संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा (CBT) क्या है?

अनुक्रम
संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा (Cognitive behavioral therapy या CBT) पद्धति एक अल्पावधि, लक्ष्य निर्धारित, मनोचिकित्सकीय उपचार है जो प्रयोगात्मक रूप से समस्या का समाधान करती है। इस पद्धति में लोगों की कठिनाइयों का कारण जानकर उनकी सोच, भावनाओं तथा संवेगों में परिवर्तन लाया जाता है यह व्यक्ति के जीवन की विभिन्न कठिन स्थितियों जैसे नींद न आना, संबंधों में कड़वाहट, नशे या शराब की बुरी आदतों को दूर करने के तथा तनाव व अवसाद का उपचार करने में सहायता करती है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा का इतिहास

1960 में आरोन. टी. बैक. नामक मनोचिकित्सक ने अपने उपचार काल के दौरान यह विश्लेषण क्रिया कि उसके मरीजो के दिमाग में विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है। और उनका प्रभाव इतना अधिक होता है, ऐसा लगता है मानो वे मूल शब्दों में अपने आप से बातें कर रहें हों, किन्तु वे इस विषय में उपचार के दौरान कुछ नहीं बताते। बैक ने विश्लेषण किया कि विचार तथा भावनाओं में गहरा संबंध होता है। उसने स्वतः: विचार. शब्द प्रतिपादित क्रिया और यहीं से ज्ञानात्मक बिहेवियर पद्धति का आरंभ हुआ। बैंक ने इसे ज्ञानात्मक पद्धति का नाम दिया। इसे ज्ञानात्मक बिहेवियरल पद्धति भी कहा जाता है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा की आवश्यकता 

अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि ज्ञानात्मक पद्धति में अवसाद का प्रभावी उपचार संभव है। ज्ञानात्मक पद्धति तथा अवसाद विरोधी दवाओं के प्रभाव से बड़े से बड़ा तथा गंभीर से गंभीर अवसाद भी ठीक हो सकता है। इन अध्ययनों तथा अनुभवों से पता चलता है कि यह पद्धति अवसाद तथा निराशा से घिरे लोगों के लिए एक वरदान है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा के चरण

ज्ञानात्मक बिहेवियर पद्धति, दूसरी मनोउपचार पद्धतियों से थोड़ी भिन्न हैं, क्योंकि इसमें उपचार कई सेशन में बंटा होता है, जबकि अन्य विधियों में मरीज़ अपने दिमाग तथा मन में जो भी विचार आता है, उसे वह परामर्शदाता के सामने रख देता है।

उपचार के प्रारंभ में प्रार्थी जब परामर्शदाता से मिलता है वह उसे अपनी समस्या बताता है और परामर्शदाता उपचार संबंधी लक्ष्य निर्धारित कर लेता है। यह समस्या कई प्रकार की हो सकती हैं। जैसे ठीक प्रकार से नींद न आना, मित्रों तथा संबंधियों के साथ ठीक प्रकार व्यवहार न करना, काम में मयान न लगना, किशोरावस्था से संबंधित शारीरिक व मानसिक समस्याए आदि। इस पद्धति में प्रार्थी जब परामर्शदाता के पास अपनी समस्या लेकर जाता है तो परामर्शदाता समस्या की गंभीरता का विश्लेषण करके उसके उपचार के लिए एक निश्चित समय अन्तराल के सेशन बनाता है। उसके बाद आगे की रणनीति बनाई जाती है।

गृहकार्य

जिस प्रकार स्कूल में बच्चों को किसी समस्या को सुलझाने के लिए कोई विशिष्ट कार्य या अभ्यास दिया जाता है उसी प्रकार मनोचिकित्सक भी अपने मरीज को अपनी समस्या से संबंधित विषयों से जुड़ी बातों के लिए कोई ऐसा क्रियाकलाप करने के लिए देते हैं जोकि उनके उपचार में प्रभावी होती है। जैसे उपचार के आरंभ में मनोचिकित्सक, प्रार्थी से उन घटनाओं को डायरी में नोट करने के लिए कहता है जो उसकी चिंता तथा अवसाद बढ़ाते हैं। अगले सेशन में क्रियाकलाप का रूप बदल दिया जाता है जैसे समस्या से संबंधित कुछ व्यायाम आदि।

स्टंक्चर का महत्व

स्टंक्चर इस पद्धति में इसलिए महन्वपूर्ण है क्योंकि यह पद्धति में समय के सही उपयोग में मदद करता है, इससे यह भी पता चलता है कि घर पर किये गए क्रियाकलापों में कोई चीज़ छूटी तो नहीं रह गई, इन सूचनाओं के आधार पर मनोचिकित्सक तथा प्रार्थी सही ढंग से नए सेशन में कार्य करने की रणनीति बनाते हैं। जैसे जैसे यह सेशन बढ़ता है, प्रार्थी आवश्यक तथा प्रभावी सिधान्तों को ग्रहण कर लेते हैं, तथा प्रार्थी स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं।

समूह सेशन

ज्ञानात्मक बिहेवियरल पद्धति कोई चमत्कार नहीं है। इसमें मनोचिकित्सक को पूर्ण कुशलता व योग्यता की आवश्यकता होती है। तथा प्रार्थी को मनोपचार के लिए शरीर,ह्रदय तथा मस्तिष्क से पूर्ण रूप से तैयार होना चाहिए। कई बार समस्या की प्रकृति को देखते हुए समूह में भी समस्या पर विचार किया जाता है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा की प्रकृति

अधिगम कोपिंग कौशल-CBT  समस्याओं को सुलझाने के लिए कौशल व निपुणता लाने के लिए कार्य करता है। CBT एक ही समय में विभिन्न तरीकों से कार्य करता है। जो व्यक्ति या छात्र चिंता से संबंधी समस्या में ऐसी परिस्थितियों से बचने का प्रयास करता है, जो चिंता को बढ़ती हैं, इसी प्रकार जो व्यक्ति अवसाद का शिकार है, वह अपने विचारों को रिकॉर्ड करना सीखता है, ताकि वह उनके बारें में तथा उनसे बाहर निकलने में सहायता प्राप्त कर सके। जो व्यक्ति किसी दीर्घ कालिक समस्या से ग्रस्त हैं वे चिंतन मनन द्वारा अपनी समस्या का हल ढूंढ़ने के लिए अपने आप को सक्षम बनाते हैं, इस प्रकार आत्ममंथन द्वारा कई गंभीर मानसिक समस्याओं का हल निकालने की क्षमता व कौशल का विकास होता है।

व्यवहार तथा विश्वास में बदलाव-ज्ञानात्मक बिहेवियरल पद्धति के द्वारा प्रार्थी के मूल व्यवहार तथा समस्या के प्रति संवेदनशीलता में परिवर्तन लाया जाता है। उदाहरण के तौर पर प्रार्थी यह सोचने लगता है कि चिंता इतना बड़ा विषय नहीं हैं, जितना कि इसे समझा जाता है या जो व्यक्ति गंभीर अवसाद से ग्रस्त हैं वे भी अपने आप को हीनभावना से मुक्त करके एक सामान्य व्यक्ति के रूप में जीवन व्यतीत करना सीखते हैं। संबंध की एक नई अवस्था-ज्ञानात्मक पद्धति के दौरान प्रार्थी तथा मनोचिकित्सक बीच में आपसी विश्वास का एक संबंध बना जाता है। जैसे जैसे उपचार आगे बढ़ता है। मनोचिकित्सक प्रार्थी के विचारों, व्यवहार तथा भावनाओं को सकारात्मकता की ओर ले जाता है। इस आपसी विश्वास को मयान में रखते हुए वह अपनी व्यक्तिगत समस्याए उनके समक्ष रखता है। अपनी समस्या को मनोचिकित्सक के समक्ष रखने के बाद प्रार्थी अपने आप को बहुत हल्का महसूस करता है। यह इस उपचार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

जीवन की समस्याओं का समाधान-ज्ञानात्मक बिहेवियरल अवसाद, चिंता, भय तथा अन्य मनोविकारों के समाधान के लिए एक अचूक औषधि का काम करता है। ज्ञानात्मक बिहेवियरल उपचार पद्धति इस सिंद्धात पर कार्य करती है कि व्यक्ति का ‘मूड’ उसके विचारों से सीधे तौर से जुड़ा होता है। नकारात्मक विचार व्यक्ति के मूड़, व्यवहार तथा शारीरिक अवस्था को भी पूर्णत: प्रभावित करते हैं।

ज्ञानात्मक बिहेवियरल पद्धति इसी प्रकार के नकारात्मक मनोभावों को पहचानने, उनकी वैधता का मूल्यांकन करने तथा उन्हें स्वस्थ विचारों से स्थानान्तरित करने में सहायता करती है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा के लाभ

  1. ज्ञानात्मक बिहेवियरल उपचार पद्धति एक आदेशात्मक प्रक्रिया है-जब प्रार्थी यह भली प्रकार से जान लेते हैं कि वे अपनी समस्याओं को किस प्रकार आत्म निरीक्षण से हल कर सकते हैं, तो वे पूरी लगन तथा समय सारणी के अनुसार मनाचिकित्सक की बताई हुई हर पद्धति का पालन करते हैं। इसलिए मनोचिकित्सक भी प्रार्थी को अच्छी तरह से पद्धति की हर प्रक्रिया समझाते हैं।
  2. ज्ञानात्मक बिहेवियरल पद्धति अल्पावधि होती हैं-CBT पद्धति में 16 सेशन तक हो सकते हैं जिसमें समस्या, वार्तालाप, गृहकार्य तथा उपचार पद्धति से सम्बंधित सभी कार्य होते हैं। कुछ लोग इन सेशनों की संख्या समस्या की गंभीरता को देखते हुए बढ़ा देते हैं किन्तु सामान्यत: यह संख्या 16 ही होती है। 
  3. ज्ञानात्मक पद्धति क्रास कल्चरल होती हैं-यह मानव व्यवहार के सार्वत्रिक नियमों पर निर्भर होता है, यह मनोचिकित्सक से अधिक प्रार्थी के लक्ष्य को निर्धारण पर बल देता है। CBT का मूलभूत सिद्धांत विचार, भावनाओं तथा व्यवहार में संबंधित होता है।

संज्ञानात्मक व्यवहारपरक चिकित्सा की हानि

  1. CBT की स्टंक्चर्ड प्रकृति के कारण अधिक गंभीर मानसिक विकारों तथा अधिगम संबंधी कठिनाइयों में यह उपचार पद्धति काम नहीं आ सकती है। 
  2. CBT केवल वर्तमान समस्याओं तथा बहुत विशेष समस्याओं को ही महत्व देती है, इसलिए इसमें बचपन में हुई पूर्वानुभवों की समस्या को सुलझाने में मदद नहीं कर सकती है।

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