उपमा अलंकार का अर्थ, परिभाषा और उदाहरण

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उपमा अलंकार सर्वप्रमुख अर्थालंकार है और अर्थालंकारों का प्रतिनिधि भी है। डॉ0 रामानन्द शर्मा के शब्दों में: ‘‘शब्दालंकारों में श्लेष और अर्थालंकारों में उपमा- ये दो ऐसे अलंकार है जो स्वयं अलंकार होकर अन्य अलंकारों को भी चमत्कृत करते हैं। यही कारण है कि उपमा को सम्पूर्ण अर्थालंकारों में सर्वाधिक महत्त्व प्राप्त है और प्राय: सभी आलंकारिकों ने सर्वप्रथम इसी का विवेचन किया है। उपमा की श्रेष्ठता और महत्त्व के विषय में प्राय: सभी आचार्य एकमत हैं। राजषेखर का मत है कि उपमा समस्त अलंकारों में शिरोरत्न के समान काव्य की सम्पदा है और कविवंश की माता के समान है। अप्पय दीक्षित का कहना है कि उपमा ही वह नटी (नर्त्तकी) है जो काव्य-रूपी मंच पर नाना प्रकार की अलंकार-भूमिकाओं में अवतीर्ण होकर काव्यमर्मज्ञों का मनोरंजन करती है। +++ कहने का आशय यह है कि उपमा सर्वप्रमुख अलंकार है। वह अलंकार रूप में तो सामने आती ही है, अनेक अलंकारों को भी चमत्कारातिषय प्रदान करती है जिससे उसका महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता है।’’

उपमा सरल एवं अति प्रचलित अलंकार है। इसमें वण्र्य की विशेषता बताने के लिए उसकी तुलना अन्य वस्तु से की जाती है। ‘‘दो पदार्थों के उपमान उपमेय भाव से समान धर्म के कथन करने को उपमा अलंकार कहते हैं।’’ वास्तव में इस अलंकार में दो वस्तुओं की तुलना नहीं होती बल्कि अल्प गुण के आधार पर दो परस्पर भिन्न वस्तुओं में समानता दिखाकर मूल वस्तु की महानता बताई जाती है। कवि का उद्देश्य चन्द्रमा के प्रकाश को रेखांकित करना नहीं होता, बल्कि मुख की उज्ज्वलता और भास्वरता को उद्घाटित करना ही होता है। ‘‘जहाँ उपमेय और उपमान के साम्य का चमत्कार पूर्ण वर्णन होता है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। उपमा के कई प्रमुख भेद हैं: पूर्णोपमा, लुप्तोपमा, मालोपमा और रसनोपमा। जहाँ उपमा के चारों अंगों- उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक- का स्पष्ट उल्लेख होता है, वहाँ पूर्णोपमा होती है। जहाँ उपमा के चारों अंगों में से एक, दो या तीन अंगों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता, वहाँ लुप्तोपमा मानी जाती है। मालोपमा में उपमेय के लिए अनेक उपमानों की योजना की जाती है। उपमानों की माला-सी बन जाने के कारण इसे मालोपमा कहा जाता है। जब उपमेय अगले क्रम में उपमान या उपमान अगले क्रम में उपमेय बनकर, रसता की कड़ी के समान सम्बन्ध स्थापित कर लें, तब वहाँ रसनोपमा अलंकार कहा जाता है।’’ प्राचीन परम्परा में उपमा के ये भेद माने जाते हैं।

सुन्दर कविराय ने उपमा का प्रयोग कम किया है, लेकिन जहाँ भी उन्होंने उपमा का प्रयोग किया है, वह अत्यन्त रमणीय है। वास्तव में वे अलंकारों के प्रचुर प्रयोग में नहीं, सटीक प्रयोग में विश्वास करते हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-

आवत ज्यों मथुरा में सुने हरि, गेहनि तें तिय दौरी करी-सी।

लाज को छाँड़ि ज्यों डोरी ते टूटत, मूँठि ते छूटि चली चकरी-सी।

कृष्ण के आने की बात सुनकर गोपियाँ अपने घरों से दौड़ पड़ी।

वे कैसे दौड़ी- इसे कवि बताता है कि वे हथिनियों के समान दौड़ी।

हथिनी की चाल अपनी तीव्रता के लिए नहीं मतवालेपन के लिए प्रसिद्ध होती है। इससे कवि ने यह व्यंजना की है कि गोपियों की चाल अत्यंत मतवाली थी, वे मत्त थी या उनकी चाल मतवाली थी, लेकिन पहुँचने या छूटकर भागने में आत्मीयता या अपनापन का बोध होता है। इसलिए कवि कहता है कि वे इतनी तीव्रता से लाज को छोड़कर चलीं जैसे डोरी के टूटते ही लट्टू मुट्ठी से छूटकर तीव्रता से घूमने लगता है। ‘लट्टू’ शब्द पुल्लिंग है और गोपियाँ स्त्रीलिंग, इसलिए कवि ‘चकरी’ शब्द का प्रयोग करता है। ‘लट्टू’ का प्रयोग बाद में चलन में आया, ब्रजभाषा में पहले से चकरी शब्द चलता आया है और कवि ने उसका ही प्रयोग किया है। कवि को अपने उद्देश्य में सफलता मिली है और उपमा सार्थक रही है। इसी प्रकार-

आँखे भरि आई, मुख पीरी परि छाई, चौंकि-

चिरिया की नाई, भाजि भौंन-कौंन में गई।

नवविवाहिता नायिका, नायक को देखकर घबरा गयी और भागकर मकान के कोने में छिप गयी। कवि इसकी तुलना करता है कि वह चिड़िया की तरह घबराकर छिप गयी। उपमान भी सार्थक है और उपमा भी श्रेष्ठ है। इसी प्रकार-

परदेस कों लाल चलें, इहिं काल है, बाल को कालिहि के बिछुरैं।

मन ही मन खेद, न दीजिए भेद, कराहि के तेल लौं हीय चुरैं।।

नायिका मुग्धा है, उसका पति विदेश चला गया है। वह कल ही गया है। उसका मन अत्यन्त खिन्न बना हुआ है। वह अपने मन की बात किसी को बता नहीं रही है और अन्दर ही अन्दर घुट रही है। उसका हृदय उसी तरह से चुर रहा है जैसे कड़ाही का घी धीरे-धीरे जलता रहता है, पता ही नहीं लगता। यहाँ उपमा अलंकार और उपमान दोनों ही सार्थक हैं। कवि की प्रशंसा करनी पड़ेगी।

अँसुवा भरि आवत हैं बरूनी लौं, सकोच तें भीतर कों यों मुरैं।

कुलवंती के जैसे कटाच्छ चलैं, चलिकै पै दृगंचल ही मैं दुरैं।।

मुग्धा नायिका वियोगिनी है। उसका पति बाहर गया है। वह रोना तो चाहती है, लेकिन लज्जावश रो भी नहीं पाती। कवि कहता है कि संकोच के कारण उसके आँसू बरौनियों तक आकर वापस मुड़ जाते हैं जैसे कुलवंती स्त्री के कटाक्ष नेत्रों तक आकर भी वापस मुड़ जाते हैं। जिस प्रकार कुलबधू कटाक्ष चलाना तो चाहती है, लेकिन लज्जावश कटाक्षपात नहीं कर पाती, इसी प्रकार मुग्धा पति के वियोग में रोना तो चाहती है, उसका हृदय उदास है, दु:खी है, लेकिन लज्जावश वह रो नहीं पाती उपमा अत्यन्त सटीक है। इसी प्रकार-

ह्वै रही पाहन की पुतरी-सी, हलायेहूँ ता पल तें न हली है।

चाउ न, चैन न, चेत कहूँ, जब तें चरचा चलिबे की चली है।।

नायिका का पति विदेश जाना चाह रहा है। जब से उसने पति के विदेश जाने की चर्चा सुनी है तब से न उसके हृदय में उत्साह है, न आराम है और न चित्त ही ठिकाने है। कवि कहता है कि वह पत्थर की पुतली-सी हो गयी है। स्तम्भित होने के लिए पत्थर की पुतली से अच्छा उपमान और क्या हो सकता है? उपमा अत्यन्त सटीक है। भाव यही है कि सुन्दर कविराय स्थल-स्थल पर उपमा का प्रयोग नहीं करते, लेकिन जहाँ भी प्रयोग करते हैं, वह अत्यन्त सटीक होता है। उपमान बहुत चुनकर रखा है जिससे भाव की सटीक व्यंजना हो सके यही समानता व्यक्त करना उपमा की सार्थकता है, सफलता है।

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