रूस का इतिहास 1815 से 1890 ई.

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रूसी लोग मुख्यत: स्लाव हैं। पुरानी रूसी भाषा में उच्चतम श्रेणी के सत्ताधारी स्वतंत्र शासक को जार कहा जाता था। 21 जनवरी 1613 ई. से रूस में रोमोनोव राजवंश का शासन प्रारंभ हुआ। माइकेल रोमोनोव इस वंश का प्रथम जार था। सन 1672 ई. में मास्को की गद्दी पर पीटर महान आरूढ़ हुआ। पीटर ने अनुभव किया कि यूरोप के देश उन्नति की दौड़ में आगे बढ़ते जा रहे हैं, रूस अन्य देशों की तुलना में बहुत पीछे है। 1725 ई. में पीटर की मृत्यु हुई। उसने अपने कार्यों से रूस को शक्तिशाली, विकासशील देश बना दिया। प्रशासन, न्यायपालिका, सेना का संगठन पश्चिमी ढंग पर किया गया। पीटर के सुधारों के बाद रूसी शासन ने यह अनुभव किया कि जनता से उसका संपर्क छूट गया है। पीटर के हृदय में परम्परा और सत्ता के प्रति कोई आदर न था। उसका मस्तिबक ज्ञान की खोज मे रहता था। रूसी जनता का नही बल्कि रूसी राज्य का कल्याण करना उसका उद्देश्य था। रूढ़िवादियों से उसका संघर्ह्य चलता रहा। पीटर को निरंतर अधिकाधिक धन और जन की आवश्यकता थी पीटर को राष्ट्रपिता, सम्राट और महान की उपाधि से विभूह्यित किया गया। इतिहासकार हेजन के अनुसार पीटर की गणना विश्व इतिहास के अत्यधिक कर्मठ और शक्तिशाली शासकों में है। रूस के इतिहास का एक महान युग उसका शासन काल था। (हिस्ट्री ऑफ माडर्न यूरोप - पृ. 19)

1725 ई. में पीटर की मृत्यु हुई। उसके 40 वर्ह्य बाद कैथरीन द्वितीय जब जार बनी तक पीटर के अधूरे कार्य पूर्णता की ओर बढ़े। 1772 ई. से सन 1796 तक जार केथरीन II ने रूसी साम्राज्य का विस्तार किया, रूस का पिछड़ापन दूर किया और एक शक्तिशाली रूस का निर्माण किया।

रूसी इतिहास का यह रोचक प्रसंग है कि सत्रहवी शताब्दी में जहाँ कुल जनसंख्या 1 करोड़ 50 लाख थी, वह उन्नीसवÈ शताब्दी के प्रारंभ में बढ़कर 4 करोड़ और 1850 ई. तक बढ़कर 6 करोड़ 30 लाख की हो गई। (जार्ज वर्नादस्की, रूस का इतिहास पृ. 157) अधिकांश रूसी जनता गांवों में रहती थी और कृह्यि कार्य करती थी। पीटर की मृत्यु के समय रूस में कुल कारखाने 200 थे। केथरीन प्प् की मृत्यु के समय यह बढ़कर 2500 तक पहुँच गया था।

जार अलेक्जेन्डर प्रथम का सिंहासनारोहण

रूस की महान शासिका केथरीन II की मृत्यु 1796 ई. को हुई, उसका पुत्र पाल, जार बना और 1796 से 1801 ई. तक शासन किया। 24 मार्च 1801 ई. को उसकी हत्या कर दी जाती है और उसका पुत्र अलेक्जेन्डर प्रथम के नाम से जार बना। 24 वर्ह्य की अवस्था थी। प्रज्ञावान, सरलता से प्रभावित होने वाला, सदाशयी, कल्पनाशील, अभिमानी व अव्यवहारिक आदर्शवादी उसे कहा गया। समकालीन राजनीतिज्ञ उसके चरित्र को समझ नहीं पाए। उसमें उदारतावाद तथा निरंकुशता की परस्पर विरोधी विचारधाराओं तथा धार्मिक रहस्यवाद के प्रभाव का आश्चर्यजनक मिश्रण था। कूटनीति क्षमता में वह मेटरनिख, कैसलरे एवं तेलेरां जैसे चतुर व अनुभवी व्यक्तियों के सम्मुख अपरिपक्व सिद्ध हुआ। (देवेन्द्र सिंह चौहान, यूरोप का इतिहास पृ. 4)

रूसी इतिहासकार जार्ज वर्नादस्की ने लिखा है - अलेक्जेन्डर प्रथम के संबंध में कहा जाता है कि वह सुई की भांति कुशाग्र, छूरे की भांति तीक्ष्ण और समुद्री फेन की भांति झूठा है। (रूस का इतिहास पृ. 180)

अलेक्जेन्डर प्रथम की गृहनीति

अलेक्जेन्डर प्रथम के सिंहासनारोहण का रूस में उत्साह व उल्लास से स्वागत हुआ। राजनैतिक पुलिस विभाग की अलोकप्रियता को देखते उसे बंद कर दिया गया, निर्वासित लोगों को क्षमादान किया गया। अपराध व अपराधियों के साथ अब दूसरे प्रकार का व्यवहार किया जाने लगा कृह्यक, दासों को छोड़ अन्य प्रजा को भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व का अधिकार दिया गया। केन्द्रीय शासन को सृदृढ़ बनाने के लिए आठ विभाग बनाये गए। आठ प्रमुख मंत्री इनके प्रमुख बनाए गए। युद्ध, नौसेना, विदेशी मामले, न्यायपालिका, गृह, वित्त, वाणिज्य, शिक्षा प्रमुख विभाग थे। प्रत्येक मंत्री जार के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी था।

रूस की सामान्य प्रजा को कोई राजनैतिक अधिकार प्राप्त न थे। लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव था। जार निरंकुश शासक था। जार के आदेश उकासेस कहलाते थे। ये कानून की तरह मान्य थे। अलेक्जेन्डर प्रथम पर उदारवाद एक नशा की भांति चढ़ता उतरता रहता था, वह कब उदारवादी और कब अनुदारवादी हो जाएगा नहीं कहा जा सकता था।

रूस में अनेक जाति के लोग रहते थे, अनेक भाह्यायें थी। फ्रांसीसी क्रान्ति के फलस्वरूप जातियों में राष्ट्रीय भावना पनपने लगी थी। रूसी लोगों को वे विदेशी मानते थे और रूसी शासन से, रूसी भाह्या से मुक्ति चाहते थे। जाति व भाह्या की समस्या से भी अलेक्जेन्डर को जूझना पड़ा।

दास प्रथा रूस की एक बड़ी समस्या थी। अलेक्जेन्डर प्रथमइस समस्या का समाधान चाहता था, मगर यह कुलीन वर्ग से जुड़ी समस्या थी। जार ने पुरस्कार के रूप में दासों का दिया जाना प्रतिबंधित किया। 14 मार्च 1803 ई. को एक आज्ञप्ति निकाली गई, दासों को मुक्त करना संपदा स्वामियों के विवेक पर छोड़ा गया। लगभग पचास हजार कृषक दास इस योजना के तहत मुक्त किये गए। कृह्यकों की मुक्ति या उन्हें कार्य भार से कुछ राहत देने के उद्देश्य से 1805 में आदेश निकाले गए। सप्ताह में मात्र 2 दिन दासों से काम लिया जा सकता था। अलेक्जेन्डर प्रथम प्रारंभ मे संवैधानिक शासन का समर्थक था, वह मानता था कि उसे रूस के लिए ही नहीं वरन यूरोप के लिए कार्य करना था। ‘‘राष्ट्रवादी उस पर राष्ट्रीय हितों के प्रति विश्वासघात या उपेक्षा का आरोप लगाते थे और रूसी सेना तथा राजनयिक सेवा में विदेशियों को प्रमुख स्थान दिए जाने पर आपत्ति उठाते थे। (रूस का इतिहास पृ. 180) 1811 से 1815 ई. तक रूस नेपोलियन जनित समस्या मे उलझा रहा। अलेक्जेन्डर प्रथम आंतरिक शासन की ओर ध्यान नहीं दे सका। 1815 ई. के पश्चात अलेक्जेन्डर की उदारवादी प्रवृत्ति पुन: जोर मारती है। वियना कांग्रेस मे वह यूरोप का सबसे अधिक उदारवादी शासक समझा जाता था।

सन 1815 में जब नेपोलियन की हार हो गई तब जार ने पुन: आंतरिक सुधारों की ओर ध्यान दिया। सन 1816 के आज्ञापत्र के द्वारा एस्टोनिया प्रांत मे कृह्यि दास प्रथा समाप्त की गई। सन 1817 मे दो और प्रांतों कूरलैण्ड तथा लिवोनिया में भी इसे लागू किया गया।

सन 1820 ई. में अलेक्जेन्डर की सेना मे एक मामूली सा विद्रोह हुआ, इससे वह इतना परेशान हो गया कि उदार विचारों का प्रचंड विरोधी बन गया, स्वतंत्रता और उदार विचारों को वह धर्म व्यवस्था व समाज का घोर शत्रु मानने लगा। यूरोप की भावना को कुचलने में वह मेटरनिख का प्रमुख सहायक बन गया।

नेपोलियन का रूस पर आक्रमण और अलेक्जेन्डर प्रथम

टिलसिट की संधि के द्वारा 1807 ई.में नेपोलियन व रूस के युद्ध की समाप्ति हुई थी। नेपोलियन ने उदार शर्तों पर संधि कर अलेक्जेन्डर को मित्रता के पाश में बांधने का प्रयास किया। यह संधि दीर्घजीवी नहीं रही। सन 1812 में नेपोलियन के रूस पर आक्रमण के साथ यह समाप्त हुई।

नेपोलियन ने रूस पर आक्रमण के लिए बड़ी तैयारी की थी। सैनिकों की संख्या 6 लाख थी, 1 हजार तोंपे थी, 1 लाख अश्वारोही थे, सभी प्रमुख सेनापति शामिल थे। प्रधान सेनापति स्वयं नेपोलियन था। “ऐसा लगता था कि संसार की कोई भी शक्ति विनाश के इस यंत्र का प्रतिरोध करने को असमर्थ होगी। नेपोलियन ने स्वयं इसे नाटक का अंतिम अंक कहा (सी. डी. हेजन, आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 168) नेपोलियन का मास्को अभियान अंतिम अंक तो नहीं मगर आश्चर्यजनक परिणाम वाला सिद्ध हो गया कि। स्पब् हो गया कि संख्या में सदैव ही शक्ति निवास नहÈ करती बल्कि कभी कभी वह दुर्बलता का भी कारण बन जाती है। नेपोलियन की विशाल (सैन्य) मशीन अपने ही भार से दबकर टूटने लगी।’’ (सी. डी. हेजन- पृ. 168) रूस पर नेपोलियन का आक्रमण, नेपोलियन की भूल के रूप मे इतिहास में स्थान प्राप्त है। यह उसके पतन का महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हुआ।

आक्रमण के कारण

महत्वाकांक्षाओंं की टकराहट - 

रूस का जार अलेक्जेन्डर प्रथम और फ्रांस का सम्राट नेपोलियन महान दोनों उच्च महात्वाकांक्षी थे। पूर्व की ओर प्रसार के अलेक्जेन्डर के प्रयासों को नेपोलियन ने रोका। “1812 ई. तक अलेक्जेन्डर यह विश्वास करने के लिए विवश हुआ कि यूरोप इतना बड़ा नहीं है कि उससे दो महात्वाकांक्षी सम्राटों की साम्राज्य लिप्सा शांत हो सके।” (डोनाल्ड राच)

अलेक्जेन्डर प्रथम का असंतोष - 

जार 1807 की अपनी पराजय को भूला नहीं था, धीरे धीरे उसे ज्ञात हो गया कि नेपोलियन से मित्रता उसके लिए लाभदायक नहीं है। इसी कारण उसने अपनी बहन कैथरीन की शादी नेपोलियन से नहÈ की।
नेपोलियन ने आस्ट्रिया की राजकुमारी मेरी लुईस से 1 अप्रेल 1810 ई. को शादी की तो अलेक्जेन्डर को लगा कि आस्ट्रिया को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

जार के बहनोई ओल्डन बर्ग के ड्यूक की डची (जागीर) नेपोलियन ने अपने साम्राज्य में मिला कर अलेक्जेन्डर प्रथम को असंतुब किया। आस्ट्रिया की राजकुमारी से शादी के समय से पेरिस की जनता में आम चर्चा होने लगी थी कि नेपोलियन रूस पर आक्रमण करने जा रहा है।

नवीन पोलैंड की स्थापना में सहायता देकर नेपोलियन ने अलेक्जेन्डर को अंसतुब् किया। जार को पता था कि रूसी साम्राज्य में लाखों की संख्या में पोल लगते रहते हैं, उनमें राष्ट्रीय भावना के उदय होने से रूस में अशांति फैल सकती थी। जार ने इसे नेपोलियन द्वारा दिए गए वचन का उल्लंघन माना कि यूरोप के मानचित्र मे पोलैण्ड का नाम फिर नहीं लिखा जाएगा।

टिलसिट की संधि द्वारा नेपोलियन ने पूर्वी यूरोप में अलेक्जेन्डर को प्रसार की छूट दी थी मगर टर्की की प्राप्ति और भारत पर आक्रमण मृगतृबणा है और नेपोलियन उसे विश्व साम्राज्य की कुंजी कस्तुनतुनिया नहीं लेने देगा। यह जानकर जार असंतुब् हुआ ।

इतिहासकार हेजन के अनुसार “अलेक्जेन्डर तथा जार के बीच कटुता तथा तनाव का सबसे बड़ा कारण महाद्वीपीय व्यवस्था थी। इससे रूस को भारी आर्थिक हानि हो रही थी। इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इससे उत्पन्न असुविधाएं दिखने लगी थी। नेपोलियन ने रूस को अपने आदेशानुसार चलने के लिए बाध्य करने का संकल्प किया। जार इसके लिए तैयार न था।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 168)

नेपोलियन का असंतोष

रूस ने जब महाद्वीपीय व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए इंग्लैंड के साथ व्यापार करने वाले तटस्थ देशों के समुद्री जहाजों को अपने बंदरगाहों में सुविधा देना जारी रखा, तब नेपोलियन के क्रोध की सीमा न रही। टिलसिट की उदार संधि उसने इसलिए की थी जिससे फ्रांस के प्रमुख शत्रु इग्लैण्ड को हराने में रूस सहायक बने।

नेपोलियन यूरोप के मामलों में रूस की दखलअंदाजी से भी असंतुब था। यूरोप पर वह एकाधिकार चाहता था। रूस ने जब यूरोपीय ताकत के रूप में उभरने का प्रयास किया तब नेपोलियन ने इसे अपने लिए चुनौती समझा। रूस को यूरोप से निकाल बाहर करने के लिए उसे परास्त करना आवश्यक था। उसने स्वंय कहा था ‘‘एरफुर्ट (1808 की संधि) के समय से अलेक्जेन्डर आपे से बाहर हो गया है। फिनलैंड की प्राप्ति से उसका सिर फिर गया है। यदि उसे विजयों की आकांक्षा है तो ईरानियों से युद्ध करना चाहिए, यूरोप में हस्तक्षेप नहीं। सभ्यता इन उत्तर वासियों (रूस) को अस्वीकार करती है यूरोप अपने मामलों की देखभाल उसके बगैर भी कर सकता है।

अलेक्जेन्डर, नेपोलियन से जिन मामलों में असंतुब् था उनमें से कुछ नेपोलियन के असंतोह्य के भी कारण थे। बढ़ता असंतोह्य युद्ध का कारण था। एक म्यान मे एक ही तलवार रह सकती थी, यूरोप में एक की ही तूती बोलेगी। नेपोलियन अपना डंका बजाने के लिए कटिबद्ध था।

रूस की जनता का फ्रांस विरोधी होना -

रूस की जनता, फ्रांस की जनता के लिए मित्रता के भाव नहीं रखती थी। नापसंदगी, शत्रुता की श्रेणी तक बढ़ चुकी थी। रूस स्थित फ्रांसीसी राजदूत भी इस तथ्य से परिचित था। उसने लिखा - “यदि रूस की जनता, फ्रांस को अपना मित्र समझे तो यह उनके लिए धर्म परिवर्तन की तरह होगा। यही कारण है कि नेपोलियन के मास्को अभियान के दौरान रूस की जनता ने अपने जार के सभी आदेशों का अक्षरश: पालन किया, सभी प्रकार की परेशानी झेलकर भी नेपोलियन के सामने घुटने नहीं टेके।”

नेपोलियन का रूस पर आक्रमण -

नेपोलियन को उसके सलाहकारों ने रूस पर आक्रमण से होने वाली समस्याओं से अवगत कराया, मगर नेपोलियन समस्याओं को तलवार के बल पर हल करने का पक्षधर था। विशाल रूस पर आक्रमण के लिए महान सेना तैयार की गई। वीरों में सर्वाधिक वीर मार्शर्लर्लल ने भी सेना में था। रूसियों ने इस सेना को 20 राष्ट्र नें की सेना कहकर पुकारा। उसमें लगभग आधे फ्रांसीसी थे, शेह्य में इटली, डेनमार्क, पोलैण्ड, हॉलैण्ड आदि देशों के लोग थे। जार ने इस सेना का सामना करने के लिए पौने दो लाख की सेना एकत्र की। रूसी सेना-नायकों को खुले युद्ध से बचने की स्पब् समझाइश दी गई थी।

बोरोडिना का युद्ध (7 सितंबर 1812 ई.) -

फ्रांसीसी सेना आगे बढ़ती गई। वह लड़ने को उतावली थी मगर रूस की सेना व जनता लड़ना नहीं चाहती थी। “रूसियों ने ड्यूक आफ वेलिंगटन के उन तरीकों का अध्ययन किया था, जिनका प्रयोग उसने पुर्तगाल में किया था। इससे उसे बड़ा लाभ हुआ था। (हेजन- पृ. 169) अपने ही देश को उजाड़ते हुए पीछे हटने की नीति पर जार और उसकी जनता चल रही थी।’’ मास्को अभियान ने यह अच्छी तरह प्रकट कर दिया कि जिस देश में राजा और प्रजा, शासक और शासित में एकता व सहयोग हो उसे शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी अधीन नहीं कर सकता। (भटनागर व गुप्त, अर्वाचीन यूरोप पृ. 216)

लड़ने के लिए बेताब फ्रांसीसी सेना के सामने रूसी सेना नहीं थी। योजनाबद्ध ढंग से रूसी सैनिक, किसान, श्रमिक व प्रजा अपने ही खेत खलिहान, नदी, तालाब को जलाते, नब् करते पीछे हट रही थी। नेपोलियन के सैनिक व घोड़ों को खाने पीने की सामग्री नहीं मिल रही थी। नीमेन नदी को पार कर रूस की सीमा में घुसे नेपोलियन की रसद व्यवस्था पांचवे दिन ही छिन्न भिन्न होने लगी। जार ने यह घोह्यणा की कि यदि आवश्यक हुआ तो वह पीछे हटते हटते एशिया की भूमि में चला जावेगा मगर रूस की पवित्र भूमि पर शत्रु से संधि पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करेगा।

रूस ने लगातार हटने के स्थान पर एक लड़ाई लड़ने का निश्चय किया। रूसी सेनापति फील्ड मार्शल माइकेल कुतुजोव को यह जिम्मेदारी सौपी गई, 7 सितंबर 1812 ई. को बोरोडिना का युद्ध हुआ। 1,25000 फ्रांसीसी सैनिकों का सामना 1 लाख रूसी सैनिकों ने किया। हेजन के अनुसार “बोरोडिना की लड़ाई की गणना उस युग के सर्वाधिक संहारकारी युद्धों में होती है। फ्रांसीसियों को 30 हजार और रूसियों को 40 हजार सैनिकों की हानि उठानी पड़ी। नेपोलियन की विजय तो हुई, मगर वह शत्रु सेना को पूरी तरह कुचल न सका। इसका कारण संभवत: यह था कि वह अपने पुराने, अनुभवी योद्धाओं को संग्राम में नहीं झोंक पाया।” (यूरोप का इतिहास- पृ. 169)

जार्ज बर्नादस्की ने लिखा - “मास्को की ओर नेपोलियन का अभियान सामरिक दृष्टि से उत्कृष्ट था किंतु बोरोडिना का महान युद्ध बराबरी का रहा और रूसी प्रधान सेनापति फील्ड मार्शल माइकेल कुतुजोव के सामरिक कौशल और विवेक के कारण नेपोलियन, रूसी सेना को नष्ट न कर सका।” (रूस का इतिहास पृ. 186)

उजड़े भूभाग, जले अधजले भवनों, खेत खलिहानों को पार करता नेपोलियन 14 सितम्बर को मास्को पहुंचा मगर वह भी एक जलता हुआ नगर था, उजड़ा नगर था। रूसियों ने आत्म समर्पण नहीं किया, मास्को छोड़कर चले गए। 700 मील का कष्टपूर्ण सफर और वीरान मास्को की प्राप्ति, हाय रे नेपोलियन की किस्मत।

“शत्रु नेपोलियन द्वारा अधिकृत शहर मास्को, एक लुटी हुई औरत के समान था।” - कैटलवे दो माह तक नेपोलियन इस आशा के साथ क्रेमलिन के राजप्रसाद में रहा कि जार संधि करेगा। मास्को से बैरंग लौटना महाद्वीप में नेपोलियन की प्रतिष्ठा का धूल धूसरित होना था। “नेपोलियन के युद्ध संबंधी अनुभवों में इस प्रकार का दृढ़ सत्याग्रह नई बात थी, उसने दो-तीन उच्च पदस्थ रूसी बंदियों को स्वयं जार के पास भेजा कि वे उसकी मित्रता का आश्वासन देकर संधि की बात प्रारंभ करने का आग्रह करें किंतु उसे सफलता नहीं मिली।” (भटनागर एवं गुप्त अर्वाचीन यूरोप- पृ. 216)

कई सप्ताह अनिश्चितता में बीते, संधि के लिए कोई नहीं आया। 18 अक्टूबर 1812 को जब बर्फ गिरने की संभावना बढ़ गई तब उसने सेना को मास्को से लौटने का आदेश दिया। रूस की भयंकर सर्दी, अन्न का अभाव, चारे का अभाव, पीने के पानी का अभाव, रूसियों का गोरिल्ला युद्ध - हर तरह से, हर तरफ से नेपोलियन की सेना को मरना था। 13 दिस. 1812 को 6 लाख सैनिकों में से मात्र 20 हजार बच कर रूसी सीमा से बाहर निकल पाए, शेष मर गए।

इतिहासकार हेजन ने लिखा है - “मास्को से नेपोलियन की वापसी, इतिहास की बहुत भयावह उपकथा है।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास पृ. 223) कैटलवे ने इसे नेपोलियन के पतन का पहला अंक लिखा है। नेपोलियन के सेनापति मार्शर्लर्लल ने अपनी पत्नी को सूचित करता है - “रूसियों की गोलियों की अपेक्षा सामान्य अकाल तथा सामान्य शीत ने विशाल (नेपोलियन की) सेना पर विजय प्राप्त की।”
नेपोलियन के पतन मेंं जार अलेक्जेन्डर की भूूिमिका नेपोलियन के असफल रूस अभियान ने उसकी कमर तोड़ दी। महान सेना की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। इतना होने पर भी अलेक्जेन्डर ने नेपोलियन को नहीं छोड़ा। “अगले संघर्ष का श्रेय अलेक्जेन्डर के व्यक्तिगत उपक्रम को ही दिया जाना चाहिए। वह नेपोलियन के विरुद्ध यूरोपीय सम्मेलन का प्रेरक और समस्त सैनिक गतिविधियों का प्रमुख प्रबंधक था।” (जार्ज वर्नादस्की, रूस का इतिहास- पृ. 187)

आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख के रूप में उसे एक हमराही मिला था। नेपोलियन की महत्वाकांक्षा से आस्ट्रिया की रक्षा उसने की। क्रान्ति-पुत्र नेपोलियन को पराजित करने में जार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेपोलियन का पतन सब चाहते थे मगर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? जार ने यह गुरुतर भार संभाला। मुक्ति-युद्ध का शंखनाद जार ने किया। प्रशा के सेनापति ने उसका साथ दिया। 10 अगस्त 1813 ई. तक प्रशा के अलावा आस्ट्रिया व इंग्लैण्ड भी उसके हमराही बने। मित्रराष्ट्रों की संयुक्त सेना नेपोलियन को परास्त करने आगे बढ़ी लाइपजिंग के युद्ध में नेपोलियन परास्त हुआ। 31 मार्च 1814 को मित्रराष्ट्रों की सेना पेरिस में प्रवेश कर गई। 18 जून 1815 ई को वाटरलू के विश्वप्रसिद्ध युद्ध में नेपोलियन की अंतिम पराजय हुई। नेपोलियन ने आत्मसमर्पण कर दिया।

इस प्रकार रूसी जार अलेक्जेन्डर प्रथम ने नेपोलियन से अपनी 1807 की हार का और 1812 के मास्को-अभियान का बदला ले लिया। जार की यह उपलब्धि महत्वपूर्ण थी। इसी कारण यूरोप की शांति के लिए बुलाई गई कान्फ्रेंस में जार को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।

जार अलेक्जेन्डर और वियना कांग्रेस 

“रूस की बर्फ ने नेपोलियन की कमर तोड़ दी। वेलिंगटन की सामरिक प्रतिभा ने उसको पूर्णत: पराजित कर दिया। नेपोलियन के निष्कासन से यूरोप में शांति हो गई। जब सेना अपना कर्तव्य पूरा कर चुकी तब राजनयिकों ने अपना कार्य आरंभ किया।” (जे.ए.आर. मैरियट, वाटरलू के पश्चात इंग्लैण्ड- पृ. 3) आस्ट्रिया की राजधानी वियना में यूरोप के प्रमुखों की बैठक आयोजित की गई। सन 1648 ई में वेस्टफेलिया के यूरोपीय सम्मेलन के बाद यूरोपीय समस्या पर विचार करने के लिए इतना बड़ा सम्मेलन यूरोप में हो रहा था। वियना सम्मेलन में शामिल एक बड़े नेता ने लिखा है - “इस समय वियना के नगर का दृश्य अत्यधिक आकर्षक और प्रभावशाली है। यूरोप के सभी विशिष्ट पुरुषों का बड़े शानदार ढंग से प्रतिनिधित्व हो रहा है।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 178) आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख की अध्यक्षता में बैठक हुई। आस्ट्रिया सरकार ने 8 लाख पौंड अतिथियों के स्वागत व खानपान में खर्च किए। टर्की को छोड़ यूरोप के सभी शासक या उनके प्रतिनिधि उपस्थित हुए। ब्रिटेन, आस्ट्रिया, रूस और प्रशा को प्रमुख स्थान दिया गया। जार को महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना था। ‘मुक्तिदाताओं का मुक्तिदाता’ वह स्वयं को कहता था। जार के पास जितनी बड़ी सुसज्जित सेना थी वैसी सेना तत्कालीन यूरोपीय राज्य के किसी भी प्रमुख के पास न थी। जार के शब्द विशेष वजन रखते थे। उसके प्रस्तावों की अवहेलना करना साधारण बात न थी। यूरोप के मामले में उसकी निर्णायक स्थिति हो गई।

जार शक्तिशाली था, प्रशा का उसे साथ था मगर राजनीति व कूटनीति में उसका पाला घाघ लोगों से पड़ा था। आस्ट्रिया का मेटरनिख, इंग्लैण्ड का कैसलरे, फ्रांस का तेलेरां जैसे चतुर एवं अनुभवी व्यक्तियों ने जार की उतनी नहीं चलने दी, जितनी वह चाहता था। सभी बड़े राजनेता जार से भयभीत भी रहते थे। ब्रिटिश विदेशमंत्री ने प्रधानमंत्री को लिखा - “वियना कांग्रेस में सबसे बड़ा खतरा तो जार है जिसे पेरिस से बहुत लगाव है। अपने देश में निरंकुश शासन के विपरीत वियना कांग्रेस में वह उदारता और सहिष्णुता की नीति बरत कर वह अपने को तुष्ट और दूसरों को प्रभावित करना चाहता है।”

प्रशा का शासक फ्रेडरिक विलियम तृतीय अपने मित्र जार से बहुत प्रभावित था, नेपोलियन के विरूद्ध जार ने ही उसे पूरा सहयोग दिया था। रूस का जार, नेपोलियन को पराजित करने की कीमत चाहता था, अधिक से अधिक राज्य विस्तार करना चाहता था। अस्ट्रिया व ब्रिटेन उसका विरोध करते थे, संपूर्ण पोलैण्ड इसी विरोध के चलते रूस को नहीं मिला। शक्ति संतुलन के सिद्धांत पर चलते, रूस को अपरिमित शक्ति, यूरोपीय राष्ट्र नहीं देना चाह रहे थे। हेजन के अनुसार¦”रूस और प्रशा ने एक दूसरे के दावों का समर्थन किया परन्तु आस्ट्रिया, फ्रांस और इंग्लैंड ने उनका तीव्र विरोध किया और अंत में उत्तर के इन दो राष्ट्रों की महत्वाकांक्षा को रोकने के लिए युद्ध लड़ने के लिये तैयार हो गये।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 179)

पोलैंड में स्थित पोसेन के गैलिशिया के भाग को छोड़कर शेष डची आफ वारसा, रूस को दिया गया। अधिकांश भाग मिला मगर संपूर्ण पोलैंड नहीं मिला। हेजन के अनुसार “अब रूस की सीमाएं यूरोप में पश्चिम की ओर काफी दूर तक फैल गई और अब वह यूरोप के मामलों में अधिक महत्व के साथ बोल सकता था।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 179) वियना कांग्रेस के शासकों ने जातियों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया, शक्ति संतुलन के चलते उन्होंने ऐसी व्यवस्था की जो वास्तव में कोई व्यवस्था न थी। “सन 1815 से अब तक यूरोप का इतिहास वियना सम्मेलन की भारी भूलों को अकृत करने का इतिहास है। (हेजन- आधुनिक यूरोप का इतिहास पृ.181) जनता की इच्छा अनिच्छा पर विचार न करने के कारण” वियना कांग्रेस की कटु आलोचना हुई। उसे पशुओं का वार्षिक मेला कहा गया। विजित प्रदेशों की लूट मची हुई थी और जिसको जो अच्छा लग रहा था वही ले लेता था।

”वियना कांग्रेस की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होने चालीस वर्षों तक यूरोप को युद्ध से दूर रखा।” - (ग्रान्ट एवं टेम्परले, उन्नीसवी एवं बीसवी शताब्दी का यूरोप- पृ.153।’’) इतिहासकार मैरियट के अनुसार-”यद्यपि कांग्रेस के कार्य प्रतिक्रियावादी थे परन्तु इससे एक पुराने युग की समाप्ति और नये युग का प्रारंभ होता है।” एक पीढ़ी से अधिक समय तक किसी भयंकर युद्ध ने यूरोप की शांति भंग नहीं की।

पवित्र संघ 

वियना में जिन दिनों यूरोपीय राज्य, यूरोपीय राष्ट्रों की सीमायें तय करने में लगे थे, रूस का जार अलेक्जेन्डर प्रथम एक ऐसा स्वप्न देख रहा था, जिसमें यूरोप के राष्ट्र प्रेम और बन्धुत्व के बंधन में बंधे रहें। यूरोपीय शांति की दिशा में यह महत्वपूर्ण था। दुर्भाग्यवश यूरोप के राष्ट्र जार को और उसकी योजना को समझ नहीं पाए और मन, वचन, कर्म से इस पवित्र संघ से नहीं जुड़े।

पवित्र संघ का जन्म अंतर्राष्ट्रीय संबधों को अधिक संतोषजनक आधार प्रदान करने के प्रशंसनीय आकांक्षा के फलस्वरूप हुआ था। बहुत कम कूटनीतिक कार्यों को इतने मजाक और घृणा का सामना करना पड़ा है, जितना इस पवित्र संघ को करना पड़ा। यह घृणा और मजाक पूर्णरूप से न्याय संगत नहीं था। इसका जनक रूस का जार अलेक्जेंडर प्रथम चतुरता तथा रहस्यवाद और उच्च आदर्शों तथा सुनियोजित महत्वाकांक्षाओं का विचित्र मिश्रण था । (मैरियट- पृ.51)

26 सितंबर 1815 ई. को रूस, प्रशा और अस्ट्रिया के सम्राटों ने पवित्र संघ में सम्मिलित होने विषयक संधि पर हस्ताक्षर किये। बाइबिल के उन शब्दों के प्रति यह निष्ठा थी जो “सब मनुष्यों को भाई चारे से रहने की, हमेशा एक दूसरे की सहायता करने की आपस में भाईचारे के सच्चे और अटूट प्रेम के धागे से बंधे रहकर एकता बनाए रखने की आज्ञा देते हैं।” बाद में फ्रांस, स्पेन और सिसली के राजा इस संघ में शामिल हुए। मेटरनिख इसे - “एक तिरस्कृत और व्यर्थ का शोर मचाने वाली चीज मानकर इससे अलग रहा।” ब्रिटेन का राजा पागल हो गया था, अत: उसका हस्ताक्षर अर्थहीन था। टर्की का सुलतान गैर ईसाई था अत: उसे अलग रखा गया। पोप इसे गैर पादरी लोगों द्वारा धार्मिक विचार का प्रचार मानकर अलग रहा।

पवित्र संघ का विचार, अच्छा विचार था, इससे यूरोप में शांति स्थापित होती मगर जार को हृदय से साथ देने वालों की कमी थी। “सन 1818 के आते आते पवित्र संघ का एक ही उद्देश्य रह गया था, समय समय पर उसकी बैठक होती थी। जो कि राज्यों के मामलों में दखल देती थी और हमेशा निरंकुशता और प्रतिक्रियावाद का पक्ष लेती थी।”¦(वाटरलू के पश्चात इंग्लैंड- पृ.188)

“प्राचीन विचारधारा के अनेक राजनयिकों की दृष्टि में पवित्र संघ या तो आदर्शवादी बकवास प्रलाप थी या रूस के साम्राज्यवादी अभिप्रायों के छिपाने की कोशिश थी।” (रूस का इतिहास, जार्ज वर्नादस्की पृ.188)

जार के बढ़ते प्रभाव के कारण किसी ने उसकी योजना का विरोध नहीं किया मगर उसे आगे भी नहीं बढ़ाया। 1825 ई. में जार की मृत्यु के साथ पवित्र संघ समाप्त हो गया। गेटे ने पवित्र संघ की प्रशंसा करते लिखा - “इससे अच्छी और उपयोगी योजना मनुष्य मात्र के लिए नहीं बनी।”

हेजन के अनुसार - “जहां तक विचारों का प्रश्न है पवित्र संघ में कोई दोष नहीं था। पवित्र संघ की असफलता का संबध जार से नहीं वरन उन लोगों से था जिन्होंने पवित्र संघ के तत्वों को ठीक से नहीं समझा या उसका अनुशीलन नहीं किया। भविष्य में पवित्र संघ के विचार धाराओं ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों को प्रेरणा दी।’’

चतुर्मुखी राष्ट्र संघ -

यूरोप में शांति बनी रहे इसके लिए यूरोपीय राष्ट्र व्यग्र थे। मेटरनिख ने इस निमित्त एक योजना रखी जिसे आस्ट्रिया के अलावा ब्रिटेन, रूस और प्रशा ने स्वीकार किया। 20 नबम्वर 1815 को चतुर्मुखी राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया । यूरोप की संयुक्त व्यवस्था के नाम से यह चर्चित रही।

संधि की शर्तें -

  1. चारों राष्ट्र वियना कांग्रेस के निर्णयों का पालन करेंगे।
  2. यूरोप की शांति को बनाए रखेंगे।
  3. यूरोप के राज्यों मे पारस्परिक सहयोग बढ़ाने, पारस्परिक मतभेदों और समस्याओं को दूर करने के लिए समय समय पर सम्मेलन करेंगे।
  4. क्रांति के विचारों को सामूहिक रूप से रोकेंगे। नेपोलियन तथा उसके वंशजो को फ्रांस के सिंहासन पर नहीं बैठने देगें।
1815 से 1822 ई तक यह संयुक्त व्यवस्था बनी रही। इंग्लैंड का विदेश मंत्री कैसलरे इसका पक्का समर्थक था। यूरोप की समस्याओं को सुलझाने के लिए इस बीच अनेक सम्मेलन हुए, इसलिए इस काल को “सम्मेलनों का काल” कहा गया है।

अक्टूबर 1818 ई. को पहला सम्मेलन जर्मनी के नगर एक्सलाशापेल में हुआ। फ्रांस की मांग पर उसे संघ में शामिल किया गया। अब यह पंचमुखी संघ बन गया। स्वीडन के राजा से संधि शर्तों को पूरा करने कहा गया। हेस्से के इलेक्टर को राजा की उपाधि नहीं दी गई। मोनेको के शासक को शासन प्रबंध सुधारने कहा गया। बेंडन के उत्तराधिकारी की समस्या सुलझाई गई, स्पेन के राजा को उपनिवेशों की समस्या के लिए सहायता नहीं दी गई। मेटरनिख ने इस सम्मेलन की प्रशंसा करते लिखा - “मैंने अपने जीवन में ऐसा सुन्दर सम्मेलन नहीं देखा।” कैसलरे के अनुसार - “हमें किसी भी देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।” रूस का जार अलेक्जेन्डर इस सम्मेलन में शामिल था। वह स्पेन के उपनिवेशों के विरुद्ध स्पेन की सहायता के लिए रूसी सेना भेजना चाहता था मगर संघ के निर्णयों को उसे मानना पड़ा।

ट्रोपो सम्मेलन 1820 ई. -

- जुलाई 1820 ई. को नेपल्स में क्रान्ति हो गई। मेटरनिख नेपल्स के विद्रोह को सेना भेजकर दबाना चाहता था। इस समस्या पर विचार के लिए ट्रोपो में सम्मेलन हुआ। रूस का जार इस समय तक कट्टर प्रतिक्रियावादी बन गया था, मेटरनिख के पूर्ण प्रभाव में आ चुका था। 19 नबम्वर 1820 ई. को अस्ट्रिया, प्रशा और रूस ने एक पूर्व लेख पर हस्ताक्षर किए। यह घोषणा की गई कि क्रान्ति के कारण जिन राज्यों का शासन बदल गया है और वे अन्य राज्यों के लिए संकट का कारण बन गये हैं, ऐसी स्थिति में बड़े राज्यों को शांति या युद्ध के द्वारा अपराधी राज्य को ठीक करने का अधिकार होगा। आस्ट्रिया ने 80 हजार सैनिक भेजकर नेपल्स का विद्रोह दबा दिया। फर्डिनेण्ड दुबारा राजा बनाया गया।

सेंंट पीटसबर्ग सम्मेलन 1824 ई. -

1821 ई. में यूनान ने टर्की के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जार विद्रोह विरोधी था लेकिन परंपरागत शत्रु टर्की के विरुद्ध यूनान का समर्थन करना चाहता था। सेंट पीट्सबर्ग में इस समस्या को निपटाने सम्मेलन हुआ। यह असफल रहा। टर्की के सुल्तन को एक प्रभावहीन संयुक्त पत्र 13 मार्च 1824 को दिया गया। यूनान व टर्की के मध्य मध्यस्थता का यह प्रस्ताव था जो माना नहीं गया। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का यह अंतिम प्रयास था।

रूस के जार अलेक्जेन्डर प्रथम का आकस्मिक रूप से 1 दिसम्बर सन 1825 ई. को तगानरोग नामक स्थान पर निधन हो गया। 48 वर्ष की अवस्था थी लेकिन मृत्यु पर किसका वश चलता है। उसने नेपेालियन महान के विरुद्ध युद्ध करके यूरोप में अपनी व अपने देश की प्रतिष्ठा बढ़ाई। सुधारों के द्वारा वह रूस को विकास की ओर अग्रसर करना चाह रहा था मगर यु़द्धों में उलझने के कारण सुधार कार्य बाधित हुए। मेटरनिख के प्रभाव में आकर वह सुधार व क्रान्ति का विरोधी हो गया, प्रतिक्रियावादी हो गया। अपने 25 वर्ष के शासनकाल में अलेक्जेंडर प्रथम ने रूस को यूरोप का एक प्रमुख राष्ट्र बना दिया। सभी महत्वपूर्ण मामलों में रूस की पूछ परख होने लगी। अपने को सही ढंग से व्यक्त न कर पाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अपने शासनकाल के उत्तरार्ध में वह यूरोपीय राजनीति व वैदेशिक मामलों में इतना उलझ गया कि रूस में सुधार व विकास के कार्य धीमी गति से हुये। आंतरिक शासन का पूरा भार अपने जनरल अलेक्सिस अराक्चीव को सौंप दिया। रूस के इतिहास में जार अलेक्जेन्डर प्रथम एक महत्वपूर्ण शासक था।

जार निकोलस प्रथम-1825 ई. से 1855 ई. जार अलेक्जेंडर प्रथम की कोई संतान नहीं थी। मृत्यु से पूर्व उसने अपने भाई निकोलस प्रथम को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 1 दिसम्बर को अलेक्जेन्डर प्रथम की मृत्यु हुई और 26 दिसम्बर 1825 ई को निकोलस प्रथम जार बना। अपने भाई से भिन्न व्यक्तित्व का व्यक्ति था, दृढ़ प्रतिज्ञ व कार्यपटु था, निरंकुशता का अवतार था। प्रांरभ से ही सैनिक वातावरण में रहने के कारण वह राजनीतिक पद्धति, व्यवहार कुशलता, कूटनीतिक वार्तालाप से अनभिज्ञ था। सुधारों का वह घोर विरोधी था और अगर कोई सुधारों की मांग के लिए समूह आंदोलन करे यह सहन नहीं कर सकता था। स्वयं को ईश्वर द्वारा राजा बनाया गया मानता था। अपने तीस वर्षीय शासनकाल में वह सदैव निरंकुशता व रूढ़िवादिता का प्रबल समर्थक था।

दिसम्बर वादियों का विद्रोह -

जार निकोलस प्रथम को सिंहासनारोहण के साथ ही विद्रोह का सामना करना पड़ा। दिसम्बर के माह में हुए विद्रोह के कारण इसे दिसम्बर वादियों का विद्रोह कहा जाता है। रूस के उदारवादी निकोलस को नापंसद करते थे और उसके स्थान पर उसके बड़े भाई कान्स्टेंटाइन को जार बनाना चाहते थे। जार ने विद्रोह में शामिल नेताओं को कड़ा दंड दिया। पांच बड़े नेता फाँसी पर लटका दिए गए। ऐसे ही एक नेता पाल पेस्टल ने मृत्यु से पूर्व कहा था - “मैंने बीज बोने से पूर्व ही फसल काटने की कोशिश की, मैं जानता था कि मुझे अपने जीवन का बलिदान देना पड़ेगा, परन्तु भविष्य में फसल काटने का समय अवश्य आयेगा।” दिसम्बर वादियों का विद्रोह व्यर्थ नहीं गया, नेताओं के बलिदान ने रंग दिखाया। जार ने भी जान लिया कि रूसियों की प्रमुख मांगों की अवहेलना नहीं की जा सकती। सुधारों के संदर्भ में जार सबसे पहले यही पता लगाता था कि दिसम्बर वादियों के असंतोष के क्या कारण थे। उन कारणों को दूर करने का प्रयास जार ने किया। दमन, अत्याचार, निरंकुशता के मध्य सुधार के कुछ कार्य किए गये। मैरियट के अनुसार - ‘‘निकोलस बिलकुल भिन्न प्रकृति और स्वभाव का व्यक्ति था उसमें न तो अलेक्जेन्डर जैसा पश्चिमी प्रभाव तथा आडम्बर था और न उस जैसा रहस्यवाद और विचार थे। वह पक्का रूसी था। (वाटरलू के पश्चात इंग्लेण्ड- पृ.70)

निकोलस प्रथम की गृह नीति 

निकोलस ने अपने शासन काल मे केन्द्रीयकरण और रूसीकरण की नीति अपनाई। उदारवादियों व क्रान्तिकारियों के दमन के लिए पुलिस और गुप्तचर विभाग को मजबूत किया। गुप्तचरों का जाल फैलाया गया, संदिग्ध गतिविधियों में लगे लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश था। प्रो. लिप्सन के अनुसार “रूसी गुप्तचर संस्था स्पेन के इक्वीजिशन से बढ़कर शायद न हो लेकिन उसके बराबर तो थी।” (यूरोप इन नाइटिंथ एंड ट्वेन्थीथ सेंचुरी- पृ. 87) 1832 से 1852 ई. के मध्य विद्रोही स्वभाव के डेढ़ लाख रूसी देश से निष्कासित किए गये। गणतंत्रवादियों से रूस को बचाने लिए यह करना जाार के लिए आवश्यक था।

प्रगतिशील विचारों के रूस में प्रवेश को रोका गया। सीमा पर चौकियाँ बढ़ाई गई। पश्चिमी राजनीतिक व दार्शनिक साहित्य रूस में प्रवेश नहीं कर सकता था। सरकारी अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं हो सकती थी। समाचार पत्रों पर सेंसर लगाया गया।

विधि संहिता का संकलन

निकोलस प्रथम की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में विधि संहिता का संकलन को प्रस्तुत किया जाता है। दिसम्बर वादियों के असफल विद्रोह ने जार को महसूस कराया कि विद्यमान प्रशासन में कुछ न कुछ खामियां हैं, जिन्हें दूर करना है। दिसम्बर वादियों की दृष्टि में रूस में विधियों की किसी पद्धति का न होना एक दोष था। इस दोष के कारण रूसी न्यायालयों की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठता था।

जार निकोलस ने विधियों के संग्रह के लिए एक समिति का गठन किया। महान राज मर्मज्ञ व विधि के नेता स्पेशन्स्की को यह कार्य सौंपा गया। जार अलेक्सिस की सन 1649 की संहिता से लेकर निकोलस प्रथम के राज्याभिषेक तक की अवधि तक के विधियों का संग्रह किया गया 42 खंडों में इसे प्रकाशित किया गया। सन 1832 ई में एक व्यवस्थित रूसी साम्राज्य विधि संहिता प्रकाशित की गई। जार्ज वर्नादस्की ने लिखा है - “इस प्रकार विधियों के संहिता करण का कार्य, जो न तो कैथरीन द्वितीय और न अलेक्जेन्डर प्रथम द्वारा ही पूरा किया जा सका था, निकोलस प्रथम के शासनकाल में पूरा हुआ।” (रूस का इतिहास पृ.196) इस प्रकार के संहिता करण से भविष्य में न्यायिक सुधारों के लिए ठोस पृष्ठभूमि निर्मित हो गई। निकोलस प्रथम यदि न्याय पालिका के अन्य दोषों के दूर करने का प्रयास करता तो उसे और प्रसिद्धि मिलती।

कृषि दासों व कृषकों की दशा सुधारने के प्रयत्न -

दिसम्बरवादियों से पूछताछ करने पर यह पता चला कि रूसी जीवन में कृषक दास प्रथा का गंभीर दोष है। जार अलेक्जेन्डर प्रथम ने इस दिशा में कार्य प्रांरभ किया था। निकोलस यह मानता था कि कुलीनवर्ग के विरुद्ध संघर्ष में कृषक एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। कृषक दास प्रथा को सीमित करने के लिए निकोलस ने अनेक सुधार किए। भूमि से संबधित कृषकों संबधी विधि का 1842 ई में घोषणा की गई। यह अपेक्षा की गई कि भू-स्वामी कृषकों के कर्तव्य निर्धारित करें। दुर्भाग्यवश यह अनिवार्य नहीं किया गया। रूस के जिलों में ही कृषक दास श्रमिकों के संबध में उत्तरदायित्व निश्चित करने का प्रयास किया गया। निकोलस प्रथम कृषक दासों की दशा सुधारने के संबध में अगला कदम उठाने वाला था, मगर पूरी सफलता नहीं मिली क्योंकि कुलीन वर्ग कृषक दासों के शोषण की व्यवस्था को बदलना नहीं चाहते थे। 1833 ई. में कृषक दासों को बेचा जाना प्रतिबंधित कर दिया गया। जार की हजारों एकड़ की जमीन पर कार्य करने कृषकों की दशा सुधार के लिए कांउट किसलेव की अध्यक्षता में एक विभाग बनाया गया। कृषकों की दश में सुधार नहीं हुआ। इसका प्रतिफल किसानों के विद्रोह के रूप में जार को भुगतना पड़ा।

आर्थिक सुधार -

दिसम्बरवादियों ने रूसी शासन व्यवस्था में जो दोष बतलाये उनमें से एक वित्त व्यवस्था संबंधी संभ्रांति भी थी। पूर्ववर्ती जार अलेक्जेन्डर प्रथम के दीर्धकालीन युद्धों के फलस्वरूप रूबल का अवमूल्यन हुआ थां वित्त मंत्री के रूप में क्रान्किन ने कागजी मुद्रा का मूल्य 3.5:1 पर स्थिर कर दिया। इसके पश्चात नई कागजी मुद्रा प्रारंभ की गई जो स्वर्ण संचिति द्वारा समर्थित थी। जार निकोलस रूसी उद्योगों को बढ़ाना चाहता था। वित्त मंत्री ने इस दिशा में कार्यवाही की। 1853 ई तक रूस का विदेश व्यापार पिछले वर्षो की तुलना में दुगुना हो गया। रेल लाइनों का निर्माण रूस में किया गया। वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। मशीनों का प्रयोग विभिन्न उद्योगों में जिस गति से बढ़नी थी वैसी बढ़ी नहीं।

साहित्य, शिक्षा क्षेत्र में प्रगति -

निकोलस रूसवादी था। अत: रूसी साहित्य के संवर्धन के लिए उसने प्रयास किया। पुश्कीन, गोगोल, लार्मान्तान, दोस्तविस्की, तुर्गनेव आदि प्रसिद्ध रूसी लेखक हुए। साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई। शिक्षामंत्री काउंट उवरोव ने रूसी भाषा में इतिहास, भूगोल व पुरातत्व के मौलिक ग्रंथों का प्रकाशन कराया। सरकारी प्राध्यापक ही देश के विश्वविद्यालयों में अध्यापन के लिए नियुक्त किए गये।

निकोलस की विदेश नीति -

यूरोप मे तुर्की मुस्लिम राष्ट्र था। सन 1453 ई में मोहम्मद द्वितीय ने रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। बालकमन प्राय: द्वीप के अधिकांश भाग तुर्की के अधिकार में थे। तुर्की (टर्की) साम्राज्य की सीमा पश्चिम में जर्मन राज्य की सीमा से आ लगी थी। टर्की के विशाल साम्राज्य के विभिन्न भागों में गवर्नर शासन करते थे जो पाशा कहलाते थे। ये पाशा तुर्की सम्राट के कमजोर होने पर स्वतंत्र थे। आस्ट्रिया ने 1683 ई में तुर्की के आक्रमण को विफल कर यूरोपीय राष्ट्रों को तुर्की के आक्रमण के भय से मुक्त किया। 1699 से 1812 ई. के बीच धीरे-धीरे तुर्की साम्राज्य से हंगरी, ट्रांसल वेनिया, अजव, क्रीमिया, कृष्ण सागर की उत्तरी तटवर्ती प्रदेश, वेसारेविया निकल गये। उन्नीसवी शताब्दी के प्रारंभ में यूरोप में रूस के बाद तुर्की साम्राज्य सबसे अधिक विस्तृत था। 1815 ई के पश्चात तुर्की साम्राज्य भी छिन्न भिन्न होने लगा। तुर्की साम्राज्य के प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करने के लिए यूरोप की शक्तियां एक दूसरे का विरोध कर रही थी।

यूनान की स्वतंता -

जार अलेक्जेन्डर के काल में यूनान ने टर्की के विरुद्ध विद्रोह किया था। टर्की सुल्तान ने क्रोध में आकर हजारों यूनानी विद्राहियों को मार डाला था। समस्त यूरोप की सहानुभूति यूनान के साथ थी। मेटरनिख के क्रान्ति विरोधी होने के कारण यूरोप के शासक यूनानी स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उदासीन रहे।

मिश्र के टर्की गवर्नर मोहम्मद अली ने अपने पुत्र इब्राहिम को एक विशाल सेना के साथ यूनानियों के दमन के लिए भेजा। इस सेना ने त्राहि मचा दी। 1826 ई. में उसने विद्रोहियों को परास्त कर मिसोलोंधी पर अधिकार कर लिया। एथेन्स भी जीत लिया गया।

रूस का जार निकोलस शांत बैठने वाला नहीं था। उसने यूनानियों को सहायता देने का निश्चिय किया। 1827 में रूस, ब्रिटेन तथा फ्रांस के बीच लंदन मे संधि हुई। टर्की के सुल्तान से यूनान को स्वतंत्र करने का अनुरोध किया गया। न मानने पर मित्रराष्ट्रों ने यूनानियों की सहायता के लिए नौसेना भेजी। 1827 ई में नेवेरिनो नामक स्थान पर टर्की का नोसैना परास्त हुआ। ब्रिटेन युद्ध से अलग हो गया। रूस ने युद्ध जारी रखा और कस्तुनतुनिया तक पहुंच गया एड्रियानोपेल की संधि से शांति हुई। तुर्की साम्राज्य के पतन में इस संधि का महत्वपूर्ण स्थान है। यूनानियों को स्वतंत्रता दी गई। सर्बिया, माल्डेनिया, वेलेखिया, को स्वतंत्र शासन दिया गया। वियना कांग्रेस के बाद क्रान्तिकारियों की यह सर्वप्रथम सफलता थी। रूस का जार निकोलस प्रथम की इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका रही। जार ने उदारता की अभिव्यक्ति तो की ही बालकान के समुद्री तट पर अधिपत्य स्थापना करने की नीति का यह अंग था।

रूस की टर्की के प्रति नीति बदलती रहती थी, मगर हमेशा उसका लक्ष्य टर्की के प्रदेश की प्राप्ति रहती थी। अपने ही गवर्नर मिश्र के पाशा से पराजित होकर टर्की के सुल्तान ने यूरोपीय शक्तियों से सहायता मांगी। रूस ने सहायता दी। ब्रिटेन, फ्रांस, आस्ट्रिया ने मोहम्मद अली का साथ दिया। तुर्की सुल्तान को अपने साम्राज्य से सिरिया, पेलेस्टाइन, दमिश्क, एलप्पो और अदन पर मोहम्मद अली का अधिपत्य स्वीकार करना पड़ा।

रूस ने सहायता की कीमत मांगी। तुर्की सुलतान से उनिकयार स्केलेसी की संधि 8 जुलाई 1833 ई को हुई। तुर्की ने रूस को बासफोरस और डर्डानेल्स के जल डमरू मध्य तक अपने जहाज ले जाने का अधिकार दिया। रूस ने संकट के समय तुर्की केा सहायता का वचन दिया। अब तुर्की पर रूस का प्रभाव बढ़ने लगा। इंग्लैंड और फ्रांस को यह सह्य नहीं था। मोहम्मद अली की बढ़ती शक्ति और महत्वाकांक्षा से रूस और ब्रिटेन चिंतित हुए। ब्रिटेन के लिए तुर्की पर रूसी प्रभाव और मिश्र पर फ्रांसीसी प्रभाव सह्य नहीं था। तुर्की को अधिक कमजोर भी होने नहीं देना चाहता था।

जार निकोलस ने समयोचित निर्णय लिया और ब्रिटेन के साथ 15 जुलाई 1840 को लंदन की संधि की। प्रशा, रूस, अस्ट्रिया, इंग्लैण्ड ने इस पर हस्ताक्षर किए। ब्रिटेन की यह कूटनीतिक विजय थी। फ्रांस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा भी बना और रूस को तुर्की में अधिक अधिकार भी नहीं दिए। मोहम्मद अली को पाशा पद वंशानुगत दिया गया और वह फ्रांस की चंगुल से मुक्त कराया गया। रूस के बासफोरस और डार्डानेल्स जल डमरू मध्य तक जहाज ले जाने का अधिकार समाप्त किया गया। रूस की तुर्की पर से संरक्षता भी नष्ट हो गई। जार निकोलस युद्ध के मैदान में जो जीता था उसे संधि के टेबल पर हार गया। उसका पाला ब्रिटेश मंत्री पामस्र्टन से पड़ा था जो समकालीन यूरोप का सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ था। मैरियट ने लिखा है “यदि पामस्र्टन विदेश मंत्री न बना होता तो काला सागर रूसी झील बना रहता और भूमध्य सागर के पूर्वी भाग पर जार के जहाजी बेड़े का प्रभुत्व स्थापित हो जाता। 1841 ई की लंदन की संधि ने उन्किमार स्केलेसी की संधि को समाप्त कर दिया और उसने रूस को अंसदिग्ध शब्दों में बतला दिया कि पूर्वी समस्या के अंतिम समाधान में इंग्लैण्ड प्रभाव शाली भाग लेगा।” (वाटरलू के पश्चात इग्लैण्ड पृ. 253)

रूस के जार निकोलस के लिए तुर्की एक असाध्य रोगी के समान था जो किसी समय काल के गाल में समा सकता था। सन 1844 ई में जार ने तुर्की के बंटवारे के संबंध मे ब्रिटेन से बात की। ब्रिटेन रूस को एशिया में अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी समझता था, इसलिए कस्तुनतुनिया में रूस का प्रभाव नहीं बढ़ने देना चाहता था। सन 1853 ई में जार ने पुन: तुर्की के बंटवारे का प्रस्ताव रखा परन्तु ब्रिटेन ने ठुकरा दिया। वास्तव में ब्रिटेन तुर्की के अस्तित्व एवं स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहता था। रूसी महत्वाकांक्षा को रोकने का यह सही उपाय भी था।
क्रीमिया का युद्ध 1853 ई. -

जार तुर्की से उलझने के लिये बहाना ढूंढ़ रहा था। जेरूसलेम का तीर्थ रोमन चर्च या यूनानी चर्च के अधिकार में रहे इस पर पादरियों मे विवाद हो गया। फ्रांस ने रोमन चर्च का और रूस ने यूनानी चर्च का पक्ष लिया। रूस, तुर्की के सुलतान की समस्त ईसाई प्रजा की संरक्षता की मांग कर रहा था। हेजन के अनुसार -”यदि यह मांग स्वीकार कर ली गई होती तो इसका अर्थ होता कि तुर्की के आंतरिक मामलों मे रूस को सदा हस्ताक्षेप करने का अधिकार प्राप्त हो जाता और अंत में तुर्की रूस का एक प्रकार का अधीन देश बन जाता।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास पृ. 412)

1853 ई में रूस और तुर्की के मध्य युद्ध प्रारंभ हो गया। जार निकोलस प्रथम ने आशा की थी कि यह युद्ध कुछ दिनों तक सीमित रहेगा। उसकी यह आशा भ्रमात्मक सिद्ध हुई। इंग्लैण्ड और फ्रांस तथा तुर्की के स्थान पर तुर्की, ब्रिटेन, फ्रांस व पीडमेंट को पाया - हेजन के अनुसार “इंग्लैण्ड युद्ध में इसलिये सम्मिलित हुआ कि वह आक्रमण तथा विस्तारवादी रूस से भारत के मार्ग के विषय में भयभीत था। फ्रांस नेपोलियन प्रथम के मास्को अभियान का बदला लेना चाहता था।” (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 421)

यह युद्ध मुख्य रूप से दक्षिणी रूस में काले सागर में स्थित क्रीमिया प्राय:द्वीप में लड़ा गया। यह युद्ध इसलिये भी महत्वपूर्ण था कि यहां पर सेवेस्टापोल में रूस का एक विशाल सामुद्रिक अस्त्रागार था। रूसी बेड़ा वहां उपस्थित था। सेवेस्टापोल लेने और रूसी सामुद्रिक बेड़े को डुबा देने से कई वर्षों के लिए रूस की शक्ति नष्ट हो जावेगी और इस प्रकार वह शस्त्र नष्ट हो जाएगा जिससे रूस तुर्की को गंभीर आघात पहुंचा सकता था। 11 माह तक सेवेस्टापोल का घेरा चला, टोडिलबर्न ने इसकी रक्षा के लिये बहुत बुद्धि लगाई। बड़े और छोटे सैनिक टुकड़ियों के मध्य युद्ध के लिए यह स्मरण किया जावेगा। कड़ी सरदी, रसद व्यवस्था के छिन्न भिन्न होने औषधि व अस्पताल की कमी के कारण मिश्र राष्ट्रों की सेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा। 336 दिनों के घेरे के बाद 8 दिसम्बर 1855 ई को सेवेस्टापोल का पतन हो गया। बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ।

पेरिस की संधि -

30 मार्च 1856 ई. को पेरिस की संधि द्वारा शांति स्थापित हुई। शर्तें थीं -
  1. काले सागर की तटस्थता बनाए रखा गया। युद्धपोतों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके किनारे अस्त्रागार नहीं बनाया जावेगा।
  2. प्रत्येक राष्ट्र के व्यापारिक जहाज यहां जा सकेंगे।
  3. मोल्डेविया और वेलेशिया पर से रूसी संरक्षण समाप्त किया गया। तुर्की सुलतान की संप्रभुता के अंतर्गत ये स्वतंत्र घोषित किए गये।
  4. तुर्की को यूरोपीय राज्यों के परिवार में सम्मिलित कर लिया गया। इस परिवार से अब तक उसे असभ्य राष्ट्र कहकर बाहर रखा गया था। तुर्की के आंतरिक मामलों मे हस्तक्षेप न करने का वचन यूरोपीय राष्ट्रों ने दिया।
मैरियट के अनुुसार - “पूर्वकालीन घटनाओं पर विचार करने वाले आलोचकों का यह मत रहा है कि क्रीमिया युद्ध यदि एक अपराध नहीं था तो कम से कम भारी भूल अवश्य था और इसको टालना चाहिए था और यह टाला जा सकता था।”¦(वाटरलू के पश्चात इंग्लैण्ड- पृ. 260)

एक महान कूटनीतिज्ञ ने अपना सोचा विचारा मत सुसाहित्यिक शब्दों में व्यक्त किया - “क्रीमिया के युद्ध में इग्लैण्ड ने अपना दांव उचित घोड़े पर नहीं लगाया था।” मैरियट - “धीरे धीरे इग्लैण्ड ने उचित अथवा अनुचित यह धारणा बनाई कि तुर्की का मामला यूरोप के लिए महत्वपूर्ण था और उसके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था कि जार शक्ति के द्वारा अपनी मांगों को प्रस्तुत करने के लिए कृतसंकल्प था और केवल शक्ति के द्वारा ही उसकी सेनायें खदेड़ी जा सकती थी। क्रीमिया का युद्ध इस धारणा का तर्क सम्मत एवं अनिवार्य परिणाम था।” (वाटरलू के पश्चात इग्लैण्ड- पृ. 216)

हेजन - “क्रीमिया युद्ध के द्वारा पश्चिमी यूरोप की ईसाई शक्तियों ने तुर्की को सहायता देकर नष्ट होने से बचाया। क्योंकि वे कस्तुनतुनिया पर रूस का अधिपत्य नहीं होने देना चाहती थी। पूर्वी प्रश्न का हल के रूप में यह युद्ध पूर्ण असफल रहा। अपनी ईसाई प्रजा की दशा सुधारने के लिए दिया हुआ तुर्की सुल्तान का वचन कभी पूरा नहीं किया गया। उसकी दशा और बिगड़ गई। (आधुनिक यूरोप का इतिहास- पृ. 413)

सोलहवीं शताब्दी के धार्मिक युद्धों की तरह क्रीमिया का युद्ध धार्मिक प्रश्न को लेकर प्रारंभ हआ। मिश्र राष्ट्र विजयी हुये। उनका सम्मान बढ़ा मगर एक लाख व्यक्तियों की जानें गई। कुछ समय के लिए बालकान प्रदेशों पर रूस का प्रभाव कम हुआ। रूस का जार निकोलस इन पराजयों से ऐसा टूटा कि उसकी मृत्यु हो गई। फ्रांस के 75 हजार सैनिक मारे गए, इग्लैण्ड के 24 हजार सिपाही मारे गये। फ्रांस का 1 अरब रूपया खर्च हुआ और इग्लैण्ड पर 4 करोड़ 10 लाख पौ. का ऋण चढ़ गया। रूस की जन धन की हानि का अनुमान लगाना कठिन है। “क्रीमिया युद्ध में कौन विजयी हुआ तथा कौन पराजित हुआ यह बतलाना कठिन है।” जार निकोलस प्रथम की कूटनीतिक हार के रूप में भी इसे देखा जाता है।

जार अलेक्जेन्डर द्वितीय 1855-1881 ई. 

निकोलस प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलेक्जेन्डर द्वितीय जार बना, अवस्था 37 वर्ष की थी। एक शासक बनने लायक शिक्षा उसे दी गई थी। निकोलस अपने पुत्र के लिए एक सुदृढ़ राज्य छोड़ना चाहता था, मगर क्रीमिया युद्ध की पराजय ने रूस की कमर तोड़ दी। अंतिम समय में उसने बड़े दुख के साथ अपने पुत्र से कहा था - “अब तो मैं केवल तुम्हारे लिए तथा रूस के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर सकता हूँ।” अलेक्जेन्डर अपने पिता की भांति निरंकुश था लेकिन कट्टर प्रतिक्रियावादी नहीं था। कभी वह सुधारवादी बन जाता था तो कभी प्रतिक्रियावादी। रूस के आंतरिक इतिहास की यह विशेषता रही है कि जब जब विदेशी युद्धों में उसकी पराजय हुई तब तब उसके आंतरिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार हुए। क्रीमिया युद्ध के पश्चात रूस में महत्वपूर्ण आंतरिक सुधार हुए। रूस के बुद्धिजीवी भी सुधार की मांग कर रहे थे।

कृषक दास प्रथा की समाप्ति 1861 ई. -

“कृषक दास प्रथा पूर्ववर्ती शासन की आधारभूत त्रुटि थी। इसलिए स्वाभाविक था कि अलेक्जेन्डर द्वितीय के सुधार इस त्रुटि के निराकरण से प्रारंभ होते विशेषत: ऐसी स्थिति में जब उनकी आधार-भूमि का निर्माण निकोलस के राज्य काल में ही हो चुका था।” (जार्ज वर्नादस्की, रूस का इतिहास- पृ. 202)

दास प्रथा का तात्पर्य उन किसानों से था जो भूमि जोतते-बोते थे किंतु भूमि पर उनका कोई अधिकार न था। वे भूमिस्वामियों के नियंत्रण में रहते थे। भूमि जोतने-बोने के बदले उन्हें भूमिपतियों के खेतों में मुफ्त में कार्य करना पड़ता था। लगान भी देना पड़ता था। राज्य को अलग से लगान देना होता था। भूस्वामी का नियंत्रण उनके जीवन पर भी था। बिना अनुमति के वे विवाह भी नहीं कर सकते थे। ये दास भूमि के साथ इस ढंग से बंधे होते थे कि भूस्वामी द्वारा खेत बेच देने पर दास भी स्वामी के अधिकार में स्वयमेव चले जाते थे।

दास प्रथा रूस की महत्वपूर्ण समस्या थी। तथ्य यह है कि रूस की आबादी का 90 प्रतिशत कृषक दास थे। संख्या की दृष्टि से ये पांच करोड़ थे। 2 करोड़ 30 लाख कृषक दास तो केवल जार की निजी जमीन पर थे। शेष कुलीन वर्ग के अधिकार में थे।

समितियों का गठन -

जनवरी सन 1857 में जार अलेक्जेन्डर द्वितीय ने एक समिति का गठन किया। उच्च पदस्थ अधिकारियों की यह समिति कोई ठोस निर्णय नहीं कर पाई। विलनो के गवर्नर जनरल को यह कार्य सौंपा गया। अभिजात वर्ग की प्रांतीय समिति का गठन किया गया। अन्य प्रांतों के अभिजात वर्गों की मांग पर वहां भी समितियां गठित की गई। मास्को के अभिजात वर्गों के सामने जार ने स्पष्ट कहा - “इसकी अपेक्षा हम इस बात की प्रतीक्षा करें कि कृषक दास प्रथा नीचे से समाप्त हो। यह अच्छा होगा कि सुधार ऊपरी स्तर से प्रारंभ हो।” (रूस का इतिहास- पृ. 202)

प्रांतीय समितियों के कार्यों का पुनरीक्षण सेन्ट पीट्सबर्ग के विशेष आयोग द्वारा किया गया। इस आयोग में शासकीय अधिकारियों के अलावा कुलीन वर्ग के भूस्वामी भी रखे गए। जेम्स रोस्तो इसका अध्यक्ष था। प्रांतीय समितियों की सुझावों की अपेक्षा इस समिति के सुझाव दूरगामी प्रभाव वाले थे।

कृषक दास प्रथा समाप्त 1861 ई. -

रूस के कृषक दासों के लिए 3 मार्च 1861 ई. की तिथि अत्यंत महत्व की है। सम्राट ने इसी तिथि को कृषक दास प्रथा समाप्ति विषयक आदेश पर हस्ताक्षर किए :-
  1. घरेलू दासों को 2 वर्ष के भीतर स्वतंत्र कर दिया जावेगा।
  2. कृषक दासों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी गई। भूमि भी उन्हें दिया जावेगा।
  3. भमि के उपयोग के कारण उन्हें कुछ राशि देनी थी या भूस्वामी के कुछ कार्य करने थे।
  4. कृषक चाहे तो ऋण लेकर एकमुश्त भूस्वामी से भूमि ले सकता था।
  5. भूस्वामी को राशि देने के लिए कृषक को 49 वर्ष के लिए शासन की ओर से ऋण की व्यवस्था की गई।
जार अलेक्जेन्डर द्वितीय की इस सुधार योजना का लाभ प्रत्यक्षत: कृषक दासों को मिला। 1861 से 1881 ई. के मध्य कुल भूस्वामियों में से 85 प्रतिशत ने कृषकों को अपनी जमीन बेच दी। कम्यून के लोग सामूहिक रूप से भूस्वामियों को जमीन की कीमत देने के लिए वचनबद्ध थे। सभी किसान जब निर्धारित राशि पटा देते तब भूस्वमित्व कम्यून को मिलता। कम्यून अपने सदस्यों को परिवार के आकार के अनुसार स्वयं भूमि का बंटवारा किया करता था। कम्यूनों के अधिकार व कर्तव्य निर्धारित थे। कम्यून के बाहर कृषक पूर्ण स्वामित्व के आधार पर जमीन खरीद सकता था। सन 1861 ई का सुधार अपूर्ण होने के बावजूद कृषक दासों की दशा सुधारने के क्षेत्र में बड़ा कदम था। कृषक संपूर्ण राज्य की भूमि बंटवारे में प्राप्त करने का स्वप्न देखने लगे - यह भावी क्रांति की पृष्ठभूमि बनी।

जेमेमस्त्वो सुधार -

सन 1864 ई. में जार ने एक और सुधार किया। स्थानीय स्वशासन का प्रारंभ हुआ। प्रत्येक गांव के निर्वाचित प्रतिनिधियों को शाला, अस्पताल, सड़क संबंधी कार्य सौंपे गए। 3 वर्ष के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव होता था। निर्वाचक तीन श्रेणी के थे। कुलीन और व्यापारी, कृषक कम्यून, नगर निवासी। जेमस्त्वो के द्वारा रूस में स्थानीय शासन व्यवस्था की नींव रखी गई। ये संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले सिद्ध हुए।

न्यायिक सुधार -

सन 1864 में न्यायिक सुधार किए गए। न्यायालयीन प्रक्रिया में सुधार, जूरी पद्धति का प्रारंभ करना, शांति न्यायाधिपति के पद की स्थापना इसमें सम्मिलित थे। रूस न्याय के क्षेत्र में अन्य यूरोपीय राज्यों से सक्षम प्रमाणित हुआ। कृषकों को अपने मामले पृथक नगर न्यायालयों द्वारा निपटाने की विशेष व्यवस्था की गई थी।

सार्वजनिक सैनिक सेवा -

1874 में लागू किए गए इस व्यवस्था से रंगरूटों को उनके परिवार के अनुसार विशेषाधिकार दिए गए। एकमात्र पुत्र, पौत्र को पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त होते थे। उसे द्वितीय वर्ग की रक्षित सेना में रखा जाता था। व्यवहारिक रूप में प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व उसे सैनिक सेवा के लिए नहीं बुलाया गया। माध्यमिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को विशिष्ट विशेषाधिकार दिए गए थे। सेना में वर्गगत भेदभाव नहीं था।

अलेक्जेन्डर द्वितीय के द्वारा जो सुधार किए गए वे 1905 ई. तक और कुछ सन 1917 तक बनी रही। इन सुधारों से रूसी समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। असंतोष की आंधी को रोकने में ये कारगर सिद्ध हुए।

13 मार्च 1881 को एक बम विस्फोट में जार अलेक्जेन्डर द्वितीय मारा गया। ‘मुक्तिदाता जार’ ने अनेक सुधार कर रूस का आधुनिकीकरण किया। रूसी साम्राज्य का काफी विस्तार हुआ। जार अलेक्जेन्डर की हत्या एक महान राजनीतिक दुर्घटना थी।

जार अलेक्जेन्डर तृतीय 1881.1894 ई. - 

अलेक्जेन्डर द्वितीय की हत्या के पश्चात उसका पुत्र अलेक्जेन्डर तृतीय गद्दी पर बैठा। निरंकुशता व प्रतिक्रियावाद उसे विरासत में प्राप्त थी। उदारवाद का वह शत्रु था। क्रांतिकारियों ने उसके पिता की हत्या की थी यह तथ्य उसे सदैव स्मरण रहता था। वह रूस की प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित करना चाहता था। पार्लियामेंट उसकी निगाह में निरर्थक संस्था थी। पुलिस विभाग का प्रमुख प्लेबी उसकी निरंकुशता को बढ़ावा देता था। निरंकुशता, धार्मिक कट्टरता और रूसीकरण इस त्रिभुज का नाम अलेक्जेन्डर तृतीय था। एक जार, एक धर्म औरैरैर एक रूस उसका नारा था।

हजारों की संख्या में आतंकवादी पकड़े गए, सूली पर लटकाए गए, जेल भेजे गए, साइबेरिया मरने के लिए निर्वासित किए गए। प्रेस पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। अल्पसंख्यक जातियां या तो रूसी भाषा व संस्कृति अपना लें अन्यथा दंड के लिए तैयार रहें। पोल, यहूदी मुख्य रूप से शिकार बने। कुलीन वर्ग निरंकुश राजतंत्र का समर्थक था। उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया। एक विशेष बैंक बनाया गया जहां से कुलीनों को कम ब्याज में रुपये उधार दिए जाते थे। उच्च पदों पर उनकी नियुक्तियां की गई। किसानों की दशा सुधारने की ओर भी ध्यान दिया गया। सिंचाई की सुविधायें बढ़ाई गई। औद्योगिक प्रगति की शुरु हुई। दास प्रथा की समाप्ति से रूस में मजदूर मिलना आसान हो गया था। कोयले व लोहे के बड़े खानों का पता लगाया गया। आयात कर बढ़ा दिया गया। नये शहर रूस में बसने लगे। मध्यमवर्ग का जन्म हुआ। बड़े पैमाने पर रेलों की लाइन बिछाई गई। 1891 में ट्रांस साइबेरियन लाइन का निर्माण प्रारंभ हुआ। 1902 ई. में यह पूर्ण हुआ। रूस का मजदूर वर्ग समाजवादी सिद्धांतों से प्रभावित होने लगा। 1894 ई. में अलेक्जेन्डर तृतीय की मृत्यु हुई।

“अलेक्जेन्डर तृतीय को कोई विशेष शिक्षा नहीं मिली थी। किंतु उसमें राजमर्मज्ञता की सहज प्रवृत्ति और व्यवहारकुशलता थी। और वह उसके समक्ष प्रस्तुत किए गए प्रश्नों के सारभूत मुद्दों को बिना किसी कठिनाई के समझ जाता था। अलेक्जेन्डर तृतीय का स्वभाव जटिलताओं से रहित था, किंतु वह एक जन्मजात सम्राट था। (जार्ज वर्नादस्की, रूस का इतिहास- पृ. 215)

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