श्रम (विष्टि) लिया जाने लगा, उन पर करों का बोझ
लाद दिया गया तथा उपसामंतीकरण की प्रक्रिया ने सारी कमी को पूरा कर दिया। डी.डी. कौंसाबी के अनुसार ईसंवी सन्
की प्रारंभिक सदियों के दौरान जब राजा भूमि पर अपने राजस्विक और प्रशासनिक अधिकार अपने अधीनस्थ अधिकारियों को
देने लगा तो इनका कृषकों से सीधा सबंध कायम हुआ। इस कारण गांव की बंद अर्थव्यवस्था से खलल पडा। इस प्रक्रिया
को वे ‘उपर से विकसित होने वाला सांमतवाद’ मानते है। बाद में गुप्तकाल में यह प्रक्रिया और विकसित हुई कोंसबी के अनुसार
आगे चलकर गांव के भीतर राज्य और कृषकों के बीच भू-स्वामियों का एक वर्ग विकसित हुआ जिसने अपनी सेना और शास्त्रों
के बल पर धीरे-धीरे स्थानीय आबादी पर सता स्थापित कर ली। इस प्रक्रिया को कोंसबी ‘नीचे से विकसित होने वाला
सामंतवाद’ मानते है। कुछ इतिहासकारों ने फ्लयूडलिज्म को नाइटों के समर्थन और सेवा से संबधित संस्थाओं के एक समूह
और कानून, शासन और सैनिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखते है जिसकी मुख्य विशेषता प्रशासनिक
विकेन्द्रीकरण है। फ्यूडलिज्म की इस अवधारणा से कभी-2 भारतीय इतिहासकार भी प्रभावित हुए है। इस प्रकार सामंतवाद
को परिभाषित करना कठिन है क्योंकि सामंतवाद पर शोध करने वाले विद्वानों ने इसकी अलग-2 व्याख्या दी है। लेकिन
साधारणत: सामंतवादी व्यवस्था में राजनैतिक एवम् प्रशासनिक ढांचा भूमि अनुदानों के आधार पर गठित था। असली आर्थिक
ढांचा कृषि दासत्व प्रथा पर आधारित था। इसमें जमींदार भूमि के स्वामी थे जो काश्तकारों ओर राजाओं के बीच कड़ी का
कार्य करते थे। इस प्रणाली में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी। इसमें उत्पादन स्थानीय किसानो और मालिकों के उपभाग के लिए
होता था ना कि बाजारों के लिए।

उदय और विकास

भारत में मौर्योतर-काल और गुप्तकाल में कुछ राजनैतिक और प्रशासनिक प्रवृतियों के कारण और विशेष तौर पर गुप्तकाल
में राज्य-व्यवस्था सांमतवादी ढांचे में ढ़लने लगी थी। प्रो0 रामशरण शर्मा के अनुसार इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रवृति ब्राÎह्यणों को
भूमिदान देने की थी। मौर्यकाल एवम् मौर्यो से पूर्व पाली साहित्य में मगध और कोसल के शासकों द्वारा ब्राह्यणों को दान दिए
गए गांवों का उल्लेख मिलता है। परन्तु उस काल में ग्रहीता ब्राह्यणों के प्रशासन सबंधी अधिकार नही सौंपे जाते थे। भूमिदान
का प्राचीनतम उल्लेख पहली शताब्दी ईसा पू0 के सातवाहन अभिलेख में मिलता है जिसमें अश्वमेघ यज्ञ में एक गांव दान देने
का उल्लेख है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारों का इसमें कोई उल्लेख नही है लेकिन दूसरी शताब्दी में राजा गौतमीपुत्र शातकण्र्ाी
ने बौद्ध भिक्षुओं कों गांव दान में दिए। ग्रामदान के समय पहली बार ग्रहीता को प्रशासनिक अधिकार सौंपे गए। पांचवी शताब्दी
तक ऐसे अनुदानों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। इन अनुदानों की 2 महत्वपूर्ण विशेषताएं थी :-

  1. राज्य के समस्त साधनों का ग्रहीता के नाम हस्तांतरण;
  2. ग्रहीता पर आन्तरिक सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों का दायित्व सौंप देना।

अधिकारो की प्राप्ती के बाद ग्रहिता प्राप्त क्षेत्र में आसानी से निजि शासन क्षेत्र स्थापित कर सकता था। जिन आर्थिक
प्रवृतियों के कारण भूमि अनुदान दिया जाता था उनका ठीक निरूपण करना कठिन है। प्राय: मौर्य तथा मौर्य काल
में वीरान इलाकों में गांव बसाने अथवा बंजर भूमि को आबाद करने की उद्देश्य से भूमि दान में दी जाती थी इसका
मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक भूमि को कृषि लायक बनाना था क्योंकि राज्य को कृषि से काफी आय प्राप्त होती
थी। लेकिन बाद के काल में आबाद जमीन को भी अनुदान में दिया जाने लगा। जिसकी तुलना मध्यकालीन यूरोप
की सामंतवादी प्रणाली से की जा सकती है।

गुप्तकाल में भारत के बड़े-बड़े सामंत राजाओं द्वारा ब्राह्यणों, मठों को दान स्वरूप बसे हुए गांव देने के अनेक प्रमाण
मिलते है। इन अनुदानों में सामंत राजाओं ने संबधित गांव के निवासियों को (जिसमें कृषक और कारीगर दोनों थे) स्पष्ट निर्देश
दिया है कि वे ग्रहीता को केवल प्रचलित कर ही अदा ना करें बल्कि उनके आदेशों का भी पालन करे। 5 वीं शताब्दी के
अभिलेखों से पता चलता है कि आगे चलकर राजा ने ग्रहीता को दण्डित करने का अधिकार भी सौंप दिया। ग्रहिता को यह
अधिकार मिलने के बाद गांव संभवत: आत्मनिर्भर राजनैतिक इकाई बन जाता था। भूमिदान देने का सबसे बड़ा नतीजा यह
निकाला कि शासनतंत्रा पर से केन्द्र का व्यापाक नियंत्रण, जिसके लिए मौर्य साम्राज्य प्रसिद्ध था, गुप्तकाल में लुप्त होने लगा
और उसका स्थान सता के विकेन्द्रीकरण ने ले लिया। उपसांमतीकरण का पहला उदाहरण इन्दौर अभिलेख में मिलता है। इससे
पता चलता है कि राजा की ओर से मिली भूमि पर सामंत स्वयं भी खेती करता था और किसी दूसरे को भी खेती के लिए
दे सकता था। उदासांमतीकरण की प्रवृति के कारण किसानों की दिशा बिगड़ने लगी। यह प्रक्रिया मध्य भारत के पश्चिमी हिस्से
में पांचवी श0 से प्रारंभ हुई। महत्वपूर्ण बात यह है कि गुप्त साम्राज्य के केन्द्रीय हिस्सों मेंं अर्थात् आधुनिक बंगाल, बिहार और
उतरप्रदेश में किसी भी सामंत द्वारा राजा की अनुमति के बिना भूमिदान या गांव दान का उल्लेख नही मिलता । इन परिवर्तनों
का असर यह हुआ कि अब राज्य किसानों से सीधा कर वसूलने की अपेक्षा यह कार्य कर नए तीसरे वर्ग के हाथों में चला
गया। इसे राज्यतंत्रा के सामंतीकरण का एक और लक्षण माना जाता है।

गुप्त और गुप्तोत्तरकाल के बाद ग्रहिताओं और क्षेत्र स्वामियों के अधीन किसानों की स्थिति दासों जैसी हो गई थी तथा दूसरी
ओर नए-नए बढ़े हुए करों के कारण स्वतंत्र कृषकों की स्थिति भी काफी बिगड़ गई थी। इन पर लगाए हुए करों की तुलना
यूरोप के सामंतवचादी महसूलो से की जा सकती है। ये दोहरे दायित्व सिर्फ मध्यभारत और पश्चिमी भारत में देखने को मिलते
है।

सामंतवाद के स्पष्ट लक्षण गुप्त और गुप्तोत्तर काल में दिखाई देने लगे थे इसकी विशेषतांए थी- भूमिदान, अनुदान में दी भूमि
के साथ बेगार की प्रथा, किसानों और शिल्पियों को अपनी मर्जी से आने-जाने पर रोक, मुद्रा का अभाव, व्यापार का प्रचलन,
राजस्व व्यवस्था व दण्ड प्रशासन का अधिकार ग्रहिता के पास जाना अधिकारियों को वेतन स्वरूप अलग-2 क्षेत्रों का राजस्व
सौपंने की शुरूआत व सामंती दायित्वों का विकास आदि।

पांचवी शताब्दी तक भूमि अनुदान प्रथा के कारण मन्दिरों और मठों की संख्या में वृद्धि हुई, अनेक रियासतों का उपभाग करने
के कारण ये अत्यंत धनी हो गए। इन मठों की सम्पन्नता के कारण ही तुर्क आक्रमणकारियों ने इन्हें जी भरकर लूटा। बाद
के काल में विशेषकर राजपूत राज्यों में जब युद्ध एक महान समारोह बन गया तब युद्ध में मरने वाले सैनिकों के परिवार के
लिए भी गांव दान में दिए जाने लगे। इसका एक कारण यह भी था कि ऐसा करने से पर्याप्त सैनिक मिल सकेंगे क्योंकि सामंती
पद्ध़ती सैनिकों पर ही आधारित थी।

सामंतवाद का विकास

राजनैतिक सामंतवाद के उद्भव और विकास का ईसवी सन् की पहली शताब्दी से ब्राह्यणों को दिए जाने वाले भूमि-अनुदानों
से जुड़ा हुआ है। जो क्षेत्र उनको दान किए जाते थे उनमें उन्हें राजस्वविषयक व्यापक अधिकार दिए जाते थे और साथ ही
शांति व्यवस्था कायम रखने और अपराधियों से जुर्माना वसूलने जैसे प्रशासनिक अधिकार भी। इस काल में भूमि अनुदान वालों
की मंशा चाहे जो भी रही हो किन्तु ऐसे अनुदानों का परिणाम यह हुआ कि देश में आर्थिक एवम् राजनैतिक शक्ति से सम्पन्न
एक नए वर्ग का उदय हुआ। तथा शासन तंत्रा पर केन्द्र का वह सूक्ष्म और व्यापक नियंत्रण जिसके लिए मौर्य साम्राज्य प्रसिद्ध
था वह मौर्येतर काल तथा गुप्तकाल में लुप्त होने लगा और इसका स्थान सता के विकेन्द्रीकरण ने ले लिया। लगभग इसी समय
राज्य के सुदूरवर्ती प्रदेशों में उपसांमीकरण की ण्था भी प्रारंभ हो गयी और जब गुप्त साम्राज्य समाप्ती पर था जब से साम्राज्य
के केन्द्रिय भागों में भी यह प्रथा लागू हो गयी। उपसांमतीकरण की प्रथा की प्रारंभ हो गयी और जब गुप्त साम्राज्य समाप्ती
पर था तब से साम्राज्य के केन्द्रिय भागों में भी यह प्रथा लागू हो गयी। उपसामंतीकरण का प्रथम प्रमाण गुप्तकाल का है जिसमें
गुप्तसम्राट बुधगुप्त के अधीन महाराजा सुरभिशचन्द्र एक बड़ा सोमंत था और जिसके अधीन एक अन्य सामंत मातृविष्णु था।
सामंतवादी प्रणाली के विकास में देश विजय की उस क्रिया से भी सहायता मिली जिसमें पराक्रमी राजा छोटे-2 सरदारों को
जीतकर उन्हें कर-दाता बनाकर और भक्ति भाव का प्रर्दशन करने का वचन लेकर उन्हें पुन: पदासिन कर देता था। यह प्रक्रिया
चन्द्रगुप्त के समय अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। यद्यपि समुद्रगुप्त की इलाहाबाद प्रशस्ति में सामंतवाद शब्द का जिक्र नही
है तथापि छठी शताब्दी में विजि सरदारों के लिए सामंत शब्द का प्रयोग किया जाता था। धीरे-धीरे सामंतवाद का प्रयोग
पराजित सरदारें के अतिरिक्त राज्यधिकारियों के लिए भी होने लगा। एक विद्वान के अनुसार शक, यवन, कुषाण आदि विदेशी
अंशाति उत्पन्न अदा की। अव्यवस्था के युग में प्रत्येक महत्वाकांक्षी शक्तिशाली व्यक्ती ने भी अपने पृथक राज्य कायम कर
लिया। गुप्त शासकों ने इन सभी महाराजाओं का अंत नही किया। यही कारण है कि गुप्तों के शिथिल होते ही ये पुन: स्वतंत्र
हो गए और परस्पर युद्धों द्वारा अपनी शक्ति के विस्तार में तत्पर हो गए। परिणामस्वरूप समस्त भारत में अव्यवस्था फैल गई
और एक प्रकार से मत्सय न्याय का प्रारंभ हुआ। इसलिए तिब्बती लेखक तारानाथ को यह लिखने का मौका मिला कि “इस
काल में प्रत्येक ब्राह्यण, क्षित्राय, और वैश्य अपनी-2 जगह शासक बन बैठे”। गुप्तों के साथ भी भारत में एक शक्तिशाली विशाल
साम्राज्य की कल्पना भी समाप्त हो गई। सामंती पद्धति का यह एक स्वाभाकि परिणाम था।

मौर्यकाल में समण्डलों के प्रधान अधिकारियों अर्थात् रजुकों की नियुक्ति सम्राट करता था। लेकिन गुप्त साम्राज्य में भी
अधिकारियों जिन्हें अब कुमारामात्य कहा जाता था, उपरिक द्वारा नियुक्त किए जाते थे। केवल गुप्त साम्राज्य के केन्द्र या
निकटवर्ती क्षेत्रों में ही विषयपतियों की नियुक्ति स्वयं शासक करता था। गुप्तकाल के सममण्डली और जिले के अधिकारियों
के बाद उतरोदर वंशानुगत होते चले गए।

इसके परिणामस्वरूप एक ओर तो केन्द्रिय सता की जड़ खोखली होती गई और दूसरी ओर प्रशासन का स्वरूप भी सामंतवादी
होता गया। पूर्व मध्यकालीन राज्य पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट में भी सामंतवादी विशेषतांए प्रबल हो उठी। पालों ने धार्मिक
अनुष्ठानों पर खूब भूमि अनुदान दिए, इन अनुदानों के भोक्ता वैष्णव और शैव मंदिर थे। लेकिन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान
बौद्ध विहारों का था। 7 वीं शताब्दी के उतरार्ध में नांलदा विहार के अधीन 200 गांव थे बाद के शासकों के काल में इसके
गावों में बढ़ोतरी हुई। इनके अलावा मुख्य पुरोहितों और मन्दिरों को भी प्रतिहार शासकों और सांमतों से काफी गांव अनुदान
में मिले।

प्रतिहारों और पालों के राज्यों को मिलाकर मंदिरों और ब्राह्यणों के अधीन जितने गावं थे, अकेले राष्ट्रकूट के राज्य में वे उनसे
अधिक गांवों के भोक्ता थे। ऐसा लगता है कि राष्ट्रकूटों के अधीन पुरोहितों के बजाए धार्मिक संस्थाओं ने प्रमुख भूमिधर वर्ग
का रूप धारण किया। पाल और प्रतिहार राज्यों में यह बात देखने को नही मिलती। उतर भारत में धार्मिक अनुदान-भोगियों
को कर नही देना पड़ता था लेकिन धर्मेतर भोक्ता नजराने के तौर पर शायद कुछ देते थे। इस काल में ग्रामीण समुदायों के
भूमि-संबधी अधिकारों का भी àास होने लगा और परिणामत: अधिकाधिक जमीन पर व्यक्तिगत स्वामित्व स्थापित होता गया।
उपसांमतीकरण की प्रवृति के कारण किसानों की दशा बिगड़ती गई। इसमें एम महत्वपूर्ण बात यह है कि जो सांमत केवल
एक गांव का स्वामी था, वह भी अपने प्रभु से अनुमति लिए बिना अपनी जमीन दूसरों को हस्तांतरित कर सकता था तथा जमीन
के साथ जोतने वाले हलिकों को भी हस्तांतरित कर सकता था इससे सिद्ध होता है कि प्रतिहारों के अधीन राजस्थान में कृषि
-दासत्व की प्रथा थी। कृषको ंको कृषि दासों की स्थिति में पहुंचने वाली दूसरी बात थी बेगार प्रथा का विस्तार। पूर्वी
काठियावाड़ में प्रतिहारों के सांमतों को ग्रामीणों से बेगार लेना का अधिकार प्राप्त था। वहां यह प्रथा विष्टि नाम से जानी जाती
थी। सच तो यह है कि बेगार की प्रथा जितने व्यापक रूप में प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के शासन-काल में गुजरात और महाराष्ट्र
में प्रचलित थी, उतनी और किसी काल में नही रही। यह राजस्व का एक मुख्य साधन थी।
इस काल की अर्थव्यवस्था में चार विशेषतांए प्रमुख है :

  1. भूमि पर राजकीय और सामुदायिक स्वामित्व का हास हो रहा था तथा व्यक्तिगत स्वामित्व का विकास हो रहा था।
  2. उपसामंतीकरण, बेदखली, नए-नए करों के आरोपण तथा बेगार के कारण किसानों की दशा दयनीय हो रही थी।
  3. व्यापार और शिल्प-कारीगरी से हाने वाली राजकीय आय मात्रा कुछ लोगों की जागीर बनती जा रही थी।
  4. आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का विकास, जिसका अस्तित्व मुद्रा के कम उपयोग और व्यापार की कमी से सिद्ध होता है।

सामंतवाद का स्वरूप

सामंतवादी व्यवस्था के तहत कर्मचारियों को वेतन नकद ना देकर भूमि अनुदानों के रूप में दिया जाता था। अर्थशास्त्र से पता
चलता है कि नई बस्तियों से संबधित कुछ अधिकारियों को छोड़कर राज्य के समस्त अधिकारियों को नकद वेतन मिलता था।
लेकिन संभवत: दूसरी शताब्दी में संकल्ति मनुस्मृति में राजस्व अधिकारियों के भूमिदान के रूप में वेतन देने का उल्लेख है।
गुप्तकालीन स्मृतिकार भी इस व्यवस्था को कायम रखते है। इतना तो स्पष्ट है कि हर्षवर्धन के काल में अधिकारियों को वेतन
नकद न होकर भूमिदान के रूप में मिलता था। àनसोग में विवरण, हर्ष के अभिलेख और मुद्रा के अभाव से इस बात की पुष्टि
होती है। भोगिक, भोगपतिक और भोगिपालक जैसे अधिकारियों के नामों से भी ऐसा लगता है कि ये पद मुख्यत: राजस्व का
उपभोग करने के लिए इन अधिकारियों को दिए गए थे। वैसे भी मन्दिरों और पुरोहितों के निर्वाह के लिए भी भूमि अनुदान
दिए जाते थे और अधिकारियों को भी निर्वाह के लिए भूमि अनुदान दिए जाने लगे।

इस व्यवस्था में सामन्तों को अपने सम्राटों के प्रति कुछ दायित्वों का निर्वाह करना होता था बाण पहला लेखक जिसने हर्षचरित
तथ काद्म्बरी में सामंतों के कर्तव्यों का संकेत दिया है। सामान्यत: सामंतों का मुख्य कर्तव्य था अपने राजा के लिए सेना संगठित
करना, वार्षिक कर देना तथा प्रतिवर्ष राजा के दरबार मे ंउपस्थिति होकर अपनी वफादारी प्रदर्शित करना। ये सम्राट के साथ
अनेक मनोंरजनों में भी हिस्सा लेते थे। इस प्रकार सामंत सैनिक और प्रशासनिक दृष्टि से ही नही अपितु सामाजिक दृष्टिकोण
से सामंत पद्धति का यह लाभ था कि इसमें केन्द्र से प्रशासित नौकरशाही की आवश्यकता नही रह जाती थी।

इस सामंतवादी ढांचे में हुई विविध उपसांमतों की वृद्धि के कारण भूमि से प्राप्त होने वाली आय अनेक भागों में बिखर जाती
थी। दूसरी ओर राजा की स्थिति ऊपर से कमजोर हुई तथा नीचे से कृषक की स्थिति कमजोर हुई। बिचौलियों की संख्या
में वृद्धि होने के कारण अधिक आय उनके हाथों में आ गई तथा उन्होंने कृषकों पर कई अन्य नए कर भी लगा दिए। कुछ
कृषक तो 1ध्3 हिस्सा कर के रूप में अदा करते थे। यद्यपि सामान्यत: उत्पादन का 1/6 भाग ही कर के रूप में प्रचलित था।
इन करों के अलावा किसानों और शिल्पियों से बेगार भी लिया जाता था।

कुलीन वर्ग पूर्णत: कृषि पर निर्भर था और जुताई का वास्तविक कार्य कृषक करते थे। जो अधिकतर शुद्र होते थे। इस काल
में उत्पादन स्थानीय जरूरतों को पूरा करने जितना उत्पादित किया जाता था। यानि आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी जिसमें
अतिरिक्त उत्पादन पर जोर नही दिया जाता था। व्यापार और विनिमय भी स्थानीय स्तर तक था। अतिरिक्त उत्पादन की
कोशिश इसलिए नहीं की गई क्योंकि इससे कृषकों को कोई फायदा नही होता था और अतिरिक्त हिस्से को जमींदार हड़प
लेते थे। सीमित उत्पादन और व्यापार के अभाव के परिणामस्वरूप अर्थतंत्रा की दृष्टि से गांव आत्मनिर्भर ईकाइ से परिवर्तित
हो गए। इस प्रकार अनेक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर आर्थिक इकाइयों का उदय हुआ।

सत्ता का विकेन्द्रीकरण इसका सिंद्धात था। राजा ने सता को अपने सामंतों और जागीरदारों में बांट दिया। इसमें सांमत के
न्याय के खिलाफ अपील नहीं होती। सता का हंस्तातरण होने के साथ ही राजा की शक्ति में कमी आई। और मध्यस्थों की
शक्ति में वृद्धि हुई। इस प्रणाली में राज्यों को प्रांतों, और प्रांतों को गांव में बांटा गया था। सता के विकेन्द्रीकरण के कारण
शक्ति छोटे-छोटे लोगों के हाथों में बंट गई थी। जिससे गांव की प्रशासनिक इकाइयां (पचांयतें) समाप्त हो गई थी।
इस काल में समाज का स्वरूप ग्रामीण था। समाज सैनिक संगठन पर आधारित था क्योंकि शासकीय वर्ग ने युद्धों के जरिए
अपना Status ऊंचा किया था। Status के साथ इनकी जाति का भी स्थान बढ़ा। जैसे समाज में राजपूतों का स्तर ऊंचा हुआ।
लेकिन जातिवाद पहले की अपेक्षा जटिल हो गया और औरतों की स्थिति में गिरवाट दर्ज की गई। ब्राह्यण का उत्थान हुआ,
शासकीय वर्ग द्वारा संरक्षण दिया जाने के कारण। समाज में अनेक नई जातियों का उद्भव हुआ। इसके पीछे भूमि अनुदान
प्रणाली उतरदायी थी।

शिक्षा का माध्यम संस्कृति होने के कारण यह आम आदमी से सबंधित नही थी। तकनीकी शिक्षा का अभाव है और रचनात्मक
की कमी है। इस समय शास्त्रीय गतिविधियों में भी पुनरावृति है। क्योंकि पुराने शास्त्रों को लगभग ज्यों का त्यों लिखा गया।
लेखकों ने तो भी लिखा वह erotic (अश्लीलता) हैं लेकिन जो Prose (गद्य) लिखे गए वे वास्तविक है जैसे : सामवेद द्वारा रचित्
कथासरित् सागर। इस समय धर्म को नए ढंग से समझा गया, क्योंकि धर्म में भी अश्लीलता के तत्वों का समावेश है। खुजराहों
के मंदिरों इसका उदाहरण है जिनका निर्माण इसी काल में हुआ। इतिहास से संबधित रचनाओं में स्थानीय शासकों की प्रशंसा
के अतिरिक्त कुछ नही है जैसे : चालुक्य वंश के शासक विक्रमादित्य पर बिल्हण द्वारा रचित विक्रमादित्यदेव चरित, पद्मगुप्त
द्वारा मालवा के शासक सिंधुराज पर लिखी गई किताब नवसांहसचरित आदि। भवभूति, हस्तिमुल्ला ने अनेक नाटक लिखे।
काव्य में जयदेवच का रचित गीतगेांविद काफी प्रसिद्ध है। इस समय की सांस्कृतिक गतिविधियों में Sensuality को एक उत्सव
के रूप में लिया गया है। इसका प्रभाव मंदिरों पर स्पष्ट नजर आता है और तांित्रक स्कूलों में भी। इस समय पालि और प्राकृत
भाषा का पतन हो रहा है तथा क्षेत्रीय भाषाओं की उत्पति जैसे: असनिया, उडिया आदि।

सामंतवादी ढांचे की महत्वपूर्ण विशेषता राजनैतिक सता का विकेन्द्रीकरण का स्वरूप भारत में वैसा नही था जैसा यूरोप में
था। यूरोप की भांति यहां विकेन्द्रीकरण सैनिक सेवा करने वालों को दी गई जगीर का परिणाम ना होकर अधिकतर ब्राह्यणों
और मन्दिरों को भूमि अनुदान देने का परिणाम था दूसरे यूरोप में सभी कृषकों का अपना सारा समय और शक्ति अपने मालिक
के खेत पर लगानी पड़ती थी, वहीं भारत में स्वतंत्र कृषकों की काफी संख्या थी। फिर भी भारत में उपसामंतीकरण का
सिलसिला उतना अधिक नही था जितना यूरोप में था।

इस प्रकार हम देखते है कि भारत में सामंतवाद की विशेषतांए गुप्तकाल में स्पष्ट सामने आई। इसका स्पष्ट प्रभाव राजपूत
काल में देखने को मिला। कुछ परिवर्तनों के साथ राजनैतिक, आर्थिक ढांचे के आधार के रूप में सामंतवाद कुछ हद तक अभी
हाल तक जीवित रहा है और समाज के विकास को प्रभावित करता रहा है।

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