अनुप्रास अलंकार का अर्थ, परिभाषा भेद एवं उदाहरण

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अनुप्रास अलंकार अनुप्रास शब्दालंकारों में सबसे अधिक प्रचलित अलंकार है। ‘‘अनुप्रास शब्द अनु+प्र+अस्+घ´् के योग से निश्पन्न हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ है: समान ध्वनियों या वर्णों की आवृत्ति। वास्तव में इस अलंकार में वर्णनीय रस के अनुकूल व्यंजनों के क्रमिक विन्यास का ही विधान है। स्वरों की विषमता होने पर भी व्यंजनों की समता अनुप्रास कही जाती है।’’ भारतीय काव्यशास्त्र में अनुप्रास के पाँच भेद माने गये है – वृत्त्यनुप्रास, छेकानुप्रास, लाटानुप्रास, श्रुत्यनुप्रास और अन्त्यानुप्रास। इनमें पहले तीन ही हिन्दी में विशेष प्रसिद्ध हुए हैं। अन्त्यानुप्रास तो तुक का ही समानार्थक या पर्यायवाची है।

अनुप्रास के भेद

वृत्त्यनुप्रास

वृत्त्यनुप्रास अनुप्रास का सबसे अधिक प्रचलित तथा सबसे अधिक मान्य रूप है। इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है: ‘‘जहाँ एक या अनेक वर्णों की अनेक बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्त्यनुप्रास होता है’’ यों तो यह प्रकार ही सबसे अधिक प्रचलित और मान्य है, लेकिन सुन्दर को तो यह रूप विशेष प्रिय रहा है, लेकिन उन्होंने कहीं इसका सायास प्रयोग किया है- ऐसा कहीं नही दिखता। यहीं कारण है कि उनका प्रयोग पाठक को कभी भी उद्वेजित नही करता। यहाँ उनके काव्य से वृत्त्यनुप्रास के कुछ रम्य उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे है-

  1. आलिन की ओट ह्वैकै, चिक माँझ दृग दैकै दुरि-दुरि दौरि-दौरि देखि जाती द्ल है। यहाँ निचली पंक्ति में ‘द’ वर्ण की कई बार आवृत्ति हुई है जिससे वृत्त्यनुप्रास बनता हैं। पहली पंक्ति में भी ‘दृग दैकै’ में वृत्त्यनुप्रास है।
  2. सासुरे को चली, बाहिर बाग विलोकत ही अखियाँ भर आई। यहाँ ‘बाहिर बाग विलोकत’ में ‘ब’ वर्ण की तीन बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  3. दीनदयाल चले दयिता दुख, देखत ऐसे दुरेइ दुरै। यहाँ ‘दीनदयाल’ तथा ‘दयिता दुख देखत’ और ‘दुरैइ दुरै’ में ‘द’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास है।
  4. ‘सुन्दर’ अधर पर पीक की लसति लीक, बीच कारे काजर की रेख रेखियत है। यहाँ ‘लसति लीक’ में ‘ल’ की, ‘कारे काजर की’ में ‘क’ की तथा रेख रेखियत में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति है, इसलिए वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  5. लागो लेहु लपटाहु, लेटि-लेटि जाहु बेगि, मिलि-मिलि रहे दोऊ, नेह की हिलग में। यहाँ ‘लागो लेहु लपटाहु लेटि-लेटि’ में निरन्तर ‘ल’ आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  6. पावक से राते नैन, जावक सो चुयो परै, दावक सौ देखे देह दूनीक दगति है। यहाँ ‘देखे देह दूनीक दगति’ में चार बार ‘द’ की आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  7. तेरे अधरान की ललाई लखि लोचन के, लोचक तो ‘सुन्दर’ सुधा सो सींचियतु है। यहाँ ऊपर की पंक्ति ‘ललाई लखि लालन’ में ‘ल’ की तथा नीचे की पंक्ति में ‘सुन्दर सुधा सो सींचियतु’ में ‘स’ की कई बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  8. कैसो नीको नायक सकल सुखदायक है, कैसी नीकी चाँदनी औ, कैसी नीको चन्दु है। यहाँ ‘नीको नायक’ में ‘न’ की तथा ‘सकल सुखदायक’ में ‘स’ की आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
  9. झाँकति झरोखनि में देखिबे को तलावेली, तब ही ते तरुनि को ताप तनु तयो है। यहाँ ‘झाँकती झरोखनि’ में ‘झ’ की तथा ‘ताप तनु तयो’ में ‘त’ की आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास है।
  10. मिली रस रंग रिद्धि ‘सुन्दर’ सकल सिद्धि, पाइ नवौ निद्धि जे निकाई और सबहीं। यहाँ ‘रस रंग रिद्धि’ में ‘र’ की तथा ‘सुन्दर’ सकल सिद्धि’ में ‘स’ की तीन-तीन बार आवृत्ति है। अतएव वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।

सुन्दर कविराय के काव्य से और भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं और इस सूची को बहुत लम्बा बढ़ाया जा सकता है लेकिन इससे कुछ लाभ नहीं होगा। सुन्दर को वृत्त्यनुप्रास में रुचि है, लेकिन उन्होंने इसका प्रयास पूर्वक प्रयोग कहीं नहीं किया है। जहाँ वृत्त्यनुप्रास का प्रयासपूर्वक प्रयोग किया जाता है, जैसे ‘तरनि तनूजा तट तमाल तरूवर बहु छाये।’ वहाँ पाठक का ध्यान अर्थ से भटक जाता है और आवृत्ति में अटक जाता है जिसे अच्छा नहीं माना जाता।

छेकानुप्रास

‘छेक’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘बुद्धिमान’। बुद्धिमान लोग एक वर्ण की बार-बार आवृत्ति पसन्द नहीं करते। वे चाहते हैं कि अनेक वर्णों की पुनरावृत्ति हो और यही छेकानुप्रास है। ‘‘जहाँ दो या अधिक व्यजंनों की बिना व्यवधान के एक बार आवृत्ति हो, वहा छेकानुप्रास होता है। वृत्त्यनुप्रास और छेकानुप्रास में अन्तर यह है कि जहाँ वृत्त्यनुप्रास में एक या अनेक वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहीं छेकानुप्रास में दो या अधिक वर्णों की केवल एक बार सामूहिक आवृत्ति होती है।’’ सुन्दर ने छेकानुप्रास में विशेष रूचि ली है। उनके काव्य में छेकानुप्रास के उदाहरण सर्वत्र मिल जाते है। यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत है-

  1. तनगि तनैगी करि भौंहनि को तानति हौ, जिति धीर गही मन तिती तब गहैगो। यहाँ ‘तनगि तनैगी’ में ‘त’, ‘न’ और ‘ग’ तीन व्यंजनों की व्यवधान रहित आवृत्ति है इसलिए छेकानुप्रास अलंकार है।
  2. मग में परत पग, ‘सुन्दर’ भरत डग, कोमल कमल भूमि छाँड़त है धन कों। यहाँ ‘कोमल कमल’ में ‘क’, ‘म’ और ‘ल’ तीन व्यंजनों की व्यवधान रहित आवृत्ति है इसलिए छेकानुप्रास अलंकार है।
  3. पीरी परि आई कही ‘सुन्दर’ कपोलनि में, काँपत अधर जानों सुधा सों सुधारे है। ‘पीरी परि’ में ‘प’ और ‘र’ व्यंजनों की व्यवधान रहित आवृत्ति हुई है अत: छेकानुप्रास अलंकार है।
  4. तीरथ जात को जातरी जात, सुने पछितात ही द्यौस गँवायों। यहाँ ‘जातरी जात’ में ‘ज’ और ‘त’ की लगातार आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है।
  5. मोती के हार घने घनसार, सनी सुख सेज सुगंधनि त्यों ही। यहाँ ‘घने घनसार’ में ‘घ’ और ‘न’ दो व्यंजनों की आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है।
  6. मैन मनो गढ़ि गोल गिलोलनि, खेल कों छोलि गिलोल सँवारी। यहाँ ‘मैन मनो’ में ‘म’ और ‘न’ दो व्यंजनों की व्यवधानरहित आवृत्ति होने से छेकानुप्रास अलंकार है।
  7. नारि निहारि निहोरन लागे, नये दृग नैकु तऊ न तिया के। यहाँ ‘निहारि निहोरन’ में ‘न’, ‘ह’ और ‘र’ तीन व्यंजनों की एक साथ आवृत्ति होने से छेकानुप्रास अलंकार है।
  8. जिनकी उनि डारनि सों कहि ‘सुन्दर’ ए मन-मानिक मोती फरैं। यहाँ ‘मन-मानिक’ में ‘म’ और ‘न’ दो व्यंजनों की व्यवधानरहित आवृत्ति है। अतएव छेकानुप्रास अलंकार है।
  9. बाई ओर ‘सुन्दर’ सिवा के हेत फेरि-फेरि, सुधा सों सुधारि धरैं, कला सुधाधर की। यहाँ ‘सुधारि धरैं’ में ‘ध’ और ‘र’ दो व्यंजनों की व्यवधानरहित आवृत्ति होने से छेकानुप्रास अलंकार है।
  10. कुंडल अडोल, मुख ‘सुन्दर’ न बोले बोल, लोचन अलोल, मानों काहू हरि लये हैं। यहाँ ‘बोलै बोल’ में ‘ब’ और ‘ल’ दो व्यंजनों की व्यवधानरहित आवृत्ति है। अतएव छेकानुप्रास अलंकार है।

यह सूची बहुत लम्बी की जा सकती है क्योंकि सुन्दर कविराय के काव्य में स्थल-स्थल पर छेकानुप्रास के उदाहरण मिलते रहते हैं, लेकिन ऐसा करना उचित नहीं है। सत्यता यह है कि सुन्दर कविराय ने अनुप्रास अलंकार में विशेष रुचि ली है। वृत्त्यनुप्रास में सायास प्रयत्न उनका नहीं दिखता, लेकिन छेकानुप्रास के प्रति गहन रुचि उनमें अवश्य परिलक्षित होती है।

अनुप्रास के अन्य भेद है: लाटानुप्रास, श्रुत्यनुप्रास और अन्त्यानुप्रास। इनके स्वरूप पर संक्षेप में प्रकाश डालना आवश्यक है। डॉ0 रामानन्द शर्मा इनके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए लिखते है: ‘‘शब्द और अर्थ की अभिन्नता में भी तात्पर्य मात्र के भेद को लाटानुप्रास कहते है। वस्तुत: इस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों की पुनरुक्ति होती है, लेकिन अन्वय करने पर तात्पर्य बदल जाता है। जहाँ एक ही स्थान से उच्चरित व्यंजनों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास अलंकार होता है। चरणान्त में व्यंजनों की समानता को अन्त्यानुप्रास कहा जाता है। इसे हिन्दी तुक का रूप ही समझना चाहिए।’’ इन तीनों भेदों में केवल लाटानुप्रास ही चमत्कार उत्पन्न करने में समर्थ होता है। अन्त्यानुप्रास (तुक) का विधान तो हिन्दी में सर्वत्र मिलता ही है, इसलिए इसे अलंकार स्वीकार करना ही निरर्थक है। एक ही स्थान से उच्चरित व्यंजनों की ओर भी हिन्दी कवियों ने विशेष ध्यान नहीं दिया है। केवल लाटानुप्रास ही रम्य है, लेकिन इसकी ओर हिन्दी के कवियों ने ध्यान नहीं दिया है। सुन्दर में लाटानुप्रास का कहीं प्रयोग देखने को नहीं मिलता।

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