ग्राम सभा के कार्य, महत्व एवं भूमिका

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अनुक्रम

ग्राम सभा एक ऐसी अवधारणा है जो सामान्य जन की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है और जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, राजनीतिक प्रतिबद्धता पर विचार किए बिना ग्रामीण समुदाय को सन्दर्भित करती है। यह आमजन की सर्वोच्चता को स्थापित करती है। ग्राम सभा स्थानीय स्तर पर गांव के प्रत्येक मतदाता को निर्णय-निर्माण, योजना निर्माण, क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन की प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करती है। यह गांव में लोगों को उनकी समस्याओं पर विचार-विमर्श करके दूर करने के लिए राजनीतिक व सामाजिक मंच प्रदान करती है, और परिणाम स्वरूप उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को मुखर करती हैं। यह ग्रामीण समुदाय के सभी वयस्क व्यक्तियों को एक साथ बैठने और निर्वाचित प्रतिनिधियों के कार्यों एवं कार्यप्रणाली पर चर्चा, बहस और विश्लेषण का मंच प्रदान करती है। इस तरह पंचायत के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करती है।

सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि ग्राम सभा का मतलब है गांवों में रहने वाला प्रत्येक पुरूष और महिला जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेता है तथा उसका नाम मतदाता सूची में दर्ज हो, वे सभी ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। वस्तुत: किसी भी पंचायत क्षेत्र के समस्त वयस्क नागरिकों के सम्मिलित स्वरूप या समूह को ग्राम सभा कहते हैं। अर्थात यह वह व्यवस्था नहीं है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधि हेाते हैं और ग्रामीणों की ओर से निर्णय लेते हैं। बल्कि यह वह व्यवस्था है जहां ग्रामीण समुदाय के सभी वयस्क जनमानस – युवा, बुजुर्ग, महिला, पुरूष, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछडा वर्ग – आमने सामने की अन्त:क्रिया, चर्चा द्वारा अपने मामलों के विषय में सामूहिक निर्णय लेते हैं। इससे आमजन को सक्रिय, प्रत्यक्ष व पूर्ण भागीदारी प्राप्त होती है । अत: स्पष्ट है कि पंचायती राज व्यवस्था में गांव स्तर पर स्थानीय स्वशासन की दो संस्थाऐं – ग्राम सभा व पंचायत- अलग-अलग संगठन है।

ग्राम सभा एवं पंचायत

ग्राम पंचायत का अर्थ है ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की संस्था और ग्राम सभा का तात्पर्य सम्पूर्ण गांव या गांवों के व्यस्क लोगों के समूह से है। दूसरे शब्दों में निर्वाचित सरपंच एवं पंचो से बनी ग्राम पंचायत के निर्वाचक मण्डल के सामूहिक रूप को ग्राम सभा कहते है। ग्राम सभा में पंचायत क्षेत्र के सभी मतदाता शामिल है जबकि ग्राम पंचायत में ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। ग्राम सभा के सदस्य जिनकी आयु कम से कम 21 वर्ष हो, निर्वाचित होने पर पंचायत के सदस्य बनते हैं। इस प्रकार ग्राम सभा के सदस्य की आयु कम से कम 18 वर्ष व ग्राम पंचायत के सदस्य की आयु कम से कम 21 वर्ष होती है।

अर्थात ग्राम सभा के सदस्य जिनकी आयु 21 वर्ष है और जिनका नाम मतदाता सूची में है, वे ही ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित होने पर पंचायत के सदस्य हो सकते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ग्राम पंचायत का अस्तित्व ग्राम सभा से है, न कि ग्राम सभा का अस्तित्व पंचायत से। ग्राम पंचायत एक निर्वाचित व छोटा निकाय है और इसका कार्यकाल पांच वर्ष होता है। दूसरी तरफ ग्राम सभा एक वृहत व स्थायी निकाय है, जो भंग नहीं होता है। ग्राम पंचायत जहाँ प्रतिनिधित्यात्मक लोकतन्त्र का रूप है तो, ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों के रचनात्मक सहयोग से ग्रामीण विकास एवं योजनाओं का सुगमता से कार्यान्वयन सम्भव है। ग्राम पंचायत एक निर्वाचित संस्था होने के नाते मानव प्रयासों को गतिशाील करने का निर्णय ले सकती हैं, लेकिन ग्राम पंचायत के निर्णय को वैद्यता तभी मिलती है जब ग्राम सभा उसका अनुमोदन करती है। इससे निर्णय के क्रियान्वयन की क्षमता बढने के साथ-साथ सामाजिक स्वीकृति में भी गुणात्मक वृद्धि होती है।

ग्राम सभा एक प्रकार से ग्राम पंचायत की विधायिका है और पंचायत इसकी ‘कार्यकारी निकाय’ (Executive Body) है। जहाँ ग्राम सभा पर गांव के सभी मामलों एवं समस्याओं पर चर्चा कर निर्णय लेने का उत्तरदायित्व है, वही इन निर्णयों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत पर है। सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं को पंचायत द्वारा क्रियान्वयन के लिए हाथ में लिये जाने के पूर्व ग्राम सभा का अनुमोदन आवश्यक है।

ग्राम सभा के कार्य

ग्राम सभा, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए और ऐसी सीमा तक और ऐसी रीति से, जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर विहित की जाये, कार्य करेगी –

  1. सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं का, वार्ड सभा द्वारा अनुमोदित योजनाओं, कार्यक्रमों को परियोजनाओं में से पूर्विकता क्रम में, ऐसी योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को पंचायत द्वारा क्रियान्वयन के लिए हाथ में लिये जाने के पूर्व अनुमोदन करना।
  2. गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अधीन लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की, उनकी अधिकारिता के अधीन आने वाली विभिन्न वार्ड सभाओं द्वारा पहचाने गये व्यक्तियों में से, पूर्विकता क्रम में पहचान या चयन।
  3. संबंधित वार्ड सभा से यह प्रमाण-पत्र अभिप्राप्त करना कि पंचायत ने खण्ड (क) में निर्दिष्ट उन योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए उपलब्ध करायी गयी निधियों का सही ढंग से उपयोग कर लिया है जिनका उस वार्ड सभा के क्षेत्र में व्यय किया जाना है।
  4. कमजोर वर्गों को आवंटित भूखण्डों के संबंध में सामाजिक संपरीक्षा करना।
  5. आबादी भूमियों के लिए विकास की योजनाएँ बनाना और अनुमादित करना।
  6. सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक श्रम और वस्तु रूप में या नकद अथवा दोनों ही प्रकार के अभिदाय जुटाना।
  7. साक्षरता, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को प्रोत्साहित करना।
  8. ऐसे क्षेत्र में समाज के सभी समुदायों के बीच एकता और सौहार्द बढाना।
  9. किसी भी विशिष्ट क्रिया कलाप, स्कीम, आय और व्यय के बारे में पंचायत के सदस्य और सरपंच से स्पष्टीकरण मांगना।
  10. वार्ड सभा द्वारा अभिशासित संकर्मों में से पूर्विकता क्रम में विकास संकर्मों की पहचान और अनुमोदन।
  11. लघु जन निकायों की योजना और प्रबंध।
  12. गोण वन उपजों का प्रबंध।
  13. सभी सामाजिक सेक्टरों की संस्थाओं और कृत्यकारियों पर नियंत्रण।
  14. जनजाति उप-योजनाओं को सम्मिलित करते हुए स्थानीय योजनओं पर और ऐसी योजनाओं के स्त्रोतों पर नियंत्रण।
  15. ऐसे पंचायत सर्किल के क्षेत्र की प्रत्येक वार्ड सभा द्वारा की गयी अभिशंसाओं के बारे में विचार और अनुमोदन।
  16. ऐसे अन्य कृत्य जो विहित किये जाऐं।

नीति निर्माताओं ने ग्राम सभा के महत्व को भाँपते हुए 73 वें संविधान संशोधन के बाद भी इसे और सशक्त करने के लिए निरन्तर प्रयास किये। वर्ष 1999-2000 व 2009-2010 को ग्राम सभा वर्ष के रूप में मनाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि स्थानीय स्वशासन की इकाई के रूप में ग्राम सभा और मजबूत हो, और ग्राम सभा व ग्राम पंचायत के बीच वही सम्बंध हो जो विधायिका और सरकार के बीच है। गांव में कोई भी कार्यक्रम शुरू करने से पहले ग्राम सभा का पूर्व अनुमोदन अनिवार्य हो।

ग्राम सभा का महत्व एवं भूमिका

लोकतंत्र को चौपाल तक पुहँचाने का कार्य पंचायतों ने किया तो ग्राम सभा ने लोकतन्त्र को घर की चौखट व गवाड तक पहुँचाने का महती कार्य किया है। पंचायती राज को जीवंत, ऊर्जावान और गतिशील बनाने तथा शिखर से धरातल तक लोकतंत्र के प्रवाह को पहुँचाने के लिए ग्राम सभा को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। ग्राम सभा के माध्यम से योजना प्रक्रिया का लोकतन्त्रीकरण हुआ, जिसमें योजना चक्र (निर्माण, क्रियान्वयन, मूल्यांकन) के प्रत्येक स्तर पर समाज के सभी वर्गो, विशेषकर अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला एवं गरीब, बहिष्कृत (Excluded), को सक्रिय भागीदारी का समान अवसर मिला है। इसने पूरी नियोजन प्रक्रिया को अरहस्यमयी बनाया और दिखाया कि एक सामान्य व्यक्ति इस प्रक्रिया में केवल प्राप्तिकर्ता (Reciever) नहीं है, बल्कि भागीदार है और इसमें कुछ योगदान दे सकता है। सहभागिता पूर्ण क्रियान्वयन ग्राम सभा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। सहभागी लाभार्थी चयन ने पूर्व में प्रचलित मनमाने पूर्ण चयन जैसे सरपंच द्वारा अपने निकट के लोगों को पक्षपात पूर्ण ढंग से लाभ पहुँचाने या विरोधियों को लाभ से वंचित करने को कम किया है। इस विषय में ग्राम सभा की सर्वोच्चता अधिकार के रूप में स्वीकार हो चुकी है।

ग्राम सभा जमीनी स्तर पर सामुदायिक भावना को जाग्रत करती है। सभी लोगों को साथ बैठकर, मिलकर काम करने का अवसर व परिस्थिति प्रदान कर विभिन्न समूह के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक दूरी को कम करके सामाजिक सौहार्द का वातावरण बनाती है। ग्राम सभा की सहभागी पद्धति विकास पर आने वाली लागत को कम करती है और कार्य की गुणवत्ता को बढाने के साथ-साथ सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों के ‘इच्छित प्रभाव’ व ‘वास्तविक प्रभाव’ के बीच के अन्तर को कम करती है। ग्राम सभा ‘योजना निर्माण केन्द्र’ व ‘वास्तविक क्रिया केन्द्र’ के बीच की खाई को पाटने के लिए एक अभिनव तन्त्र है  ग्राम सभा सहभागी एवं प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का सार है, और अकेला ऐसा निकाय है जो पंचायत को समुचित ढंग से कार्य करने के लिए बहुमूल्य जानकारी, सहयोग प्रदान करती हैं ।

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