टेलीकॉन्फ्रेंसिंग का अर्थ, परिभाषा प्रकार एवं उपयोग

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टेलीकॉन्फ्रेंसिंग अपने शाब्दिक अर्थों में उस प्रणाली के लिए प्रयोग होता है जिसके प्रतिभागी एक दूसरे से काफी दूर होते हुए भी आपस में संवाद कायम रखने में सफल रहते हैं। इसके लिए एक अधिक टेलीफोन लाइनों की आवश्यकता पड़ती है। टेलीकॉन्फ्रेंसिंग एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है जिसमें दो या दो से अधिक दूर बैठे व्यक्ति अपनी इच्छित विषय-वस्तु से संबंधित चर्चा-परिचर्चा में भाग ले सकते हैं, अपनी बात को कह सकते हैं, दूसरों की बात सुन सकते हैं।

टेलीकॉन्फ्रेंसिंग का अर्थ एवं परिभाषा

टेलीकॉन्फ्रेंसिंग शब्द जिसे हिन्दी में दूर संवाद प्रणाली या दूर संभाषणप्रणाली का नाम दिया जा सकता है अपने शाब्दिक अर्थों में उस तन्त्र, प्रणाली या प्रारूप के लिये प्रयुक्त होता है जिसके प्रतिभागी एक दूसरे से काफी दूर होते हुए भी आपस में उचित संवाद या संभाषण कायम रखने में सफल रहते हैं। वैसे तो हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि कान्प्रेफन्सिंग या पारस्परिक संवाद कायम रखने के लिये प्रतिभागियों का एक-दूसरे के सामने बने रहना बहुत उत्तम रहता है ताकि पारस्परिक अन्त:क्रिया एवं संप्रेषण भली-भाँति हो सके। परन्तु बहुत बार आमने-सामने रहकर संवाद या संभाषण प्रक्रिया स्थापित कर पाना संभव नहीं हो पाता। विशेषकर उस स्थिति में जब प्रतिभागी एक-दूसरे से बहुत अधिक दूर हों, उनका मिलन संभव न हो या इस प्रकार के मिलने में बहुत अधिक समय, पैसा तथा शक्ति के अपव्यय की बात आती हो, तब उस समय परम्परागत कान्प्रेफन्सिंग या आमने-सामने संवाद व्यवस्था कायम करने की बजाय टेली-कान्प्रेफन्सिंग (दूर संवाद प्रणाली) का ही सहारा लेना उपयुक्त रहता है।

इस दृष्टि से टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग या दूर संवाद प्रणाली को हम एक ऐसी संवाद प्रणाली के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति किन्हीं दो या दो से अधिक स्थानों पर बैठे हुए किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की सहायता से उसी प्रकार का सामूहिक संप्रेषण, संवाद संभाषण और अन्त:क्रियायें करने में सक्षम होते हैं जैसे कि वे एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर परम्परागत संवाद या संभाषण प्रणाली में करते दिखाई देते हैं।

टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग के लिये एक से अधिक टेलीफोन लाइनों की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही साथ पारस्परिक सम्बन्धित युक्तियों की भी आवश्यकता होती है। इसी को संपर्क विधि कहते हैं। प्रत्येक युक्ति को प्रत्येक संपर्क द्वारा जोड़ना सामान्य अभ्यास माना जाता है। संपर्क के लिये हाथों के सेट, शीर्ष सेट, स्पीकर फोन तथा रेडियो टेलीफोन आदि आवश्यक होते हैं। टास्क टेलीकॉन्फ्रेंसिंग क्या है? टेलीकॉन्फ्रेंसिंग या टेलीकान्प्रेंफस में वास्तव में दूर-दूर बैठे हुए दो या दो से अधिक लोगों के मध्य ‘वास्तविक- समय-अन्त:प्रक्रिया (Real-Time Interaction) होती है।

टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है जिसमें दो या दो से अधिक दूर बैठे व्यक्ति अपनी इच्छित विषय-वस्तु से सम्बन्धित चर्चा-परिचर्चा में भाग ले सकते हैं, अपनी बात को कह सकते हैं, दूसरों की बात सुन सकते हैं, उन पर तुरन्त प्रतिक्रियाएं एवम् सुझाव तथा अभिमत प्रदान कर सकते हैं, साथ-साथ आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

इस प्रकार टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग के रूप में अति उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग कर आज यह पूरी तरह संभव हो गया है कि हजारों-लाखों किलोमीटर दूर बैठे हुए व्यक्ति उसी तरह संभाषण, वार्तालाप तथा संवादों में रत रह सकते हैं जैसे कि वे एक छत के नीचे बैठे किसी कॉन्प्रेंफस हॉल में आवश्यक अन्त:संप्रेषण और अन्त:क्रियायें कर रहे हों। जहाँ तक इस प्रकार की टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग प्रणाली के ऐतिहासिक उद्गम का प्रश्न है तो उसका चलन अमेरिका में टेलीफोन (दूरभाष) तथा टेलीफोन पिक्चर फोन के जरिए 1960 में प्रारम्भ हुआ।

टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग के प्रकार

वर्तमान समय में हमें टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग के तीन रूप या प्रकार अधिक प्रचलित दिखाई देते हैं-

  1. ऑडियो कॉन्प्रेफन्सिंग (Audio Conferencing)
  2. वीडियो कॉन्प्रेफन्सिंग (Video Conferencing)
  3. कम्प्यूटर कॉन्फ्रेंसिंग (Computer Conferencing)

ओडियो कॉन्प्रेफन्सिंग

यह टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग के सबसे सरल और बहु प्रचलित रूप का प्रतिनिधित्व करती है। इस कान्प्रेफन्स में भागीदार व्यक्तियों के बीच संवाद स्थापित करने हेतु टेलीफोन का उपयोग किया जाता है यह एक तरह से दो व्यक्तियों के बीच संपन्न टेलीफोन सेवा का बढ़ा हुआ रूप है जिसमें आपसी बातचीत या संभाषण का क्षेत्र दो से बढ़कर कई व्यक्तियों तक फैल जाता है।

वीडियो कॉन्प्रेफन्सिंग

इसमें ओडियो कॉन्प्रेफन्सिंग से ज्यादा लाभ पहुँचता है क्योंकि यहाँ दूर बैठे हुए व्यक्ति आपसी संवाद स्थापित करते हुये न केवल एक-दूसरे की आवाज सुनते हैं बल्कि वे एक-दूसरे को टेलीविजन के पर्दे पर उसी तरह देख सकते हैं जैसे कि आमने-सामने बैठे हुए संभाषण कर रहे हों।

कम्प्यूटर कान्प्रेफन्सिंग

यह टेलीकॉन्प्रेफन्सिंग उपरोक्त वर्णित दोनों रूपों ऑडियो एवं वीडियो कान्प्रेफन्सिंग से बहुत अधिक उन्नत एवं प्रभावशाली प्रकार का प्रतिनिधित्व करती है।

इस कॉन्प्रफेन्सिंग हेतु कम्प्यूटर द्वारा प्रदत्त बहु-माध्यमी सेवाओं का उपयोग किया जाता है। यहाँ हम इन्टरनेट सेवाओं द्वारा लिखित सामग्री, रेखाचित्र (Graphics) आदि को कॉन्प्रेफन्सिंग में भाग लेने वाले व्यक्तियों को प्रेषित कर सकते हैं, जिन्हें वे अपने कम्प्यूटरों पर बैठे-बैठे ग्रहण कर सकते हैं। इसके बाद ये अपनी क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं को जहाँ से संप्रेषण सामग्री प्राप्त हुई थी, उन्हें या अपने मनचाहे व्यक्तियों को इन्टरनेट सेवाओं द्वारा प्रेषित कर कॉन्फ्रेंस या संवाद प्रणाली में भाग लेने के इच्छुक सभी व्यक्तियों से पारस्परिक संवाद या संभाषण प्रक्रिया को चालू रखने में निरन्तर सहयोग कर सकते हैं।

इस प्रकार की भाषा, ग्राफिक या अन्य सामग्री का आदान-प्रदान करने के अतिरिक्त वे श्रव्य एवं दृश्य प्रारूपों का प्रयोग भी आपसी संवाद तथा संभाषण हेतु कम्प्यूटर की मल्टीमीडिया सेवाओं द्वारा कर सकते हैं। फलस्वरूप कॉन्प्रेफन्सिंग में भाग लेने के इच्छुक सभी प्रतिभागी अब एक-दूसरे की आवाज भी कम्प्यूटर के साउन्ड रिकार्ड स्पीकर्स तथा ईयर फोन की सहायता से सुन सकते हैं तथा वैब केमरे की सहायता से एक-दूसरे को संभाषण करते हुये देख भी सकते हैं। ऑन लाइन सेवाओं के द्वारा इस तरह कॉन्प्रेफंस में भाग ले रहे सभी प्रतिभागी एक-दूसरे को लिखित, मुद्रित तथा चित्रित संदेश ई-मेल एवं वार्तालाप (Chattering) सेवाओं द्वारा भेज सकते हैं। वार्तालाप करने वालों की मौखिक बातें आपस में सुन सकते हैं तथा उनकी क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं को भी प्रत्यक्ष रूप में उसी तरह कम्प्यूटर मॉनीटर पर देख सकते हैं, जैसे कि वे प्रत्यक्ष रूप में संवाद या संभाषण हेतु आमने-सामने बैठे हों।

इसके अतिरिक्त, कम्प्यूटर कॉन्प्रेफन्सिंग का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इसमें कॉन्प्रेंफस में भाग लेने वाले व्यक्तियों की ऑन लाइन उपस्थिति भी अनिवार्य नहीं होती। टेलीकॉन्फ्रेंसिंग सेवाओं को और अधिक सफल बनाने हेतु निम्न प्रकार की दृश्य सामग्री तथा उपकरणों का प्रयोग उचित रहता है-

  1. प्रतिभागियों को टाइप की हुई सूचना सामग्री की इलेक्ट्रॉनिक प्रतिलिपियाँ फैक्स (Fax) द्वारा भेजी जा सकती हैं।
  2. इलेक्ट्रॉनिक चाक बोर्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है। बोर्ड पर जो कुछ भी लिखा जाता है वह डिजीटल इनपफोर्मेशन में बदलता रहता है जिसे सुदूर बैठे हुये प्रतिभागियों द्वारा अपने मॉनीटरों पर देखा जा सकता है।
  3. वीडियो टेक्स्ट या टेली टेक्स्ट (Teletext) प्रणाली का भी यहाँ इस्तेमाल किया जा सकता है। वीडियो कॉन्प्रेफन्सिंग में अगर कम्प्यूटर तकनीकी का समावेश कर दिया जाये तो टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के उद्देश्यों की पूर्ति बहुत ही प्रभावशाली ढंग से हो सकती है। इस प्रकार के आयोजन के माध्यम से दिल्ली के किसी कक्षा-कक्ष में बैठे हुये विद्यार्थी बंगलौर या लंदन में बैठे हुए अपने प्रतिभागियों के साथ गंभीर संवाद तथा वार्तालाप में रत रह सकते हैं। वे एक-दूसरे को अपने मॉनीटर पर्दे पर मुस्कराते हुये या संवाद करते हुए देखते जाते हैं तथा संवाद स्थापित करने के लिये जो कुछ कहना होता है उसे कम्प्यूटर के की-बोर्ड (Keyboard) से टाइप करके चाट विन्डो (Chat Window) के माध्यम से उन तक पहुँचाते भी रहते हैं। इस तरह जो कुछ एक जगह हो रहा है उससे सम्बन्धित सूचनाओं के आदान-प्रदान में तथा आपसी विचार-विमर्श में प्रतिभागी दूर-दूर बैठे हुए भी उसी तरह के सामीप्य का अनुभव कर सकते हैं जैसे वे एक छत के नीचे ही बैठे हों।

वीडियो एवं कम्प्यूटर कॉन्प्रेफ¯न्सग के एक अति आधुनिक प्रारूप के रूप में वेब कॉन्प्रेफन्सिंग (Web Conferencing) की यहाँ चर्चा करना आवश्यक है। वेब कान्प्रेफन्सिंग के भी कई विविध रूप हमें देखने को मिल सकते हैं। यथा-

  1. अपने बहुत ही साधारण रूप में वेब कॉन्प्रेफ¯न्सग अपनी ऐसी क्षमता के रूप में हमारे सामने आती है जिसमें प्रतिभागी फोन पर एक-दूसरे की आवाज सुनते हैं तथा वेब ब्राउजर (Web Browser) द्वारा शब्द एवं चित्रात्मक सामग्री का अवलोकन भी कर सकते हैं। कॉन्प्रेंफस आयोजक के रूप में यहाँ अब कोई भी व्यक्ति इस तरह का नियंत्रण रख सकता है कि सभी प्रतिभागी एक-सी बात सुनें या देखें। ऐसा वह उन्हें केवल एक ही वेब पेज पर रोके रखकर कर सकता है। वेब पेज की विशिष्ट बातों पर ध्यान आकृष्ट करने के लिये वह ड्राइंग टूल्स (Drawing Tools) का इस्तेमाल भी कर सकता है।
  2. अपने कुछ अधिक उन्नत रूप में वेब कॉन्प्रेफन्सिंग कॉन्फ्रेंस आयोजक को यह मौका देती है कि वह प्रतिभागियों के वेब पेजों को भी प्रदख्रशत/प्रसारित कर सके, श्वेत पट (White Board) पर कुछ लिख तथा चित्रित कर सके तथा किसी सॉफ्टवेयर को इस तरह इस्तेमाल कर सके कि सभी प्रतिभागी उसे एक साथ अपने-अपने कम्प्यूटर मॉनीटरों पर देख सवेंफ। जो कुछ भी प्रदर्शित किया जा रहा है उसमें कुछ संशोधन या सुधार करने के अवसर भी अब यहाँ प्रतिभागियों को दिये जा सकते हैं। यहाँ तक कि कॉन्फ्रेंसिंग का पूरा का पूरा नियंत्रण भी किसी प्रतिभागी को सौंपा जा सकता है।

इस तरह वेब कॉन्प्रेफन्सिंग पूरी तरह से एक ऐसा वातावरण बनाने में सक्षम भूमिका निभाती है कि सभी प्रतिभागी ऐसा अनुभव करें कि वे सभी एक ही जगह एकत्रित होकर पारस्परिक संवाद या संभाषण में रत हैं। इसके अतिरिक्त, इस प्रकार की टेलीकॉन्फ्रेंसिंग का एक बड़ा लाभ या संवाद रत होने में जो अव्यवस्था या अनावश्यक कठिनाइयाँ आ सकती हैं उस पर अनायास ही यहाँ पूरी तरह अंवुफश लग जाता है। इसके अतिरिक्त, वेब पेजों के रूप में कान्प्रेंफस के मुख्य विषय तथा उप-विषयों पर बहुमूल्य जानकारी तथा चर्चा सामग्री सभी प्रतिभागियों को अपनी-अपनी जगह पर अनायास ही प्राप्त होती रहती है। कोई भी संस्था/विद्यालय अपनी वेबसाइट पर वेब पेज के रूप में किसी विषय, समस्या या चर्चित बिन्दु को सामने रखकर इच्छित व्यक्तियों को इस पर चर्चा छेड़ने का न्योता देकर कान्प्रेंफस का श्रीगणेश कर सकता है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुये व्यक्ति अपनी रुचि-अनुसार इस संवाद प्रक्रिया में अपने-अपने कम्प्यूटरों पर बैठे हुये या सामूहिक रूप से कम्प्यूटर के पर्दे पर देखते हुए भाग लेने को स्वतन्त्र होते हैं।

टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के उपयोग

टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के प्रमुख उपयोग इस प्रकार हैं-

  1. छात्रों की आन्तरिक प्रेरणा तथा जिज्ञासा में वृद्धि होती है जिससे छात्र ज्यादा सीखते हैं।
  2. यह माध्यम विविध अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होते हैं।
  3. दूरस्थ शिक्षा के छात्र अपनी उपलब्धियों की स्वयं जांच करते हैं।
  4. इनमें पुनर्बलन की व्यवस्था होती है।
  5. विभिन्न माध्यम एक-दूसरे के सहायक होते हैं।
  6. इनका विशिष्ट अधिगम क्रियाओं में सार्थक तथा प्रभावशाली योगदान होता है।
  7. ये छात्रों की रुचि, कल्पना शक्ति तथा ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता में वृद्धि करती हैं।
  8. छात्र इनके प्रयोग से अधिक सक्रिय तथा अच्छी सहभागिता वाले बन जाते हैं।
  9. इनमें तुरन्त पृष्ठ पोषण (Feed Back) के अवसर होते हैं।
  10. अध्ययन सामग्री को प्रस्तुत करने में लचीलापन (Flexibility) लाते हैं।
  11. ये माध्यम, व्यक्तिगत उद्देश्यों, आवश्यकताओं तथा योग्यताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण को व्यक्तिगत बनाने में सहायता देते हैं।
  12. छात्र, शिक्षकों से सम्पर्क कर अपनी कठिनाइयों का निवारण करने में समर्थ होते हैं।
  13. इनका प्रयोग औपचारिक, अनौपचारिक तथा निरौपचारिक सभी क्षेत्रों में किया जाता है, अर्थात् इनका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है।

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