समाधि के प्रकार

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समाधि के प्रकार समाधि के छह प्रकार बताए हैं वे हैं- ध्यान योग समाधि, नाद योग समाधि, रसानंद योग समाधि, लयसिद्धि योग समाधि, भक्तियोग समाधि, राजयोग समाधि। कहा जाता है कि समाधि एक अवस्था है जिसमें व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार हो जाता है। सभी शास्त्रों और ग्रन्थों में जिस अवस्था को ब्रह्मज्ञान के नाम से जाना जाता है, वह स्वयं में समाधि की स्थिति है। समाधि के विषय में महर्षि, चण्डकपालि को समझाते हुए कहते हैं कि-

समाधिश्च परो योगो बहुभाग्येन लभ्यते।

गुरो: कृपाप्रसादेन प्राप्यते गुरुभक्तित:।।

विद्याप्रतीति: स्वगुरुप्रतीतिरात्मप्रतीतिर्मनस: प्रबोध:।

दिने दिने यस्य भवेत्स योगी सुशोभनाभ्यासमुपैति सद्य:।।

घटान्नि मन: कृत्वा चैक्यं कुर्यात्परात्मनि।

समाधिं तं विजानीयान्मुक्तसंज्ञो दशादिभि:।।

अहं ब्रह्म न चान्योSस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक्।

सच्चिदानन्दरूपोSहं नित्यमुक्त: स्वभाववान्।। घे0स0 7/1 2 3 4

अर्थात् समाधि कोई सामान्य अवस्था नहीं है यह एक परम् अवस्था है जो बड़े भाग्य वालों को ही प्राप्त होती है। यह उन्हीं साधकों को प्राप्त होती है जो गुरु के परम् भक्त है या जिन पर अपने गुरू की असीम कृपा होती है। जैसे-जैसे साधक की विद्या की प्रतीति, गुरु की प्रतीति, आत्मा की प्रतीति और मन का प्रबोध बढ़ता जाता है, तब उसे समाधि की प्राप्ति होती है। अपने शरीर को मन के अधीन होने से हटाने तथा परमात्मा में लगाने पर ही साधक मुक्त होकर समाधि को प्राप्त होता है। समाधि में यही भाव रहता है कि मैं ब्रह्म हूँ और इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं। मुझे किसी भी प्रकार का कोर्इ बंधन नहीं है, मैं सत्, चित्त और आनन्द कर स्वरूप है। समाधि को बताने के बाद आगे घेरण्ड मुनि समाधि के भेद को बताते हुए कहते हैं कि-

शाम्भव्या चैव भ्रामर्या खेचय्र्या योनिमुद्रया।

ध्यानं नादं रसानन्दं लयसिद्धिश्चतुर्विधा।।

पंचधा भक्ति योगेन मनोमूच्र्छा च षड्विधा।

“षड्विधोSयं राजयोग: प्रत्येकमवधारयेत्।। घे0स0 7/5 6

समाधि के छह भेद बताए हैं वे हैं- ध्यान योग समाधि, नाद योग समाधि, रसानंद योग समाधि, लयसिद्धि योग समाधि, भक्तियोग समाधि, राजयोग समाधि। ध्यान योग की समाधि शाम्भवी मुद्रा से, नाद योग की भ्रामरी से, रसानन्दयोग की खेचरी से, लयसिद्धि योग की योनि मुद्रा से, भक्तियोग की मनोमूच्र्छा से और राजयोग समाधि कुम्भक से सिद्ध होती है। उपर्युक्त छह समाधियाँ राज योग में सम्मिलित हैं, साधक को इनका अभ्यास क्रमश: करना चाहिए।

समाधि के प्रकार

समाधि के छह प्रकार बताए हैं वे हैं- ध्यान योग समाधि, नाद योग समाधि, रसानंद योग समाधि, लयसिद्धि योग समाधि, भक्तियोग समाधि, राजयोग समाधि।

ध्यान योग समाधि

शाम्भवीं मुद्रिकां कृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत्।

बिन्दु ब्रह्ममयं –ष्ट्वा मनस्तत्र नियोजयेत्।।

खमध्ये कुरुचात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु।

आत्मानं खमयं –ष्ट्वा न किंचिदपि बुध्यते।

सदानन्दमयो भूत्वा समाधिस्थो भवेन्नर:।। घे0स0 7/7 8

शाम्भवी मुद्रा को कर आत्मा को प्रत्यक्ष रूप से देखने का प्रयास करें तत्पश्चात् ब्रह्म का साक्षात्कार करते हुए मन को बिन्दु पर केन्द्रित करें। मस्तिष्क में स्थित ब्रह्म लोकमय आकाश के बीच में आत्मा ले जाए और जीवात्मा में आकाश को लय करें तथा परमात्मा में जीवात्मा का ध्यान करें। इससे योगी को आनन्द मिलता है और वह समाधि में स्थित हो जाता है।

नाद योग समाधि

अनिलं मन्द वेगेन भ्रामरीकुम्भकं चरेत्।

मन्दं मन्दं रेचयेद्वायुं भुड़्नादं ततो भवेत्।।

अन्त:स्थं भ्रमरीनादं श्रुत्वा तत्र मनो नयेत्।

समाधिजार्यते तत्रं चानन्द: सोSहमित्यत:।। घे0स0 7/9 10

धीमी गति से वायु का पान कर भ्रामरी प्राणायाम करते हुए ही धीमी गति से ही वायु का रेचन करे। वायु का रेचन करते हुए भौरे के गुन्जन की ध्वनि उत्पन्न करे। यह गुंजन (नाद) जहाँ पर हो रहा हो उसी पर ध्यान या मन लगा दे। धीरे-धीरे वह ध्वनि पूरे शरीर में गूँजने लगती है यही नाद योग समाधि है।

रसानन्द समाधि

खेचरीमुद्रासाधनात् रसनोध्र्वगता यदा।

तदा समाधिसिद्धि: स्याद्धित्वा साधारणक्रियाम्।। घे0स0 7/11

महर्षि घेरण्ड कहते हैं कि खेचरी साधना में जीभ ऊपर की ओर कपाल कुहर में प्रवेश कर जब ब्रह्मरन्ध्र में पहुँच जाती है इस प्रकार की स्थिति रसानन्द योग समाधि कहलाती है। इस अवस्था में जिस रस की अनुभूति होती है वह परम आनन्ददायी होता है। यही उस अमृत रस से प्राप्त आनन्द की समाधि है इसे ही महर्षि ने रसानन्द समाधि की संज्ञा दी है।

लयसिद्धि समाधि

योनिमुद्रां समासाद्य स्वयं शक्तिमयो भवेत्।

सुश्रृगाररसेनैव विहरेत्परमात्मनि।।

आनन्दमय: सम्भूत्वा एक्यं ब्रह्मणि संभवेत्।

अहं ब्रह्मेति चाद्वैतसमाधिस्तेन जायते।।घे0स0 7/12 13

इस समाधि का वर्णन करते हुए मुनि जी कहते हैं कि साधक को पहले योनि मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए। साधक को सब कुछ भूलकर (लिंग भेद) स्वयं में शक्ति की भावना तथा परमात्मा में पुरुष का भाव रखना चाहिए। उसे यह भावना रखनी चाहिए कि उसमें और परमात्मा में शक्ति और पुरुष का संचार हो रहा है। इसके पश्चात् आनन्द मग्न होकर यह चिन्तन करें कि “मैं ही अद्वैत ब्रह्म हूँ”। यही लयसिद्धि समाधि की अवस्था है।

भक्तियोग समाधि

स्वकीयहृदये ध्यायेदिष्टदेव स्वरूपकम्।

चिन्तये˜क्तियोगेन परमाह्लादपूर्वकम्।।

आनन्दाश्रुपुलकेन दशाभाव: प्रजायते।

समाधि: सम्भवेत्तेन सम्भवेच्च मनोन्मनी।। घे0स07/14 15

घेरण्ड मुनि कहते हैं कि अपने हृदय में अपने अराध्य देव के रूप पर ध्यान लगाए। मन में भक्ति का भाव लाए तथा अपने इष्टदेव के प्रति पूर्ण श्रद्धा, भक्ति, प्रेम आदि का भाव उत्पन्न करे। ऐसा करने से आनन्द के आँसू बहने लगते हैं और पूरा शरीर काँपने लगता है। मन में एकाग्रता आती है और तभी मन, ब्रह्म से साक्षात्कार हो जाता है। यही भक्ति योग समाधि है। यह समाधि भावुक साधकों के लिए उचित है।

मनोमूर्छा समाधि

मनोमूच्र्छा समासाद्य मन आत्मनि योजयेत्।

परमात्मन: समायोगात्समाधि समवाप्नुयात्।। घे0स0 7/16

मनोमूर्छा प्राणायाम का अभ्यास कर साधक की अन्त:करण की क्रिया समाप्त हो जाती है उसी समय साधक को अपना मन एकाग्र कर ब्रह्म में स्थित करने का प्रयास करे। परमात्मा के साथ योग होने को ही मनोमूर्छा समाधि कहते हैं।

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