संवेगात्मक विकास का अर्थ एवं विशेषताएँ

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जीवन में संवेगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा व्यक्ति के वैयक्तिक
एवं सामाजिक विकास में संवेगों का योगदान होता है। लगातार संवेगात्मक
असन्तुलन/अस्थिरता व्यक्ति के वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करती है तथा
अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक और समाजिक समस्याओं को उत्पन्न करती
है। दूसरी ओर संवेगात्मक रूप से स्थिर व्यक्ति खुशहाल, स्वस्थ एवं शान्तिपूर्ण
जीवन व्यतीत करता है। अत: संवेग व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी पक्षों को
प्रभावित करते है। अंग्रेजी का ‘Emotion’ शब्द लेटिन भाषा के शब्द ‘Emovere’ से लिया
गया है। ‘Emovere’ का अर्थ होता है- Stir up, to agitate या to excite अर्थात
– उत्तेजित होना। इगंलिश तथा इगंलिश (1958) के अनुसार- “संवेग एक जटिल भाव की अवस्था होती है जिसमें कुछ खास-खास शारीरिक व ग्रन्थीएँ क्रियाएँ होती हैं।”  बेरान, बर्न तथा कैण्टोविल (1980) के अनुसार- “ संवगे से तात्पर्य एक एसी आत्मनिष्ठ भाव की अवस्था से होता है जिसमें कुछ शारीरिक उत्तेजना पैदा होती है और फिर जिसमें कुछ खास-खास व्यवहार होते है।” परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि संवेग-

  1. जटिल मानसिक अवस्था है जिसमें शारीरिक व मानसिक पक्षों का
    समावेश होता है।
  2. किसी व्यक्ति, वस्तु एवं स्थिति के सम्बन्ध में सुख-दुख की अनुभूति कम
    या अधिक मात्रा में होती है।
  3. संवेग की अवस्था में आंगिक प्रक्रियाओं जैसे नाड़ी, श्वसन, ग्रन्थिस्त्रावों
    का एक विसरित उद्दीपन होता है।
  4. व्यक्ति की चिन्तन एवं तर्क शक्ति क्षीण हो जाती है।
  5. व्यक्ति आवेगी बल का अनुभव करता है।

संवेगो के विकास के सन्दर्भ में दो मत है-

  1. संवेग जन्मजात होते है इस मत को मानने वालो में वके विन तथा
    हांलिगवर्थ आदि है। हांलिगवर्थ का मानना है कि प्राथमिक संवेग जन्मजात होते है। वाटसन
    ने बाताया कि जन्म के समय बच्चे में तीन प्राथमिक संवेग भय, क्रोध व
    प्रेम होते है।
  2. संवेग अर्जित किए जाते है – कुछ मनोवैज्ञनिको का मत है कि
    संवेग विकास एवं वृद्धि की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त किए जाते है। इस
    सम्बन्ध में हुए प्रयोग स्पष्ट करते है कि जन्म के समय संवेग निश्चित रूप
    से विद्यमान नही होते है। बाद में धीरे-धीरे बच्चा ऐसी निश्चित प्रतिक्रियाएँ
    करता है जिससे ज्ञात होता है कि उसे सुखद व दुखद अनुभूति हो रही
    है।

सवंगो की विशेषताएँ 

  1. संवेगात्मक अनुभव किसी मूल प्रवृति या जैविकीय उत्तेजना से जुड़े होते है। 
  2. सामान्यत: संवेग प्रत्यक्षीकरण का उत्पाद होते हैं।
  3. प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव के दौरान प्राणी में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते है। 
  4. संवेग किसी स्थूल वस्तु या परिस्थिति के प्रति अभिव्यक्त किए जाते है। 
  5. प्रत्येक जीवित प्राणी में संवेग होते है। 
  6. विकास के सभी स्तरों में संवेग होते है और बच्चे व बूड़ो में उत्पन्न किए जा सकते है 
  7.  एक ही संवेग को अनेक प्रकार के उतेजनाओं (वस्तुओं या परिस्थितियों) से उत्पन्न किया जा सकता है 
  8.  संवेग शीघ्रता से उत्पन्न होते है और धीरे-धीरे समाप्त होते है। 

बच्चो के सवंगो की विशेषताएँ 

  1. बच्चों के संवेग थोडे़ समय के लिए होते है बच्चे अपने संवेगो की अभिव्यक्ति बाहरी व्यवहार द्वारा तुरन्त कर देते है जब कि बड़े होने पर बाहरी व्यवहार पर सामाजिक नियन्त्रण होता है।
  2. बच्चों के संवेग तीव्र होते है। बच्चे डर, क्रोध व खुशी आदि की अभिव्यक्ति अत्यधिक तीव्रता से करते है। 
  3. बच्चों के संवेग अस्थिर होते है। बच्चों के संवेगो में शीघ्रता से बदलाव होता है उदाहरणार्थ अभी लड़ाई और थोड़ी ही देर में तुरन्त दोस्ती कर लेते है।
  4. बच्चों के संवेग बार-बार दिखायी देते है क्योकि वे अपने संवेगों को छिपाने में असमर्थ होते है। बच्चे दिन में अनेक बार गुस्सा करते है या खुश होते है। 
  5. बच्चों की संवेगात्मक प्रतिक्रिया में भिन्नता पायी जाती है एक ही संवेग की अवस्था में प्रत्येक बच्चा अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है- 

उदाहरणार्थ :- अजनबी के सामने एक बच्चा भाग जाएगा व दूसरा रोने लगेगा।

बच्चों में पाये जाने वाले संवेगात्मक ढंग

डर –प्रथम वर्ष के अन्त के पहले ही डर से सम्बन्धित उत्तेजनाएॅ बच्चे पर प्रभाव डालने लगती है। समय के साथ-साथ उन वस्तुओं की संख्या बढती जाती है जो बच्चे को डराती है। मानसिक विकास के साथ-साथ वह इस योग्य होता है कि उन वस्तुओं और व्यक्तियों को पहचान सके जो उसे डराती हैं। डर चाहे तार्किक हो या अतार्किक इसकी जड़ बच्चों के अनुभवों में होती है। छोटा बच्चा सामान्यत: जोर की आवाज, अजनबी – लोग, -जगह, -वस्तुएँ, अंधेरी जगह व अकेले रहने से डरते है। यह डर अवस्था के साथ-साथ कम हो जाता है। डर के प्रति बच्चे की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शारीरिक व मानसिक दशा क्या है। यदि बच्चा थका हुआ है तो ऐसी स्थितिया डर को और बढ़ाती है। Boston ने अपने अध्ययनों में पाया कि बुद्धिमान बच्चे डर अधिक प्रदर्शित करते है क्योंकि वे खतरे की सम्भावनाओं को समझते है। डर तब उपयोगी होता है जब यह खतरे से सावधान करता है।

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क्रोध –

यह संवेगात्मक प्रतिक्रिया बच्चे ज्यादा करते है क्योंकि वातावरण में क्रोध दिलाने वाले उत्तेजक डर की अपेक्षा अधिक होते है। अधिकतर बच्चे शीघ्र ही यह समझ जाते है कि क्रोध ध्यान आकृष्ड करने का अच्छा तरीका है। इससे उनकी इच्छा की पूर्ति होती है। छोटे बच्चे को आराम न मिलने पर क्रोध आता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तो वह स्वयं काम करना चाहता है और कार्य न कर पाने पर गुस्सा दिखाता है। विद्यालय जाने से पूर्व की आयु के बच्चे उन पर गुस्सा करते है जो उनके खेल की चीजो को छूते है व उनके खेलने में बाधा उत्पन्न करते है। उत्तर बाल्यावस्था में बच्चे की मजाक उड़ाने, उनकी गलती निकालने व दूसरे बच्चो से तुलना करने पर उनके गुस्सा आता है। क्रोध को अभिव्यक्त करने का ढ़ंग वातावरण से सीखा जाता है।

ईर्ष्या –

ईर्ष्या बच्चे तब दिखाते है जब प्यार की कभी के लिए वास्तव में कोई स्थिति जिम्मेदार होती है या बच्चा प्यार की कमी महसूस करता है। ईर्ष्या इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे उससे कैसा व्यवहार करते है व बच्चे को कैसा प्रशिक्षण मिला है। कभी-कभी माता-पिता दूसरो की प्रशंसा अत्याधिक करते है उस प्रकार वे अपने बच्चों में प्रतिद्वन्दिता व स्पर्धा उत्पन्न करते है। ईष्र्या की स्थिति में बच्चे विभिन्न प्रतिक्रिया देते है।

  1. गुस्सा करना:- यह दो पक्रार से पक्रट किया जाता है –
    1. प्रत्यक्ष रूप से जिससे ईष्र्या होती है उसके रास्ते में मिल जाने पर उस पर प्रहार करना
    2. अप्रत्यक्ष रूप से जिससे ईर्ष्या होती है उसकी अनुपस्थिति में उसके बस्ते से उसकी कापी या किताब चुराना लेना।
  2. आत्मीकरण करना:- जिससे ईर्ष्या होती है उससे बच्चा आत्मीकरण कर लेते है।
  3. अधिक प्यार मिलने वाले से स्वयं को अलग करना
  4. दमन:- बच्चा अपनी भावनाओं को यह कहते हएु दबा देता है कि मैं परवाह नही करता
  5. मार्गान्तीकरण- यदि बच्चा पढने में तजे बच्चे से ईष्र्या करता है तो वह खेल में स्वयं को आगे कर लेता है।

हर्ष, सन्तोष एवं सुख-

ये तीनो सुखद संवेग है। इनमें मात्रा का अन्तर है। ये निश्चयात्मक संवेग है। क्योकि व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वीकार करता है जो इस संवेग को उत्पन्न करती है। छोटे बच्चों में ये संवेग शारीरिक कष्ट न होने पर देखा जाता है। बडे बच्चों को सन्तोष व हर्ष तब होता है जब उन्हे सफलता मिलती है, दूसरें से प्रशंसा मिलती है व दूसरो से उच्चता या श्रेष्ठता का अनुभव होता है।

स्नेह –

स्नेह बच्चे किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति दिखाते है। छोटे बच्चे उनके प्रति स्नेह दिखाते है जो उनकी आवश्यमताओं की परवाह करते है, उनसे खेलते है, सामान्यत: जो उन्हे हर्ष एवं सन्तोष प्रदान करते है। परिवार के सदस्यों एवं ऐसे लोग जिनसे खून का सम्बन्ध नही है, बच्चा स्नेह दिखाएगा या नही यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे के प्रति इन लोगो का व्यवहार कैसा है।

उत्सुकता या कौतुहल-

छ: से सात महीने के बाद बच्चे नई चीजों को पकड़ना चाहते है। पकड़ने के बाद सब तरफ से देखकर, छूकर, पटककर, हिलाडुला कर, मुहँ में डालकर विभिन्न ऐन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करते है। जैसे ही बच्चे बोलना सीखते है वे अपने कौतुहल को प्रश्न पूछकर कौतुहल को शान्त करते है आठ से नौ वर्ष के बच्चे इसी इच्छा के कारण अपना अधिक समय पढ़ने में लगाते है।

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किशोर में पाये जाने वाले संवेगात्मक व्यवहार 

डर-

किशोर सामाजिक परिस्थितियों, अपरिचित व्यक्तियों एवं नर्इ स्थिति में जाने से डरते है। डर की अभिव्यक्ति में लिंग भेद पाया जाता है । क्योकि लड़के व लड़कियों के मूल्यों में अन्तर होता है। लड़किया व्यक्तिगत सुरक्षा को विशेष महत्व देती है इसलिए अपरिचित के सामने डरती है जबकि लड़कों में ऐसा नही पाया जाता। डर पर सामाजिक – आर्थिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है।

चिन्ता-

चिन्ता डर से उत्पन्न होती है। ये काल्पनिक कारणों से होती है। इसमें वास्तविकता का अंश भी होता है लेकिन ये अनावश्यक रूप से बड़ी छुपी अवस्था है अर्थात् परेशानी अभी है नही, लेकिन आ सकती है इस बात की चिन्ता होती हैं। चिन्ता किसी वस्तु, व्यक्ति एवं स्थिति से सम्बन्धित हो सकती है। जैसे परीक्षा में अच्छे नम्बर आयेगें या नही, नौकरी मिलेगी या नही या फिर दूसरों के सामने बोलने से डरते है। लड़के व लडकियों के मूल्यों में अन्तर अलग-अलग होते है। जैसे लड़के नौकरी व व्यवसाय को लेकर चिन्तित होते है जबकि लड़कियां बाहय आकृति एवं सामाजिक मान्यता को लेकर अधिक चिन्तित रहती है।

दुश्चिन्ता-

दुश्चिन्ता आन्तरिक द्वन्द्व के कारण उत्पन्न होती है। यह लगातार रहने वाली कष्टकारी मानसिक दशा है। व्यक्ति बेचैनी का अनुभव करता है। उसे यह स्पष्ट नही होता है कि वह क्या करे और क्या न करें। जब अनेक चिन्ताएं एकत्रित होती है तो वह दुश्चिन्ता का रूप धारण कर लेती है। उदाहरण के लिए यदि किशोर ऐसे सांस्कृतिक समूह में रहता है जहां वाहृ आकृति, प्रसिद्धि, अध् ययन व सम्प्राप्ति को महत्व दिया जाता है और किशोर स्वयं को इन सांस्कृतिक आशाओं के अनुरूप नही पाता तो दुश्चिन्ता हो जाती है।

क्रोध-

किशोरो को पक्षपातपूर्ण व्यवहार से गुस्सा आता है। यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार घर पर भी हो सकता है। यदि कोर्इ उन पर रोब जमाता है तो गुस्सा आता हैं। भार्इ बहनों द्वारा एक दूसरे का सामान प्रयोग करने पर, व्यग्ंयात्मक बातों का प्रयोग करने पर, आदतों मे बाधा होने पर, योजना को सफलतापूर्वक सम्पन्न न करने पर क्रोध आता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में किशोर चीजों को तोड़ते, फेंकते है, तेज बोलते है। कभी कभी बोलना बन्द कर देते है।

ईर्ष्या-

इसमें दो संवेग शामिल होते है। सामाजिक स्तर खोने का डर और क्रोध। किशोरावस्था में ईर्ष्या भार्इ बहनों के प्रति कम और संगी साथियों के प्रति ज्यादा होती है। जितना अधिक किशोर सामाजिक स्थितियों में असुरक्षा का अनुभव करेगा उतना अधिक उन लोगों से ईर्ष्या करेगा जिनकों सामाजिक मान्यता प्राप्त है। असन्तुष्ट बच्चा ईर्ष्या का शिकार होता है। इस संवेग की अनुभूति पर मौखिक अभिव्यक्ति होती है। जैसे मजाक उड़ाना या व्यंग्य करना।

जलन की भावना –

जलन की भावना व्यक्ति की चीजों के प्रति होती है जैसे कोर्इ अमीर घर का लड़का कार में आता है, अच्छे कपड़े पहनता है, अच्छे खिलौने रखता है। तो गरीब घर के लड़के को उसकी इन सुविधाओं से जलन होती है।

नाराज होना-

यह गुस्से से कम तीव्र संवेग है। किशोर गुस्से की तुलना में नाराज अक्तिाक होते है। किशोर उन चीजों के बारे में बात करके सुख का अनुभव करते है। जो उसे नाराज करती है। किशोर दूसरें लोगों के भाषण, व्यवहार करने के तरीके से अधिक नाराज होते है। किशोर जब आशा के अनुरूप कार्य नही कर पाता, उसका समायोजन अच्छा नही होता वे नाराज होते है।

जिज्ञासा/उत्सुकुकता-

किशोर लिंग, वैज्ञानिक चीजों, संसार की घटनाओं, धर्म व नैतिकता में उत्सुकता दिखाते है और इन विषयों पर वे प्रश्न भी करते है। वे किताबें, पत्र पत्रिकाएं पढ़कर अपनी जिज्ञासा को शान्त करते है।

स्नेह-

यह व्यक्ति, वस्तु या जानवर के प्रति कोमल लगाव है। यह सुखद अनुभवों पर आधारित होता है। किशोरावस्था व बाल्यावस्था के इस संवेग में अन्तर होता है। किशोर स्नेह निर्जीव व जानवरों की तुलना में व्यक्तियों के प्रति अधिक करते है। किशोर के लिए स्नेह में भी तीव्रता होती है। लेकिन किशोर बच्चों की तरह केवल घर के लोगों से भी स्नेह नही करते वरन संग-साथी व बाहर के लोगों से भी करते है।

दु:ख-

इस संवेग की अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति ऐसी चीज खो देता है जिसको वो बहुत महत्व देता है। तथा उससे उसे संवेगात्मक लगाव होता है। किशोर को इस संवेग का अनुभव बार-बार होता है क्योकि किशोर में अब सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है। किशोर बच्चों की तरह रोते नही है वरन् अपने चारों तरफ के लोगों व चीजों में रूचि नही लेते है। एकान्त में रहते है। भूख कम लगती हैं व नींद कम आती है। इसका किशोर के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

खुशी-

किशोर खुशी का अनुभव तब करता है जब उसका समायोजन अच्छा होता है। प्रशिक्षण व योग्यता से किशोर इस योग्य होता है कि वह परिस्थिति के साथ ठीक से समायोजन कर सके। अच्छा समायोजन व्यक्ति को आत्म सन्तोष देता है। यदि किशोर समाज द्वारा मान्यता प्राप्त कार्यो को सफलतापूर्वक करता है तो उसमें उच्चता की भावना आती है उससे भी उसे सन्तोष मिलता है। अन्तत: वह खुशी का अनुभव करता है।

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संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक

  1. परिपक्वता – व्यक्ति के विकास पर संवेगात्मक विकास निर्भर करता है विशेष रूप से स्नायु तन्त्र के विकास पर। यदि Frontal Lobe को हटा दिया जाए तो संवेगों में स्थिरता नही रहती है।
  2. स्वास्थ्य और शारीरिक विकास – बच्चे के स्वास्थ्य, शारीरिक विकास एवं संवेगात्मक विकास में धनात्मक सहसम्बन्ध होता है। स्वास्थ्य में गिरावट से संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  3. बुद्धि – Hurlock ने अध्ययनों में पाया कि सामान्य व कम बुद्धि के लोगों में अपने संवेगों पर नियन्त्रण कम होता है। चूंकि बुद्धिमान व्यक्ति के पास चिन्तन व तर्क की योग्यता होती है इसलिए संवेगों पर नियन्त्रण कर लेते है।
  4. सीखना – व्यक्ति समाज व संस्कृति द्वारा मान्य ढंग से संवेगों को व्यक्त करना सीखता है। उदाहरण के लिए नीग्रों के डर को व्यक्त करने का तरीका भारतीयों से भिन्न प्रकार का होता है। बच्चे संवेगात्मक व्यवहार को दो प्रकार से सीखते है –
    1. अनुबन्धन द्वारा – Watson us Albert नामक बच्चे पर प्रयोग किया। यह बच्चा खरगोश से बहुत प्यार करता था और उसके साथ खेलता था। Watson ने इस बच्चे को खरगोश से डरना सिखाया। अत: जब कभी बच्चा खरगोश के साथ खेलता था तो वे जोर की आवाज (जो डरावनी थी) करते थे। इससे बच्चा डरने लगा। ध ाीरे-धीरे बच्चा खरगोश से डरने लगा। बाद में वह सफेद फर वाली सभी चीजों से डरना सीख गया
    2. अनुकरण – यदि माता-पिता चिन्तित रहते है तो बच्चे चिन्तित रहना सीख जाते है। इसी प्रकार माता-पिता शान्त तो बच्चे भी शान्त होते है। Turner ने पाया कि शिक्षकों के संवेगात्मक व्यवहार का प्रभाव छात्रों पर पड़ता है।
  5. विद्यालयी वातावरण – शिक्षकों का अपने व्यवसाय एवं छात्रों के प्रति मनोवृत्ति, विद्यालय अनुशासन, विद्यालय में अकादमिक सुविधाए, भौतिक सुविधाए, शिक्षण विधि, पाठ्य सहगामी क्रियाएं आदि का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि विद्यालय में अत्यन्त कठोर अनुशासन होता है या अनुशासन विहीन विद्यालय दोनों का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  6. संगी-साथी – संवेगात्मक व्यवहार अनुकरण द्वारा सीखे जाते है। साथ ही कहावत है- संगत का असर पड़ता है। अत: बच्चों के संवेगात्मक विकास पर मित्रों, संगी साथियों व सह पाठियों के व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।
  7. परिवारिक वातावरण – माता-पिता व बच्चे के मध्य सम्बन्ध, बच्चे का जन्म क्रम, लड़का व लड़की, परिवार का आकार, परिवार का सामाजिक आर्थिक स्तर, अनुशासन, माता-पिता का बच्चे के प्रति मनोवृत्ति, आदि बच्चे के संवेगात्मक विकास को प्रभावित करते है।
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