समन्वित परामर्श अथवा समाहारक परामर्श क्या है?

अनुक्रम
जो परामर्शदाता निदेशात्मक या अनिदेशात्मक विचारधाराओं से असहमत हैं उन्होंने उपबोधन (परामर्श) के एक अन्य प्रकार की तकनीक को विकसित किया है, जिसे ‘समन्वित परामर्श अथवा ‘समाहारक परामर्श’ कहा जाता है। समन्वित परामर्श एक प्रकार से दोनों उपबोधनों के मध्य का परामर्श है, इसे मध्यमार्गीया’ के नाम से भी सम्बोधित किया जा सकता है। समाहारक परामर्श की प्रवृत्ति के अनुरूप इसके अन्तर्गत आवश्यकता पड़ने पर और सेवार्थी के हित में होने पर भावात्मक अभिव्यक्ति पर नियन्त्रण भी लगाया जा सकता है। इसमें उपबोधक पूर्णरूप से तटस्थ नहीं रहता है। इसमें परिस्थिति के अनुरूप उपबोधक तथा सेवार्थी के सम्बन्धों के ममय छ पूर्व निश्चित दूरी (Reservations) निहित रहती है।

समन्वित परामर्श / समाहारक परामर्श की अवधारणा

समाहारक परामर्श निदेशात्मक तथा अनिदेशात्मक विधियों का विश्लेषणात्मक समागम है। यह इन दोनों विधियों के बीच के स्तर की परामर्श विधि है। समाहारक परामर्श में परामर्शदाता न तो निदेशात्मक परामर्श विधि की तरह अग्रणी व प्रमुख भूमिका निभाता है न ही अनिदेशात्मक परामर्श विधि की तरह गौण रूप से भाग लेता है, अपितु दोनों के ममय का रास्ता अपनाता है।

समाहारक परामर्श में, व्यक्ति तथा उसके व्यक्तित्व संबंधी आवश्यकताओं का परामर्शदाता अमययन करता है। अमययन के पश्चात वह परामर्श के लिए उचित विधि का चयन करता है।

समाहारक परामर्श में परामर्शदाता प्रार्थी की आवश्यकता के अनुरूप परामर्श निदेशात्मक विधि से आरंभ करता है तथा धीरे-धीरे अनिदेशात्मक विधि की ओर बढ़ता है, कभी अनिदेशात्मक विधि से चलकर निदेशात्मक विधि की ओर बढ़ता है, तथा बीच बीच में प्रार्थी को स्थिति के अनुसार हर प्रकार का सहयोग प्रदान करता है।

समन्वित परामर्श / समाहारक परामर्श की विशेषताएं

थॉर्न द्वारा अनुमोदित, सम्भावनात्मक परामर्श की प्रमुख विशेषतायें हैं-
  1. इसमें सामान्यत: वस्तुनिष्ठ एवं समन्वयपरक विधियों का प्रयोग किया जाता है। 
  2. परामर्श की विधि का प्रयोग करते समय अल्पव्यय के सिद्धान्त को मयान में रखा जाता है। 
  3. परामर्श के प्रारम्भ में सामान्यत: उन प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें उपबोमय की भूमिका सव्यि होती है तथा परामर्शदाता की भूमिका नििष्व्य हो। 
  4. समस्त विधियों एवं प्रविधियों का प्रयोग करने हेतु परामर्शदाता में अपेक्षित व्यावसायिक दक्षता व शलता होना आवश्यक है। 
  5. इसके अन्तर्गत, उपबोमय की आवश्यकता को मयान में रखकर ही निदेशात्मक तथा अनिदेशात्मक विधियों को प्रयुक्त करने का निर्णय लिया जाता है। 
  6. समन्वित परामर्श के अन्तर्गत कार्य शलता एवं उपचार प्राप्त कराने को विशिष्ट महत्व दिया जाता है। समाहारक उपबामय में अपेक्षित अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया जाता है, जिससे वे स्वयं की पहल के अनुसार समस्याओं का समाधान स्वयं खोज सकें।

समन्वित परामर्श / समाहारक परामर्श के सोपान

  1. उपबोमय की आवश्यकता तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी आवश्यकताओं का अध्ययन : प्रथम सोपान में परामर्शदाता यह प्रयास करता है कि उपबोमय की वास्तविक आवश्यकता क्या है? प्रार्थी की व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की जाये। सर्वप्रथम उसकी वास्तविक आवश्यकता ज्ञात की जाती है। 
  2. प्रविधियों का चयन : इसके अन्तर्गत, उपबोमय की आवश्यकता के अनुसार प्रवििधायों का चयन कर, उनका उपयोग किया जाता है। द्वितीय सोपान की मुख्य विशेषता है- परामर्श की प्रविधियों को व्यक्ति की आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों के अनुकूल प्रयुक्त करने का प्रयास करना।
  3. प्रविधियों का प्रयोग : चयनित प्रविधियों को विशिष्ट परिस्थिति में प्रयुक्त किया जाता है। जिन प्रविधियों का चयन किया जाता है। उनकी उपयोगिता उपबोमय की परिस्थिति के अनुसार ही देखी जाती है। 
  4. प्रभावशीलता का मूल्यांकन : उपबोमय को यथोचित परामर्श देने तथा पथ-प्रदर्शन हेतु वांछनीय तैयारी इस सोपान में की जाती है। इसमें प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाता है। 
  5. परामर्श की तैयारी : उपबोमय को यथोचित परामर्श तथा पथ-प्रदर्शन हेतु वांछनीय तैयारी इस सोपान में की जाती है। 
  6. उपबोमय एवं अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों की राय प्राप्त करना : परामर्श के कार्यक्रम एवं अन्य आवश्यक उद्धेश्य एवं विषयों पर उपबोमय एवं उससे सम्बद्ध अन्य व्यक्तियों की राय को जाना जाता है।

समन्वित परामर्श / समाहारक परामर्श के उपचारात्मक उपयोग

सभी प्रकार की मनोचिकित्सकीय परामर्शों का एक मात्र तथा विशिष्ट लक्ष्य मनोरोगी अथवा प्रार्थी की मनोस्थिति में सुधार लाना होता है। मनोचिकित्सिक या परामर्शदाता इस विधि का उपयोग यह जानने में करते हैं कि व्यक्ति अपनी क्षमताओं का उपयोग करके जीवन के दायित्वों को पूर्ण कर सकता है या नहीं यदि परामर्शदाता इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हो जाता है तो प्रार्थी की चिकित्सा के लिए दैनिकचर्या के कुछ कार्यक्रम संयोजित कर लेता है। इस पद्धति में प्रार्थी के प्रशिक्षण तथा पुनर्शिक्षा पर ध्यान दिया जाता है।

समन्वित परामर्श / समाहारक परामर्श की सीमाएँ 

  1. निदेशात्मक तथा अनिदेशात्मक परामर्श को एक दूसरे से मिलाकर उपचार करना अत्यधिक समस्या उत्पन्न करता है। 
  2. इस पद्धति में यह प्रश्न उठता है कि व्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता देनी चाहिए इस प्रकार की स्वतंत्रता के लिए कोई निश्चित नियम नहीं हैं। 
  3. इस प्रकार की पद्धति में यदि परामर्शदाता, प्रार्थी की समस्या को न समझे या पूर्ण रूप से न समझ सके तो, उसे गलत परामर्श दे सकता है, जिससे प्रार्थी को लाभ की जगह नुकसान पहुचा सकता है।

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