वेद शब्द का अर्थ, स्वरूप, चतुर्धा विभाजन एवं भाग

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अनुक्रम

‘वेद’ शब्द का अर्थ- वैदिक ग्रन्थों में ‘वेद’ शब्द दो प्रकार के पाये जाते है- अन्तोदात्त एवं आद्युदात्त। इनमें प्रथम प्रकार का शब्द ‘दर्भमुष्टि’ के अर्थ में एवं द्वितीय प्रकार का शब्द ‘ज्ञान’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद-संहिता में ‘असुन्’ प्रत्ययान्त वेद: (वेदस्) शब्द अनेक बार आया है। भाष्यकारों के द्वारा इस शब्द का अर्थ ‘धन’ किया गया है। निघण्टु में भी धन के पर्यायवाची शब्दों में वेद शब्द पढ़ा गया है। ऐसा लगता है कि यह शब्द ‘विद’ ज्ञाने धातु से निष्पन्न न होकर ‘विद्लृ लाभे’ धातु से निष्पन्न है। ज्ञान अर्थवाची ‘ज्ञा’ और ‘विद्’ दोनों धातुए है, परन्तु इन दोनों के अर्थ में अन्तर है। भौतिक विद्याओं की जानकारी को ज्ञान एवं आध्यात्मिक विद्याओं की जानकारी को ‘वेद’ कहा जाता है।

‘वेद’ शब्द के अर्थ के विषय में अनेक विचार प्राप्त होते है। ऋग्वेद-प्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति की प्रस्तावना में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- ‘‘विद्यन्ते ज्ञायन्ते लभ्यन्ते वैभिर्धर्मादिपुरूषार्था इति वेदा:।’’ अर्थात् जिसके द्वारा धर्मादि चारों पुरूषार्थ प्राप्त किये जाते है उसे ‘वेद’ कहते है। सायणाचार्य ने ‘वेद’ शब्द के विषय में स्पष्ट कहा है कि जो ग्रन्थ अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति तथा अनिष्ट वस्तु के परिहार के लिए अलौकिक उपाय का ज्ञान कराता है, वह ‘वेद’ है। सायणाचार्य के इस लक्षण में वेद का अर्थ ज्ञानमूलक है। वास्तव में जो उपाय प्रत्यक्ष, अनुमान एवं अन्य प्रमाणों से ज्ञात नही किये जा सकते उनके लिए प्रबल प्रमाण वेद ही है- ‘धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:।’ तैत्तिरीय संहिता में वेद शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है कि ‘वेद’ के द्वारा ही देवताओं ने असुरों की सम्पत्ति को प्राप्त किया, यही ‘वेद’ का वेदत्व है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ऐहलौकिक सुख-सम्पन्नता से सम्बन्धित जानकारी ज्ञान एवं पारलौकिक सुख-सम्पन्नता से सम्बन्धित जानकाी ‘वेद’ कहलाती है। आचार्य सायण के अनुसार जो ज्ञान प्रत्यक्ष अथवा अनुमान के द्वारा नही प्राप्त हो सकता उसका अवबोध ‘वेद’ के द्वारा हो जाता है, यही ‘वेद’ की वेदता है-

‘‘प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।

एनं विन्दन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता।।’’

आचार्य सायण ने भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरूषार्थचतुष्टय की प्राप्ति का परम साधन ‘वेद’ को ही स्वीकार किया है- ‘‘अलौकिकं पुरूषार्थोपायं वेत्ति अनेन इति वेदशब्द निर्वचनम्।’’ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ज्ञान, सत्ता, लाभ तथा विचार, इन चारों अर्थो को बतलाने वाली ‘विद्’ धातु से वेद शब्द की व्युत्पत्ति स्वीकार की है। इस धातु से करण और अधिकरण अर्थ में घञ् प्रत्यय करने से वेद शब्द सिद्ध होता है। इस प्रकार वेद शब्द का अर्थ है- जिससे सभी मनुष्य सभी सत्य विद्याओं को जानते है, जिससे सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जिससे लौकिक एवं पारलौकिक, सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते है, जिससे ग्राह्य एवं त्याज्य पदार्थो का विचार किया जाता है, उसे वेद कहा जाता है। इस प्रकार भारतीय आस्तिक परम्परा के आधार पर यह निर्विवाद रूप में स्वीकार किया गया है कि ‘वेद’ शब्द का अभिधेयार्थ ‘ज्ञान’ है तथा विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान का उद्गम-स्थान भी वेद ही है।

वेद का स्वरूप

विद्वानों में वेद के स्वरूप के सम्बन्ध में विभीन्न मत प्राप्त होते है। बौधायनगृह्यसूत्र में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद कहे गये है। कात्यायन विरचित ‘प्रतिज्ञापरिशिष्ट’ एवं ‘सत्याषाढ़श्रौतसूत्र‘ भी मन्त्र और ब्राह्मण भाग को ही वेद स्वीकार करते है। आचार्य सायण ने भी मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनो को वेद माना है- ‘‘मन्त्रब्राह्मणात्मक: शब्दराशिर्वेद:’’। आचार्य जैमिनि ने मीमांसा-सूत्रों में मन्त्र और ब्राह्मण को वेद मानकर उनकी प्रामाणिकता का प्रतिपादन किया है। वास्तव में अठारहवीं शताब्दी से पूर्व के सभी विद्वानों ने मन्त्र और ब्राह्मण भाग को वेद स्वीकार किया है। वेद ऋषि-दृष्ट है, अपौरूषेय माने जाते है। वेद के इस तथ्य को मानने वाले विद्वान मात्र मन्त्रों को ही वेद मानते है। उनका कहना है कि ऋषियों ने मन्त्रों को संहितापाठ के रूप में ही देखा अत: संहितात्मक मन्त्र-भाग ही वेद है। ब्राह्मण भाग तो संहितात्मक मन्त्रों के भाष्य है। पाश्चात्य विद्वान् विल्सन और ग्रिफिथ ने भी मन्त्रों को ही वेद स्वीकार किया है, परन्तु मैक्समूलर महोदय का विचार उदारतापूर्ण है। उनके अनुसार वेद का अर्थ मात्र संहिता नही है, बल्कि ब्राह्मण, आख्यक, उपनिषद्, आदि सभी वेद कहलाने की योग्यता रखते है। वास्तव में वैदिक युग के सम्पूर्ण साहित्य संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् को वैदिक साहित्य माना गया है। साथ ही सब में संहिता ग्रन्थों के ज्ञान का ही सरल एवं ग्राह्य रूप प्रतिपादित होने से सभी वेद ही है।

वेदों का चतुर्धा विभाजन

तप:पूत ऋषियों के अन्त:करण से उद्भूत वेद-राशि प्रारम्भ में एक थी। कालान्तर में महर्षि कृष्ण-द्वैपायन (वेदव्यास) ने उसका चार संहिताओं के रूप में संकलन किया। ये संकलन ही ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता, सामवेद संहिता तथा अथर्ववेद संहिता कहलाये। उस संकलन के मूल में याज्ञिक अनुष्ठान की प्रक्रिया है। यज्ञ में प्रधानत: चार ऋत्विज होते है- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। होता नामक ऋत्विज् यज्ञ में ऋग्वेद का पाठ करके उपयुक्त देवताओं को यज्ञ में बुलाता है। वह याज्या और अनुवाक्य ऋचाओं का पाठ करता है। उद्गाता नामक ऋत्विज् औदगात्र कर्म का सम्पादन सामवेद के मन्त्रों को गाकर करता है। जिन ऋचाओं के उपर साम का गायन होता है उन्हें ‘योनि’ कहते है। साम का पारिभाषिक नाम ‘स्तोत्र‘ भी है। यज्ञ का प्रमुख ऋत्विज् अध्वर्यु होता है। वह प्रत्येक कर्म करते समय यजुर्वेद के मन्त्रों को पढ़ता है। अध्वर्यु यजुर्वेद के मन्त्रों का उपांशु रूप में पाठ करता हुआ अपने कार्यो का सम्पादन करता है। ब्रह्मा नामक ऋत्विज् का कार्य यज्ञ की वाह्य विघ्नों से रक्षा, स्वरों में सम्भावित त्रुटियों का निराकरण तथा अनुष्ठान में विविध दोषों को दूर करना होता है। इसीलिए तो यज्ञ का अध्यक्ष पद ब्रह्मा को ही प्रदत्त है। वास्तव में ब्रह्मा को ऋग्यजुस्साम का भी ज्ञाता होना चाहिए।

इस प्रकार यज्ञीय दृष्टि से इन चार ऋत्विजों के विविध कर्मो को दृष्टि में रखकर सम्पूर्ण वेद-राशि उपर्युक्त चार संहिताओं के रूप में विभाजित है। जिन मन्त्रों में अर्थवशात् पादों की व्यवस्था है उन छन्दोवद्ध मन्त्रों को ‘ऋक्’ कहा जाता है। ऋचाओं पर गाये जाने वाले गायन को साम कहते है5। गद्यमय मन्त्रों को यजुष् कहते है, अर्थात् जो मन्त्र ऋचाओं और सामो से व्यतिरिक्त स्वरूप वाले है, वे यजुष कहलाते है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि पादवद्ध मन्त्रों का संकलन ऋग्वेद, सामयुक्त मन्त्रों का संकलन सामवेद, गद्यमय मन्त्रों का संकलन ही यजुर्वेद है। इस प्रकार स्वरूप की दृष्टि से तीन ही वेद हुए। परन्तु सम्पूर्ण सामवेद में मात्र 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष सभी मन्त्र ऋग्वेद से उद्धृत है। ऐसा अनेक विद्वान स्वीकार करते है जबकि 99 ऐसे मन्त्र है जो एकदम नवीन है। हो सकता है, ये नवीन मन्त्र ऋग्वेद की अनुपलब्ध शाखाओं से संकलित किये गये हों। इसी प्रकार यजुर्वेद में गद्यमय मन्त्रों के अतिरिक्त पादबद्ध पद्यमय मन्त्र भी पाये जाते है। हो सकता है, उनके पाठ करने की प्रणाली गद्यमय ही स्वीकार्य हो। अब प्रश्न यह है कि ऋग्यजुस्साम रूप वेदत्रयी के अतिरिक्त चतुर्थ संहिता यथर्ववेद का उद्भव क्यों और किस प्रकार हुआ। इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऐहलौकिक एवं पारलौकिक दोनो प्रकार के सुख-साधन आवश्यक है तथा आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक, तीनों प्रकार के दु:खों से मुक्ति प्राप्त करना भी आवश्यक है। ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद के माध्यम से पारलौकिक सुख-समृद्धि तो प्राप्त हो सकती है, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक दु:ख भी दूर हो जाते है परन्तु ऐहलौकिक सुख की प्राप्ति तथा आधिभौतिक दु:ख का निवारण प्रत्यक्षरूपेण नही हो सकता। अत: ऋषियों ने इन उद्देश्यों की सद्य: पूर्ति के लिए अथर्ववेद का पृथक् संकलन किया।

वेदवाची शब्द

‘वेद’ के पर्यायवाची शब्दों में श्रुति, आम्नाय, त्रयी, छन्दस्, स्वाध्याय, आगम और निगम मुख्य है। यहाँ इन शब्दों के अर्थ के विषय में विवेचन करना अप्रासंगिक नही होगा। ‘श्रुति’ शब्द का अर्थ है श्रवण किया या सुना हुआ। यह शब्द ‘श्रु’ धातु से ‘क्तिन्’ प्रत्यय लगकर बना है। प्राचीन काल में गुरूपरम्परा से शिष्यगण सुनकर याद करते थे, इसीलिए वेद को श्रुति कहा गया। निरूक्त में मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के लिए ‘श्रुति’ शब्द का प्रयोग मिलता है। वेद के लिए ‘अनुश्रव’ शब्द भी श्रुति का समानाथ्र्ाी है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार वेद को श्रुति इसीलिए कहा जाता है कि लोग इससे सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को सुनते हैं। इनके अनुसार केवल मन्त्र-भाग ही ‘श्रुति’ है।

वेद को आम्नाय भी कहा गया है। ‘आम्नाय’ पद आ उपसर्ग पूर्वक ‘म्ना अभ्यासे’ धातु से निष्पन्न है। इसका अर्थ है, जो ग्रन्थ अभ्यास के द्वारा कथित हो वह आम्नाय कहलाता है। गुरूमुख द्वारा बार-बार अभ्यास कराये जाने के कारण वेदों को आम्नाय कहा जाता है। ‘त्रयी’ शब्द भी वेद का समानार्थक है। वास्तव में ऋक्, यजुष् और साम को ही त्रयी कहते है। परन्तु इससे ऐसा समझना भ्रमपूर्ण होगा कि अथर्ववेद त्रयी नही है, क्योंकि अथर्ववेद में भी ऋक् और यजुष् मन्त्र हैं। ऋक्, यजुष् और साम का अर्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद ही नहीं समझना चाहिए। ऋक् तो ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वेदों में भी हैं। इसी प्रकार यजुष् अथर्ववेद में भी हैं। वर्णित है कि जिन मन्त्रों में पादव्यवस्था हो वे ऋक् है तथा गद्यमय मन्त्र ही यजुष् हैं। षड्गुरूशिष्य ने सर्वानुक्रमणी की वृत्ति में वेद की चारों संहिताओं को त्रयी माना है। वेद के पर्याय के रूप में ‘छन्दस्’ या चन्द शब्द का भी अनेक ग्र्रन्थों में प्रयोग प्राप्त होता है। अष्टाध्यायी में ‘बहुलं छन्दसि’ सूत्र अनेक बार आया है जिससे ‘छन्दसि’ शब्द का अर्थ ‘वेद’ में है। निरूक्त के रचयिता यास्काचार्य ने ‘छन्द आच्छादने’ धातु से इस शब्द को निष्पन्न माना है। यास्क के निर्वचन का आधार मैत्रायणी-संहिता, तैत्तिरीय-संहिता, छान्दोग्य ब्राह्मण एवं जैमिनि ब्राह्मण आदि वैदिक ग्रन्थ ही है। शतपथ-ब्राह्मण में छन्दस् शब्द का निर्वचन ‘छन्द प्रीणने’ धातु से किया गया हैै। छन्द का अर्थ है- बन्धन। अर्थात् निश्चित नियम में बंधे हुए शब्द-समूह को छन्दस् कहते हैं। कुछ विद्वान् पूजा अर्थ में पठित छन्द या छद् धातु से छन्दस् शब्द को निष्पन्न मानते है। इनके अनुसार वेद मन्त्रों को ‘छन्दस्’ इसलिए कहा जाता है कि इन्हीं के द्वारा देवताओं की पूजा होती है। अथवा हमारे द्वारा पूजनीय होने के कारण भी वेद छन्दस् हैं। वेद के स्वरूप के विषय में जब से ‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’ की धारणा प्रबल हुई तब से ‘छन्दस्’ के द्वारा ब्राह्मण-ग्रन्थों का भी ग्रहण किया जाने लगा। पाणिनि ने मन्त्र और ब्राह्मण दोनों के लिए ‘छन्दस्’ शब्द का प्रयोग किया है। परवर्ती आचार्यो ने कल्पसूत्र आदि ग्रन्थों में भी छन्दस्त्व स्वीकार किया है।

‘स्वाध्याय’ शब्द का अर्थ भी वेद ही है। स्वाध्यायो•ध्येतव्य:, स्वाध्यायान्मा प्रमद: आदि वेदवाक्यों में ‘स्वाध्याय’ शब्द का अर्थ वेद ही है। मनुस्मृति में स्पष्टत: कहा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि द्विजातियों के लिए वेद का स्वाध्याय अपरिहार्य है, अत: स्वाध्याय का अर्थ भी वेद हो गया। उस समय वेदातिरिक्त कोई विषय स्वाध्याय के लिए स्वीकृत नही था। पश्पशाह्निक में ‘‘रक्षोहागमलघ्वसंदेहा: प्रयोजनम्।’’ इस वाक्य में ‘आगम’ शब्द वेद के पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त हुआ है। सांख्यकारिका की छठी कारिका में ईश्वरकृष्ण ने ‘‘तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्’’ के द्वारा भी मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के लिए ‘आगम’ शब्द का प्रयोग किया है। स्यर्तव्य है कि कालान्तर में तन्त्र के लिए एवं एक विशेष प्रकार के धार्मिक सम्प्रदाय के साहित्य के लिए भी ‘आगम’ शब्द का प्रयोग होने लगा, जैसे शैव आगम, वैष्णव आगम, जैन आगम एवं बौद्ध आगम आदि। वेद के लिए ‘निगम’ शब्द का प्रयोग भी प्राय: किया जाता है। यास्क ने निरूक्त में जितने उदाहरण वेदों से दिये हैं उनमें प्राय: सर्वत्र ‘निगम’ शब्द का प्रयोग किया है। यह शब्द उन स्थलों पर ‘वेद’ का ही वाचक है। आगम और निगम दोनों ही पद-रचना एवं अर्थ की दृष्टि से लगभग समान ही हैं। अन्तर मात्र ‘आ’ और ‘नि’ उपसर्गो का है। ‘आ’ का अर्थ है मर्यादा, सीमा, और ‘नि’ का अर्थ है निश्चित रूप से। इस प्रकार जो ग्रन्थ सब ओर से ऐहिक तथा आमुष्मिक सुख को प्राप्त करावे वह आगम, तथा जो ग्रन्थ निश्चित रूप से ऐहिक तथा आमुष्मिक सुख की प्राप्ति के साधनभूत उपायों का ज्ञान करावे उसे निगम कहते हैं।

वेदों के भाग

प्रत्येक ‘वेद’ के मुख्य चार विभाग है- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद।

संहिता

संहिता ग्रन्थों में मन्त्रों का संकलन है। ऋग्वेद के मन्त्रों को ‘ऋचा’ या ‘ऋक्’, सामवेद के मन्त्रों को ‘साम’, यजुर्वेद के मन्त्रों को ‘यजुष्’ कहते है एवं अथर्ववेद के मन्त्रों को भी इन्ही से अभिहित किया जाता है। सामवेद में ऋग्वेद के ही मन्त्र, जिनको सस्वर लय एवं ताल से गाया जा सके, संकलित किये गये है। इसमें मात्र 78 यन्त्र ऋग्वेद से नही लिए गये हैं। अथर्ववेद के भी लगभग 1200 मन्त्र ऋग्वेद से किए गये है, शेष मन्त्र स्वतन्त्र हैं।

ब्राह्मण

ब्राह्मण-ग्रन्थों में कर्मो तथा विनियोगों के अतिरिक्त मन्त्रों की व्याख्या की गयी है। विश्व-साहित्य में गद्यों का प्रादुर्भाव तो यजुर्वेद से ही हो जाता है, परन्तु उसका विकास ब्राह्मण-ग्रन्थों से प्रारम्भ होता है। सभी ब्राह्मण-ग्रन्थ गद्यमय है। इनमें यज्ञों में होने वाले विविध-कर्मों का औचित्य ललित-कथाओं के माध्यम से बताया गया है। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं। ब्राह्मण-ग्रन्थों में ही यह भी बतलाया गया है कि यज्ञ के किस कर्म में किस मन्त्र का पाठ किया जाना चाहिए।

आरण्यक

आरण्यक अर्थात् जंगलों में पठनीय होने के कारण ब्राह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट भाग को आरण्यक कहा जाता है। वानप्रस्थाश्रम में करणीय यज्ञ, महाव्रत एवं हौत्र आदि कर्मों, उनकी व्याख्याओं एवं विधियों का प्रतिपादन आरण्यक ग्रन्थों में किया गया है। साथ ही साथ इनमें यज्ञों की आध्यात्मिक व्याख्या तथा दार्शनिक चिन्तन भी सन्निहित हैं।

उपनिषद्

वेद के अन्तिम भाग उपनिषद शब्द ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्गपूर्वक ‘षद्लृ’ धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है। ‘षद्लृ’ धातु के चार अर्थ होते है- बैठना, नाश करना (विशरण), प्राप्त करना (गति) और शिथिल करना (अवसादन)। ‘उप’ का अर्थ है समीप और ‘नि’ का अर्थ है ध्यानपूर्वक।

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