‘दलित’ या अनुसूचित जाति का अर्थ, परिभाषा व समस्याएं

By Bandey 1 comment
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हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इस देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग सदियों से न केवल पिछड़ा है, बल्कि समाज द्वारा पीड़ित, उपेक्षित व अवहेलना के बोझ से कुण्ठित रहा है। इस कारण ये लोग न केवल गंभीर समस्याओं से पीड़ित रहे हैं। बल्कि अमानवीय जीवन भी जीते रहे है। सामान्य तौर पर इन्हीं लोगों को सामाजिक रुप में दलित कहते है। हालांकि संवैधानिक तौर पर इन लोगों को अनुसूचित जातियां कहा जाता है और परम्परागत रुप में इन्हें अस्पृश्य जातियाँ हरिजन, अछूत आदि नामों से पुकारा जाता रहा है। आजादी के बाद राष्ट्रीय सरकार और समाज सुधारकों का ध्यान इनकी तरफ गया और भारतीय संविधान में भी इनकों कुछ विशेष सुविधाएं प्रदान की गई। साथ ही इन लोगों को कुछ विशेष सुविधाएं व संरक्षण प्रदान करने के लिए इनको एक विशेष अनुसूची के अंतर्गत रखा गया। अत: इनको अनुसूचित जाति भी कहा जाता है।

दलित कौन है? 

सामान्य रुप से दलित शब्द से तात्पर्य उस व्यक्ति या वर्ग से लगाया जा सकता है जिसका कि समाज में निम्नतम स्थान है। गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करता है, समय में उत्पीड़न का शिकार है और जिसका वास्तविक रुप से समाज व सदस्यों द्वारा अपमान होता रहता है। एक दूसरे रुप में कहा जा सकता है कि परम्परागत भारतीय समाज में जाति प्रथा के अंतर्गत चार प्रमुख जातियां- ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है। इन चारों के अलावा एक पांचवा वर्ग भी है जिसके सदस्यों को परम्परागत रुप में अस्पृश्य व अछूत कहा जाता था। गाँधी जी ने उन्हें हरिजन का नाम दिया और सरकार ने उन्हें कुछ सुविधाएं और संरक्षण देने के उद्देश्य से उन्हें एक सूची के अन्तर्गच रखते हुए अनुसूचित जाति के रुप में उनकी एक अलग पहचान बनायी। ये लोग सदियों से अस्पृश्य रहे है, साथ ही सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक व आर्थिक दृष्टि से अत्यंत पिछ़़ड़े भी।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये आदेशों में अनुसूचित जातियों का विवरण दिया गया है और यह कहा गया है कि चूंकि ये लोग सदियों से अत्यंत पिछ़ड़े एवं गंभीर समस्याओं से घिरे हैं। इसलिए इन वर्गो के शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक एवं गंभीर समस्याओं से घिरे हैं। अत: इन वर्गो के शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक दृष्टि से उत्थान के लिए सरकार को विशेष प्रयास करना चाहिए। सन् 1981 को जनगणना के अनुसार इन जातियों की कुल जनसंख्या 10,47,55,214 थी अर्थात भारत की कुल जनसंख्या का 15.8 प्रतिशत। 1991 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या बढ़कर 13,82,23,277 (कुल जनसंख्या का 16.4 प्रतिशत) हो गया है, जिनमें से 11,23,43,798 लोग ग्रामीण समुदायों में तथा 2,58,79,480 नगरीय समुदायों में निवास कर रहे हैं। इन जातियों की सर्वाधिक जनसंख्या 392,76,455 (2,58,23,388 ग्रामीण व 34,53,067 नगरीय निवासी) उत्तर प्रदेश में है। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 16,66,36,000 है। पंरतु सचमुच इस संख्या से उन लोगों की पृथक करना होगा जो इन जातियों या वर्गो के होते हुए भी आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से सम्पन्न है तथा सामाजिक उत्पीड़न का शिकार नहीं है।

‘दलित’ या अनुसूचित जाति का अर्थ व परिभाषा

अनुसूचित जातियाँ भारतीय समाज की वे जातियाँ है, जिन्हें परंपरागत रुप में अस्पृश्य समझा जाता रहा है और अस्पृश्यता के आधार पर ये जातियाँ अनेक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक अयोग्यताओं की शिकार या पीड़ित रहीं है और इसलिए अनेक समस्याओं से घिरी रहती है और आज भी स्थिति काफी गंभीर है। वर्तमान समय में संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारी के फलस्वरुप सरकारी द्वारा बनाई गई सूची के अंतर्गत जिन ‘अनुसूचित जातियों’ को स्थान दिया गया है, उन्हें अस्पृश्य जातियां, अछूत, दलित, बहिश्कृत जातियां, हरिजन आदि शब्दों से संबोधित किया जाता रहा है।

डॉ. डी.एन. मजूमदार ने इन अस्पृश्य या अनुसूचित जातियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, “दलित या अस्पृश्य जातियां वे है जो अनेक सामाजिक और राजनैतिक निर्योग्यताओं की शिकार है, इनमें से अनेक निर्योग्यताएं उच्च जातियों द्वारा परम्परागत तौर पर निर्धारित और सामाजिक तौर पर लागू की गई है।”

अनुसूचित जातियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वैदिक ग्रंथों में चाण्डाल निशाद आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है। ये लोग समाज के सबसे नीचे स्तर के लाग समझे जाते थे, पर वे अस्पृश्य है या नहीं, स्पष्ट पता नहीं चलता। डॉ. घुरिये के अनुसार उत्तर वैदिक काल में यज्ञ, धर्म आदि से संबांधित शुद्धता या पवित्रता की धारणा अत्यंत प्रखर थी परंतु अस्पृश्यता की धारणा आज जिस रुप में है, उस युग में नहीं थी। स्मृति काल में चाण्डाल आदि के रहने की व्यवस्था गांव के बाहर थी। धर्मशास्त्र युग में अस्पृश्यता की भावना सबसे पहले स्पष्ट हुई और एक ब्राह्मण नारी और शुद्र पुरुष से उत्पन्न सन्तानों को जिन्हें चाण्डाल कहकर संबोधित किया गया, सबसे घृण्य समझा गया। मनु के युग में ऐसे अस्पृश्य लोगों का न केवल गांव से निकाल दिया गया बल्कि उन्हें ऐसे कार्यो और कर्त्तव्यों को सौंपा गया जिससे स्पष्ट हो जाए कि वे मनुष्य जाति के सबसे अधम उदाहरण हैं। जैन और बौद्ध धर्म से प्रभावित लोगों ने इनकी दयनीय अवस्था से आकर्षित इनकी अवस्था को सुधारने का प्रयत्न किया परंतु इन संबंध में मुसलमानों की राज्य स्थापना होने तक कोई विशेष उन्नति नहीं हो पाई। नानक, चैतन्य, कबीर आदि के प्रयत्न इस दिशा में विशेष उल्लेखनीय है। उच्च जातियों के अत्याचारों से पीड़ित होकर हजारों अस्पृश्यों ने अपने को इस्लाम धर्म में परवर्तित कर लिया। अंग्रेजों के आने के बाद अस्पृश्य जातियों या अनुसूचित जातियों को निर्योग्याताएं धीरे-धीरे कम होती गई। आज हमारी सरकार इस संबंध में विशेष प्रयत्नशील है।

दलित समाज की प्रमुख निर्योग्यताएं निम्न थी:-

  1. अध्ययन, अध्यापन व आम विकास के अवसरों से वंचित।
  2. धार्मिक ग्रंथों अध्ययन, वाचन और श्रवण पर निषेध।
  3. पूजा पाठ और मंदिर में प्रवेश करने पर निषेध। 
  4. रथ व घोड़े की सवारी पर मनाही।
  5. सार्वजनिक घाटों, तालाबों और कुओं से पानी लेने पर प्रतिबंध।
  6. सार्वजनिक धर्मशालाओं, भोजनालयों आदि में प्रवेश पर प्रतिबंध।
  7. सम्पत्ति रखने के अधिकार से वंचित।
  8. राजनैतिक शासन सम्बंधी अधिकारों पर प्रतिबंध।
  9. अस्त्र-शस्त्र धारण करने और युद्ध कला सीखने पर प्रतिबंध।

दलितों की समस्याओं के समाधान के संदर्भ में संवैधानिक प्रयास सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सभी नागरिकों के लिए सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता तथा अवसर की समानता प्रदान करना संविधान के प्रमुख उद्देश्य निरुपित किए गए हैं। अनुसूचित जातियों, जनजातियों के उनकी परम्परात्मक निर्योग्यताओं तथा कमजोर सामाजिक आर्थिक आधार को देखते हुए संविधान में उन्हें सामान्य नागरिक के रूप में प्राप्त अधिकार तथा दलित अर्थात अनुसूचित जातियों के सदस्य के रूप में प्राप्त संरक्षण व विशेष अधिकार प्रदान किये गये हैं।

सामाजिक भेदभाव:- दलित समस्या का आधारभूत पक्ष

दलितों के साथ सामाजिक भेदभाव आज भी बरता जाता है। चाहे वे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख अथवा इसाई समाज के अंग हो। अस्पृश्यता किसी न किसी रुप में आज भी बनी हुई है। संविधान के अनुच्छेद-15 के अनुसार धर्म, वंश, जाति, लिंग भेद, जन्म स्थान अथवा उनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी नागरिक के ऊपर निम्न कोई शर्त या प्रतिबंध नहीं होगा।

  1. दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों तथा सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों पर प्रवेश।
  2. ऐसे कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों तथा सार्वजनिक स्थानों के जिनकी व्यवस्था पूर्व अथवा आंशिक रुप से राज्य निधियों से की जाती है अथवा जो सामान्य जनता के उपयोग के लिए समर्पित कर दिए गए है, उपयोग करने के विषय में।

संविधान की धारा-17 के द्वारा अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया और इसका किसी प्रकार का आचरण निषिद्ध कर दिया गया, अस्पृश्यता के आधार पर किसी भी प्रकार की अनर्हता लगाना कानून की दृष्टि से दंडनीय अपराध निरुपित किया गया। धारा-2(ब) सभी सार्वजनिक प्रकृति की धार्मिक हिन्दू संस्थाओं को सभी हिन्दुओं के लिए खोल दिए जाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। संविधान की धारा 35(अ)(11) के तहत “अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955” दिनांक 19 नवम्बर 1976 से लागू हुआ। इन सब कोशिशों से छुआछूत जरुर कम हुई है लेकिन गई नहीं है। आज भी हरिजनों के कुँंए अलग है, बस्तियों अलग है यहाँ तक कि शमशान घाट भी अलग हैं। अस्पृश्यता निवारण के लिये आवश्यक है कि शहरी कालोनियां अथवा सरकारी बंगलों में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिये आवंटन हो, पब्लिक भोजनालय हों।

दलितों की समस्याएं

वास्तव में देखा जाए तो भारत की आजादी के बाद अनुसूचित जातियों को अन्य नागरिकों की तरह अधिकार दे दिए गए हैं। यह भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इन जातियों की वैधानिक निर्योग्यताएं आज दूर हुई हैं। फिर भी ये लोग अनेक प्रकार की समस्याओं से आज भी घिरे हुए हैं। अनुसूचित जातियों के अधिकतर सदस्य गांवों में रहते हैं और गांव की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियां उनके लिए अनुकूल नहीं हैं। इन जातियों की प्रमुख समस्याएं है-

आर्थिक समस्याएं:- 

इसमें शंका नहीं कि आर्थिक वृद्धि किसी भी समूह के सुख एंव प्रगति का सबसे प्रमुख कारण है और इसीलिए कहा जाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक स्वतंत्रता के बिना केवल कल्पना मात्र है। इस संबंध में अनुसूचित जातियों की समस्या सबसे गंभीर है।

  1. व्यवसाय को चुनने की स्वतंत्रता नहीं:- अपने परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर अनुसूचित जातियों को पहले यह अधिकार नहीं था कि वे ऊँची जातियों के पेशों को स्वतंत्र रुप से चुन सकें। अस्पृष्यता को धारणा के कारण अभी हाल तक उन्हें सब तरह के पेशों को करने की स्वतंत्रता न थी। ग्रामीण समुदायों में आज भी स्थिति बहुत
    सुधरी नहीं है। इन निर्योग्यता के कारण इन जातियों की आर्थिक स्थिति आज भी बहुत दयनीय और वे निर्धनता से संबंधित समस्त कष्टों को सहन कर रहे हैं।
  2. भूमिहीन कृषक:- हमारे देश के अधिकांश भाग में कृषि करना ऊँची जातियों का एकाधिकार जाना जाता है। इस कारण यह नहीं हो सकता कि अनुसूचित जाति का भूमि पर अधिकार न हो। वे अधिकतर भूमिहीन श्रमिक है। कहा जाता था कि यह उनका सौभाग्य होगा यदि उन्हें ऊँची जाति के लोग केवल अपने खेत में काम करने का अधिकार दे दें। जमींदारी प्रथा के समाप्त होने से पूर्व इनसे गुलामों की तरह बेगार ली जाती थी।
  3. सबसे कम वेतन:- बेशक अनुसूचित जाति के लोग समाज के लिए सबसे आवश्यक और मूल्यवान सेवा करते है, परंतु इस कम का पारिश्रमिक उन्हें सबसे कम मिलता है, यहां तक कि उनकी तन ढकने को कपड़ा और पेट भरने को अनाज भी नहीं मिल पाता है। वे आधे पेट खाकर, आधे नंगे रहकर जीवन व्यतीत करते रहते हैं।
  4. श्रम विभाजन में निम्न स्थान:- कारखाने आदि में उनकी अच्छे पदों पर काम करने का अवसर हीं नहीं मिल पाता है। उन्हें केवल वे काम ही मिलते है, जो कोई नहीं करता है। योग्यता होने पर भी उचित काम न मिलने से उत्पादन को काफी धक्का पहुँंचता है और उनकी आर्थिक स्थिति गिर जाती है।

सामाजिक समस्याएं:- 

सामाजिक क्षेत्र में भी दलितों या अनुसूचित जातियों की निर्योग्यताएं अनेक है, जिनके कारण उनकी समस्या न केवल गंभीर है, बल्कि दयनीय भी है। ये सामाजिक समस्याएं है-

  1. समाज में निम्नतम स्थिति:- अस्पृष्यता की धारणा से अनुसूचित जातियों को समाज में निम्नतम स्थिति प्रदान की है। इसी कारण पहले ऊँची जातियों के लोगों द्वारा उनके स्पर्ष मात्र से ही नहीं बचा जाता था बल्कि उनके दर्शन और छाया तक भी उन्हें अपवित्र करती थी। एक मानव का दूसरे मानव के द्वारा इतना अपमान उनकी निर्योग्यता का ही रुप है।
  2. शैक्षणिक समस्या:- अनुसूचित जातियों के लड़के लड़कियों को पहले स्कूल और कॉलेज में भर्ती होने से रोका जाता था। उन्हें शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता नहीं थी। इसका फल यह था कि प्राय: शत-प्रतिशत लोग अशिक्षित थे। आज भी इन जातियों में षिक्षा का प्रसार अधिक नहीं है, खासकर गांवों में।
  3. निवास संबंधी समस्या:- अनुसूचित जातियों को प्राय: शहरों में भी उन मौहल्लों में नहीं रहने दिया जाता है, जिनमें ऊँची जाति के लोग रहते हैं। उनके लिए अलग बस्तियां होती है। गांवों में यह समस्या और भी गंभीर है। अछूतों को प्राय: गांवो में नहीं रहने दिया जाता है। गांव से बाहर उनकी बस्ती बनती है।

धार्मिक समस्याएं:- 

धार्मिक दृष्टिकोण से भी दलितों या अनुसूचित जातियों की अनेक निर्योग्यताएं व समस्याएं है। कुछ समय पहले तक अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार नहीं था। कानून द्वारा आज इस निर्योग्यता को दूर कर दिया है, फिर भी गांवों में कहीं-कहीं यह निर्योग्यता आज भी पाई जाती है। अनुसूचित जाति के लोग धार्मिक उपदेशों को सुन नहीं सकते और न ही श्मशान घाटों में अपने मुर्दो को जला सकते थे। ब्राह्मण इनके धार्मिक संस्कारों की पुरोहिती नहीं करते थे।

अनुसूचित जातियों में भी भेदभाव की समस्या:- 

अनुसूचित जातियों का आपस में ही भेदभाव बरतना स्वयं में ही एक गंभीर समस्या है। अचंभे की बात यह है कि अनुसूचित जातियों में आपस में छुआछूत की भावना है, जिसके कारण अनेक हरिजनों की निर्योग्यताएं और कुछ प्रतीत होती है। जैसे- चमड़े का काम करने वाली एक जाति से अन्य अनुसूचित जातियाँ सामाजिक दूरी बनाये रखती है और विवाह शादी तो कदापि नहीं करती इससे अनुसूचित जातियों में श्रेष्ठता व हीनता की भावना पनपती है जो अन्तत: राष्ट्रीय एकता के लिए एक समस्या बन जाती है।

अन्तर्जातीय संघर्ष की समस्या:- 

अनुसूचित जातियों की एक और बड़ी समस्या अन्तर्जातीय संघर्ष की है। यह संघर्ष समस्या शक्ति या आर्थिक अथवा राजनैतिक शक्ति के आधार पर घटित होती है। जिस समुदाय में जिस जाति के लोग अधिक संख्या में है या जो जाति आर्थिक, राजनैतिक सत्ता से शक्तिमान है, वे अपने से निर्बल जाति के लोगों को जन, बल, धन, बल या राज बल से दबाने का प्रयास करते है और तभी अन्तर्जातीय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। डॉ. दुबे के अनुसार इस प्रकार के संघर्ष उसी अवस्था में संभव है, जब शक्ति सम्पन्न जाति में एकता हो।

चुनाव में हिंसा की समस्या:- 

अनुसूचित जातियों के लोगों के सामने लोकसभा, विधानसभा यहाँ तक कि पंचायतों के चुनाव के समय एक विकट समस्या उत्पन्न हो जाती है। विशेषकर गांवों में आर्थिक व राजनैतिक रुप में शक्ति सम्पन्न जाति के लोग अनुसूचित जातियों के लोगों को स्वतंत्रापूर्वक बोट देने के अधिकार से वंचित करते है, और एक विशेष प्रत्याशी के पक्ष में डरा-धमकाकर जबरदस्ती वोट डलवाने के लिए उन पर कई प्रकार के दबाब डालते है, यहाँ तक कि उन पर अत्याचार भी करते है। ऐसे अवसरों पर भी प्राय: खूनी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। चुनाव के बाद भी अनुसूचित जातियों को बेहद गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते है।

अन्य जातियों द्वारा अत्याचार की समस्या:- 

पूर्व में हरिजनों पर अनेक निर्योग्यताएं लादकर उन पर अनेक अन्याय व अत्याचार होते थे। परंतु स्वतंत्रता के बाद वैधानिक या संवैधानिक तौर पर उन्हें समान अधिकार मिल जाने के बाद उनका उत्पीड़न थम जाएगा, परंतु वास्तव में ऐसा हुआ नहीं है। उन पर अत्याचार व उत्पीड़न विशेषकर गांवों में आज भी जारी है, और कभी-कभी तो अत्यंत उग्र रुप में देखने को मिलता है। यह आवश्यक नहीं कि उत्पीड़न करने वाला उच्च जाति का ही हो। एक गांव विशेष में जो जाति अत्यंत संगठित होती है और जिसके हाथों में आर्थिक व राजनैतिक या दोनों प्रकार की शक्तियां होती है, वह उसी शक्ति के बल पर गांव के हरिजनों पर अत्याचार व उत्पीड़न करती रहती है। इस प्रकार के उत्पीड़न न हिंसा के दिल दहला देने वाले समाचार हमें प्राय: समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलते है कि अमुक गांव में एक प्रभावषाली जाति के द्वारा हरिजन बस्ती में आग लगा दी गई जिसके फलस्वरुप गांव के सभी हरिजन परिवार बेघर हो गये।

अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक संरक्षण

संवैधानिक संरक्षण

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दलितों के उत्थान के लिए किये गए प्रयत्नों में सबसे पहले उल्लेखनीय उनके लिए संवैधानिक संरक्षण है। स्वतंत्र भारत के संविधान में उनकी अनेक निर्योग्यताओं को दूर करने के लिए निम्नवत नियम रखे गए है-

  1. अनुच्छेद-15 (1) राज्य किसी नागरिक के विरूद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या उनमें किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा।
    (2) केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई नागरिक (i) दुकानों, होटलों, पार्को तथा सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश (ii) साधारण जनता के उपयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, सड़कों, स्नानघाटों तथा सार्वजनिक

    समागम स्थानों के उपयोग के बारे में किसी भी निर्योग्यता, प्रतिबंध या शर्त के अधीन न होगा।

  2. अनुच्छेद-16:- राज्याधीन नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के संबंध में समस्त नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर किसी नागरिक के लिए राज्याधीन किसी नौकरी या पद के विषय में न अपात्रता होगी और न विभेद किया जायेगा।
  3. अनुच्छेद-17 :- अस्पृष्यता का अंत किया जाता है और इसका किसी भी रुप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृष्यता से उत्पन्न किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा, जो कानून के अनुसार दण्डनीय होगा।
  4. अनुच्छेद-29:- राज्यनिधि द्वारा घोषित या राज्यनिधि से सहायता पाई जाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित न किया जायेगा।
  5. अनुच्छेद-38:- राज्य ऐसे किसी सामाजिक व्यवस्था को कार्य साधन के रुप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की उन्नति का प्रयास करेगा, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करें।
  6. अनुच्छेद:- 46:- राज्य जनता के दुर्बलतम विभागों की विशेषत: अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा तथा अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करेगा तथा सामाजिक अन्याय व सब प्रकार का शोषण से उनका संरक्षण करेगा।

अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955:-

केन्द्रीय सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 15 को विस्तारपूर्वक लागू करने के लिए इस अधिनियम को पारित किया और यह कानून के रुप में 1 जून 1955 से लागू हुआ इस अधिनियम की मुख्य धाराएं निम्न प्रकार है:-

  1. धारा 3:- (1) प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी सार्वजनिक पूजा के स्थान में प्रवेश करने की स्वतंत्रता होगी, (2) प्रत्येक व्यक्ति किसी प्रकार की पूजा प्रार्थना या दूसरे धार्मिक संस्कार करने में स्वतंत्र होगा। (3) प्रत्येक व्यक्ति को धर्म संबंधी पवित्र नदी, तालाब आदि में नहाने या पानी लेने की स्वतंत्रता होगी, (4) इन नियमों का पालन न करने पर सरकार द्वारा दी गई कोई भी सहायता बंद की जा सकती है या जमीन छीनी जा सकती है।
  2. धारा:-4 प्रत्येक व्यक्ति को (1) किसी दुकान जलपान, गृह, होटलों या सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान में प्रवेश करने और धर्मशालाओं या मुसाफिरखानों के बर्तनों तथा अन्य चीजों को व्यवहार में लाने की स्वतंत्रता होगी। (2) किसी भी नदी, कुएं, नल, घाट, श्माशान या कब्रिस्तान के स्थानों को व्यवहार में लाने की स्वतंत्रता होगी। (3) साणारणत: जनता के लिए बनाई गई धर्मार्थ संस्थाओं के लाभ और सेवाओं की उपभोग करने का पूर्ण अधिकार होगा। (4) किसी भी मुहल्ले में जमीन खरीदने, मकान बनवाने और रहने की स्वतंत्रता होगी। (5) किसी भी धर्मशाला, सराय आदि से लाभ उठाने का पूर्ण अधिकार होगा। (6) किसी भी सामाजिक या धार्मिक संस्कार या प्रथा को अपनाने की स्वतंत्रता होगी, (7) किसी भी प्रकार के जेवर या अन्य चीजों को पहनने की स्वतंत्रता होगी।
  3. धारा-5:- (1) प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी सामाजिक चिकित्सालय, औषधालय, शिक्षा संस्था या छात्रावास में प्रवेश करने का अधिकार होगा और वहां प्रत्येक के साथ समान व्यवहार किया जावेगा। (2) अस्पृश्यता के आधार पर कोई भी दुकानदार किसी भी व्यक्ति को चीज बेचने या सेवा करने से इंकार नहीं कर सकता है।
  4. धारा-7:- इस कानून के किसी भी नियम को न मानने या अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले को दण्ड दिया जायेगा। ये दण्ड 6 माह की कैद या रु. 500/- के जुर्माना या दोनो ही हो सकते है।

नागरिक अधिकार संरक्षण कानून, 1976:- 

केन्द्रीय सरकार के प्रयासों के फलस्वरुप अस्पृश्यता के अपराध के लिए कडे़ दण्ड के प्रावधान का नया कानून 19 नवम्बर, 1976 से लागू कर दिया गया है। अस्पृश्यता सामाजिक बुराई को संविधान की धारा 17 द्वारा समाप्त कर दिया गया था। 1955 में अस्पृश्यता अपराध कानून बनाया गया परंतु समय-समय पर यह शिकायत होती रही है कि अस्पृश्यता को रोकने में यह कानून सक्षम नहीं है। इस आलोचना को देखते हुए केन्द्र सरकार ने एल. इल्यापेरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जिसने 1969 में अपनी रिपोर्ट दी। नया कानून इस कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है। इसे राष्ट्रपति ने 13 दिसम्बर, 1976 को अपनी स्वीकृति दे दी थी।

नागरिक अधिकार संरक्षण कानून, अस्पृश्यता अपराध कानून 1955 में किए गए संशोधन से अस्तित्व में आया है। इसके अन्तर्गत अस्पृश्यता के अपराध के लिए दण्डित लोग संसद और विधानसभा के चुनाव में खड़े नहीं हो सकेगें। अस्पृश्यता बरतने के अपराध में जुर्माना और जेल दोनों तरह की सजा की व्यवस्था की गई है।

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Unknown

Jun 6, 2019, 11:42 am Reply

Thank you sir jankari dene ke liye

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