नेति क्रिया के प्रकार, क्रिया की विधि और उसके लाभ

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अनुक्रम

नेति षटकर्मों की तृतीय शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। नेति क्रिया को आधुनिक समय में कान, नाक व गले से सम्बद्ध किया है। नेति क्रिया के माध्यम से मुख्य रूप से उपरोक्त् तीन अंगों (नाक, कान, गले) की सफाई होती है। शास्त्रीय विवेचन करे तो हठयोग के महत्वतपूर्ण ग्रन्थों हठ-प्रदीपिका व घेरण्ड संहिता में नेति की प्रक्रिया में सिर्फ सूत्र नेति का वर्णन मिलता है। परन्तु वर्तमान में नेति क्रिया अनेको रूपों में प्रयोग की जाती है। जैसे जल नेति, दुग्ध् नेति, घृत नेति, मूत्र नेति, रबर नेति, सूत्र नेति ।

नेति क्रिया के प्रकार

जल नेति

जल द्वारा इसमें नासिका मार्ग का शुद्धिकरण किया जाता है।

क्रियाविधि-

  1. नेति पोट (टोटीं वाला लोटा) ले लीजिए।
  2. उकडूं बैठकर या बडे होकर सिर को आगे झुकाये।
  3. स्वच्छ जल शरीर के तापमान को बराबर जिसमें नमक (स्वादानुसार) डला हो उसे नेति पोट में भर लीजिए।
  4. जो स्वर चल रहा हो उसमें नेति पोट के टोटी को घुसाये।
  5. मुँह खोल जीजिए तथा गर्दन को थोड़ा झुकायें।
  6. जल दूसरे नाक से स्वत: आने लगेगा।
  7. 20-25 सेकण्ड तक जब पानी पूरा खत्म हो जाये नेति पोट की नाक से निकाल लेता या पुन: दूसरी नाक से इस क्रिया को दोहराये।

विशेष –

  1. नेति पोट वर्तमान में प्लास्टिक व तॉबे, पीतल का बना बाजार में उपलब्ध रहता है।
  2. जल नेति में जल का तथा अन्य नेति में घृत, मूत्र (स्व:मूत्र-मध्य भाग का) प्रयोग गुरू के निर्देशानुसार किया जा सकता है।

रबर नेति

रबर नेति अर्थात कैथेडर द्वारा नासिका मार्ग की सफाई इस प्रक्रिया में की जाती है।

क्रियाविधि-

  1. लम्बी , पतली रबर की ट्यूब (कैथेडर) को (जो अच्छी तरह उबली हो) ले लीजिए।
  2. खडे होकर बिना तनाव लिये जो स्वर चल रहा हो उस ट्यूब को धीरे-धीरे नासिका मार्ग में डाले।
  3. थोड़ी देर बाद रबर नेति (कैथेडर) का दूसरा सिरा गले तक पहुँच जायेगा।
  4. अंगूठा व तर्जनी अंगुली मुँह में डालकर गले से उसके दूसरे सिरे को खीच लीजिए।
  5. थोडी देर दोनों छोरों को पकड़कर उसमें आगे-पीछे घर्षण करें।
  6. अन्त में धीरे-धीरे रबर नेति को बाहर निकाल दीजिए।
  7. पुन: इस प्रक्रिया को दूसरे नासाछिद्र में डालकर दोहराइये।

सूत्र नेति

7.8 इंच लम्बे 8-10 महीन सूती धागों में मोम डालकर बॅट लीजिए। एक हिस्सेव को लगभग 6 इंच मोम में डालरक कडा होने दे। इस प्रकार सूत्र नेति बनाकर इस प्रक्रिया को किया जाता है।

क्रियाविधि-

  1. एक सूत्र नेति लेकर सावधानी पूर्वक जो स्वर चल रहा हो उसमें सूत्र नेति धीरे-धीरे डालिए।
  2. थोड़ी देर बाद सूत्र नेति का दूसरा सिरा गले तक पहुँच जायेगा।
  3. अंगूठा व तर्जनी अंगुली को मुँह में डालकर गले से उसके दूसरे सिरे को खीच लीजिए।
  4. थोड़ी देर सूत्र नेति के दोनों छोरों को पकड़कर घर्षण कीजिए।
  5. अन्त में मुँह से सूत्र नेति निकाल दीजिए पुन: दूसरे नाक से इस प्रक्रिया को दोहराये।

नोट – वर्तमान में बाजार में सूत्र नेति बनाई हुए उपलब्ध रहती है। उसे प्रयोग हेतु खरीदा जा सकता है। सभी प्रकार की नेति की लाभ व सावधानियॉं इस प्रकार है।

लाभ –

  1. नेति क्रिया का साइनस ग्रन्थि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  2. नाक से निकलने वाले श्लेरष्मा का नियंत्रण करती है।
  3. “वसन संस्थान के रोगों, साइनोसाइटिस, ब्रोकाइटिस, अस्थमा में लाभकारी है।
  4. दूर व निकट दृष्टि में अतयन्त लाभकारी है।
  5. आँख, नाक व कानों के रोगों में लाभप्रद है ।
  6. नासिका मार्ग में श्लेष्मो झिल्ली की मालिश होने से उसकी क्रियाशीलता बढ़ती है तथा रक्त का प्रभाव तेज होता है।
  7. नेति क्रिया से तनाव, चिन्ता, अवसाद के रोगियों को भी लाभ पहुँचता है।
  8. मस्तिष्क में गर्मी, उत्ते जल, मिर्गी की बीमारी में भी इसका सार्थक प्रभाव पड़ता है।

सावधानियॉं-

  1. नासिका मार्ग एक नाजुक अंग है, रबर या सूत्र नाक में नहीं जाये तो जबरदस्ती ना करे।
  2. रबर नेति या सूत्र नेति करने से पहले यह अवश्य साफ होनी चाहिए।
  3. नेति करते समय हाथ स्वच्छ रहे तथा नाखुन कटे होने चाहिए।
  4. एक कुशल मार्गदर्शन में नेति का अभ्यास करें।

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