अनिदेशात्मक परामर्श क्या है?

अनुक्रम
अनिदेशात्मक परामर्श विधि पूर्ण रूप से प्रार्थी केन्द्रित होती है। इस विधि में परामर्शदाता एक ऐसा सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करता है, जिससे प्रार्थी अपने अंदर छिपी गूढ़ भावनाओं व मनोविकारों को पूर्ण रूप से वार्तालाप के द्वारा बाहर प्रदर्शित करता है, वह भी बिना किसी भय अथवा दबाव के यहा पर परामर्श संबंधी सभी उनरदायित्व प्रार्थी पर होते हैं।

अनिदेशात्मक परामर्श के सोपान

  1. वार्तालाप : प्रथम सोपान में, परामर्शदाता तथा उपबोमय के बीच अनेक बैठकों में अनौपचारिक रूप से विभिन्न विषयों पर बातचीत होती है। अनेक बार ये दोनों बिना किसी उद्धेश्य के भी मिलते हैं। लेकिन प्रथम सोपान का मुख्य उद्धेश्य है- परस्पर सौहार्द्र की स्थापना करना जिससे उपबोमय नि:संकोच रुप से अपनी बात को कहने हेतु मानसिक रूप से तैयार हो सके। परामर्शदाता द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि वह उपबोमय के साथ मित्र के समान सम्बन्ध स्थापित कर ले और उसके समक्ष ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दे कि मित्र-चिकित्सा (नेन्ड-थेरैपी) की पद्धति को प्रयुक्त किया जा सके।
  2. जाच-पड़ताल : उपबोमय की वैयक्तिक समस्या, परिस्थिति एवं सन्दर्भों के सम्बन्ध में सविस्तार जाच पड़ताल की व्यवस्था इस सोपान के अन्तर्गत की जाती है। इसलिए परामर्शदाता विभिन्न परोक्ष प्रविधियों का प्रयोग करता है। 
  3. संवेगात्मक अभिव्यक्ति : उपबोमय की व्यवस्थाओं भावनाओं तथा मानसिक तनावों को अभिव्यक्त करने हेतु उसे अवसर प्रदान करना ही, इस सोपान का मुख्य उद्धेश्य है।
  4. परोक्ष रूप से प्रदान किए गए सुझावों पर चर्चा : इस सोपान में उपबोमय, परामर्शदाता द्वारा दिए गए सुझावों को एक आलोचनात्मक दृष्टि से देखता है।
  5. योजना का प्रतिपादन : इसमें परामर्शदाता को स्वयं की समस्या का हल प्राप्त करने हेतु एक वास्तविक योजना का निर्माण करने का अवसर प्रदान किया जाता है। इस योजना के स्वरूप, प्रभाव इत्यादि के सम्बन्ध, में दोनो विचार-विमर्श करते हैं।
  6. योजना का क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन : षष्ठम् सोपान के अन्तर्गत, उपबोमय द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित किया जाता है, तथा उसकी प्रभावशीलता ज्ञात करने के लिए आत्म-मूल्यांकन की व्यवस्था भी इस सोपान में की जाती है।
नेडरिक थार्न के अनुसार, परामर्शदाता का यह प्रयास प्रार्थी के व्यक्तिगत विभवों के व्युत्व्मानुपाती होता है। परामर्शदाता इस विधि में अधिकाधिक प्रयास द्वारा प्रार्थी की समस्याओं का निदान करने का प्रयास करता है। परामर्शदाता द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि वह उपबोमय के साथ मित्र के समान सम्बन्ध स्थापित कर ले और उसके समक्ष ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दे कि मित्र-चिकित्सा (नेड-थेरैपी) की पद्धति को प्रयुक्त किया जा सके।

अनिदेशात्मक परामर्श की विशेषताए

  1. इसके अन्तर्गत सेवार्थी को अपनी समस्या का हल स्वयं खोजने हेतु प्रेरित किया जाता है।
  2. इस उपबोधन में किसी भी प्रकार के निदानात्मक उपकरण अथवा परीक्षण का प्रयोग नहीं किया जाता है। किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में उपबोमय की सीमाओं को ज्ञात करने हेतु परीक्षाओं का उपयोग किया जाता है। 
  3. सेवार्थी को स्वतन्त्र दृष्टिकोण अपनाने हेतु इस के अन्तर्गत अवसर प्रदान किया जाता है। 
  4. सेवार्थी के विकास तथा समायोजन की प्रक्रिया में उसकी सहायता करना ही, इसका मुख्य उद्धेश्य होता है। अत: परामर्शदाता, एक मित्र के समान, उपबोमय में रूचि लेता है, बातचीत करता है और सेवार्थी की समस्याओं एवं कठिनाइयों में सम्मिलित होने हेतु तत्परता अभिव्यक्त करता है। 
  5. इस प्रकार के परामर्श में यथार्थता, संवेदनशीलता एवं स्वाभाविकता का होना परम आवश्यक है। इस प्रकार के परामर्श में यथार्थता, संवेदनशीलता एवं स्वाभाविकता का होना परम आवश्यक है।

अनिदेशात्मक परामर्श के संदर्भ में रोगर्स सिद्धांत

रॉगर्स ने अनिदेशात्मक परामर्श विधि के संदर्भ में कई सिद्धांत दिये हैं जो हैं-
  1. प्रति व्यक्ति इस परिवर्तनीय संसार में अस्तित्व रखता है। 
  2. हर व्यक्ति अपने आप को दुनिया में सबसे अधिक अच्छी तरह जानता और समझता है, इसलिए अपनी जानकारी के लिए सबसे अच्छा स्त्रोत वह व्यक्ति स्वयं होता है। 
  3. प्रत्येक व्यक्ति में अपने आप को समझने, अपनी क्षमताओं व योग्यताओं को बनाये रखने के लिए तथा उन्हें बढ़ाने के लिए एक स्वाभाविक प्रवृनि होती है। 
  4. भावनाए तथा संवेग किसी भी व्यक्ति की क्षमताओं के विकास में बाधक नहीं बल्कि वृद्धि तथा विकास के लिए आवश्यक हैं। 
  5. किसी भी व्यक्ति के स्वभाव को समझने के लिए उसकी अन्तर्मुखी स्वभाव को समझना बहुत आवश्यक है।

अनिदेशात्मक परामर्श की सीमायें

  1. इस प्रकार के परामर्श को शिक्षालय अथवा महाविद्यालयों की परिस्थितियों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है। 
  2. इसके अन्तर्गत उपबोमय की अपनी आवश्यकताओं एवं सुविधाओं के अनुसार समय देना पड़ता है, जिससे सम्पूर्ण परामर्श प्रक्रिया पूर्ण होने में अधिक समय लगता है। 
  3. वैयक्तिक विभिन्नताओं को मयान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि अनेक परिस्थितियों में कुछ छात्र स्वयं कोई कदम उठाने में संकोच करते हैं तथा छ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जो परामर्शदाता के बगैर छ भी करने को तैयार नहीं होते हैं।

निदेशात्मक एवं अनिदेशात्मक परामर्श में अन्तर

  1. समय की दृष्टि से दोनों परामर्शो में अन्तर है। अनिदेशीय उपबोधन में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। 
  2. निदेशात्मक उपबोध के अन्तर्गत, विश्लेषण को तथा अनिदेशात्मक परामर्श सेवार्थी-केन्द्रित होता है।
  3. निदेशात्मक परामर्श समस्या-केन्द्रित होता है, जबकि अनिदेशात्मक परामर्श सेवार्थी-केन्द्रित होता है।
  4. निदेशात्मक परामर्श के अन्तर्गत, सभी बौद्धिक पक्ष को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि अनिदेशात्मक उपबोधन, में सेवार्थी के संवेगात्मक पक्ष ही का महत्व दिया जाता है। 
  5. निदेशात्मक उपबोधन में व्यक्ति इतिहास का उपयोग किया जाता है तथा अनिदेशात्मक परामर्श में यह अमययन नहीं किया जाता है। 
  6. निदेशात्मक परामर्श का वह रूप माना जाता है जिसमें व्यक्ति की क्षमताओं की सीमाए होती हैं अत: सेवार्थी हेतु अपनी समस्याओं का पूर्वाग्रहों से मुक्त अमययन असम्भव है। जबकि अनिदेशात्मक परामर्श के अन्तर्गत यह स्वीकार किया जाता है कि व्यक्तियों में स्वयं की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता एवं योग्यता निहित होती है। 
अत: उसे मात्र क्षमता व शक्ति के अनुकूल पहचान करने की आवश्यकता होती है। प्रत्युनर देना: जब प्रार्थी अपनी सारी स्थिति से परामर्शदाता को अवगत कराता है, तो परामर्शदाता उसको सकारात्मक ढंग से प्रत्युनर के तौर पर उसको समझाता है तथा परामर्श देता है। यदि प्रार्थी की बातें सुनकर परामर्शदाता नकारात्मक ढंग से प्रत्युनर देता है या नकारात्मक व्यवहार करता है, तो प्रार्थी अपनी छिपी भावनाओं को अंदर ही दबा लेता है, तथा परामर्शदाता को पूर्ण सहयोग नहीं देता है।

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