विश्व की भाषाएँ एवं भाषा परिवार

अनुक्रम
विश्व के भाषा परिवारों के संबंध में कई मत हैं। जर्मन विद्वान विल्हेम फोन हम्बोल्ड्ट ने 13 परिवारों की चर्चा की है, जबकि पार्टिरिज ने 10 की और आधुनिक विद्वान् राड्स इनकी संख्या मात्र 12 ही बताते हैं। इसी प्रकार ग्रे के अनुसार यह संख्या 28 है तथा भारतीय विद्वान 10 से 18 तक की संख्याओं का उल्लेख करते हैं। कुछ ने तो यह संख्या 100 तक पहुँचा दी है, परन्तु विश्व की भाषाओं के ठीक से अध्ययन के अभाव में ये सभी मत अनुमान पर ही आधारित हैं।

पारिवारिक वर्गीकरण के आधार पर भाषा खण्ड

विश्व की भाषाओं को चार भाषा-खण्डों में बाँटा जा सकता है -
  1. अफ्रीका - खण्ड - इसमें चार प्रमुख भाषा-परिवार हैं - (क) बुशमैन ,(ख) बाँटू, (ग) सूडान, और (घ) हेमैटिक-सेमैटिक। हेमैटिक-सेमैटिक को अलग-अलग परिवार भी माना जाता है। 
  2. यूरेशिया-खण्ड - इनमें नौ मुख्य भाषा परिवार हैं - (क) हेमैटिक-सेमैटिक, (ख) काकेशियन, (ग) यूराल-अल्टाइक, (घ) चीनी, (ड़) द्रविड़ ,(च) ऑस्ट्रो-एशियाटिक ,(छ) जापानी-कोरियाई, (ज) मलय-पॉलिनेशियन ,और(झ) भारोपीय। 
  3. प्रशान्त महासागरीय-खण्ड - इसके अन्तर्गत मुख्यत: मलय-पॉलिनेशियन परिवार है, जिसे कुछ विद्वान अनेक परिवारों का समूह मानते हैं। 
  4. अमरीका खण्ड - अमेरिकन परिवार की भाषाओं के लगभग सौ परिवार स्वीकार किए जाते हैं।
वर्गीकरण से यह स्पष्ट है कि कुछ परिवार दो-दो भाषा-खण्डों में आये हैं। हेमैटिक-सेमैटिक परिवार दोनों-अफ्रीका और यूरेशिया खण्डों में आया है। इसी प्रकार मलय-पॉलिनेशियन परिवार यूरेशिया और प्रशान्त महासागरीय खण्डों में आया है। इसके अलावा कुछ विद्वान् विभिन्न खण्डों के कुछ परिवारों को एक ही परिवार में समाविष्ट करने के पक्षधर हैं। इस भेद के बावजूद आज निश्चित भाषाओं के 13 भाषा-परिवार स्वीकृत हैं - (1) भारोपीय (2) द्रविड़ (3) चीनी, (4) सेमैटिक-हेमैटिक, (5) यूराल-अल्टाइक, (6) काकेशियन, (7) जापानी-कोरियाई, (8) मलय-पॉलिनेशियन, (9) ऑस्ट्रो-एशियाटिक, (10) बुशमैन, (11) बॉँटू, (12) सूडान,और (13) अमेरिकी।

भारतीय आर्य भाषाएं

भारत से अभिप्राय सन् 1947 से पहले का अविभाजित भारत से है, जिसमें पाकिस्तान और बंग्लादेश समाविष्ट थे। कुछ विद्वान तो भारत का अर्थ श्रीलंका और वर्मा सहित भारत लेते हैं। वस्तुत: अंग्रेजों के आने से पहले ये सब प्रदेश भारत के ही अंग थे।

आर्य भाषा का इतिहास आर्यों के भारत आने से शुरू होता है। जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन के आर्यभाषाओं के वर्गीकरण के केन्द्रीय समुदाय में पश्चिमी हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती और हिमालयी भाषाएं हैं। मध्य समुदाय में मात्र पूर्वी हिंदी को ही स्थान दिया गया है। इनके बताये पूर्वी समुदाय में बिहारी, उड़िया, बंगला तथा असमी भाषाएँ हैं। दक्षिणी समुदाय में इन्होंने केवल मराठी को ही स्वीकार किया है। इनके अनुसार उत्तरी-पश्चिमी समुदाय में सिंधी, लहंदा और कश्मीरी भाषाएँ आती हैं।

भारतीय आर्य-भाषा के प्रारम्भ का अनुमानित समय 1500 ई0 पू0 के आस-पास है। 1500 ई0पू0 से लगभग 2000ई0 तक के सुदीर्घ-काल को भाषिक विशेषताओं के आधार पर तीन कालों में विभािजत किया गया है।
  1. प्राचीन आर्य भाषा - 1500 ई0पू0 से 500 ई0पू0 तक (1000 वर्ष) 
  2. मध्यकालीन आर्य भाषा- 500 ई0पू0 से 1000ई0 तक (1500 वर्ष) 
  3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा - 1000 ई0 से अब तक।

प्राचीन आर्य भाषा

आर्यों के भारत आगमन के समय इनकी भाषा ईरानी से अधिक अलग नहीं थी, लेकिन आर्येतर लोगों के सम्पर्क में आने पर अनेक प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभावों के फलस्वरूप उसमें परितर्वत आने लगा और वह अपनी भगिनी भाषा ईरानी से भिन्न रूप ग्रहण करने लगी।

आर्य भाषा का पुराना रूप वैदिक संहिताएँ हैं, जिनमें नियमितता के अभाव के कारण रूपों की विविधता है तथा परवर्ती साहित्य में लुप्त अनेक प्राचीन शब्दों का प्रयोग है। वैदिक संहिताओं का काल 1200 से 900 ई0पू0 के लगभग माना जाता है। इनमें भाषा के दो रूप-जिन्हें सुविधा के लिए प्राचीन और नवीन नाम दिया जाता है, मिलते हैं। प्राचीन रूप अवेस्ता के निकट है। वेदों की भाषा काव्यात्मक होने के कारण बोल-चाल की भाषा से अलग है। परवर्ती साहित्य ब्राह्मण ग्रंथों तथा उपनिषदों आदि (रचना काल 900ई0पू0) की भाषा अपेक्षाकृत व्यवस्थित है। उसमे न तो रूपाधिक्य है और न ही जटिलता है। इन ग्रंथों की गद्य-भाषा तत्कालीन बोलचाल की भाषा के निकट है। ऐसा प्रतीत होता है कि वेदों की रचना के समय तक आर्यों का निवास सप्त-सिंधु पंजाब प्रदेश था और ब्राह्मणों तथा उपनिषदों की रचना के समय वे मध्य प्रदेश में आ गए थे।

सूत्र ग्रंथों (रचना काल लगभग 700 ई0पू0) में भाषा के विकसित रूप के दर्शन होते हैं। इसी भाषा के उत्तरी रूप अपेक्षाकृत परिनिष्ठित एवं पंडितों में मान्य रूप को पाणिनी ने पाँचवीं शताब्दी में नियमबद्ध किया, जो सदा के लिए लौकिक संस्कृत का सर्वमान्य आदर्श रूप बन गया।

पाणिनि द्वारा संस्कृत भाषा को व्याकरण के नियमों में बाँध दिए जाने पर बोलचाल की भाषा पालि, प्राकृत तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं के रूप में विकास करती चली गई। इधर संस्कृत भाषा बोलचाल की भाषा न रहने पर भी कुछ परिवर्तित होती रही, जिसकी झलक रामायण, महाभारत पुराण-साहित्य और कालिदास के काव्यों में मिलती है।

वैदिक भाषा की तीन बोलियाँ थीं- पश्चिमोत्तर, मध्य देशी तथा पूर्वी। लौकिक संस्कृत की एक अन्य दक्षिणी बोली भी विकसित हो गई थी। इस प्रकार उसकी चार बोलियाँ थीं।

मध्यकालीन आर्य-भाषा

प्राचीन आर्य-भाषा के द्वितीय रूप लौकिक संस्कृत को मुनित्रय पाणिनि, पतंजलि और कात्यायन ने नियमों में बाँधकर एक स्थाई रूप दे दिया, जिससे उसमें परिवर्तन वैयाकरणों की दृष्टि में विकार तथा भाषा-वैज्ञानिकों की दृष्टि में विकास असह्य हो गया, जबकि जन-भाषा बंधनो (नियमों) की उपेक्षा करती हुई निरन्तर विकसित होती रही। जन-भाषा के मध्यकालीन रूप को ही ‘मध्यकालीन आर्य-भाषा’’ नाम दिया गया। इसकी स्थूल काल-सीमा 500ई0पू0 से 1000 ई0 तक है।

मध्यकालीन आर्य-भाषा को ‘प्राकृत’ कहा गया है। प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से किये जाने से दो प्रकार के मत प्रचलित हो गये। एक मत यह है कि प्राकृत मूल अथवा जन-भाषा है और उसका परिष्कृत साहित्यिक रूप वैदिक लौकिक संस्कृत भाषा है। दूसरा मत इसके सर्वथा विपरीत है। इसके अनुसार संस्कृत प्रकृति है और उससे उत्पन्न भाषा प्राकृत है। वैदिक भाषा का उच्चरित रूप अवश्य प्राकृत कहलाता होगा, परन्तु मध्यकालीन प्राकृत को संस्कृत से विकसित मानना ही युक्ति संगत होगा

1500 वर्षों की प्राकृत भाषा के विकास की स्थितियों के संदर्भ में उसे तीन कालों (500-500 वर्षों के अन्तराल से) में बाँटा जाता है और सुविधा के लिए उसे प्रथम प्राकृत काल (500ई0 पू0 से ईसवी प्रारम्भ तक), द्वितीय प्राकृत काल (ईसवी प्रारम्भ से 500 ई0तक) तथा तृतीय प्राकृत काल (500-1000 ई0 तक) नाम दिया जाता है।

पालि-बौद्धो-विशेषत: दक्षिणी बौद्धों की यह भाषा ‘ मागध-भाषा’ अथवा ‘देश-भाषा’ नामों से भी प्रसिद्ध है। पालि के विकास की दृष्टि से कम से कम उसके चार रूप मिलते हैं। इसका प्राचीनतम रूप त्रिपिटक में सुरक्षित है। इसका दूसरा विकसित रूप त्रिपिटक के गद्य-भाग में मिलता है। तीसरा रूप बुद्धघोष की अट्ठकथा आदि का गद्य है और चतुर्थ रूप उत्तरकालीन काव्य-ग्रंथों-दीपवंश, महावंश आदि की भाषा है।

अभिलेखी प्राकृत के अधिकांश लेख शिलाओं पर होने के कारण इसका एक नाम शिलालेखी प्राकृत भी है। इसकी सुलभ सामग्री को दो भागों में विभक्त किया गया है - 1. अशोकी अभिलेख तथा 2. अशोकेतर अभिलेख ।

द्वितीय प्राकृत के अन्तर्गत भारत एवं भारत के बाहर प्रयुक्त विभिन्न धार्मिक साहित्यिक एवं अन्य प्राकृतें हैं। इन प्राकृतों के लगभग दो दर्जन नाम सुझाए गए हैं, जिनमें भाषा-वैज्ञानिक स्तर पर केवल पाँच प्रमुख भेद स्वीकरणीय हैं - शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री, अर्धमागधी और मागधी। 5 तृतीय प्राकृत के अन्तर्गत अपभ्रंश भाषा आती है, जिसकी अन्तिम सीमा अवहट्ठ भाषा है। जो अपभं्रश और आधुनिक आर्य-भाषाओं के मध्य की कड़ी एवं सन्धिकालीन भाषा है। उपलब्ध रचनाओं के आधार पर अपभ्रंश का क्षेत्र पूरा आर्य-भाषा भाषी भारत ठहरता है। वस्तुत: अपभ्रंश प्राकृतों और आधुनिक भारतीय आर्य-भाषाओं के बीच की कड़ी रही है।

आधुनिक आर्य भाषा

अपभ्रंश भाषा अवहट्ट आदि अनेक स्थानीय रूपों से बढ़ती हुई आधुनिक आर्य-भाषा का रूप ग्रहण कर गई। आधुनिक आर्य-भाषा स्थानीय विशेषताओं को ग्रहण करती हुई अनेक रूपों (उपभाषाओं और बोलियों) में विकसित हुई। ये प्रमुख रूप हैं - सिन्धी, गुजराती, लहंदा, पंजाबी, मराठी, उड़िया, बंगला, असमिया, हिंदी (पश्चिमी और पूर्वी), राजस्थानी ,पहाड़ी तथा बिहारी आदि।

आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएं

भारतीय आर्य भाषा में विकास का जो क्रम पालि से प्रारंभ हुआ था वह आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के रूप में पूर्णत्व को पहुंचा। विद्वानों का अनुमान है कि छठी से ग्यारहवीं सदी के मध्य प्रचलित प्रत्येक प्राकृत का एक-एक अपभ्रंश रूप रहा होगा, जिनसे आधुनिक आर्यभाषाएं तथा उपभाषाओं के प्रादुर्भूत होने की संभावना व्यक्त की जाती है। ये हैं : (1) शौरसेनी से-गुजराती (भाषा) , राजस्थानी (उपभाषा), पश्चिमी हिंदी (उपभाषा), पहाड़ी (उपभाषा) (2) अर्धमागधी से-पूर्वी हिंदी (उपभाषा); (3) मागधी से - बिहारी (उपभाषा), बंगाली (भाषा), असमी (भाषा); (4) महाराष्ट्री से - मराठी (भाषा); (5) पैशाची से - लहंदा (भाषा, केकय अपभ्रंश से), पंजाबी (भाषा, टक्क अपभ्रंश से ); ब्राचड से-सिंधी (भाषा)।

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का परिचय

(1) सिंधी - सं0 सिंधु से सिंध शब्द बना है। सिंध प्रदेश की भाषा सिंधी कहलाती है। शाह लतीफ का ‘रिशालो’ सिंधी का प्रसिद्ध ग्रंथ है। सिंधी की पांच बोलियां हैं- बिचोली, सिराइकी, लारी, थरेली और कच्छी। बिचोली मध्यसिंध में बोली जाती है। यही वहां की परिनिष्ठित भाषा है। सिंधी की अपनी कोई स्वतंत्र लिपि न होने के कारण कभी यह विकृत फारसी लिपि में, कभी गुरुमुखी में और कभी नागरी में लिखी जाती रही है। अरबी के आधार पर निर्मित 1853 ई0 से सिंधी की अपनी लिपि प्रचलित है। सिंधी के सभी शब्द स्वरांत हैं। ग, ज, ड, ब, ध्वनियों का उच्चावरण कंठपिटक को बंद करके द्वित्व रूप में होता है। पुलिंग संज्ञाएँ उकारांत, ओकारांत, तथा स्त्रीलिंग संज्ञाएँ अकारांत होती हैं। दो लिंग और दो वचन हैं। सिंध में अधिकांशत: मुसलमान रहते हैं। इसलिए उसके शब्दभंडार में अरबी-फारसी शब्दों की भरमार है। संपूर्ण शब्दभंडार का लगभग 75 प्रतिशत भाग संस्कृत तद्भवों का है। सिंधी बोलने वाले प्राय: पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हैं, किन्तु भारत के बंबई तथा दिल्ली में भी सिंधीभाषी हैं।

(2). लहँदा - इसका शाब्दिक अर्थ है -पश्चिम या सूर्यास्त की दिशा। पंजाब के दो भाग हैं: भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब। लाहौर और स्याल-कोट जिलों को छोड़ कर शेश पश्चिमी पंजाब में व्यवहृत पंजाबी को लहँदे दि बोली (लहँदा) कहा जाता है। वास्वत में यह पंजाबी की ही उपभाषा है। इसमें लिखित साहित्य का अभाव है। सिंधी तथा कश्मीरी से लहँदा बहुत प्रभावित है। यद्यपि इसकी अपनी स्वतंत्र लिपि लंडा है; तथापित इसके बोलने वालों में अधिकांशत: मुसलमान ही हैं, जो फारसी लिपि का ही प्रयोग करते हैं।

(3). पंजाबी - पंजाबी शब्द पंज ‘पांच’ और आब ‘पानी’ या ‘नदी’ के योग से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है ‘पांच नदियों का देश’। सतलज, रावी, व्यास, चेनाव और झेलम नदियों से संबंधित क्षेत्र को पंजाब और वहां की भाषा को पंजाबी कहा जाता है। लहंदा और पंजाबी भिन्न-भिन्न भाषाएं हैं; फिर भी कभी-कभी दोनों को पंजाबी कह दिया जाता है। पूर्वी पंजाबी या भारतीय पंजाब की भाषा ही वास्तव में पंजाबी है। इक्क, सत्त, अट्ठ, गड्डी जैसे प्राकृत शब्दों का प्रयोग पंजाबी में आज भी होता है। इसी के आधार पर कुछ लोगों का कहना है कि आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में पंजाबी सबसे पुरानी है। परिनिष्ठित पंजाबी का व्यवहार अमृतसर के समीप माझ में होता है। इसलिए इसे माझी भी कहा जाता है। डोगरी बोली जम्मू तथा पंबाज के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है। पंजाबी की अपनी लिपि लंडा है, जिसे सिक्ख गुरु अंगद ने सोलहवीं सदी में देवनागरी के आधार पर परिष्कृत किया था। तब से इसे गुरुमुखी कहा जाने लगा।

(4). गुजराती - भाषा के अर्थ में गुजराती शब्द सोहलवीं सदी के बाद से मिलता है। टेसिटरी का कहना है कि 1600 ई0 तक पश्चिमी राजस्थान तथा गुजरात की भाषा प्राचीन राजस्थानी थी। आधुनिक गुजराती का स्वरूप सत्रहवीं सदी के मध्य से प्रकट हुआ। गुजराती पहले देवनागरी लिपि में लिखी जाती थी; अब उसकी अपनी लिपि है जो कैथी लिपि से मिलती-जुलती विकृत देवनागरी ही है। यही अब गुजराती लिपि कहलाती है। शिरोरेखा विहीनता इसकी विशेषता है। नागरी, बंबइया, गामडिया, सुरती, काठियावाड़ी इत्यादि गुजराती की प्रमुख बोलियां हैं।

(5). मराठी - महाराष्ट्र प्रांत की भाषा मराठी है। बंबई प्रांत में पूना के निकटवर्ती भू-भाग की बोली परिनिष्ठत मराठी मानी जाती है। इसकी अनेक बोलियां है, किन्तु उनमें से बहुत-सी स्थानीय हैं। सबसे प्रसिद्ध बोली कोंकणी है।

(6). बंगाली - डॉ0 चटर्जी ने बंगाली भाषा का उदय 950 ई0 से मानते हुए उसके विकास-क्रम को तीन कालों में विभािजत किया है- (क) प्राचीन काल (950ई0-1200ई0), (ख) मध्यकाल (1200-1800ई) और (ग) आधुनिक काल (1800ई0 से वर्तमान समय तक)।बंगाली भाषा के दो भेद स्पष्ट हैं-पूर्वी बंगाली और पश्चिमी बंगाली। ढाका पूर्वी बंगाली का और कलकत्ता पश्चिमी बंगाली का केंद्र है। पश्चिमी बंगाली ही वस्तुत: बंगाली भाषा है। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में बंगाली साहित्यिक दृष्टि से संपन्न भाषा है।

(7). उड़िया - उड़ीसा को प्राचीन काल में उत्कल देश कहा जाता था। यही कारण है कि उड़िया को उत्कली भी कहा जाता है। बंगला से उड़िया का गहरा संबंध है, किन्तु बंगला में संस्कृत के शब्दों का बाहुल्य है तो उड़िया में मराठी और तेलगू के शब्दों का। उड़िया लिपि यद्यपि देवनागरी से ही विकसित हुई है, तथापि तेलुगू लिपि से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण यह नागरी से भिन्न प्रतीत होती है।

(8). असमी - आसाम की भाषा असमिया (असमी) कहलाती है। भौगोलिक दृष्टि से ऊंचा-नीचा होने के कारण असमी भाषी भू-भाग को असम कहा जाता है। असमी प्राय: बंगाली लिपि में लिखी जाती है।

(9). हिंदी - यह भारत की केंद्रीय या प्रमुख आर्यभाषा है, जो मुख्यत: शौरसेनी अपभं्रश से और गौणत: मागधी और अर्धमागधी से उदभूत हुई है; क्योंकि पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पूर्वी हिंदी आदि के सहयोग से वर्तमान मानक हिंदी का स्वरूप निर्मित हुआ है।

आधुनिक भारतीय आर्येतर भाषाएं

भारत वर्ष अनेक भाषा-भाषियों का देश रहा है। यह देश आदिकाल से ही विदेशियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। जिससे समय-समय पर विदेशी जातियां अपने-अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए यहां आते रहे और भारत की समृद्धि को क्षति पहुंचाते रहे, परन्तु इन विदेशी जातियों के आगमन, निवास, व्यावसायिक संबंध आदि अनेकों कारणों से यहाँ की भाषाएं भी प्रभावित होती रही तथा कुछ नवीन भाषाओं का जन्म भी हुआ होगा। फलस्वरूप भारत अनेक धर्मों के साथ-साथ विविध भाषा-भाषियों के देश के रूप में भी स्थापित हुआ । भारत में पाई जाने वाली मुख्य आर्येतर भाषाएँ इस प्रकार हैं -

द्राविड़ परिवार की भाषाएं

इस परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं - 1. तमिल (मद्रास में) 2 तेलुगु (आन्ध्र प्रदेश में), 3. कन्नड़ (मैसूर में), 4. मलयालम (केरल में) द्राविड़ परिवार में गोंडी (मध्य प्रदेश, बुन्देलखण्ड), कुरुख या ओराओं (बिहार, उड़ीसा), ब्राहुई (बलूचिस्तान) भाषाएँ भी आती हैं। तमिल भाषा तमिलनाडु और लंका में बोली जाती है। यह अत्यन्त समृद्ध भाषा है।

तेलुगु आंधप्रदेश की भाषा है। आंध्र जाति का नाम ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत और अशोक के अभिलेखों में मिलता है। कन्नड़ मैसूर राज्य की भाशा है। इसकी लिपि तेलुगु और तमिल भाषाओं से मिलती-जुलती है। मलयालम केरल की भाषा है।

बुरुशस्की (खजुना परिवार)

इस परिवार की भाषाएं भारत के उत्तर -पश्चिमी छोर में पाई जाती हैं। कुछ विद्वान इसे मुंडा और द्राविड़ परिवार से संबद्ध मानते हैं। इसका क्षेत्र भारत-ईरानी, तुर्की और तिब्बती परिवार से घिरा है। अंडमन की अंडमनी भाषा भी एक स्वतंत्र परिवार की मानी जाती है।

चीनी परिवार

इस परिवार का क्षेत्र सम्पूर्ण चीन, वर्मा, स्याम तथा तिब्बत है। इस परिवार के अन्तर्गत चीनी (चीन में) थाई या स्यामी (स्याम या थाइलैण्ड में), ब्रह्मी या वर्मी (वर्मा में) ,तिब्बती (तिब्बत में), अनामी (कम्बोडिया, कोचीन, चीन, टोंकिन में) आदि भाषाएं आती हैं। उत्तराखण्ड के सीमान्त जिलों में इस परिवार से संबंधित भोटिया (रड़) भाषा का व्यवहार होता है।

दक्षिण पूर्व एशियाई (आस्ट्रो-एशियाटिक) परिवार

इस भाषा परिवार के व्यवहार का क्षेत्र पश्चिम में भारत का उत्तरी पहाड़ी भाग तथा मध्य प्रदेश और उड़ीस का कुछ भाग है। पूर्व में अन्नाम, श्याम, कम्बोडिया तथा दक्षिण में निकोबार द्वीप हैं।

इस परिवार की मुख्य भाषाएं पश्चिम में मुण्डा (कोल) तथा दक्षिण में निकोबार है। मुण्डा के भी दो वर्ग हैं। जिसमें उत्तरी के अन्तर्गत कनावरी, शबर आदि भाषाएं हैं। यह हिमायल की तराई में शिमला से बिहार तक बोली जाती है, तथा दक्षिणी के अन्तर्गत संथाली, मुंडारी, भूमिज आदि भाषाएं आती हैं। संथाली भाषा का व्यवहार भारत में पूर्वी बिहार और पश्चिमी बंगाल में होता है। मुंडारी भाशा का व्यवहार नागपुर, उड़ीसा, मध्यप्रदेश तथा मद्रास में होता है। मुंडा भाषाओं का प्रभाव भोजपुरी, मगही, मैथिली आदि भाषाओं पर पड़ा है।

हिंदी भाषा का उद्भव और विकास

हिंदी गद्य के प्रारम्भिक गद्य-लेखकों- इंशा अल्ला खाँ, सदल मिश्र, सदासुखलाल, लल्लूलाल की भाषा खडी़बोली नहीं थी। इनकी भाषा में खड़ीबोली भाषा की ओर उन्मुख होने का संकेत मिलता है। इंशा अल्ला खाँ ने ‘आने-जाने वाली जो सांसें हैं’ वाक्य को आधुनिक खड़ीबोली भाषा अथवा हिंदी भाषा में इस प्रकार लिखा है - ‘आतियाँ-जातियाँ जो सांसें हैं।’ भारतेन्दु-युग में खड़ीबोली भाषा के गद्य का प्रारम्भ हुआ। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को खड़ीबोली भाषा के गद्य का जन्मदाता माना जाता है। भारतेन्दु ने खड़ीबोली के भाषा का जो बीज बोया, वह बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध काल के प्रारम्भ में द्विवेदी-युग और शुक्ल-युग में फला-फूला। आज हम जिस प्रकार के हिंदी गद्य का व्यवहार शिक्षा आदि के माध्यम से किया करते हैं, हिंदी गद्य का वैसा रूप भारतेन्दु युग में नहीं हो पाया था।

हिंदी गद्य का भारतेन्दु-युग आरम्भ होने से पहले हिंदी भाषा के दो रूप प्रचलित थे। राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का खड़ीबोली हिंदी का अरबी-फारसी के शब्दों से भरा रूप और राजा लक्ष्मणसिंह का संस्कृत शब्दों से भरा हुआ था। भारतेन्दु जी ने इन दोनों अतिवादी रूपों को त्यागकर मध्यम मार्ग अपनाया। उन्होंने व्यवहार में आने वाले अरबी-फारसी के सरल शब्दों और संस्कृत के व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग किया।

खड़ीबोली भाषा बनकर तो हिंदी-साहित्य में भारतेन्दु-काल में आयी, परन्तु यह उत्तर भारत की जनता के व्यवहार में इससे पहले ही आ चुकी थी। भाषा का यह नियम और स्वभाव है कि वह पहले जनता के व्यवहार में आती है, फिर उसका रूप स्थिर हो जाने के बाद उसमें साहित्य-रचना आरम्भ होती है। इसी आधार पर भारतेन्दुजी खड़ीबोली के भाषा-रूप का प्रयोग गद्य-साहित्य में आरम्भ कर सके। ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ही देशभर में घूमने वाले विभिन्न प्रान्तों के साधु, नट, कंजर और व्यापारी आपस में मिलने पर खड़ीबोली हिंदी में ही बात करते थे। उस समय तक खड़ीबोली का भाषा-रूप सम्पर्क का आधार बन चुका था।

भारतेन्दु बाबू हरिशचंद्र ने और उनके युग के साहित्यकारों ने खड़ीबोली के भाषा-रूप का प्रयोग किया। डॉ0 धीरेन्द्र वर्मा ने ‘हिंदी-भाषा के विकास’ को तीन भागों में विभाजित किया है -
  1. आदि-काल - सन् 1000 से सन् 1500 ई0 तक।
  2. मध्य-काल -सन् 1500 से सन् 1800 ई0 तक।
  3. आधुनिक-काल - सन् 1800 से अब तक।
इस विभाजन को सभी भाषा-वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है इससे स्पष्ट है कि हिंदी खड़ीबोली गद्य के जिस रूप का प्रयोग भारतेन्द्रु हरिश्चन्द्र और उनके युग के साहित्यकारों ने किया, वह इससे 75 वर्ष पूर्व व्यवहार में स्थिर हो चुका था। हिंदी भाषा के आधुनिक-काल का परिचय डॉ0 द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने इस प्रकार दिया है - ‘‘ इस काल में आकर हिंदी पूर्णतया विकसित हो गयी थी। अभी तक वह पद्य के लिए प्रयुक्त होती थी और उसमें गद्य-साहित्य बहुत कम लिखा गया था। परन्तु इस काल में आते ही एक ओर तो हिंदी की बोलयों में पर्याप्त साहित्य लिखा जाने लगा, दूसरी ओर उसकी ये बोलियाँ इतनी विकसित हो गयीं कि वे बोली न रहकर उपभाषा के पद पर आसीन हो गयीं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस काल में आकर हिंदी की एक खड़ीबोली ने इतना अधिक विकास किया कि वह पहले तो मेरठ, मुजफ्फरनगर आदि जिलों की केवल बोलचाल की ही बोली थी, परन्तु अब उपभाषा बनकर सर्वप्रथम पद्य एवं गद्य की एक समर्थ भाषा बनी, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्द पर्याप्त मात्रा में आ गये और इनमें अरबी-फारसी के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्द भी प्रचुर मात्रा में अपना लिये गये। इस प्रकार कुछ ही वर्शों में खड़ीबोली ने एक परिनिष्ठित हिंदी (मानक भाषा) का रूप धारण कर लिया, जिसमें से पुराने तद्भव एवं देशज शब्द निकल गये, नये-नये पारिभाषिक शब्दों को अपना लिया गया और ज्ञान-विज्ञान के लिए अत्यन्त सक्षम, सशक्त एवं समर्थ भाषा बना लिया गया।

उन्नीसवीं शताब्दी के भारतेन्दु-युग (1875 से 1900 तक) में ही खड़ीबोली में साहित्य-रचना हुई हो और इससे पूर्व खड़ीबोली में कोई साहित्य नहीं लिखा गया हो ऐसी बात नहीं है। उन्नसवीं शताब्दी के भारतेन्दु युग से पूर्व का सन् 1800 से 1844 तक का अर्थात् 44 वर्ष का समय रीतिकाल के अन्तर्गत आता है। यह असंभव है कि इस काल में खड़ीबोली में साहित्य-रचना हुई ही न हो। यह तो निश्चित है की रीतिकाल में कविता की भाषा ब्रजभाषा रही। रीतिकाल तक क्या, भारतेन्दु युग की समाप्ति तक अर्थात् सन् 1900 ई0 तक भक्ति और Üांृगार की कविताएँ ब्रजभाषा में लिखी गयीं। भारतेन्दु ने केवल देश-प्रेम अथवा राश्ट्रीयता सबंधी कविताएँ ही खड़ीबोली में लिखीं।

रीतिकाल में खड़ीबोली में गद्य-रचना आरम्भ हो गयी थी।सन् 1823 की गद्य-रचना ‘गोरा-बादल की वीरता’ प्राप्त होती है। उन्नीसवींं शताब्दी में खड़ीबोली गद्य में रचित जिस ग्रंथ को प्रामाणिक माना गया है, वह रामप्रसाद निरंजनी का ‘भाषायोग वासिष्ठ’ है। भाषायोग वासिष्ठ’ का प्रकाशन सन् 1865 में नवल किशोर पे्रस, बम्बई से हुआ।खड़ीबोली गद्य के विकास में फोर्ट विलियम कॉलेज का भी पर्याप्त योगदान है। इस कॉलेज से सबंधित लोगों द्वारा रचित ग्रंथ नासिकेतोपाख्यान, रामचरित, प्रेमसागर, लालचन्द्रिका टीका, भाषा कायदा, सिंहासन-बत्तीसी, बेताल-पचीसी, भक्तमाल-टीका और हातिमताई का अनुवाद है। सदल मिश्र का ‘नासिकेतोपाख्यान’ यजुर्वेद तथा कठोपनिषद् की नचिकेता की कथा पर आधारित है। इसकी भाषा में पूर्वी प्रयोग, ब्रजभाषा के रूप तो हैं ही, स्थान-स्थान पर असन्तुलित-शिथिल वाक्यों के साथ-साथ पंडिताऊपन भी झलकता है। इतना होने पर भी यह ग्रंथ खड़ीबोली गद्य का पर्याप्त सुगठित रूप प्रस्तुत करता है। ‘रामचरित’ के रचयिता भी सदलमिश्र हैं। यह संस्कृत ग्रंथ - ‘अध्यात्म रामायण’ का हिंदी रूपान्तर है। इसकी भाषा ‘नासिकेतोपाख्यान’ के समान ही है। सदल मिश्र के अतिरिक्त लल्लूलाल तथा सदासुखलाल भी फोर्ट विलियम कॉलेज से संबंधित थे। लल्लूलाल ने ‘प्रेमसागर’ की रचना की है। यह ग्रंथ श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध का अनुवाद है। चतुभ्र्ाुज मिश्र ने पहले भागवत के दशम स्कन्ध का अनुवाद ब्रजभाशा में किया। लल्लूलाल ने उसका खड़ीबोली में रूपान्तर कर दिया है। ‘प्रेमसागर’ की भाषा ब्रजभाषा से प्रभावित है। शब्दों के रूप समान नहीं है तथा अनिश्चित हैं। ‘प्रेमसागर’ में अनेक स्थलों पर ग्रामीण शब्दों के साथ-साथ अशुद्ध प्रयोग भी पर्याप्त मात्रा में हैं।

‘लालचन्द्रिका’ ‘बिहारी सतसई’ की टीका है। ‘बेताल पच्चीसी’ शिवदास द्वारा रचित एक संस्कृत रचना का अनुवाद है। पहले सुरति मिश्र ने इसका ब्रजभाषा में अनुवाद किया। बाद में मजहरअली ने इसे खड़ीबोली में रूपान्तरित किया। ‘भाषा कायदा’ ब्रजभाषा का व्याकरण है, जिसे लल्लूलाल ने लिखा है। इंशाअल्लाखाँ ने ‘रानी केतकी की कहानी’ की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में अर्थात् 1805ई0 में की। ‘रानी केतकी की कहानी’ की भाषा के विषय में राजनाथ शर्मा ने अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास’ में लिखा है- ‘‘मुंशी इंशाअल्लाखाँ ने इसी समय अपनी छोटी-सी परन्तु प्रसिद्ध पुस्तक ‘रानी केतकी की कहानी’ लिखी। उनका उद्देश्य ऐसी भाषा लिखने का था, जिसमें हिंदी का छुट और किसी बोली का पुट न हो। इसके साथ जिसमें हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। बस जैसे भले लोग अच्छों से अच्छे आपस में बोलते-चालते हैं, ज्यों-का-त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी कीे न हो। अर्थात् इंशा ऐसी भाषा लिखना चाहते थे, जो उस समय हिन्दू-मुसलमान दोनों की बोलचाल की भाषा थी। उस समय मुसलमान साहित्यिक हिंदी अर्थात् ब्रजभाषा को ‘भाखा’ कहते थे। इंशा इसके (ब्रजभाषा के) प्रभाव से मुक्त बोलचाल की शिष्ट भाषा प्रयोग करना चाहते थे। ऐसा करना उन्हें असंभव प्रतीत होता था। उन्होंने संस्कृत और अरबी-फारसी के शब्दों से बचने का भरसक प्रयत्न किया, परन्तु उनकी शैली उर्दू-फारसी की शैली से प्रभावित हो ही गई। इंशा की उपर्युक्त आकांक्षा में यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने बोलचाल की भाषा को साहित्य-क्षेत्र में उतारने का प्रयन्त किया था, इसी कारण इनकी भाषा में सहज प्रवाह न आ सका। इंशा के समय तक खड़ीबोली उर्दू कविता में प्रयुक्त होते-होते काफी मँज चुकी थी। और खड़ीबोली की यही मँजाहटल अपने चुलबुलेपन और रंगीनी के साथ ‘रानी केतकी की कहानी’ में उतर आयी है। मुहावरों का प्रयोग उसकी विशेषता है।’’ इस विवेचना से स्पष्ट है कि उन्नीसवीं शताब्दी ईसवी में खड़ीबोली हिंदी में गद्य-रचना आरम्भ हो गई थी। ज्यों-ज्यों उन्नीसवीं शताब्दी आगे बढ़ती गयी, त्यों-त्यों खड़ीबोली मानक तथा परिनिष्ठित होती गयी। उन्नीसवीं शताब्दी समाप्त होते-होते खड़ीबोली गद्य में स्तरीय साहित्यिक रचनाएँ होने लगी थी। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में खड़ीबोली में काव्य-रचना प्रारम्भ हुई। यह बात अलग है कि खड़ी बोली में ब्रजभाषा का सा माधुर्य सन् 1920 के बाद आ पाया।

भाषा और बोली

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भाषा और बोली में कोई अंतर नहीं है। विचारों का आदान-प्रदान कराने वाले माध्यम के लिए ये दो अलग-अलग नाम है।14 एक बोली समय के अन्तराल से भाषा बन जाती है, और कभी की भाषा कालान्तर में बोली ही रह जाती है।15 जब कोई बोली किन्हीं कारणों से विस्तृत भू-भाग में साहित्य, शिक्षा और शासन के कार्यों में व्यवहृत होने लगती है तो भाषा कहलाने लगती है। बोली को डॉ0 राजमणि शर्मा ने इस प्रकार परिभाषित किया है- ‘‘किसी भाषा के ऐसे सीमित एवं क्षेत्र विशेष के रूप को बोली कहा जाता है जो एक तरफ ध्वनि, रूप, वाक्य, अर्थ, शब्द तथा मुहावरे आदि की दृष्टि से अपने क्षेत्र विशेष में महत्वपूर्ण एवं स्पष्ट वैभिन्न्य से संपृक्त नहीं होती; दूसरी तरफ इस धरातल पर वह उस भाषा के परिनिष्ठित रूप से भिन्न तो हो पर इतना भिन्न न हो कि अन्य रूपों के वक्ता उसे समझ न सके।’’ स्पष्टत: एक भाषा के अन्तर्गत जब कई अलग-अलग रूप विकसित हो जाते हैं तो उन्हें बोली कहते हैं।

इस संदर्भ में बाबूराम सक्सेना का मत है कि - भाषा और बोली दोनों शब्द वाणी के द्योतक हैं, आपेक्षिक दृष्टि से एक का क्षेत्र सीमित है, दूसरी का विस्तृत। बोली भाषा के अन्तर्गत है, भाषा बोली के अंतर्गत नहीं। ध्वनिग्राम (स्वनिम) और ध्वनियों में जो अंतर है, वही अंतर भाषा और बोली में है। एक ही भाषा की दो बोलियों को बोलने वालों को परस्पर समझने में अपेक्षाकृत कम कठिनाई होती है, दो भाषाओं को समझने में ज्यादा।

भाषा और बोली के प्रमुख भेदक तत्व हैं -
  1. स्टीवर्ट द्वारा निर्दिष्ट मानकभाषा के चार लक्षणों-मानकीकरण, स्वायत्तता, ऐतिहासिकता और जीवंतता- के आधार पर भाषा और बोली के अंतर को समझने में सहायता मिल सकती है। भाषा अथवा मानक भाषा में ये चारों अभिलक्षण एक साथ मिलते हैं; जबकि बोली में ऐतिहासिकता और जीवंतता के लक्षण तो विद्यमान रहते हैं, किन्तु मानकीकरण और स्वायत्तता का अभाव पाया जाता है।
  2. भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है और बोली का सीमित। अर्थात् भाषा का व्यवहार अधिक दूर तक होता है और बोली का अपेक्षाकृत कम दूर तक। अत: एक भाषा के क्षेत्र में अनेक बोलियाँ होती हैं, किन्तु एक बोली के क्षेत्र में अनेक भाशाएँ नहीं हो सकतीं।
  3. एक भाषा की जितनी बोलियाँ होती हैं, उनमें उच्चारण, शब्द-समूह व्याकरण इत्यादि का भेद रहते हुए भी परस्पर, बोधगम्यता बनी रहती है, किन्तु दो भाषाओं में इसका अभाव पाया जाता है। उदाहरणाथ - खड़ी बोली में ‘लड़का गया’ बोलने वाला: ब्रज- छोरा गयौ; कन्नौजी- छोरागओ; अवधी -लरिका गवा; भोजपुरी- लरिका गइल वाक्यों को भी समझ लेता है। इसके विपरीत हिंदी- लड़का गया बोलने या समझने वाला व्यक्ति अंग्रेजी का ज्ञान नहीं रखता हो तो वह वाक्य को नहीं समझ सकता।
  4. भाषा का प्रयोग शिक्षा, शासन, साहित्य-रचना आदि के लिए होता है किन्तु बोली का दैनिक व्यवहार के लिए।
  5. भाषा का मानक रूप सामाजिक प्रतिष्ठा और औपचारिक शिक्षा का माध्यम होता है। भाषा साधारणता बोली के प्रभाव से मुक्त रहती है; यद्यपि आंचलिक साहित्य में क्षेत्रीय बोलियों के शब्दों का व्यवहार मिलता है।

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