दूरवर्ती शिक्षा का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, आवश्यकता एवं महत्व

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दूरवर्ती शिक्षा अनेक अर्थों में प्रयोग की जाती है। अर्थों के अनुसार उनके कई नाम भी प्रचलित हैं। जैसे-

  1. पत्राचार शिक्षा (Correspondence Education)
  2. गृह अध्ययन (Home Study)
  3. बाह्य अध्ययन (External Study)
  4. दूरस्थ शिक्षा (Distant Education)
  5. परिसर से बाहर अध्ययन (Off Campus Study)
  6. मुक्त अधिगम (Open Learning)
  7. स्वतन्त्र अध्ययन (Independent Study)
  8. बहु-माध्यम शिक्षा (Multi-media Education)

दूरवर्ती शिक्षा पर संचार विज्ञान की खोजों का काफी प्रभाव पड़ा है। शैक्षिक प्रसार प्रचार के क्षेत्र में संचार विज्ञान की विभिन्न तकनीकियों के प्रयोग ने दूरवर्ती शिक्षा की महत्ता एवं क्षेत्र में काफी वृद्धि कर दी है। दूरवर्ती शिक्षा एक गैर-पारस्परिक (Non-Traditional) विधि के रूप में अत्यन्त लोकप्रिय होती जा रही है।

दूरवर्ती शिक्षा की परिभाषायें

पिफलिप कौम्बस (Philips Combs) के अनुसार-पहले से स्थापित (चल रही परम्परागत) औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र से बाहर चलने वाली सुसंगठित शैक्षिक प्रणाली को दूरवर्ती शिक्षा कहा जाता है। यह एक स्वतन्त्र प्रणाली के रूप में अथवा किसी बड़ी प्रणाली के अंग के रूप में सीखने वालों को एक निश्चित समूह को निश्चित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये मदद देती है।

बोर्जी होमवर्ग (1981) इस सन्दर्भ में लिखते हैं, शिक्षा के सभी स्तरों पर अध्ययन के विभिन्न प्रकार जो शिक्षक के निरन्तर तत्कालीन निरीक्षण में नहीं है, उन्हें दूरवर्ती शिक्षा कहा जाता है।

व्रैडमेयर (1977) अपने विचार प्रदर्शित करते हुये कहते हैं, स्वतन्त्र अध्ययन (Independent Study), शिक्षण-अधिगम की विभिन्न अवस्थाओं की व्यवस्था करता है, जिसमें शिक्षक एवं छात्र परस्पर एक-दूसरे से अलग रहकर आवश्यक कार्यों तथा उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हैं, विभिन्न विधियों से सम्पर्क करते हैं। स्वतन्त्र अध्ययन का उद्देश्य विद्यालय के छात्रों को कक्षा के अनुपयुक्त स्थान तथा प्रारूप से मुक्त करना है तथा विद्यालय से बाहर के छात्रों को उनके अपने वातावरण में अध्ययन करते रहने के अवसर प्रदान करना होता है। इस प्रकार से छात्रों में स्वत: निर्धारित अधिगम की क्षमता विकसित होती रहती है।

उपर्युक्त परिभाषा में व्रैडमेयर ने दूरवर्ती शिक्षा के स्थान पर ‘स्वतन्त्र अध्ययन’ शब्द का प्रयोग किया है। पीटर्स (1973) कहते हैं कि दूरवर्ती शिक्षा, ज्ञान, कौशल तथा अभिवृत्ति प्रदान करने की एक नवीन तथा उभरती हुयी, विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली शैक्षिक संरचना है जो दूरगामी शिक्षा के रूप में लोगों को शिक्षा देने में समर्थ है।

मालकम आदिशेषैया (1981) के अनुसार-दूरवर्ती शिक्षा का तात्पर्य उस शिक्षण प्रक्रिया से है, जिसमें स्थान और समय के आयाम शिक्षण और अधिगम के मध्य हस्तक्षेप करते हैं।

जी. रामा रेड्डी (1998) ने दूरवर्ती शिक्षा को एक प्रवर्तनकारी, अपारंपरिक तथा अरूढ़ प्रणाली के रूप में, शिक्षा परिसरों में तथा शिक्षा परिसरों से बाहर अध्ययनरत, दोनों प्रकार के छात्रों को आवश्यकता पूरी करने वाली बताया है। वे आगे कहते हैं, बुनियादी तौर पर दूरवर्ती शिक्षा प्रणाली का जोर छात्र तथा शिक्षक के अलगाव पर है जिससे छात्रों को स्वायत्त रूप से सीखने का अवसर मिलता है। दोनों के मध्य जो भी माध्यम हो, उसके द्वारा परस्पर संचार स्थापित किया जाता है जैसे-डाक या इलैक्ट्रोनिक प्रेषण, टेलीफोन, टेलेक्स या फैक्स, दोतरफा रेडियो-जिसमें संगणक और टी. वी. के पर्दे जुड़े रहते हैं और संगणक द्वारा नियन्त्रित अंत:क्रियात्मक ‘वीडियो डिस्क’ आदि।

डा. कुलश्रेष्ठ के शब्दों में दूरवर्ती शिक्षा व्यापक तथा अनौपचारिक शिक्षा की एक विधि है जिसमें दूर-दूर स्थानों पर स्थित छात्र, शैक्षिक तकनीकी द्वारा प्रायोजित विकल्पों में से किन्हीं निश्चित विकल्पों का प्रयोग करते हुये शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति कर लेते हैं। ये विकल्प निम्न प्रकार के हो सकते हैं-

  1. भलीभाँति संरचित स्व-अनुदेशन सामग्री,
  2. पुस्तकों, सन्दर्भों तथा शोध पत्रिकाओं (जर्नल्स) के सैट,
  3. चार्ट, मॉडल, पोस्टर तथा अन्य दृश्य सामग्री,
  4. टेलीविजन/रेडियो प्रसारण आदि।
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दूरवर्ती शिक्षा में शिक्षक तथा छात्रों के मध्य प्रत्यक्ष रूप से मौखिक शब्दों का संचार नहीं हो पाता है। दूरवर्ती शिक्षा, शिक्षक और छात्रों के मध्य निम्नांकित प्रकार की दूरियों की ओर संकेत करती है-

  1. शिक्षक और छात्रों के मध्य स्थान की दूरी (भौतिक दूरी)।
  2. पाठ/अधिगम सामग्री के निर्माण और उसके सम्प्रेषण में समय के अन्तराल की दूरी।
  3. पाठ या अधिगम सामग्री के सम्प्रेषण तथा उसे पढ़ने और सीखने के बीच की दूरी।

शिक्षण और अधिगम की प्रक्रिया में उपर्युक्त प्रस्तुत दूरियों के कारण ही इस प्रकार की शिक्षा को दूरवर्ती-शिक्षा कहा जाता है।

दूरवर्ती शिक्षा की विशेषतायें

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर दूरवर्ती शिक्षा की विशेषतायें प्रस्तुत की जा सकती हैं-

  1. दूरवर्ती शिक्षा, शिक्षण-अधिगम की एक सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित प्रणाली है।
  2. इसमें आमने-सामने बैठकर पढ़ने-पढ़ाने का बन्धन नहीं होता।
  3. यह प्रणाली छात्रों की आवश्यकताओं, स्तर एवं उसके दैनिक कार्यों से जुड़ी रहती है।
  4. यह एक ज्यादा लचीली विधि है।
  5. छात्रों को इस विधि द्वारा, अपनी इच्छानुसार समय लगाकर, उसको अपनी योग्यता तथा गति के अनुसार पढ़ने के अवसर मिलते हैं।
  6. इस विधि में छात्रों के ऊपर बाहर से कुछ थोपा नहीं जाता वरन् जो कुछ सिखाया जाता है, छात्र अपने प्रयत्नों से सीखते हैं।
  7. यह विधि छात्रों के सुनिश्चित एवं विशिष्ट समूह के लिये पूर्व निर्धारित, सुनिश्चित तथा विशिष्ट उद्देश्यों के लिये शिक्षा प्रदान करती है।
  8. इसमें शैक्षिक तकनीकी के विभिन्न माध्यमों जैसे मुद्रित तथा अमुद्रित, दोनों प्रकार के माध्यमों का प्रयोग किया जाता है।
  9. अनुदेशन सामग्री के अध्ययन का उत्तरदायित्व छात्रों पर अधिक होता है।
  10. इस प्रणाली में छात्रों को अधिगम शुरू करने और खत्म करने की अपनी क्षमता के अनुसार स्वतन्त्रता होती है।
  11. दूरवर्ती शिक्षा की तकनीकों का प्रयोग सभी आयु वर्ग के लोगों को शिक्षित करने के लिये अनेक प्रकार के व्यावसायिक एवं अव्यावसायिक शास्त्रों से सम्बन्धित पाठ्यक्रमों के शिक्षण हेतु किया जाता है।
  12. दूरवर्ती शिक्षा-स्व-अनुदेशन की प्रणाली पर आधारित होती है।
  13. यह शिक्षा को देश के दूर-दूर तक के स्थानों तक पहुँचाने का प्रयास करती है।

इन विशेषताओं के आधार पर दूरवर्ती शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए कुलश्रेष्ठ एवं रावत लिखते हैं-दूरवर्ती शिक्षा एक ऐसी सुगठित व व्यवस्थित प्रणाली है, जिससे शिक्षक और छात्रों में कितनी भी भौतिक दूरी क्यों न हो, शैक्षिक तकनीकी के मुद्रित/अमुद्रित माध्यमों का प्रयोग करते हुये, शिक्षा को छात्रों तक रोचक, बोधगम्य तथा वैज्ञानिक विधियों के द्वारा पूर्व निश्चित तथा विशिष्ट उद्देश्यों के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने में अपना योगदान देती है।

दूरवर्ती शिक्षा स्व-अनुदेशन के सिद्धान्त पर आधारित, अन्त:प्रेरणा जाग्रत कर छात्रों को उनकी योग्यता, स्तर तथा आवश्यकताओं के अनुरूप उनकी गति एवं क्षमता के अनुसार, व्यावसायिक या अव्यावसायिक विषयों का शिक्षण देती है और उनके जीवन के लिये इस शिक्षण के द्वारा एक नयी रोशनी, नया प्रकाश तथा नवीन परिवर्तन लाने में सफल होती है।

दूरवर्ती शिक्षा के उद्देश्य/लक्ष्य

दूरवर्ती शिक्षा के प्रमुख लक्ष्य तथा उद्देश्य नीचे दिये गये हैं-

  1. दूरवर्ती शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है देश के सुदूर कोने में स्थित विभिन्न स्थानों पर पढ़ने वालों के द्वार-द्वार तक शिक्षा पहुँचाना।
  2. छात्रों के स्तर, आवश्यकताओं, योग्यताओं, क्षमताओं तथा आयु के अनुसार अधिगम सामग्री तैयार करना तथा निर्दिष्ट विधियों द्वारा छात्रों तक पहुँचाने का सफल प्रयास करना।
  3. इस प्रणाली में ज्ञान व अधिगम को विभिन्न विधाओं के प्रयोग द्वारा छात्रों तक पहुँचाने का सपफल प्रयास करना।
  4. ऐसे लोगों के लिये शिक्षा के अवसर पुन: प्रदान करना, जो किन्हीं कारणों से अपने जीवन में शिक्षित होने के अवसर खो चुके हैं।
  5. विभिन्न कार्यों में लगे तथा विभिन्न व्यवसायों से जुड़े, विभिन्न व्यक्तियों तथा गृहणियों को उनकी आवश्यकतानुसार जीवनपर्यन्त शिक्षा प्राप्त हो सके, जिससे वे अपना शिक्षा स्तर तथा जीवन स्तर सुधार सकें।
  6. दूरवर्ती शिक्षा के उपकरण का प्रयोग कर परम्परागत विद्यालयों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों पर कार्य का दबाव कम करने के लिये प्रयास करना।
  7. संविधान में वर्णित ‘सभी को शिक्षा के समान अवसर’ सिद्धान्त को बढ़ावा देना।
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दूरवर्ती शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व

आज के युग में दूरवर्ती शिक्षा दिन-प्रतिदिन एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा के साधन के रूप में विकास के पथ पर आगे बढ़ती चली जा रही है। निम्नांकित बिन्दु दूरवर्ती शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व के विशेष परिचायक बिन्दु हैं-

  1. ऐसे लोग जो दूर-दराज के गाँवों में वन्य तथा पहाड़ी प्रदेशों में रहते हैं और जहाँ शैक्षिक सुविधाओं का अभाव है या वे बहुत सीमित मात्रा में हैं, वहाँ दूरवर्ती शिक्षा, शिक्षा की ज्योति पैफलाने में एक शक्तिशाली साधन है।
  2. दूरवर्ती शिक्षा ऐसे लोगों के लिये भी वरदान है जो अपनी शिक्षा को आगे जारी रखने के लिये अन्यत्र जाने में पूर्णतया असमर्थ है।
  3. दूरवर्ती शिक्षा उन लोगों के लिये भी एक उत्तम साधन है जो किसी कारणवश (समय से पूर्व) जीविकोपार्जन के लिये किसी नौकरी या धन्धे में लग जाते हैं और औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाये हैं।
  4. ऐसे लोग जो किसी व्यवसाय/धन्धे या नौकरी में लगे हैं परन्तु अपने स्व-सन्तोष (Self Satisfaction) तथा Professional Development के लिये अपने विषय से सम्बन्धित नवीन संप्रत्ययों, नव-सूचनाओं तथा नयी तकनीकियों आदि का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। इस प्रकार दूरवर्ती शिक्षा राष्ट्रीय उत्पादन को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  5. दूरवर्ती शिक्षा, निरक्षर किसानों, मजदूरों, गृहणियों तथा विकलांग व्यक्तियों आदि के लिये भी महत्त्वपूर्ण है जो औपचारिक विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं।
  6. दूरवर्ती-शिक्षा, औपचारिक शिक्षा एक प्रभावशील विकल्प है, जो आजीवन शिक्षा से लेकर शिक्षा के सार्वभौमीकरण तक को अपने अन्दर समेटे रहता है। दूसरे शब्दों में इसका क्षेत्र काफी व्यापक है।
  7. दूरवर्ती शिक्षा, शैक्षिक तथा व्यावसायिक अवसरों की समानता प्रदान करने वाला एक सशक्त माध्यम है।
  8. दूरवर्ती शिक्षा, एक गतिमान भविष्योन्मुखी सांगठनिक संरचना विकसित करने का एक अच्छा अवसर है।
  9. दूरवर्ती शिक्षा, बहुमाध्यमीय उपागम का प्रयोग करती है-फलस्वरूप छात्रों की अधिगम प्रक्रिया को अधिक बल मिलता है।
  10. दूरवर्ती शिक्षा ऐसे लोगों के लिये भी महत्त्वपूर्ण है जिन्हें ज्ञान के उन्नयन के लिये वुफछ अतिरिक्त शैक्षिक प्रशिक्षण की आवश्यकता हो।
  11. समृद्ध समाजों के लोगों (जिनके पास पर्याप्त समय/अवकाश हो और जो कोई शौक पूरा करना चाहते हों) के लिये दूरवर्ती शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।
  12. दूरवर्ती शिक्षा छात्र-केन्द्रित या व्यक्ति-केन्द्रित व्यवहार है, अत: इसके अन्तर्गत छात्रों के स्तरों के अनुरूप बेहतर अधिगम सामग्री देने में दूरवर्ती शिक्षा सफल सिद्ध हुई है।
  13. दूरवर्ती शिक्षा से ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा मनोवैज्ञानिक, तीनों प्रकार के उद्देश्यों की प्राप्ति सम्भव होती है।
  14. दूरवर्ती शिक्षा छात्रों में स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित करती है, अन्त:अभिप्रेरणा जाग्रत करती है, उन्हें अपने विषय में नवीनतम सूचनायें प्रदान कर दक्षता उत्पन्न करती है तथा जीवन की शैली में वांछित परिवर्तन लाती है।
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दूरवर्ती शिक्षा के लाभ

दूरवर्ती शिक्षा के प्रमुख लाभ नीचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

  1. यह करोड़ों लोगों को सतत/अनवरत शिक्षा प्रदान करती है जो इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं।
  2. दूरवर्ती शिक्षा, व्यक्ति के द्वार तक स्वयं जाकर उसे शिक्षित करने का प्रयास करती है।
  3. साक्षरता के विकास में यह सहायक है।
  4. अपनी आत्मोन्नति तथा व्यावसायिक उन्नति के लिये अपने ज्ञान तथा कौशल में वृद्धि करने की चाह रखने वालों के लिये उच्च शिक्षा के ये द्वार खोलती है।
  5. गृहणियों के लिये शिक्षा सुलभ करके उनके गृह कार्य से सम्बन्धित कौशलों को समुन्नत बनाती है।
  6. विकलांग, विशिष्ट तथा दूरस्थ क्षेत्र के निवासियों को भी दूरवर्ती शिक्षा समुचित शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है।
  7. दूरवर्ती शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीकी के नवीनतम खोजों को प्रयोग कर स्वयं को अधिक व्यवस्थित रखती है और दूसरों को न्चजव.कंजम बनाने में सहायता देती है।
  8. दूरवर्ती शिक्षा में पुनर्बलन तथा पृष्ठपोषण के लिये विशेष प्रावधान रखे गये हैं।
  9. यह परम्परागत शिक्षा की तुलना में कम खर्चीली, सस्ती तथा अधिक उपयोगी शिक्षा है।
  10. दूरवर्ती शिक्षा के माध्यम से शिक्षा-प्रक्रिया में सार्वलौकिकता/सार्वभौमिकता सम्भव होती है।
  11. दूरवर्ती शिक्षा यथार्थ आवश्यकताओं के लिये एक समाधान है जो शिक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाने में सक्षम एवं समर्थ हैं।
  12. दूरवर्ती शिक्षा, औपचारिक-शिक्षा-प्रणाली पर छात्रों के दबाव को कम करती है और गुणात्मक सुधारों की ओर अग्रसरित करती है।
  13. यह हमारे संविधान के इस प्रावधान को प्रोत्साहित कर बढ़ावा देती है कि सभी को शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए।
  14. यह प्रणाली प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक की शिक्षा के लिये, हर स्तर पर उपयोगी सि( हुई है।
  15. दूरवर्ती शिक्षा व्यक्तियों को उनके खाली समय का समुचित विधि से उपयोग करना सिखाती है।
  16. लोग अपनी अहर्ताओं को उन्नत कर अच्छी नौकरी पाने में समर्थ हो जाते हैं।
  17. दूरवर्ती शिक्षा समुदाय के शिक्षा के स्तर में वृद्धि तथा शिक्षा के प्रति जागृति उत्पन्न करने में सहायक होती है।
  18. दूरवर्ती शिक्षा अपने शिक्षण हेतु पाठ्य-सामग्री निर्माण के लिये अथवा विषय-वस्तु पर व्याख्यान देने के लिये अत्यन्त विशिष्ट विषय-विशेषज्ञों को आमन्त्रित करती है तथा उनका पूरा लाभ छात्रों को देने का प्रयास करती है।
  19. छात्र दूरवर्ती शिक्षा में अपनी गति से सीखने का अवसर प्राप्त करते हैं।

दूरवर्ती शिक्षा प्रोग्राम की सीमाएँ

दूरवर्ती शिक्षा प्रोग्रामों की निम्नांकित सीमायें हैं-

  1. कभी-कभी छात्र अपनी प्रेरणा, शक्ति योग्यता तथा अभिरुचियों का अनावश्यक रूप से ज्यादा आकलन (Overestimation) कर लेते हैं, जिससे बाद में उन्हें परेशानी होती है।
  2. दूरवर्ती शिक्षा में कम्प्यूटर अनुदेशन को छोड़कर, अन्य प्रत्येक प्रोग्राम में पृष्ठपोषण तुरन्त नहीं प्राप्त कर पाते।
  3. दूरवर्ती शिक्षा-प्रोग्रामों में छात्रों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर ध्यान देना मुश्किल हो जाता है।
  4. बहुत बार दूरवर्ती शिक्षा ‘लकीर की पफकीर’ बनकर कार्य करती है।
  5. छात्रों ने परम्परागत शिक्षा प्रणाली की तुलना में अन्त:क्रिया (Interaction) कम होती है।
  6. छात्रों पर शिक्षकों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ पाता क्योंकि उनसे सामना यदा कदा, सम्पर्क प्रोग्रामों में ही हो पाता है। इसीलिये बहुत से मूल्य (Values), अभिवृत्ति (Attitudes) आदि जो शिक्षकों से छात्र पाते हैं, इस विधि में सम्भव नहीं हो पाते।
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