षट्कर्म का अर्थ, हठयोग प्रदीपिका में वर्णित षट्कर्म

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षट्कर्म शब्द क अर्थ है, छ: ऐसी क्रियायें जिनके माध्यम से शरीर का शोधन किया जाता है। षट्कर्म दो शब्दों से बना है- षट्+कर्म, शट् का अर्थ छ, कर्म का अर्थ क्रियायें। हठयोग प्रदीपिका में शरीर की शुद्धि के लिए जिन छ: क्रियाओं का वर्णन किया गया है उन्हें षट्कर्म कहा जाता है। यह शोधन क्रियायें कपाल प्रदेश से गुदा द्वार तक की आन्तरिक शुद्धि के प्रयोग में लायी जाती है। जिस प्रकार आर्युवेद में शरीर के शोधन के लिए पंचकर्म चिकित्सा का वर्णन है, उसी प्रकार हठयोग के साधकों के लिए आन्तरिक शुद्धि एवं वात, पित्त, कफ को सन्तुलित करने के लिए शट्कर्मों का वर्णन मिलता है। योगी स्वात्माराम जी ने भी अपने ग्रन्थ हठयोग प्रदीपिका में भी इन शुद्धि क्रियाओं का वर्णन किया है और शरीर शुद्धि (आन्तरिक शुद्धि) के लिए इनके प्रयोग को अत्यन्त आवश्यक माना है।

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित षट्कर्म

धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा।

कपालभातिश्चैतानि शट्कर्माणि प्रचक्षते।। ह0प्रदीपिका 2/22

अर्थात-धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि एवं कपालभाति ये छ: शोधन क्रियाएँ कही गई हैं।

धौति

हठप्रदीपिका में शरीर में स्थित 72000 नाड़ियों का शोधन करने के लिए शट् क्रियाओं का भी उल्लेख किया गया है। इन शट् क्रियाओं से आन्तरिक शोधन होता है। धौति सबसे पहला षट्कर्म है। इसकी विधि बताते हुए कहा गया है कि-

विधि-

चतुरड्गुलविस्तारं हस्तपंचदशायतम्।

गुरूपदिश्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैग्रसेत्।

पुन: प्रत्याहरेच्चैतदुदितं धौतिकर्म तत्।। ह0प्र0 2/24

अर्थात् सर्वप्रथम उत्कट आसन में बैठकर, चार अंगुल चौड़ा, पन्द्रह हाथ लम्बा, स्वच्छ कपड़ा, गुनगुने जल में भली प्रकार से भिगोकर किसी गुरू के निर्देशन के अनुसार धीरे-धीरे निगले। पूरा निगलने के बाद लगभग आधा हाथ कपड़ा मुंह के बाहर ही छोड़े तत्पश्चात् कपड़े (निगले हुए) को धीरे-धीरे मुँह से बाहर निकालें। यही धौति क्रिया है।

लाभ-

कासश्वासप्लीहकुश्टं कफरोगाश्च विंशति:।

धौतिकर्मप्रभावेन प्रयान्तयेव न संशय:।। ह0प्र0 2/25

अर्थात् धौति के लाभों का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है कि जो साधक धौति का अभ्यास करता है उसे विभिन्न प्रकार के रोग जैसे खाँसी, दमा, तिल्ली तथा कुश्ठ आदि रोग नहीं होते। बीस प्रकार के कफ विकार दूर हो जाते हैं। इससे पूरी आहार नाल, आमाशय आदि की पूरी सफाई हो जाती है।

सावधानी – धौति करते समय बहुत सी सावधानी बरतनी चाहिए। सर्वप्रथम धौति करते समय गुरू का होना अति आवश्यक है। धौति खाते समय अत्यधिक धैर्य की आवश्यकता होती है, मन को दृढ़ करना पड़ता है। धौति निकलने में दिक्कत होने पर गुनगुना नमकीन जल पीएं। धौति को निकालते हुए धीरे-धीरे निकाले, तेजी से निकालने पर खून आदि निकल सकता है। जो लोग धौति को पहली बार कर रहे हैं वह धौति पर घी या शहद लगा सकते हैं। धौति करने से पूर्व रात्रि हल्का भोजन या भोजन न करें।

वस्ति

वस्ति शरीर की बड़ी आंत की सफाई करती है। इसको करने की विधि इस प्रकार हैं-

विधि-

नाभिदघ्नजले पायुन्यस्तनालोत्कटासन:।

आधाराकुंचन कुर्यात् क्षालनं बस्तिकर्म तत्।। ह0प्र0 2/27

अर्थात् सर्वप्रथम साधक को नाभिपर्यन्त किसी स्वच्छ जल में जाकर गुदा में एक स्वच्छ नली डालकर उत्कटासन में बैठना चाहिए। तत्पश्चात् साधक को अपने गुदा को संकुचित कर जल को गुदामार्ग से अन्दर प्रविश्ट कराकर अन्दर के अंगों को धोना चाहिए। यही वस्ति क्रिया है।

लाभ – गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवा:।

बस्तिकर्मप्रभावेन क्षीयन्ते सकलामया:।।

धात्विन्द्रियान्त: करणाप्रसादं दद्याच कान्तिं दहनप्रदीप्तिम्।

अशेशदोशोपचयं निहन्यादभ्यस्यमानं जलबस्तिकर्म।। ह0प्र0 2/28-29

वस्ति के लाभों का वर्णन करते हुए हठप्रदीपिका में लिखा है कि- इसके अभ्यास से शरीर के विभिन्न रोग जैसे वायुगोला, तिल्ली, जलोदर तथा त्रिदोशों (वात, पित्त कफ) के विकृत होने से होने वाले सभी दोश दूर हो जाते हैं। शरीर की धातुएं पुश्ठ होती हैं। मन को प्रसन्नता मिलती हैं, जठराग्नि प्रदीप्त होती हैं तथा शरीर कान्तिवान तथा इन्द्रियां बलिश्ठ होती हैं। सावधानी- जल वस्ति करते हुए ध्यान रखें कि जल रूका या प्रदूशित न हों। गुदा में जो नली डालनी हो वह शुद्ध हो। किसी भी प्रकार के गुदा के इनफैक्शन में इसका अभ्यास न करें।

नौलि

विधि-

अमन्दावर्तवेगेन तुन्दं सव्यापसवयत:।

नतांसो भ्रामयेदेशा नौलि: सिद्धै: प्रचक्ष्यते।। ह0प्र0 2/34

अर्थात् सर्वप्रथम श्वास को बाहर छोड़कर हाथों को घुटनों पर रखें। कन्धों को सामने झुकाए तत्पश्चात् उड्डियान बंध लगाकर नलों को सामने की ओर इकठ्ठा करे फिर तेज गति से उदर को दाएं से बाएं तथा बाएं से दाएं घुमाएं । इसे ही नौलि कहा गया है।

लाभ-

मन्दाग्निसंदीपनपाचनादिसंधायिकानन्दकरी सदैव।

अशेशदोशामयशोशणी च हठक्रियामौलिरियं च नौलि:।। ह0प्र0 2/35

इसके लाभों का वर्णन करते हुए कहा है कि इससे उदर प्रदेश की सभी व्याधियां जैसे मन्द-जठराग्नि, पाचन संम्बधी दोश आदि नष्ट हो जाते हैं। यह उदर के सभी अंगों की मालिश करता है तथा उदर की मांस पेशियों को पुष्ट करता है।

सावधानी – यह अभ्यास थोड़ा कठिन है इसलिए इसका अभ्यास संभल कर करना चाहिए। हार्निया या अल्सर आदि रोगों में इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। जिन व्यक्तियों का पेट अत्यधिक कमजोर हो उन्हें धीरे-धीरे ही इसका अभ्यास करना चाहिए। नौलि को घुमाने से पहले धीरे-धीरे घुमाएं वेग से नहीं।

नेति

विधि-

सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत्।

मुखान्निर्गमयेच्चैश नेति: सिद्धैर्निगद्यते।। ह0प्र0 2/30

अर्थात् स्वात्माराम जी यहाँ सूत्र नेति का ही वर्णन किया है। उन्होनें कहा है कि लगभग 9 इंच लम्बी एवं चिकनी सूत्र जो कि विशेश रूप में तैयार की गई हो, को किसी एक नासिका में डाले तथा धीरे-धीरे उसे मुख से बाहर निकालें । इसी क्रिया को पुन: दूसरी नासिका से भी करें। इसे योगीजन नेति कहते हैं।

लाभ-

कपालशोधनी चैव दिव्यदृश्टिप्रदायिनी।

जत्रूध्र्वजातरोगोघं नेतिराशु निहन्ति च।। ह0प्र0 2/31

नेति के लाभों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि नेति करने से कपाल का शोधन होता है। इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, साधकों को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। कन्धे के ऊपर के सभी रोग दूर हो जाते हैं जुकाम, एलर्जी, साइनोसाइटिका आदि सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। नाक की बढ़ी हुई हड्डी भी सूत्रनेति के बिल्कुल ठीक हो जाती है।

सावधानी – सूत्र नेति को नासिका में धीरे-धीरे डालें, जल्दी न करें अन्यथा नाक कें अंदर से खून निकल सकता हैं। घाव होने पर नेति न करें। सूत्र को अच्छी तरह घी आदि से चिकना कर लें। सूत्र नेति करने से पूर्व हाथ के नाखून आदि काट ले अन्यथा सूत्र को मुंह से बाहर निकालते हुए घाव हो सकता है। सूत्र को गरम पानी से धोए।

त्राटक

विधि-

निरीक्षेन्निश्चलदृशा सूक्ष्मलक्ष्यं समाहित:।

अश्रुसम्पातपर्यन्तमाचार्येस्त्राटकं स्मृतम्।। ह0प्र0 2/32

अर्थात् सर्वप्रथम किसी भी ध्यानात्मक आसन में स्थिर होकर बैठें। तत्पश्चात् अपने से तीन-चार फुट दूर कोई भी सूक्ष्म वस्तु जैसे मोमबत्ती की लौ, दीपक की लौ आदि को लगातार देखते रहें जब तक की दोनों आंखों से आंसू न आ जाए। इसके बाद दोनों हाथों को रगड़कर दोनों आंखों पर लगाएं। कुछ देर आंखों को बंद कर आराम करें उसके बाद पुन: इसी क्रिया को दोहराएं। विद्वानों ने इसे ही त्राटक कहा है।

लाभ-

मोचनं नेत्ररोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम्।

यत्नतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटकपेटकम्।। ह0प्र0 2/33

इसका नियमित अभ्यास करने वाले साधक को कभी भी नेत्र सम्बन्धी रोग नहीं होता है। यह तन्द्रा आदि को भी दूर करता है। आंखों की रोशनी बहुत तेजी से बढ़ती है। साधक को भूत-भविश्य सभी अर्थात् दिव्य दृष्टि प्राप्त होती हैं। वह त्रिकालदश्र्ाी हो जाता है। विद्वानों ने इसे स्वर्ण की पेटी के समान मूल्यवान बताया है अत: इसकी रक्षा करना अति आवश्यक है।

सावधानी – त्राटक का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। वस्तु की उचित दूरी बनाए रखना अति आवश्यक है। आंखें थकने पर उनकों आराम देना भी बहुत जरूरी है।

कपालभाति

विधि-

भस्त्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ।

कपालभातिर्विख्याता कफदोशविशोशणी।। ह0प्र0 2/36

सर्वप्रथम किसी भी ध्यानात्मक आसन में स्थिर होकर बैठें। तत्पश्चात् वेग से लोहार की धौकनी के समान श्वास-प्रश्वास (रेचक-पूरक) करें। यहीं कपालभाति हैं।

लाभ- कपालभाति का अभ्यास कफ सम्बन्धी विकारों को दूर करता हैं। कफ बढने पर कफ को तुरंत नासिका मार्ग से बाहर फेंकता है। कपाल प्रदेश का शोधन कर उसे कान्तिवान बनाता है तथा चेहरे पर चमक लाता है।

सावधानी- कपालभाति करते हुए केवल नाक का ही प्रयोग करें। मुंह को विकृत न करें। होठों को समान्य रहने दें। उच्च रक्तचाप , हृदय आघात वाले व्यक्ति इसका अभ्यास न करें।

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