मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा, शाखाएं एवं अध्ययन की आवश्यकता

मनोविज्ञान का अर्थ मनोविज्ञान (Psychology) दो ग्रीक शब्दों, 'Psyche' तथा 'Logos' के मिलने से बना है। 'Psyche' का अर्थ ‘आत्मा’ तथा 'Logos' का अर्थ अध्ययन करना अथवा ‘विवेचना’ करना होता है। अत: इस शाब्दिक अर्थ के अनुसार मनोविज्ञान को आत्मा का अध्ययन करने वाला विषय माना गया है।’’

आरंभिक ग्रीक दार्शनिकों जैसे अरस्तू (Aristotle) तथा प्लेटो (Plato) ने मनोविज्ञान को आत्मा का ही विज्ञान कहा। 17वीं शताब्दी के दार्शनिकों जैसे लिबिनिज (Leibinitz), लॉक (Locke) आदि ने 'Psyche' शब्द का अधिक उपयुक्त अर्थ ‘मन’ (mind) से लगाया। और इस तरह से इन लोगों ने मनोविज्ञान को मन के अध्ययन (study of mind) का विषय माना। परन्तु आत्मा या मन ये दोनों ही कुछ पद ऐसे थे जिनका स्वरूप अप्रेक्षणीय (unobservable) तथा अदर्शनीय था। अत: इन दोनों तरह की परिभाषाओं को वैज्ञानिक अध्ययन के लिए स्वीकार्य नहीं माना गया। इसके बाद लोगों ने मनोविज्ञान को चेतना या चेतन अनुभूति के अध्ययन को विज्ञान कहा। 

मनोविज्ञान की परिभाषा

विलियम वुण्ट (Wilhelm Wundt) तथा उनके शिष्य टिचेनर (Titchener) इस परिभाषा के प्रमुख समर्थक थे। परन्तु इस परिभाषा को भी वैज्ञानिक अध्ययन के लिए स्वीकार्य नहीं माना गया क्योंकि इससे वैज्ञानिक ढंग से प्रेक्षणीय करने एवं समझने में कोई खास मदद नहीं मिलती थी। विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक (Father of experimental psychology) कहा जाता है क्योंकि इन्होंने लिपजिंग विश्वविद्यालय में 1879 में पहली मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला खोली थी।’’

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा मनोविज्ञान को अधिक वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ रूप से परिभाषित करने की कोशिश की गयी। इन लोगों ने मनोविज्ञान को व्यवहार का अध्ययन (study of behaviour) का विज्ञान माना है। मनोविज्ञान को व्यवहार के अध्ययन के विज्ञान के रूप में परिभाषा जे.बी. वाटसन (J.B. Watson) ने सर्वप्रथम दिया था। व्यवहार को एक ठोस एवं प्रेक्षणीय (observable) पहलू के रूप में परिभाषित किया गया।’’

अत: यह आत्मा, मन तथा चेतना आदि से काफी भिन्न था क्योंकि ये सभी कुछ ऐसे थे जो आत्मनिष्ठ (subjective) थे तथा जिनका प्रेक्षण (observation) भी नहीं किया जा सकता था। इसको विषय-वस्तु व्यवहारात्मक प्रक्रियाएँ (behaviour processes) माना गया जिसे आसानी से प्रक्षेण किया जा सकता है। सीखना, प्रत्यक्षण, हाव-भाव आदि जिनका वस्तुनिष्ठ अध्ययन संभव है, उसका ही अध्ययन मनोविज्ञान करता है। साथ-ही-साथ मनोविज्ञान उन मानसिक प्रक्रियाओं (mental processes) का भी अध्ययन करता है जिनका सीधे प्रेक्षण तो नहीं किया जाता है परन्तु उसके बारे में आसानी से व्यवहारात्मक एवं मनोवैज्ञानिक आँकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखकर मनोविज्ञान की एक उत्तम परिभाषा सैनट्रोक (Santrock, 2000) के अनुसार, ‘‘मनोविज्ञान व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।’’’’

बेरोन (Baron, 2001) के अनुसार, ‘‘मनोविज्ञान संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं एवं व्यवहार के विज्ञान के रूप में उत्तम ढंग से परिभाषित किया जाता है।’’’’

बोरिंग बोरिंगंग लैगफेल्ड व वेल्ड- ‘‘मनोविज्ञान मानव प्रकृति का अध्ययन है।’’

सिस्सरेल्ली एवं मेअर (Ciccarelli - Meyer, 2006) के अनुसार, ‘‘मनोविज्ञान व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।’’

क्रो एवं क्रो- ‘‘मनोविज्ञान मानव व्यवहार आरै मानव संबंधों का अध्ययन है।’’

वुडुडवर्थर्- ‘‘मनोविज्ञान वातावरण के संबंध में व्यक्तियों की क्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।’’

जेम्स- ‘‘मनोविज्ञान की सर्वोत्तम परिभाषा चेतना के वर्णन और व्याख्या के रूप में की जा सकती है।’’

मनोविज्ञान के लक्ष्य 

(Goals of Psychology) मनोविज्ञान मानव एवं पशु के व्यवहार एवं संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। ऐसे अध्ययन के पीछे उसके कुछ छिपे लक्ष्य (goals) होते हैं।  मनोविज्ञान के मुख्य लक्ष्य निम्नांकित तीन हैं 
  1. मापन एवं वर्णन (Measurement and description)
  2. पूर्वानुमान एवं नियंत्रण (Prediction and control) 
  3. व्याख्या(Explanation) 
1. मापन एवं वर्णन- मनोविज्ञान का सबसे प्रथम लक्ष्य प्रणाली के व्यवहार एवं संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का वर्णन करना तथा फिर उसे मापन करना होता है। प्रमुख मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं जैसे - चिंता, सीखना, मनोवृत्ति, क्षमता, बुद्धि आदि का वर्णन करने के लिए पहले उसे मापना आवश्यक होता है। इसे मापने के लिए कई तरह के परीक्षण की आवश्यकता होती है। इसलिए मनोविज्ञान का एक मुख्य लक्ष्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को मापने के लिए परीक्षण या विशेष प्रविधि का विकास करना है। किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण या प्रविधि में कम-से-कम दो गुणों का होना अनिवार्य है - विश्वसनीयता (reliability) तथा वैधता (validity) विश्वसनीयता से तात्पर्य इस तथ्य से होता है कि बार-बार मापने से व्यक्ति के प्राप्तांक में कोई परिवर्तन नहीं आता है। 

वैधता से तात्पर्य इस बात से होता है कि परीक्षण वही माप रहा है जिसे मापने के लिए उसे बनाया गया है। मापने के बाद मनोवैज्ञानिक उस व्यवहार का वर्णन करते हैं। जैसे - बुद्धि परीक्षण द्वारा बुद्धि मापने पर यदि किसी व्यक्ति का बुद्धि लब्धि (intelligence quotient) 150 आता है तो मनोवैज्ञानिक यह समझते हैं कि व्यक्ति तीव्र बुद्धि का है और वह विभिन्न परिस्थितियों में बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार कर सकता है।’’

2. पूर्वानुमान एवं नियंत्रण- मनोविज्ञान का दूसरा लक्ष्य व्यवहार के बारे में पूर्वकथन करने से होता है ताकि उसे ठीक ढंग से नियंत्रित किया जा सके। जहाँ तक पूर्वकथन का सवाल है, इसमें सफलता, मापन (measurement) की सफलता पर निर्भर करता है। सामान्यता: मनोवैज्ञानिक व्यवहार के मापन के आधार पर ही यह पूर्वकथन करते हैं कि व्यक्ति अमुक परिस्थिति में क्या कर सकता है तथा कैसे कर सकता है? जैसे अगर हम किसी छात्र के सामान्य बौद्धिक स्तर का मापन करके उसके बारे में सही-सही जान लें तो हम स्कूल में उसके निष्पादन (performance) के बारे में पूर्वकथन आसानी से कर सकते हैं। जैसे व्यक्ति की अभिरुचि को मापकर मनोवैज्ञानिक यह पूर्वानुमान लगाते हैं कि व्यक्ति को किस तरह के कार्य (job) में लगाना उत्तम होगा ताकि उसे अधिक-से-अधिक सफलता प्राप्त हो सके। पूर्वकथन तथा नियंत्रण साथ-साथ चलता है और मनोवैज्ञानिक जब भी किसी व्यवहार के बारे में पूर्वकथन करता है तो उसका उद्देश्य उस व्यवहार को नियंत्रित भी करना होता है।’’

3. व्याख्या- मनोविज्ञान का अंतिम लक्ष्य मानव व्यवहार की व्याख्या करना होता है। व्यवहार की व्याख्या करने के लिए मनोवैज्ञानिक कुछ सिद्धान्तों का निर्माण करते हैं ताकि उनकी व्याख्या वैज्ञानिक ढंग से की जा सके। ऐसे सिद्धान्त ज्ञात स्त्रोतों से तथ्यों को संगठित करते हैं और मनोवैज्ञानिक को उस परिस्थिति में तर्कसंगत अनुमान लगाने में मदद करते हैं जहाँ वे सही उत्तर नहीं जान पाते हैं। मानव व्यवहार की व्याख्या करना मनोविज्ञान का सबसे अव्वल लक्ष्य हैं क्योंकि जब तक मनोवैज्ञानिक यह नहीं बतला पाते हैं कि व्यक्ति अमुक व्यवहार क्यों कर रहा है, अमुक मापन प्रविधि क्यों काम में ले रहा है तो वे सही ढंग से न तो उस व्यवहार के बारे में पूर्वकथन ही कर सकते हैं और न ही ठीक ढंग से नियंत्रण ही संभव है।’’

मनोविज्ञान की शाखाएं

कुछ ही वर्षों के समय में इस विज्ञान के अनेक विभाग हो चुके है और इन विभागों की भी अनेक शाखाएं उत्पन्न हो चुकी है। यों तो मनोविज्ञान की बहुत सी शाखाएं है किन्तु उनमें से मुख्य है:-
  1. सामान्य मनोविज्ञान। 
  2. पशु मनोविज्ञान। 
  3. तुलनात्मक मनोविज्ञान। 
  4. वैयक्तिक मनोविज्ञान। 
  5. सामाजिक मनोविज्ञान। 
  6. मनोविज्ञान अथवा विश्लेषण मनोविज्ञान। 
  7. असामान्य मनोविज्ञान। 
  8. चिकित्सा मनोविज्ञान। 
  9. बाल मनोविज्ञान। 
  10. उद्योग मनोविज्ञान। 
  11. वाणिज्य मनोविज्ञान। 
  12. शिक्षा मनोविज्ञान।

मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता क्यों है?

मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर हम सभी को अपने जीवन में झांकने से प्राप्त होता है। हम सभी अपने जीवन में जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त विभिन्न प्रकार के अनुभवों से गुजरते हैं, एवं जिनमें घटनाओं को समझना, चुनौतियों से निबटना, संबंधों का विकास, रोग आदि सम्मिलित होते हैं। इन अनुभवों के प्रकाश में हम जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में निर्णय लेते हैं। हमारे ये निर्णय कभी सही साबित होते हैं कभी गलत। कुछ परिस्थितियों में हमें स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि हम सही निर्णय कर रहे हैं वही कुछ परिस्थितियों में हम अस्पष्ट होते हैं। हमारे निर्णयों का सही एवं गलत होना हमें प्राप्त सूचनाओं की समझ एवं उनकी विश्लेषण कर पाने की क्षमता पर निर्भर करता है। 

इसके साथ ही हमारी भाव दशा एवं पूर्व अनुभव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सही निर्णय हमें सही परिणाम प्रदान करते हैं एवं हमें हमारे लक्ष्य की प्राप्ति होती है। सही निर्णय हमारे जीवन को बेहतर बनाते हैं। ऐसी परिस्थिति में यह प्रश्न उठता है कि यह निर्णय लेने की प्रक्रिया किस प्रकार घटित होती है? कौन से कारक इसमें बाधक होते हैं? एवं कौन से कारक इसमें सहायक होते हैं? यदि इन प्रश्नों का समुचित उत्तर हमें प्राप्त हो सके तो हम निर्णय करने की प्रक्रिया को समझ सकते हैं। 

सार रूप में यदि कहें तो अपने दैनिक जीवन में हम अपनी मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा संचालित होते हैं जिनके बारे में हमें निश्चित रूप से जानना चाहिए। इसी कारण मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता है।

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