बेन्थम का राजनीतिक विचार

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बेन्थम का राजनीति-दर्शन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसकी महत्त्वपूर्णदेनों को भुलाया नहीं जा सकता। उसके विचार शाश्वत सत्य के हैं जो आधुनिक युग में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

बेन्थम का राजनीतिक विचार

राजनीतिक दर्शन के इतिहास में यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है कि क्या बेन्थम को एक राजनीतिक दार्शनिक माना जाएया नहीं। कई लेखक उसको राजनीतिक दार्शनिक की बजाय एक राजनीतिक सुधारक मानते हैं। उनके अनुसार बेन्थम काध्येय किसी राजनीतिक सिद्धान्त का प्रतिपादन करना नहीं था बल्कि अपने सुधारवादी कार्यक्रम की पृष्ठभूमि के लिए राज्यके सम्बन्ध में कुछ विचार प्रस्तुत करना था ताकि इंगलैंड की शासन प्रणाली में वांछित सुधार किए जा सकें। उसके प्रमुख राजनीतिक विचार उसके सुधारवादी कार्यक्रम का ही एक हिस्सा हैं। उसके प्रमुख राजनीतिक विचार हैं :-

राज्य सम्बन्धी विचार

बेन्थम राज्य को एक कृत्रिम संस्था मानता है। उसने राज्य की उत्पत्ति के‘सामाजिक समझौता सिद्धान्त’ का खण्डन किया है। वह राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता को नकारते हुए कहताहै कि इस प्रकार का समझौता कभी हुआ ही नहीं था और यदि हुआ भी हो तो वर्तमान पीढ़ी को इसे स्वीकार करनेके लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं है। उसका कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि समझौता हुआ हो।उसका कहना है कि यदि समझौता होना स्वीकार कर भी लिया जाए तो समझौते द्वारा आज्ञा पालन के कर्त्तव्य की कोईनिश्चित व्याख्या नहीं की जा सकती। बेन्थम का मानना है कि मनुष्य द्वारा कानून तथा सरकार की अधीनता स्वीकारकरने का मुख्य कारण मूल समझौता न होकर वर्तमान हित व उपयोगिता है। सरकारों का अस्तित्व इसलिए है कि वेसुख को बढ़ाती हैं। मनुष्य कानून और राज्य की आज्ञा का पालन इसलिए करते हैं कि वे जानते हैं कि “आज्ञा पालनसे होने वाली संभावित हानि आज्ञा का पालन न करने से होने वाली हानि से कम होती है।” इसलिए राज्य की उत्पत्तिका आधार सामाजिक उपयोगिता है न कि सामाजिक समझौता। उसके अनुसार- “राज्य एक काल्पनिक संगठन है जोव्यक्तियों के हितों का योग मात्र है।” राज्य का हित उसमें रहने वाले व्यक्तियों के हितों का योग मात्र होता है। बेन्थमके मतानुसार- “राज्य व्यक्तियों का एक समूह है जिसका संगठन उपयोगिता अथवा सुख की वृद्धि करने के लिए कियागया है।” उसके अनुसार राज्य का ध्येय या लक्ष्य न तो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारना है और न ही समुदाय के सद्और नैतिक जीवन की उन्नति करना है बल्कि वह तो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि करना है।

इस प्रकार बेन्थम राज्य की उत्पत्ति के ‘सामाजिक समझौता सिद्धान्त’, ‘आदर्शवादी सिद्धान्त’, ‘आंगिक सिद्धान्त’, आदिका खण्डन करते हुए राज्य की उत्पत्ति का आधार सामाजिक उपयोगिता को मानते हुए राज्य को एक कृत्रिम संस्थास्वीकार करता है। उसके अनुसार राज्य व्यक्तियों के हितों का योग मात्र है। वह राज्य को एक साध्य न मानकर एकसाधन मात्र मानता है जिसका उद्देश्य सार्वजनिक हित में वृद्धि करने के साथ-साथ ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतमसुख’ को खोजना है। अत: राज्य की उत्पत्ति का यह सिद्धान्त सीमित व संकुचित है। इसके अनुसार राज्य व्यक्ति केसुख का साधन मात्र है। यह एक व्यक्तिवादी धारणा है।

राज्य की विशेषताएँ

बेन्थम के सिद्धान्त के अनुसार राज्य को निम्नलिखित विशेषताएँ है :

  1. यह अधिकतम सुख को बढ़ाने वाला एक मानवी अभिकरण है।
  2. यह व्यक्ति के अधिकारों का स्रोत है।
  3. यह व्यक्ति के हितों में वृद्धि करने का एक साधन है।
  4. इसका लक्ष्य अपने नागरिकों के सुख में वृद्धि करना है।
  5. यह दण्ड-विधान द्वारा नागरिकों को अनुचित कार्यों को करने से रोकने वाला साधन है।

इस प्रकार राज्य अपने नागरिकों के हितों को अधिकतम सीमा तक बढ़ाने के लिए कानून का सहारा लेता है। वह कानूनको ढाल बनाकर ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि के मार्ग में आने वाली रुकावटों पर अंकुश लगाता है।

राज्य के कार्य

बेन्थम के अनुसार राज्य के कार्य सकारात्मक न होकर नकारात्मक हैं।उसने राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा कम महत्त्व प्रदान किया है। उसके अनुसार राज्य के कार्य हैं :-

  1. राज्य लोगों के सुख में वृद्धि तथा दु:ख में कमी करने का प्रयास करता है।
  2. वह नागरिकों को गलत कार्यों को करने से रोककर उनके आचरण का नियन्त्रित करता है।

इस प्रकार राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में बेन्थम का दृष्टिकोण नकारात्मक ही रहा है। उसने व्यक्तिवादी और लेसेज-फेरे(Individualist and Laissez-faire) की धारणा पर ही अपने राज्य सम्बन्धी विचारों को खड़ा किया है। उसका राज्यनागरिकों के व्यक्तित्व का विकास करने की बजाय उनके सुख में वृद्धि करना है। अत: बेन्थम की दृष्टि में नागरिकों कास्थान राज्य से उच्चतर है।

सरकार सम्बन्धी विचार

बेन्थम के सरकार या शासन सम्बन्धी विचार भी उसकेउपयोगितावादी सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। बेन्थम राज्य और सरकार में अन्तर करते हुए सरकार को राज्य का एकछोटा सा संगठन मानता है तो कानून तथा अधिकतम सुख के लक्ष्य को कार्यान्वित करता है। बेन्थम उपयोगितावाद केसिद्धान्त की कसौटी पर विभिन्न शासन प्रणालियों को परखकर गणतन्त्रीय सरकार का ही समर्थन करता है। उसकाविश्वास है कि “अन्ततोगत्वा प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही एक ऐसी सरकार है जिसमें अन्य सभी प्रकार की सरकारों की तुलनामें अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख प्राप्त कराने की क्षमता है।” उसके विचारानुसार गणतन्त्रीय सरकार में कुशलता,मितव्ययिता, बुद्धिमत्ता तथा अच्छाई जैसे गुण पाए जाते हैं। उसके विचार में राजतन्त्र बुद्धिमानों का शासन तो है, परन्तुवह ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ का पालन करने में असक्षम है। गणतन्त्र में कानून बनाने का अधिकार जनताके पास होने के कारण कानून जनता के हित में बनते हैं और ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ का लक्ष्य सरलता सेप्राप्त हो सकता है। इसी तरह कुलीनतन्त्र में बुद्धिमत्ता तो पाई जाती है, क्योंकि यह गुणी और अनुभवी व्यक्तियों द्वारासंचालित होती है, लेकिन इसमें ईमानदारी कम पाई जाती है। यह शासन व्यवस्था भी “अधिकतम लोगों के अधिकतमसुख’ के सिद्धान्त की उपेक्षा करती है। गणतन्त्र में जनता व शासक के हितों में समानता रहती है। इसलिए ‘अधिकतमलोगों के अधिकतम सुख’ का ध्येय गणतन्त्र में ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य शासन-प्रणालियों में नहीं। अत:गणतन्त्रीय सरकार ही सर्वोत्तम सरकार है।

सम्प्रभुुता सम्बन्धी विचार

बेन्थम ने राज्य की सम्प्रभुता का समर्थन किया है। उसका माननाहै कि शासक सभी व्यक्तियों और सब बातों के सम्बन्ध में कानून बना सकता है। चूँकि कानून आदेश होता है, अतएवयह सर्वोच्च शक्ति का ही आदेश हो सकता है। बेन्थम का मानना है कि राज्य का अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तकसर्वोच्च सत्ता की आज्ञा की अनुपालन लोगों द्वारा स्वभावत: की जाती है। बेन्थम के अनुसार राज्य सम्प्रभु होता है, क्योंकिउसका कोई कार्य गैर-कानूनी नहीं होता। कानूनी दृष्टि से सम्प्रभु निरपेक्ष एवं असीमित होता है। उस पर प्राकृतिक कानूनएवं प्राकृतिक अधिकार का कोई बन्धन नहीं हो सकता। लेकिन बेन्थम के अनुसार सम्प्रभु निरंकुश, अमर्यादित एवंअपरिमित नहीं हो सकता। बेन्थम के अनुसार व्यक्ति उसी सीमा तक सम्प्रभु की आज्ञा का पालन और कानून का आदरकरते हैं, जिस सीमा तक वैसा करना उनके लिए लाभदायक और उपयोगी होता है। बेन्थम के मतानुसार शासक कानूनबनाने का अधिकार तो रखता है लेकिन वह उसी सीमा तक कानून बना सकता है जहाँ तक व्यक्तियों के अधिकतम हितके लक्ष्य की प्राप्ति होती हो। यदि कानून व्यक्तियों के लिए लाभदायक व उपयोगी न हों तो जनता का यह कर्त्तव्य होजाता है कि वह शासक व उसके द्वारा बनाए गए कानूनों का प्रतिरोध करे।

इस प्रकार हॉब्स की तरह बेन्थम भी कानून-निर्माण को सम्प्रभु का सर्वोच्च अधिकार मानता है लेकिन वह कार्यपालिकाऔर न्यायपालिका सम्बन्धी अधिकारों को सम्प्रभु को नहीं सौंपता। वह शासक की असीमित शक्तियों के विरुद्ध है। उसकेअनुसार शासक समस्त सामाजिक सत्ता का केन्द्र नहीं है। उसका सम्प्रभु तो कानून निर्माण के क्षेत्र में ही सर्वोच्च है, अन्यमें नहीं।

प्राकृतिक अधिकारों सम्बन्धी धारणा

बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा काखण्डन करते हुए प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को मूर्खतापूर्ण, काल्पनिक, आधारहीन व आडम्बरपूर्ण बताया है। उसनेकहा है- “प्राकृतिक अधिकार बकवास मात्र हैं – प्राकृतिक और हस्तान्तरणीय अधिकार आलंकारिक बकवास हैं – शब्दोंके ऊपर भी बकवास है।” उसके मतानुसार प्रकृति एक अस्पष्ट शब्द हैं, इसलिए प्राकृतिक अधिकारों की धारणा भीनिरर्थक है। उसके मतानुसार अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं जो सम्प्रभु की सर्वोच्च इच्छा का परिणाम हैं। उसकेअनुसार पूर्ण स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से असम्भव है, इसलिए अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं।

बेन्थम ने टामस पेन तथा गॉडविन जैसे प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त के समर्थक विचारकों का खण्डन करते हुए कहाकि प्राकृतिक अधिकार केवल एक प्रलाप और मूर्खता का नंगा नाच हैं। उसका मानना है कि प्राकृतिक अधिकारों कानिर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है। वे अधिकारों का निर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है।वे अधिकार ही उचित हो सकते हैं जो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के लक्ष्य को प्राप्त कराने में सहायक हों।बेन्थम ने कहा है- “अधिकार मानव जीवन के सुखमय जीवन के वे नियम हैं जिन्हें राज्य के कानून मान्यता प्रदान करते हैं।”

अत: अधिकार प्रकृति-प्रदत्त न होकर समाज-प्रदत्त होते हैं। वे मनुष्य के सुख के लिए हैं जिन्हें राज्य मान्यता देता हैऔर उनके अनुसार अपनी नीति बनाता है। राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। नागरिक प्राकृतिक अधिकारों के लिए राज्यके विरुद्ध किसी प्रकार का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि अधिकारों के साथ कुछ कर्त्तव्य भी बँधे हैं जिनके अभाव मेंअधिकार निष्प्राण व निरर्थक हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा को कोरी मूर्खता बताया है। उसके अनुसारअधिकार कानून की देन है और अच्छे कानून की परख ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख’ प्रदान करने के लक्ष्य कोप्राप्त करने पर ही हो सकती है। इस तरह बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा का खण्डन करते हुए उन्हें काल्पनिककहा है।

कानून सम्बन्धी विचार

बेन्थम का विचार है कि मनुष्य एक स्वाथ्र्ाी प्राणी होने के नाते सदैव अपनेसुख की प्राप्ति में लगा रहने के कारण दूसरों के हितों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकता है। ऐसी स्थिति से निपटनेके लिए कुछ बन्धनों का होना जरूरी है। इसलिए राज्य के पास कानून की शक्ति होती है जो परस्पर विरोधी हितों सेउत्पन्न संघर्ष से अधिक कारगर ढंग से निपटने में सक्षम होती है। बेन्थम का मत है- “विभिन्न अनुशस्तियों के द्वारा व्यक्ति के हित और समुदाय के हितों के मध्य तालमेल बैठाया जाना चाहिए।” बेन्थम का मानना है कि इनअनुशस्तियों में सबसे अधिक कारगर अनुशस्ति कानून की होती है। राज्य मूलत: कानून का निर्माण करने वाला संगठनहै और यह अपने व्यक्तियों पर कानून के द्वारा ही नियन्त्रण रखता है।

बेन्थम के मतानुसार- “कानून सम्प्रभु का आदेश है। कानून सम्प्रभुता की इच्छा का प्रकटीकरण है। समाज के व्यक्तिस्वाभाविक रूप से कानून की आज्ञा का पालन करते हैं। कानून न तो विवेक का और न ही किसी अलौकिक शक्ति कीआज्ञा है। सामान्य रूप से यह उस सत्ता का आदेश है, जिसका पालन समाज के व्यक्ति अपनी आदत के कारण करतेहैं।” कानून व्यक्ति की मनमानी पर अंकुश है। यह व्यक्ति व समुदाय के हितों में तालमेल बैठाने का साधन है जो अपनाकार्य दण्ड व पुरस्कार के माध्यम से करता है। कानून का सम्बन्ध व्यक्ति के समस्त कार्यों से न होकर केवल उन्हीं कार्योंका नियमन करने से है जो व्यक्ति के अधिकतम सुख के लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए आवश्यक है।

बेन्थम का मानना है कि कानून इच्छा की अभिव्यक्ति है। ईश्वर और मनुष्य के पास तो इच्छा होती है लेकिन प्रकृति केपास कोई इच्छा नहीं होती। इसलिए दैवी कानून और मानवीय कानून तो हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक कानून नहीं होसकते। दैवी कानून भी अनिश्चित होता है। अत: मानवीय कानून ही सर्वोच्च कानून होता है जो समाज व व्यक्ति के सम्बन्धोंका सही दिशा निर्देशन व नियमन कर पाने में सक्षम होता है।

कानून का उद्देश्य

बेन्थम का मानना है कि कानून का उद्देश्य भी सामाजिक उपयेागिता है। कानून व्यक्ति के आचरणको अनुशासित करता है जिससे समाज में ‘अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि होती है। बेन्थम के अनुसारकानून के चार उद्देश्य हैं – सुरक्षा, आजीविका, सम्पन्नता तथा समानता। बेन्थम का कहना है कि सार्वजनिक आज्ञा पालनही कानून को स्थायित्व प्रदान करके उसे प्रभावी बनाता है और उसे अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को प्राप्त करनेमें योगदान देता है। इसलिए कानून की भाषा स्पष्ट व सरल होनी चाहिए ताकि साधारण व्यक्ति भी उसका ज्ञान प्राप्तकर सके।

कानून के प्रकार

बेन्थम ने कानून का वर्गीकरण करते हुए उसे चार भागों में बाँटा है :

  1. नागरिक कानून (Civil Law)
  2. फौजदारी कानून (Criminal Law)
  3. संवैधानिक कानून (Constitutional Law)
  4. अन्तरराष्ट्रीय कानून (International Law)

इस प्रकार बेन्थम ने कानून को सम्प्रभु का आदेश मानते हुए उसे व्यक्तियों के अधिकतम सुख प्राप्त करने के लक्ष्य कोप्राप्त करने के लिए आवश्यक माना है। उसने मानवीय कानून को सर्वोच्च कानून माना है। अपने अन्य सभी सिद्धान्तोंकी तरह बेन्थम ने कानून को भी उपयोगितावादी आधार प्रदान किया है।

न्याय सम्बन्धी विचार

अपने अन्य विचारा ें की ही तरह बेन्थम ने न्याय को भी उपयोगिता के आधारपर परिभाषित किया है। बेन्थम का कहना है कि कानून पर आधारित होने के कारण न्याय का परिणाम उपयोगिता होनाचाहिए। बेन्थम ने अपने न्याय सम्बन्धी विचारों में तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय व्यवस्था की कटु आलोचनाएँ की हैं। उसनेकहा है कि मुकद्दमे में वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए न्याय प्राप्ति के मार्ग में दुर्गम बाधाएँ उपस्थित हो जातीहैं। उन्हें न्याय प्राप्त करने के लिए भारी फीसें वकीलों को देनी पड़ती हैं। साथ में ही समय अधिक लगता है। न्याय प्राप्तकरने के लिए न्यायपालिका के कर्मचारियों को कदम कदम पर सुविधा शुल्क देने पड़ते हैं। इसलिए बेन्थम के तत्कालीनन्याय-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- “इस देश में न्याय बेचा जाता है, बहुत महंगा बेचा जाता है और जोव्यक्ति इसके विक्रय मूल्य को नहीं चुका सकता है, न्याय पाने से वंचित रह जाता है।” बेन्थम न्यायधीशों को एक कम्पनीकी संज्ञा देता है। यह कम्पनी अपने लाभ के लिए उन कानूनों का सहारा लेती है जिन्हें अपने लाभ के लिए न्यायधीशोंने बनाया है।

इस प्रकार बेन्थम ने तत्कालीन न्याय-व्यवस्था के दोषों पर भली-भान्ति विचार करके उन्हें अपने दर्शन में प्रस् किया है।उसके न्याय-सम्बन्धी विचार आज भी प्रासंगिक है। जैसे दोष उसने उस समय बताए थे, वे आज भी विद्यमान हैं।

बेन्थम : एक सुधारक के रूप में

अनेक लेखकों ने बेन्थम को एक राजनीतिक दार्शनिक की बजाए एक महान् सुधारवादी विचारक माना है। उसने तत्कालीनइंगलैण्ड की न्याय-व्यवस्था, जेलखानों, विधि, शासन-प्रणाली, शिक्षा-पद्धति, धार्मिक व्यवस्था आदि में जो सुधार किए, उनपर ही आगामी सुधारों की प्रक्रिया आश्रित हो गई। उनके सुधारवादी विचारों के सुझावों से ही सारे संसार में सुधारों की लहरचल पड़ी। सेबाइन ने कहा है- “सामाजिक दर्शन के इतिहास में ऐसे विचारक कम ही हुए हैं, जिन्होंने इतना व्यापक और इतनाउपयोगी प्रभाव डाला हो, जितना बेन्थम ने।” इसी तरह मैक्सी ने कहा है- “यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन सुधारोंका बेन्थम में इतनी तत्परता और लाभ के साथ समर्थन किया था, उनमें से अनेक सुधार आज विभिन्न देशों में विधि का रूपपा चुके हैं।” बेन्थम के प्रमुख सुधारवादी विचार हैं :-

न्याय व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय-व्यवस्था कोदोषपूर्ण मानते हुए उसमें वांछित सुधारों का सुझाव दिया है। उसने महंगी व जटिल न्याय-व्यवस्था की कटु आलोचनाकी है। उसने तत्कालीन इंगलैण्ड की अदालतों की कार्य-विधि को आसान बनाने व उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के सुझावदिए हैं। उसके प्रमुख सुझाव हैं –

  1. किसी मुकद्दमे का निर्णण एक ही न्यायधीश के द्वारा ही होना चाहिए, तीन या चार न्यायधीशों द्वारा नहीं। उसका मतहै कि अधिक संख्या से उत्तरदायित्व में कमी आती है। पूर्ण उत्तरदायित्व की भावना केवल एक न्यायधीश में ही हो सकतीहै। अनेक न्यायधीशों में परस्पर मतभेद की सम्भावना होने के कारण न्याय निरपेक्ष नहीं रह जाता है। अत: पूर्ण न्यायकी प्राप्ति के लिए न्यायधीशों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को अपना वकील स्वयं बनना चाहिए ताकि वह मध्यस्थ की औपचारिक कार्यवाही से बच सके।
  3. न्याय-व्यवस्था में दक्षता, निपुणता और निष्पक्षता लाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायधीशों की नियुक्ति योग्यता,गुण और प्रशिक्षण के आधार पर होनी चाहिए, वंश या कुल के आधार पर नहीं। इससे न्याय-व्यवस्था में अज्ञान व पक्षपातको बढ़ावा मिलता है।
  4. मुकद्दमे का निर्णय कठोर नियमों के अनुसार न करके न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) के अनुसार किया जानाचाहिए।
  5. न्याय-व्यवस्था सस्ती होनी चाहिए।
  6. न्याय शीघ्र मिलना चाहिए।
  7. न्यायिक प्रक्रिया में ज्यूरी पद्धति का प्रयोग करना चाहिए ताकि न्यायधीशों की निरंकुशता को रोका जा सके।
  8. न्याय-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए कानूनों की भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए।
  9. प्रत्येक न्यायालय का क्षेत्रधिकार अलग-अलग होना चाहिए ताकि अतिक्रमण को रोका जा सके।
  10. जनमत की अभिव्यक्ति के लिए न्याय-व्यवस्था में प्रेक्षक नियुक्त किए जाने चाहिएं।

जेल-व्यवस्था में सुधार

बेन्थम के समय में जेलों में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहारकिया जाता था। उन्हें अन्धेरी कोठरियों व तहखानों में रखा जाता था। उन्हें गन्दा भोजन दिया जाता था। बालक औरवयस्क अपराधियों को एक साथर रखा जाता था। जेल अपराधियों व अपराधों का अखाड़ा मात्र थे। जेल में जाने केबाद वहाँ से बाहर आने वाला प्रत्येक अपराधी भयानक व कुख्यात अपराधी की संज्ञा प्राप्त कर लेता था। इस व्यवस्थासे दु:खी होकर बेन्थम ने इंगलैण्ड की जेल व्यवस्था मेंसुधारों का सुझाव दिया :-

  1. जेल में ही अपराधियों को औद्योगिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे बाहर आकर समाज की आमधारा सेजुड़ जाएँ।
  2. उसने ‘गोलाकार कारावास’ (Panopticon) के निर्माण का सुझाव दिया ताकि उसमें रहकर कैदी ईमानदार औरपरिश्रमी बन सकें। उसने इस योजना के तहत अर्ध-चन्द्राकार इमारतें बनाने का सुझाव दिया ताकि जेल की अधिकारीअपने निवास स्थान से इन इमारतों पर नजर रख सके।
  3. अपराधियों को आत्मिक उत्थान हेतु नैतिक व धार्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए ताकि वे जेल से बाहर जाने परअच्छे नागरिक साबित हों।
  4. कारावास से मुक्त होने पर उनके लिए उस समय तक नौकरी देने की व्यवस्था की जाए जब तक वे समाज कीअभिन्न धारा से न जुड़ जाएँ।

आगे चलकर जेलों में जो भी सुधार हुए उन पर बेन्थम का ही व्यापक प्रभाव पड़ा।

दण्ड-व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने दण्ड-विधान के क्षेत्र में भी अपने उपयोगिता केसिद्धान्त को लागू करके उस समय में प्रचलित दण्ड-व्यवस्था के अनेक दोषों पर विचार किया है। उस समय छोटे-छोटेअपराधों के लिए अमानवीय व कठोर दण्ड दिया जाता था। बेन्थम ने महसूस किया कि छोटे से अपराध के लिए कठोरसजा देने से अपराधों में वृद्धि होती है। दण्ड का लक्ष्य समाज में अपराधों को रोकना होना चाहिए। इसलिए उसनेदण्ड-व्यवस्था में कुछ सुधारों के उपाय सुझाए हैं।

  1. दण्ड समान भाव से देना चाहिए ताकि अपराधी को अनावश्यक पीड़ा उत्पन्न न हो। अर्थात् समान अपराध के लिएसमान दण्ड का प्रावधान होना चाहिए।
  2. अपराधी को दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। उसका मानना था कि दण्ड की निश्चितता अपराधों को रोकती है।
  3. दण्ड की पीड़ा अपराध की बुराई से थोड़ी ही अधिक होनी चाहिए ताकि अपराध की पुनरावृत्ति न हो।
  4. अपराधों का वर्गीकरण किया जाना चाहिए।
  5. दण्ड का उद्देश्य अपराधी को सुधारना होना चाहिए।
  6. दण्ड का स्वरूप अपराधी की आयु व लिंग के आधार पर निर्धारित होना चाहिए।
  7. दण्ड देने से पहले अपराधी की मानसिक स्थिति व अपराध के कारणों पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए।
  8. कानून द्वारा दण्ड को कम करने या क्षमा करने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।

इस प्रकार बेन्थम ने अपने दण्ड विधान में सुधारों को प्रतिरोध सिद्धान्त (Deterrent Theory) तथा सुधारात्मक सिद्धान्त(Reformative Theory) के मिश्रण से तैयार किया है। उसके द्वारा सुझाए गए उपाय आज भी प्रासंगिक हैं। उसके सुझावोंको आगे चलकर अनेक देशों ने स्वीकार किया है।

कानून-व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने अपने समय के कानून को अव्यावहारिक व अनुपयोगी मानतेहुए उसकी आलोचना की है। उसने महसूस किया कि सभी कानून गरीबों को दबाने वाले हैं और अमीरों का पोषण करनेवाले हैं। उसने तत्कालीन कानून-व्यवस्था में सुधारों के सुझाव दिए :-

  1. कानूनों का संहिताकरण (Codification) किया जाना चाहिए ताकि उनके मध्य क्रमबद्धता कायम की जा सके। इसकेलिए कानूनों को विभिन्न श्रेणियों व वर्गों में बाँटा जाना चाहिए।
  2. सरकार को कानून की अनभिज्ञता को दूर करने के लिए अपने नागरिकों को अनिवार्य शिक्षा के माध्यम से प्रशिक्षितकरना चाहिए। इसके लिए सरकार को सस्ते मूल्यों पर पुस्तकें जनता तक पहुँचानी चाहिएं।
  3. कानून की भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए ताकि आम व्यक्ति भी उसको समझ सके। कानून में प्रयुक्त होने वालेकठिन शब्दों का सरलीकरण किया जाना चाहिए।
  4. कानून जनता के हित को ध्यान में रखकर ही बनाए जाने चाहिएं।

इस प्रकार बेन्थम ने कानून को ऐसा बनाने का सुझाव दिया जिससे व्यक्तियों के सुखों में वृद्धि हो।

शासन व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने सरकार या शासन का उद्देश्य अधिकतमलोगों के लिए अधिकतम सुख को प्रदान करना माना है। उसने सभी शासन-प्रणालियों में गणतन्त्रीय शासन-प्रणालीका ही समर्थन किया है। लेकिन उसने तत्कालीन ब्रिटिश -पद्धति को अपूर्ण मानकर उसमें कुछ सुधारों की योजना प्रस्तुतकी है।

  1. उसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन किया है। उसने इसके लिए थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा होना भीआवश्यक बताया है। उस समय संसद का सदस्य चुनने का अधिकार कम ही व्यक्तियों को प्राप्त था।
  2. उसने संसद के चुनाव प्रतिवर्ष समय पर कराने का सुझाव दिया है। इससे सदस्य क्रियाशील होंगे व निर्वाचकों कोउनकी योग्यता परखने का अवसर प्राप्त होगा।
  3. उसने गुप्त मतदान प्रणाली का समर्थन किया है। इससे निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा मिलेगा।
  4. उसने संसद के उपरि सदन को समाप्त करने का भी सुझाव दिया है ताकि इसके अनावश्यक हस्तक्षेप का निम्न सदनपर दुष्प्रभाव न पड़ सके।

उसने राजतन्त्र को समाप्त करके गणतन्त्रीय शासन प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया है। उसका सोचना है कि गणतन्त्रीयशासन-प्रणाली ही लोकहित में कार्य करेगी। इससे जनता की स्वतन्त्रता सुरक्षित रहेगी। उसका गणतन्त्रीय व्यवस्था कासमर्थन करना राजतन्त्र की आलोचना को दर्शाता है। उसके सुझावों को आज अनेक लोकतन्त्रीय देशों में अपनाया जाचुका है। आज इंगलैण्ड में उपरि सदन का महत्त्व गौण हो चुका है। इससे बेन्थम की राजनीतिक दूरदर्शिता का पता चलताहै।

शिक्षा में सुधार

बेन्थम ने मनुष्य जाति के उत्थान के लिए शिक्षा को आवश्यक माना है।उसका मानना है कि शिक्षा व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि करती है और आनन्द में भी वृद्धि करती है। इसलिए उसनेतत्कालीन शिक्षा योजना को समाज के लिए अनुपयोगी बतलाया। उसने कहा कि यह शिक्षा-पद्धति अमीरों के एकाधिकारके रूप में उनके हितों का ही पोषण करती है। अत: इसे जनतान्त्रिक बनाने के लिए इसमें कुछ परिवर्तन करने जरूरीहैं। उसने शिक्षा में सुधार किए :-

  1. उसने मतदान के लिए पढ़ने की योग्यता को आवश्यक माना।
  2. उसे जेल में रहने वाले अपराधियों की औद्योगिक व नैतिक शिक्षा पर जोर दिया।
  3. उसने निर्धन वर्ग के छात्रों के लिए विषेष रूप से शिक्षा पर बल दिया। इसके लिए उसने अपने शिक्षा सम्बन्धी प्रस्तावमें दो प्रकार की शिक्षा-व्यवस्थाओं का सुझाव दिया। एक निर्धन वर्ग के लिए तथा दूसरी मध्यम तथा समृद्ध वर्ग के बच्चोंके लिए।
  4. उसने शिक्षा में बौद्धिक विकास के विषयों के अध्ययन पर बल दिया।
  5. अपने छात्रों के लिए जीवन में उपयोगी तथा लाभदायक विषयों के अध्ययन पर जोर दिया।
  6. उसने छात्रों की नैसर्गिक क्षमता या स्वाभाविक रुचि के अनुसार ही शिक्षा प्रदान करने का समर्थन किया।
  7. उसने उच्च वर्ग के लिए अलग शिक्षा पद्धति का सुझाव दिया। इसे ‘Monitorial System’ कहा जाता है।

बेन्थम के समय में सार्वजनिक शिक्षा के प्रति कोई रुचि नहीं थी। सत्तारूढ़ वर्ग को भय था कि यदि गरीब वर्ग शिक्षितहो गया तो वह उनकी सत्ता को चुनौती देकर उखाड़ फेंकेगा। इससे सरकारी खर्च में भी वृद्धि होगी। इसके बावजूदभी बेन्थम ने शिक्षा सुधारों की योजना प्रस् की जो आगे चलकर इंगलैण्ड की शिक्षा योजना का आधार बनी। अमेरिका,कनाडा तथा अन्य प्रगतिशील देशों ने भी बेन्थम के ही सुझावों को स्वीकार करके उसके महत्त्व को बढ़ाया है। अत:आधुनिक समय में शिक्षा-प्रणाली बेन्थम की बहुत ऋणी है। बेन्थम के शाश्वत महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

अन्य सुधार

बेन्थम ने उपर्युक्त सुधारों के अतिरिक्त भी सुधार प्रस् किए हैं। उसने अहस्तक्षेपकी नीति का समर्थन किया है। उसने उपनिवेशों को आर्थिक हित के लाभदायक नहीं माना है। उसने स्वतन्त्र व्यापारनीति का समर्थन किया है। उसने धर्म के क्षेत्र में चर्च की कटु आलोचना की है। वह चर्च को एक ऐसी संस्था बनाने कासुझाव देता है जो मनुष्य मात्र का हित पूरा करने में सक्षम हो। उसने गरीबों की भलाई के लिए (Poor Law) बनाने कासुझाव दिया है। उसने स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में भी अपनी योजनाएँ प्रस्तुत की हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं किकोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिस पर बेन्थम ने अपने सुधारवादी विचार प्रस्तुत न किए हों। अत: बेन्थम को राजनीतिकदार्शनिक की अपेक्षा एक सुधारवादी विचारक मानना सर्वथा सही है।

बेन्थम का योगदान

अनेक अन्तर्विरोधों व सम्भ्रान्तियों के बावजूद बेन्थम राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक श्रेष्ठ विचारक के रूप में गिना जाताहै। उसने उन्नीसवीं शताब्दी के घटनाचक्र को इंगलैंड तथा अन्य देशों में सुधारने के रूप में इतना अत्यधिक प्रभावित किया,उतना अन्य किसी विचारक ने नहीं किया। उसके सुधारों सम्बन्धी सुझाव सम्पूर्ण संसार के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं उसकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया और उसने रूस, स्पेन, पुर्तगाल व दक्षिणी अमेरिका की राजनीतिकविचारधारा को भी प्रभावित किया। उसका राजनीतिक चिन्तन के विकास में योगदान है :-

  1. राज्य व सरकार का कल्याणकारी लक्ष्य – बेन्थम ने राज्य व सरकार का लक्ष्य अधिकतम लोगो को अधिकतम सुख प्रदान करना बताया है। बेन्थम ने कहा कि राज्य मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य राज्य के लिए है। उसने कहा कि वही राज्यउत्तम हो सकता है जो अपने प्रजाजनों का अधिकतम हित चाहता हो। उसने राज्य व सरकार की सफलता की कसौटीव्यक्तियों को अधिक से अधिक सुख प्रदान करने को माना है। बेन्थम ने राज्य व सरकार को कल्याणकारी संस्थाएँ मानाहै। उसका कहना है कि राज्य व सरकार की उत्पत्ति मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही होतीहै और इनका अस्तित्व इन आवश्यकताओं की पूर्ति पर ही निर्भर है। इसलिए उसने राज्य व सरकार को जनता की भलाईके लिए अधिकतम प्रयास कर अपने अस्तित्व को न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए कहा है। उसका ‘अधिकतम लोगों काअधिकतम सुख’ का लक्ष्य आधुनिक राज्यों व सरकारों का भी लक्ष्य है। अत: यह बेन्थम की शाश्वत देन है।
  2. न्याय-व्यवस्था में सुधार –  बेन्थम ने ब्रिटिश न्याय प्रणाली की कटु आलोचना करते हुए न्यायिक सुधार के सुझाव दिएहैं। उसने कहा है कि न्याय अमीरों को ही मिलता है, गरीबों को नहीं। उसने गरीबों के लिए श्च्ववत स्ूंश् बनाने का सुझावदिया। उसने न्यायिक कार्यवाहियों को सरल व सस्ता बनाने का जो सुझाव दिया, वह आज भी अनेक देशों की न्यायिकव्यवस्थाओं में अपनाया गया है। इंगलैण्ड की सरकार ने भी बेन्थम के सुझावों पर ही अपनी न्याय-प्रणाली का विकासकिया है।
  3. कानूनों का सुधार –  बेन्थम ने कानून के क्षेत्र में अविलम्ब तथा स्थायी प्रभाव डाला है। उसने कानून में सरलता, स्पष्टताव व्यावहारिकता लाने का जो सुझाव दिया था, वह ब्रिटिश सरकार द्वारा बाद में अपनाया गया। उसने कानूनों कोनागरिक, फौजदारी तथा अन्तरराष्ट्रीय कानून के रूप में बाँटकर कानूनशास्त्र को एक नई दिशा दी। अमेरिका, रूस तथाअन्य देशों ने उसके संहिताकरण के आधार पर ही अपनी कानून व्यवस्था को ढालने का प्रयास किया है। उसके प्रयत्नसे ही कानून के मौलिक सिद्धान्तों के चिन्तन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारत में भी उसके सुधारों का व्यापक प्रभावपड़ा है।
  4. दण्ड व्यवस्था में परिवर्तन –  बेन्थम ने दण्ड व्यवस्था में सुधार के अनेक उपायों को प्रस् किया है। उसने जेलों में सुधारके अनेक उपायों को प्रस् किया है। उसने जेलों में सुधार की जो योजना सुझाई थी, वह आज भी अनेक देशों मेंव्यावहारिक रूप ले चुकी है।
  5. समानता का विचार –  बेन्थम ने कहा है कि “एक व्यक्ति को एक ही गिनना चाहिए।” इस विचार स े समानता के सिद्धान्तका जन्म होता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, कानून की दृष्टि में समान है। उसका समानता का विचारप्रतिनिधि लोकतन्त्र का आधार है।
  6. लोकतन्त्र का संस्थापक – बेन्थम ने गुप्त मतदान, प्रेस की आजादी, वयस्क मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता आदि विचारों कासमर्थन करके लोकतन्त्र को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। आधुनिक युग में भी सभी प्रजातान्त्रिक देशों में इनका वहीमहत्त्व है जो बेन्थम ने सुझाया था। अत: बेन्थम लोकतन्त्र के संस्थापक हैं।
  7. अनुसंधान व गवेषणा की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन – बेन्थम ने ही सर्वप्रथम इस बात पर बल दिया कि राज्य की नीतिसोच-विचार करके ही निश्चित की जानी चाहिए। उसने ही गवेषणात्मक पद्धति को सर्वप्रथम राजनीतिशास्त्र में लागूकिया। उसने दर्शनशास्त्र के अनुभववाद तथा आलोचनात्मक पद्धति को राजनीति, शासन और कानून के क्षेत्र में लागूकरने का प्रयास किया। उसने कहा कि राज्य के सिद्धान्त, परम्परा व कल्पनावादी अन्त:करण पर आधारित नहीं होसकते। ये अनुसन्धान व प्रमाण पर ही आधारित होने चाहिएं। इसी धारणा को आगे चलकर अनेक राजनीतिशास्त्र केविचारकों ने अपनाया है। इसलिए यह उसकी एक महत्त्वपूर्ण देन है।
  8. उपयोगितावादी सिद्धान्त को दार्शनिक आधार प्रदान किया – बेन्थम ने सर्वप्रथम दार्शनिक सम्प्रदाय की स्थापना करकेउसे वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया है। यद्यपि उसने अपने उपयोगितावाद के मूल सिद्धान्त प्रीस्टले व हचेसन जैसेविद्वानों से ग्रहण किए हैं लेकिन इनको व्यवस्थित रूप प्रदान करने का श्रेय बेन्थम को ही जाता है।
  9. मध्यकालीन राजनीतिक विचारों का खण्डन – बेन्थम ने सामाजिक समझौता सिद्धान्त का खण्डन किया और कहा किराज्य किसी काल्पनिक समझौते का परिणाम नहीं है। उसने प्रजाजनों द्वारा स्वाभाविक रूप से आज्ञापालन को राज्यका आधार बताया है। उसने कहा कि मनुष्य राज्य की आज्ञा का पालन अपने लाभ के लिए करते हैं। इसी तरह उसनेमध्ययुग में प्रचलित राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त का भी खण्डन किया है। उसने अपने अनुभववाद पर आधारितविचारों द्वारा मध्ययुगीन अन्धकार व रहस्यवाद के जाल में फँसी राजनीतिक व्यवस्था को नई आशा की किरण दिखाई।
  10. राजनीतिक स्थिरता का सिद्धान्त – बेन्थम ने तीव्र परिवर्तनों की अपेक्षा धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से ब्रिटिश प्रणालीमें स्थिरता का गुण पैदा करने के सुझाव दिए। उसने सुधारों को क्रान्तियों की तुलना में अधिक वांछनीय और स्पृहणीयबताया। उसके सुझावों को ब्रिटिश सरकार द्वारा बाद में मान लिया गया। इससे ब्रिटिश राजनीति में स्थिरता के युग कासूत्रपात हुआ।
  11. व्यक्तिवाद का आरक्षक – बेन्थम ने व्यक्ति को राज्य के सर्वसत्ताकारवादी पाश से मुक्त कराने का प्रयास किया है। उसनेस्पष्ट कहा है कि राज्य व्यक्ति के लिए है, न कि व्यक्ति राज्य के लिए। उसने राज्य को मनुष्यों की उपयोगिता की कसौटीपर परखने का सुझाव देकर व्यक्तिवाद की आधारशिला मजबूत की हैं आधुनिक युग में अनेक सरकारें व्यक्ति कीउपयोगितावादी धारणा के आधार पर ही कार्य कर रही हैं। व्यक्ति आधुनिक युग में राज्य के प्रत्येक कार्य का केन्द्र-बिन्दुहै। बेन्थम ने अप्रत्यक्ष रूप से समाजवाद के विकास में भी योगदान दिया है। उसने स्वतन्त्र व्यापार तथा अहस्तक्षेप के सिद्धान्तका समर्थन करके समाजवाद का ही पोषण किया है।

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