बुद्धि के प्रकार एवं सिद्धांत

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बुद्धि एक ऐसा सामान्य शब्द है जिसका प्रयोग हम अपने दिन-प्रतिदिन बोल-चाल की भाषा में काफी करते हैं। तेजी से सीखना, समझना, स्मरण तार्किक, चिन्तन आदि गुणों के लिये हम दिन-प्रतिदिन की भाषा में बुद्धि शब्द का प्रयोग करते हैं सभी व्यक्ति समान रूप से योग्य नहीं होते। मानसिक योग्यता ही उनके असमान होने का मुख्य कारण है। बुद्धि अमूर्त है परन्तु बालक के विकास में महत्वपूर्ण घटक है विद्यार्थी का सभी प्रकार का विकास बुद्धि से इसलिये संबंधित है क्योंकि अधिगम (सीखना) बुद्धि पर निर्भर है। बुद्धि के स्वरूप के विषय में मनोवेज्ञानिकों में बहुत अधिक मतभेद है ।

बुद्धि की विशेषताएँ

बुद्धि एक सामान्य योग्यता है इस योग्यता से व्यक्ति अपने को व दूसरों को समझता है। बुद्धि की विशेषतायें इस प्रकार है –

  1. बुद्धि जन्मजात योग्यता है।
  2. बुद्धि व्यक्ति को विभिन्न बातों को सीखने में मदद करती है।
  3. यह व्यक्ति को अमूर्त चिन्तन की योग्यता प्रदान करती है।
  4. बुद्धि व्यक्ति की कठिन समस्याओं को सरल बनाती है।
  5. यह व्यक्ति को अपने अनुभवों से सीखने व उससे लाभ उठाने की क्षमता देती है।
  6. यह व्यक्ति को नवीन परिस्थितियों में सामंजस्य करने का गुण प्रदान करती है।
  7. बुद्धि पर वंशानुक्रम व वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है।
  8. बुद्धि व्यक्ति को भले-बुरे, सत्य-असत्य, नैतिक-अनैतिक कार्यो में अन्तर करने की योग्यता देती है।

बुद्धि के प्रकार

  1. मूर्त बुद्धि – इस बुद्धि को यांत्रिक या गायक बुद्धि भी कहते है। इसका संबंध यंत्रों और मशीनों से होता है। जिस व्यक्ति में यह बुद्धि होती है वह यंत्रो व मशीन के कार्य में विशेष रूचि लेता है।
  2. अमूर्त बुद्धि – इस बुद्धि का संबंध पुस्तकीय ज्ञान से होता है। जिस व्यक्ति में यह बुद्धि होती है वह ज्ञानार्जन में विशेष रूचि लेता है।
  3. सामाजिक बुद्धि – इस बुद्धि का संबंध व्यक्तिगत व सामाजिक कार्यो से होता है। जिस व्यक्ति में यह बुद्धि होती है वह मिलन-सार, सामाजिक कार्यो में रूचि लेने वाला, समाज में लोगों के आपसी संबंधों को जानने वाला होता है।

बुद्धि के सिद्धांत 

बुद्धि के स्वरूप की पूर्ण रूपेंण व्याख्या करने व उसे समझने के लिये बुद्धि के कई सिद्धांत सहायक हैं मनोवैज्ञानिकों का शुरू से ही यह प्रयास रहा है कि बुद्धि की व्याख्या करने हेतु वैज्ञानिक सिद्धांतो का प्रतिपादन किया जाये इस प्रयास के परिणाम स्वरूप बुद्धि के कई सिद्धांत हमारे सामने उपस्थित हैं। जिसमें से बहुआयामी सिद्धांत है –

बहुखण्ड सिद्धांत –

थस्र्टन के द्वारा दिया गया यह सिद्धांत विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण पर आधारित है थस्र्टन के अनुसार बुद्धि कई प्रारंभिक योग्यताओं से मिलकर बनी होती है उन्होनें बुद्धि के स्वरूप को जानने के लिये विश्वविद्यालय के छात्रों पर 56 मनोवैज्ञानिक परीक्षण करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला कि बुद्धि सात योग्यताओं का मिश्रण है-

  1. संख्या योग्यता
  2. शाब्दिक योग्यता
  3. स्थानिक योग्यता
  4. शब्द प्रभाव योग्यता
  5. तार्किक योग्यता
  6. स्मृति योग्यता
  7. प्रत्यक्षीकरण योग्यता

ये सभी सात क्षमतायें अथवा योग्यतायें एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं। अर्थात् उनमें सह संबंध नहीं है। थस्र्टन का मत है कि किसी विशेष कार्य करने में जैसे गणित के एक कठिन प्रश्न को समझना, साहित्य का अध्ययन करना आदि में उपर्युक्त मानसिक योग्यताओं के संयोजन की आवश्यकता होती हैं ये मानसिक योग्यतायें प्रारंभिक व सामान्य हैं क्योंकि उनकी आवश्यकता किसी न किसी मात्रा में सभी जटिल बौद्धिक कार्यो में पड़ती है।

बुद्धि संरचना का सिद्धांत – गिलफोर्ड 

गिल्फोंर्ड के सिद्धांत को त्रिविमीय सिद्धांत या बुद्धि संरचना का सिद्धांत भी कहा जाता है। गिलफोर्ड का विचार था कि बुद्धि के सभी तत्वों को तीन विभागों में बॉंटा जा सकता है जैसे –

  1. संक्रिया
  2. विषय वस्तु
  3. उत्पादन

1) संक्रिया – संक्रिया से तात्पर्य व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले मानसिक प्रक्रिया के स्वरूप से होता है। किसी दिये गये कार्य को करने में व्यक्ति द्वारा की गई मानसिक क्रियाओं का स्वरूप क्या है। गिलफोर्ड ने संक्रिया के आधार पर मानसिक क्षमताओं को पांच भागों में बॉंटा है –

  1. मूल्यांकन
  2. अभिसारी चिन्तन
  3. अपसारी चिन्तन
  4. स्मृति
  5. संज्ञान

उदाहरण तौर पर मान लिया जाये कि किसी व्यक्ति को सहशिक्षा पर उसके गुण व दोष बताते हुये एक लेख लिखने को कहा जाता है तब उपयुक्त पॉच मानसिक क्रियाओं में मूल्यांकन की संक्रिया होते पायी जायेगी। उसी तरह किसी व्यक्ति को ईट का असाधारण प्रयोग बताने को कहा जायेगा तब निश्चित रूप से अपसारी चिन्तन की संक्रिया का उपयोग किया जावेगा।

2) विषय-वस्तु – इस विमा का तात्पर्य उस क्षेत्र से होता है जिसमें सूचनाओं के आधार पर संक्रियाये की जाती है गिलफोर्ड के अनुसार इन सूचनाओं को चार भागों में बॉंटा गया है –

  1. आकृति अन्तर्वस्तु
  2. प्रतिकात्मक अन्तर्वस्तु
  3. शाब्दिक अन्तर्वस्तु
  4. व्यवहारिक अन्तर्वस्तु

उदाहरण के तौर पर व्यक्ति को दी गयी सूचनाओं के आधार पर कोई संक्रिया करना हो जो शब्दिक ना होकर चित्र के रूप में हो ऐसी परिस्थिति में विषय-वस्तु का स्परूप आकृतिक कहा जायेगा।

3) उत्पादन – उत्पादन का अर्थ किसी प्रकार की विषय-वस्तु द्वारा की गयी संक्रिया के परिणाम से होता है इस परिणाम को गिलफोर्ड ने 6 भागों में बॉंटा है –

  1. इकाई
  2. वर्ग
  3. सम्बन्ध
  4. पद्धतियॉं
  5. रूपांतरण
  6. आशय

गिलफोर्ड ने अपने सिद्धांत में बुद्धि की व्याख्या तीन विमाओं के आधार पर की है और प्रत्येक विमा के कई कारक हैं। संक्रिया बिमा के 5, विषय वस्तु विमा के 4 कारक व उत्पादन विमा के 6 कारक हैं इस तरह बुद्धि के कुल मिलकर (5x4x6=120) कारक होते हैं।

बहुबुद्धि का सिद्धांत – गार्डनर 

गार्डनर के सिद्धांत को बहुबुद्धि का सिद्धांत कहा गया है। गार्डनर के अनुसार बुद्धि का स्वरूप एकांकी न होकर बहुकारकीय होती है उन्होंने बताया कि सामान्य बुद्धि में 6 तरह की क्षमताएं या बुद्धि सम्मिलित होती है। यह क्षमताए एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं। तथा मस्तिष्क में प्रत्येक के संचालन के नियम अलग-अलग हैं। यह 6 प्रकार की बुद्धि हैं –

  1. भाषायी बुद्धि – इस तरह की बुद्धि में वाक्यों या शब्दों की बोध क्षमता, शब्दावली, शब्दों के बीच संबंधो को पहचानने की क्षमता आदि सम्मिलित होती है। ऐसे व्यक्ति जिनमें भाषा के विभिन्न प्रयोगों के संबंध में संवेदनशीलता होती है। जैसे – कवि, पत्रकार
  2. तार्किक गणितीय बुद्धि- इस बुद्धि में तर्क करने की क्षमता, गणितीय समस्याओं का समाधान करने की क्षमता, अंको के संबंधों को पहचानने की क्षमता आदि सम्मिलित होती है। ऐसी बुद्धि में तर्क की लम्बी श्रंखलाओं का उपयोग करने की क्षमता होती है। जैसे – वैज्ञानिक, गणितज्ञ।
  3. स्थानिक बुद्धि – इसमें स्थानिक चित्र को मानसिक रूप से परिवर्तन करने की क्षमता, स्थानिक कल्पना शक्ति आदि आते हैं। अर्थात् संसार को सही ढंग से देखने की क्षमता व अपने प्रत्यक्षीकरण के आधार पर संसार के पक्षों का पुननिर्माण करना, परिवर्तित करना आदि सम्मिलित हैं। जैसे – मूर्तिकार, जहाज चालक ।
  4. शारीरिक गतिक बुद्धि – इस तरह की बुद्धि में अपने शारीरिक गति पर नियंत्रण रखने की क्षमता, वस्तुओं को सही ढंग से घुमाने व उनका उपयोग करने की क्षमता सम्मिलित है। इस तरह की बुद्धि नर्तकी व व्यायामी में अधिकतर होती है। जिसमें अपने शरीर की गति पर पर्याप्त नियंत्रण रहता है। साथ ही साथ इस तरह की बुद्धि की आवश्यकता क्रिकेट खिलाड़ी, टेनिस खिलाड़ी, न्यूरों सर्जन, शिल्पकारों आदि में अधिक होता है क्योंकि इन्हें वस्तुओं का प्रयोग प्रवीणतापूर्वक करना होता है।
  5. संगीतिक बुद्धि – इसमें लय व ताल को प्रत्यक्षण करने की क्षमता सम्मिलित होती है। अर्थात लय, ताल, गायन, के प्रति उतार-चढ़ाव की संवेदनशीलता आदि इस प्रकार की बुद्धि का भाग हैं। यह बुद्धि संगीत देने वालों व गीत गाने वालों में अधिक होती है।
  6. व्यक्तिगत बुद्धि – व्यक्तिगत बुद्धि के दो तत्व होते हैं जो एक दूसरे से अलग-अलग होते हैं।
  1. अन्त: वैयक्तिक बुद्धि – अन्त: वैयक्तिक बुद्धि में अपने भावों एवं संवेगों को मॉनीटर करने की क्षमता, उनमें भेद करने की क्षमता, सूचनाओं से व्यवहार को निर्देशित करने की क्षमता आदि सम्मिलित होती है। 
  2.  अन्तर वैयक्तिक बुद्धि – दूसरे व्यक्तियों के अभिप्रेरकों इच्छाओं, आवश्यकताओं को समझने की क्षमता, उनकी मनोदशा को समझना, चित्त प्रकृति समझकर किसी नयी परिस्थिति में व्यक्ति किस प्रकार व्यवहार करेगा आदि के बारे में पूर्व कथन करने की क्षमता से होता है।

गार्डनर के अनुसार प्रत्येक सामान्य व्यक्ति में यह 6 बुद्धि होती हैं। परन्तु कुछ विशेष कारणों जैसे अनुवांशिकता या प्रशिक्षण के कारण किसी व्यक्ति में कोई बुद्धि अधिक विकसित हो जाती है। ये सभी 6 प्रकार की बुद्धि आपस में अन्त: क्रिया करती हैं फिर भी प्रत्येक बुद्धि स्वतंत्र रूप में कार्य करती है। मस्तिष्क में प्रत्येक बुद्धि अपने नियमों व कार्य विधि द्वारा संचालित होती है इसलिये यदि खास तरह की मस्तिष्क क्षति होती है तो एक ही तरह की बुद्धि क्षतिग्रस्त होगी पर उसका प्रभाव दूसरे तरह की बुद्धि पर नहीं पड़ेगा।

गार्डनर के इस सिद्धांत का आशय यह है कि एक छात्र जिसकी स्कूल व कॉलेज की उपलब्धि काफी उत्कृष्ट थी फिर भी उसे जिंदगी में असफलता हाथ लगती है वहीं दूसरा छात्र जिसका स्कूल व कॉलेज की उपलब्धि निम्न स्तर की होने के बाद उसने बहुत सफलता अर्जित की इसका स्पष्ट कारण यह है कि पहले छात्र में व्यक्तिगत बुद्धि की कमी थी व दूसरे छात्र में अधिकता।

क्रमिक महत्व का सिद्धांत – 

बर्ट एवं वर्नन ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया, उन्होनें मानसिक योग्यताओं को उनके महत्व के अनुसार 4 स्तर दिये है जो निम्न हैं –


मानसिक योग्यता

  1. सामान्य (प्रथम) 
  2. सामान्य (द्वितीय) 
  3. क्रियात्मक यांत्रिक शारीरिक
  4. शाब्दिक संख्यात्मक शैक्षिक
  1. स्मरण तर्क कल्पना
  2. चिन्तन विशेष मानसिक योग्यता

केटल का सिद्धांत – 

केटल ने बुद्धि के दो तत्व बताये हैं –

  1. अनिश्चित बुद्धि, जिसे GI कहते हैं
  2. निश्चित बुद्धि, जिसे GC कहते है

अनिश्चित बुद्धि वह है जिसके विकास पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है फलत: यह बुद्धि प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होती है। निश्चित बुद्धि के विकास पर अनुभवों, शिक्षा, संस्कृति यानि वातावरण का प्रभाव पड़ता है यह उन सभी व्यक्तियों की एक सी होती है जो एक समान वातावरण में रहते हैं। केटल के अनुसार इन दो तत्वों को भी तत्व विश्लेषण द्वारा अनेक तत्वों में विभाजित किया जा सकता है आजकल इस सिद्धांत पर आधारित कई अनुसंधान हो रहे हैं और अनिश्चित व निश्चित बुद्धि के तत्वों को खोजा जा रहा है।

11 Comments

MillardBig

Jan 1, 2020, 10:42 pm Reply

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Vaishnavi

Dec 12, 2019, 5:21 pm Reply

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Unknown

Jun 6, 2019, 11:02 am Reply

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Manvi sharma

May 5, 2019, 7:40 pm Reply

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admin

Jul 7, 2019, 1:41 am Reply

Thanks

SALAM ALI BANKI

Dec 12, 2018, 4:19 am Reply

Short answer बनाए सिर

Unknown

Mar 3, 2019, 7:59 pm Reply

Agree with u

Unknown

Oct 10, 2018, 7:44 pm Reply

Kya koi bhi iska satic answer nahi hai

Vartika

Nov 11, 2019, 2:17 pm Reply

Ky satik chahie isme?isme to bht SE topic hai…kis topic p lo stik ans chahie

Unknown

Oct 10, 2018, 12:08 pm Reply

Good

Sarthak Classes Balotra

Jan 1, 2018, 4:23 pm Reply

good notes

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