भारतीय दर्शन का वर्गीकरण एवं परिचय

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अनुक्रम

भारतीय दर्शन का वर्गीकरण इसे दो वर्गो में विभाजित किया गया है। (अ) आस्तिक दर्शन (ब) नास्तिक। दर्शन वेदों पर विश्वास करने वाला आस्तिक है। तथा वेदों की निंदा करने वाला नास्तिक है। धर्म का ज्ञान जिसको प्राप्त है। वह वेद है। आस्तिक दर्शन के अंतर्गत सामान्यत: छ: दर्शन आते है- 1. न्यायदर्शन, 2. वैशेषिकदर्शन, 3. सांख्यदर्शन, 4. योंगदर्शन, 5.मीमांसादर्शन, 6. वेदांतदर्शन। नास्तिक दर्शन के अंतर्गत तीन दर्शन आते है- 1. चार्वाकदर्शन, 2. जैनदर्शन, 3. बौद्धदर्शन।

आस्तिक दर्शन

भारतीय दर्शन का वर्गीकरण को वर्गो में विभाजित किया गया है। (अ) आस्तिक दर्शन (ब) नास्तिक दर्शन। आस्तिक दर्शन का क्रमबद्ध वर्णन है-

न्यायदर्शन

न्याय शब्द की उत्पित्त संस्कृत की नी धातु से हुई है जिसका अर्थ शब्दों और वाक्यों का निश्चित अर्थों में बोध होता है। मनु के अनुसार जो तर्क का आश्रय लेता है, वही भारतीय धर्म का स्वरूप समझता है,  अन्य कोई नहीं। न्याय-दर्शन का इतिहास लगभग 200 वर्षों का है। न्याय-दर्शन पुन: दो भागों में विभाजित है-(क) प्राचीन न्यायदर्शन (ख) नव्य-न्यायदर्शन।  प्राचीन न्याय जहाँ प्रमेय प्रधान है वहीं नव्य न्याय प्रमाण प्रधान है। प्राचीन न्याय की शैली जहॉं सरल है, आडम्बर विहिन है। नवीन-न्याय की शैली विवेचना प्रधान विस्तृत आडम्बर पूर्ण है। न्याय-दर्शन के विभिन्न आचार्य व उनकी रचनाएँ प्राचीन न्याय सूत्र शैली (पद्धति में निबद्ध है इनके रचियता है-

  1. महर्षि गौतम- प्राचीन न्याय का आदिम ग्रंथ द्वितीय शताब्दी में गौतम विरचित ‘न्याय-सूत्रम्’ है। डा. याकोबी ने न्याय-सूत्रों की रचना का काल तीसरी शताबदी माना है पं. विद्याभूषण छठी शताब्दी मानते है। ब्रह्माण्डपुराण के अध्याय 23 के अनुसार गौतम का जन्म स्थान मिथिला (बिहार) है।
  2. वात्स्यायन- महर्षि वात्स्यायन ने न्याय-सूत्रों के गूढ़ रहस्यों (अर्थों) को समझने के लिए भाष्य का प्रणयन किया, जिसे ‘न्याय-भाष्य’ कहते है। इनका समय विक्रम वर्ष 300 ई. में माना गया है।
  3. श्री वाचस्पति मिश्र- बौद्ध विद्वानों की न्यायवार्तिकों पर प्रतिकूल आलोचनाओं से बचने के लिए वाचस्पति मिश्र ने सन् 840 में ‘न्यायवार्तिक-तात्त्पर्य टीका’ लिखी।
  4. उद्योतकार- इन्होने 625 ई. में न्याय-सूत्रों के वात्स्यायन भाष्य पर ‘न्याय वार्तिकम् लिखा।
  5. जयन्त भट्ट- इनकी एकमात्र रचना ‘न्याय मंजरी’ हैं। यह न्यायसूत्रों पर एक प्रमेय बहुला कृति है इनका काल नवम शतक माना जाता है।
  6. भासर्वज्ञ- इनकी रचना ‘न्याय-सार’ है। रत्नकीर्ति ने ऊपोह-सिद्धि में इनके ग्रंथ को उद्धृत किया है। इनका समय 9 वी शताब्दी के अन्त में है।
  7. उदयनाचार्य- वाचस्पति मिश्र की आलोचना बौद्ध दार्शनिकों ने की। इन आलोचनाओं से न्याय-सिद्धांतों की रक्षा करने के लिए इन्होने ‘न्याय 16 वार्तिक तात्त्पर्य टीका-परिशुद्धि’ नामक ग्रंथ की रचना की। इनका समय 10 वी शताब्दी माना जाता है।

प्राचीन सूत्र पद्धति से ग्रंथ न लिखकर स्वतंत्र रूप से गं्रथों का निर्माण नव्य-न्याय परम्परा में किया गया। इनके रचयिता हैं-

  1. गंगेश उपाध्याय- इनकी रचना ‘तत्व चिंतामणि’ है। यह नव्य-न्याय का आधारभूत ग्रंथ है।
  2. वर्द्धमान- यह गंगेश के पुत्र थे। इन्होने उदयन के ग्रंथो पर ‘न्याय-कुसुमांजली प्रकाश’ तथा गंगेश के ग्रंथो पर ‘तत्त्व चिंतामणि’ तथा वल्लभाचार्य के न्याय-लीलावती पर ‘प्रकाश’ नामक टीका लिखी।
  3. रघुनाथ शिरोमणि- इनका प्रमुख ग्रंथ गंगेश के ‘तत्त्व-चिंतामणि’ पर दीधिति टीका है। इनका काल 16वीं शताब्दी माना गया है।
  4. मथुरानाथ- इनका समय भी 16वीं शताब्दी माना जाता है। इन्होने ‘तत्व चिंतामणि आलोक दीधिति’, ‘किरणावली प्रकाश’ एवं ‘न्याय-लीलावति प्रकाश’ पर रहस्य टीकाएँ लिखी। जगदीशभट्टाचार्य- इनका समय 17वीं शताब्दी माना गया है। इनकी प्रमुख रचना ‘दीधिति की एक वृहत्त्र व्याख्या है, जिसे ‘गादाधारी’ की नाम से जानते है।
  5. विश्वनाथ पंचानन- ‘न्याय सिद्धांत मुक्तावली’ कारिकावली’ इनकी रचनाएँ है। न्यायसूत्र पाँच अध्यायों में विभक्त है, प्रत्येक अध्याय दो आन्हिकों में विभक्त है। इनमें षोड्श पदार्थों के लक्षणों को परिभाषित किया गया है। प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह स्थान इन तत्वों को जान लेने से मोक्षकी प्राप्ति सुलभ हो जाती है।

वैशेषिक दर्शन 

इसे कणाद दर्शन भी कहते है क्योंकि कणाद उलूक नामक ऋषि के कुल में उत्पन्न हुए थे। स्वयं भगवान् ने उलूक रूप में अवतीर्ण हो इन्हे पदार्थ का ज्ञान कराया था। विशेष नामक पदार्थ की विशिष्ट कल्पना के कारण इसेवैशेषिक संज्ञा प्राप्त हुई है। इस दर्शन के आचार्य है-   रावण-भाष्य-यह भाष्य ‘अद्यावधि’ अप्राप्य है।

प्रशस्तपाद-इनका ‘पदार्थधर्म-संग्रह’ वैशेषिक तत्वों के निरूपण के लिए अत्यन्त मौलिक रचना है इसे प्रशस्तपाद भाष्य कहते हैं। इस पर आधारित कई टीकाए व टीकाकार हैं-

  1. व्योमशिवाचार्य- प्रशस्तपाद भाष्य पर इनकी टीका ‘व्योमवती’ है।
  2. उदयनाचार्य- इनकी टीका किरणावली है।
  3. श्री धराचार्य- ‘न्याय कन्दली’ नामक टीका 911 ई. में लिखी।
  4. श्री वत्स– ‘न्याय लीलावती’ इनकी टीका है।
  5. वल्लभाचार्य- इनकी टीका ‘न्याय-लीलावती’ ‘किरणावली’ के समान प्रसिद्ध है इनका काल 12 वी शताब्दी का था।
  6. पद्मनाभ मिश्र – इनकी टीका का नाम ‘सेतु’ है।
  7. शंकर मिश्र- इनके ग्रंथ का नाम ‘कणाद-रहस्य’ है।
  8. जगदीश भट्टचार्य- इनकी टीका ‘सूक्ति’ है।
  9. मल्लिनाथ सूरी- इनकी टीका – ‘प्रशस्तभाष्य निकष’ है।
  10. शिवादित्य मिश्र- इनकी रचना ‘सप्तपदाथ्र्ाी’ है। इसकी रचना 12वीं शताब्दी से पूर्व हुई है।
  11. विश्वनाथ न्याय पंचानन- इनका समय 17वीं शताब्दी का था।

इनका सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘तर्क-संग्रह’ है। वैशेषिक-दर्शन दस अध्यायों में विभक्त है। इन सभी अध्यायों को मिलाकर 370 सूत्र है। पदार्थों के भेदों को बोधकवैशेषिक होता है। हेय, हेतु, हान तथा हानोपाथ इन चारों प्रतिपाद्य विषयों को समझने के लिये छ: पदार्थ वैशेषिक दर्शन में माने गये है। धर्म विशेष से उत्पन्न हुआ जो द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय पदार्थों का साधम्र्य और वैधम्र्य से तत्त्वज्ञान उससे मोक्ष होता है। द्रव्य, गुण, कर्म मुख्य पदार्थ है। इनसे प्रयोजन सिद्ध होता है शेष पदार्थ केवल शब्द व्यवहार के ही उपयोगी है। द्रव्य नौ प्रकार के हैं-

  1. द्रव्य-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन। क्रिया के गुणवत् समवायकारण ही ही द्रव्य का लक्षण है।
  2. गुण- द्रव्य का आश्रय गुण है जो संयोग विभाग के कारण से होता है। गुणों की संख्या चौबीस है- रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरूत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार।
  3. कर्म- चलना रूप कर्म है, यह उत्क्षेपण-अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, गमन आदि है।
  4. सामान्य- किसी अर्थ की जो जाति किस्म है वह सामान्य है सामान्य के दो भेद हैं पर व अपर। एक व्यापक जाति जिसकी अवान्तर जातियाँ और भी हो, जैसे वृक्षत्व पर सामान्य तथा अवान्तर जैसे आम्रत्व अपर सामान्य कहलाती है।
  5. विशेष- ऐसा पदार्थ जो पहचान का निमित्त है, वही विशेष पदार्थ है। विशेष पदार्थ है। विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग-ये गुणों के पर्व है
  6. समवाय- जहॉं गुण-गुणी का सम्बन्ध, वहां सम्बन्ध को समवाय कहते है। ऐसे सम्बन्धो को संयोग भी कहते है। वैशेषिक प्रयत्न और अनुमान दो प्रमाणों को स्वतंत्र मानता है, उपमान व शब्द को अनुमान के अंतर्गत स्वीकार है।

सांख्यदर्शन 

सांख्यदर्शन में छ: अध्याय माने जाते है। तथा 527 सूत्र है। यह दर्शन आत्मा का ज्ञान कराता है तथा प्रकृति और चौबीस तत्त्वों का विवेचन करता है। इसलिये इसे सांख्य कहा गया है। 2 यहाँ संख्या की प्रधानता रहती है इसलिये इसे सांख्य दर्शन कहते है। सांख्य-दर्शन के मुख्य आचार्य निम्न है-मान्यतानुसार महामुनि कपिल सांख्य के प्रथम आचार्य माने जाते है।

  1. आसुरि- ‘अज्ञातनामा वाड्मय’ इनका ही है जो लुप्त है।
  2. पंचशिख- ‘भिक्षुसूत्र‘ सांख्यानुयायी भिक्षुओं के आचार के निदर्शन के लिए सांख्याचार्य पंचशिख द्वारा प्रणीत ग्रंथ है जो अब लुप्त हो चुका है।
  3. जैगीषव्य- अश्वघोष में बुद्धचरित (12/66) में प्राचीन आचार्य के रूप में इन्हें निर्देशित किया है। इनकी कोई भी रचना उपलब्ध नहीं है। 
  4. वार्षगण्य- इनकी कोई भी रचना प्राप्त नहीं है इनके निर्देश विभिन्न ग्रंथो में प्राप्त होते है।
  5. ईश्वरकृष्ण- इनकी रचना ‘सांख्यकारिका’ है।
  6. विन्ध्यवासी- इनका समय ईसा की चतुर्थ शताब्दी के अंतिम भाग से लेकर
  7. पंचम शताब्दी के मध्य तक माना जाता है। विभिन्न ग्रंथो में इनके निर्देश मिलते है।
  8. विज्ञानभिक्षु- इन्होंने ‘सांख्य-प्रवचन सूत्रों पर सांख्य प्रवचन भाष्य लिखा है तथा सांख्यसार नामक प्रकरण ग्रंथ भी लिखे है।
  9. भावगणेश-इन्होनें ‘तत्वसंग्रह’ पर ‘तत्वयाथाथ्र्यदपिन’ नामक व्याख्या ग्रंथ लिखे है।

सत्व, रज और तमो गुण की साम्यावस्था प्रकृति है। प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से पंचतन्मात्रायें और दोनों प्रकार की इन्द्रियॉ उत्पन्न होती है। तन्मात्राओं स्थूल-भूत उत्पन्न होते हैं इनके अतिरिक्त पुरूष पदार्थ को मिलाकर पच्चीस तत्वों का गण होता है। महत् नामक पहला कार्य मनन व्यापारवाला ‘मन’ है। महत् आदि के क्रम से पाँच भूतों की सृष्टि होती है। पृथ्वी, जल, तेज, आकाश व वायु पाँच तत्त्व है। अध्यवसाय (निश्चयात्मक वृित्त) बुद्धि है।  अभिमान वृित्त वाला अहंकार है। कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियो के साथ ग्यारहवा आंतरिक इन्द्रिय ‘मन’ है। कर्मेन्द्रियाँ- हाथ, पाँव, मुँह, गुदा, उपस्थ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ जैसे- श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण।

यहाँ तीन प्रमाण माने गये है- दोनों (बुद्धि और आत्मा) से एक (पुरुष) का अज्ञात अर्थ का निश्चय ‘प्रमा’ कहलाता है, उस (प्रमा) का जो अतिशय साधक है वह त्रिविध प्रमाण कहलाता है। जिस (विषय) के साथ सम्बद्ध होता हुआ उसी के आकार को ग्रहण करने वाना जो ‘विज्ञान’ है वही प्रत्यक्ष-प्रमाण है। व्याप्ति के ज्ञान से व्यापक का ज्ञान अनुमान व्याप्ति के ज्ञान से व्यापक का ज्ञान अनुमान प्रमाण है। आप्त का उपदेश शब्द प्रमाण है।

योगदर्शन

‘योगदर्शन’ पतंजलि का दर्शन है, जिसे राजयोग की संज्ञा मिली है पतंजलि ने इसे ही सजाकर अपने मौलिक विचारों के रूप में व्यवस्थित किया है।योग का अर्थ है जोड़ना अर्थात् से परमात्मा को जोड़ना।इससे सम्बद्ध साहित्य व रचनाकार है-

  1. हिरण्यगर्भ-’योगदर्शन’ के प्राचीन रचनाकार हिरण्यगर्भ को माना है।
  2. पतंजलि-’योगदर्शन’ पतंजलि का ही मौलिक ग्रंथ स्वीकारा गया है ये योग के प्रवर्त्तक, प्रचारक व संशोधक भी है। ‘योगसूत्र‘ के रचयिता पतंजलि ही है इस सूत्र की रचना विक्रमपूर्व द्वितीय शताब्दी में मानी गई है।
  3. वाचस्पति मिश्र- इनकी ‘तत्ववैशारदी’ रचना प्रसिद्ध है।
  4. विज्ञानभिक्षु- इनकी ‘योगवार्तिक’ रचना प्रसिद्ध है।
  5. भोजकृत – इनकी ‘राजमार्तण्ड’ रचना प्रसिद्ध है।
  6. भावागणेश- इनकी ‘वृित्त’ रचना प्रसिद्ध है।
  7. रामानंदयति- इनकी ‘मणिप्रभा’ रचना प्रसिद्ध है।
  8. अनंत पंडित- इनकी ‘योगचंन्द्रिका’ रचना प्रसिद्ध है।
  9. सदाशिवेन्द्र सरस्वती- इनकी ‘योगसुधारक’ रचना प्रसिद्ध है।

योगदर्शन में चार पाद व 195 सूत्र है। प्रत्यक्ष, अनुमाण व आप्त ये तीन प्रमाण सांख्यदर्शन की भाँति ही है। योग का अर्थ जोड़ना है अर्थात् आत्मा से परमात्मा को जोड़ना।

मीमांसा 

इसका अर्थ है विवेचन करना यह पूजार्थक मान धातु से जिज्ञासा अर्थ में मीमांसा शब्द निष्पन्न हुआ है। इसे पूर्व या कर्ममीमांसा भी कहते है। इसमें मंत्रो का विनियोग व आहुतियों को कर्म का विधान बतलाया है। यह एक प्रकार का नीतिशास्त्र भी है। इसकी रचना व रचनाकार है-

  1. महर्षि जैमिनी- इनकी रचना ‘मीमांसा सूत्र‘ है। ‘मीमांसासूत्र‘ के व्याख्याकार, भाष्यकार निम्न है।
  2. उपवर्ष- शबरस्वामी ने मींमासाभाष्य (1/1/5) में तथा शंकराचार्य ने ‘शारीरिकभाष्य (3/3/53)’ में इनके मतों का उल्लेख किया है।
  3. भवदास- भवदास ने पूर्वमींमासा के 16 अध्यायों में ‘वृित्तग्रंथ’ लिखा है।
  4. वृित्तकार- वृित्तकार का उल्लेख शबरभाष्य (1/1/5) में हुआ है।
  5. बौधायन- इन्होने पूर्व व उत्तरमींमासा सूत्रों पर टीका लिखी।
  6. कुमारिल भट्ट- यह मींमासा के पुनरूद्धारक माने जाते है ब्रह्मटीका, मध्यटीका व अन्य कई ग्रंथ है।

मीमांसा का अन्य भाग उत्तर मीमांसा अर्थात् वेदान्त दर्शन कहलाता है। पूर्वमीमांसा में छ: प्रमाणों का उल्लेख है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान अर्थापित्त एवं अनुपलब्धि। जिस अर्थ के बिना दृष्टा या श्रुत विषय की उपपित्त न हो अथापित्त किसी वस्तु के अभाव के साक्षात् ज्ञान को अनुपलब्धि प्रमाण कहते है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द व उपमान प्रमाण न्याय दर्शन जैसे है।

उत्तरमीमांसा या वेदान्तदर्शन

भारतीय अध्यात्मशास्त्र की सभी दार्शनिक प्रवृित्तयों और विचारधाराओं में वेदांतदर्शन सर्वश्रेष्ठ है। वेदान्त अर्थात् वेदों का अंत-उत्तर भाग जहाँ वेदों का सम्पूर्ण सार आ जाता है। ब्रह्मज्ञान ही सत्य और अनन्त है।

मनुष्य मात्र के लिए वेदों का सार अर्थात् जीव में ब्रह्मैक्य का सम्पादन है। वेदान्त का भव्य-प्रसाद जिन भित्तयों पर खड़ा है, वे तीन है- उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा गीता। वेदों का सार ही उपनिषद् में वर्णित है। सम्पूर्ण वेदान्त दर्शन में अविद्या की निवृित्त ही मोक्ष है वही ब्रह्म प्राप्ति हैं।

इस दर्शन में तीन प्रमाण है। प्रत्यक्ष, अनुमान व आगम। वस्तु से सम्बद्ध होता हुआ जो विज्ञान सम्बद्ध वस्तु का आकार धारण कर लेता है वह विज्ञान अर्थात् बुद्धिवृित्त ही प्रत्यक्ष प्रमाण है- प्रतिबन्ध या व्याप्ति को देखकर प्रतिबद्ध या व्याप्य का ज्ञान करना अनुमान है। प्रमाण आप्त पुरूष का उपदेश जो सभी अस्तिक दर्शनों में एक समान है। इस दर्शन के आचार्य व उनकी रचनाएँ है-

  1. श्री व्यासजी- इन्होने सर्वप्रथम उत्तरमीमांसा वेदांतदर्शन की रचना की है।
  2. बदरायण-’ब्रàसूत्र‘ की रचना की है जो वेदांतदार्शन का मूल ग्रंथ है।
  3. शंकराचार्य- इनका समय (788-820 ई.) का है इनका ‘शारीरिक भाष्य’ नामक रचना है व अद्वैतवाद की स्थापना की है।
  4. भास्कराचार्य- इनका भाष्य ‘भास्कर-भाष्य’ है इनका समय 1000 ई. का है।
  5. रामानुज- इनका समय 1140 ई. है ‘विशिष्टद्वैवावाद’ इनकी रचना है।
  6. माधवाचार्य- इनका समय 1238 ई. का है इन्होने द्वैतवाद मत की स्थापना की ‘पूर्णप्रज्ञा भाष्य’ इनका है।

नास्तिक दर्शन 

भारतीय दर्शन का वर्गीकरण को वर्गो में विभाजित किया गया है। (अ) आस्तिक दर्शन (ब) नास्तिक दर्शन। उपनिष्द् काल के तुरंत पश्चात् ही नास्तिक दर्शन का जन्म हुआ। नास्तिक दर्शन का क्रमबद्ध वर्णन है-

चार्वाक दर्शन

चार्वाक शब्द चर्व, धातु से बना है जिसका अर्थ है-’चबाना’ इसमें भोजन, पान, भोग प्रभृति का उपदेश दिया गया है।

चार्वी बुद्धि को कहते हैं और बुद्धि से सम्बद्ध होने के कारण इस आचार्य को चार्वी या चार्वाक कहते है। चार्वाक के अनुसार जब आत्मा है ही नही तो फिर परलोक, पुनर्जन्म धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य की मान्यता कैसी? इसलिए जब तक जीवन है, मनुष्य को सुखपूर्वक जीना चाहिए। मृत्यु के पश्चात मनुष्य जीवन धारण नही करता। चार्वाक एकमात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानता है।

चार्वाक दर्शन के साहित्य- ब्रर्हस्पत्य सूत्र ही चार्वाक दर्शन के सर्वस्व है। हरिभद्र सूरिरचित षड़्दर्शनसमुच्चय में भी चार्वाक की चर्चा आई है। इसमें चार्वाक दर्शन की कल्पना है तथा आठ श्लोकों में इस साहित्य का विवरण प्रस्तुत किया गया है। माधवाचार्य का सर्वदर्शन संग्रह जिसमें चार्वाक दर्शन के प्राय: सभी तथ्यों को संकलित करने की चेष्टा की गई है।

जैनदर्शन

जिन लोगो द्वारा प्रविर्त्तत धर्म और दर्शन का नाम जैन है। ‘जि’ जये धातु से नक् (उणादि) प्रत्यय लगकर ‘जिन’ शब्द का निर्माण हुआ है इसी जिन शब्द का विशेषण ‘जैन’ हुआ। यह दर्शन वस्तुवादी तथा बहुसत्तावादी है। इनके अनुसार जिन द्रव्यों को हम देखते है वे जीव और अजीव दोनों है। जैनदर्शन स्याद्वाद को अत्यधिक महत्व देता है। मोक्षतत्व के लिए दुद्गल से वियोग ही मोक्ष माना गया है। अन्य आस्तिक दर्शनों की तरह जैन दर्शन में भी प्रत्यक्षानुमान व शब्द प्रमाण स्वीकृत हुए हैं।जैन दर्शन में काल के आधार पर साहित्य तथा प्रर्वत्तक-

  1. आगमकाल– इस काल में श्वेतांबर एवं दिगंबरो के आगम साहित्य आते है। श्वेताम्बर मतानुसार प्रमुख ग्रंथ समवार्यांग, स्थानांग, नदी आदि। दिगम्बर मतानुसार प्रमुख गं्रथ कषायपाहुड़ महाबंध, नियमसार आदि। 
  2. अनेकांतस्थापनकार- इसमें सिद्धसेन व समंतभद्र दो मुख्य दार्शनिक हुए। सिद्धसेन की प्रमुख कृतियाँ है, सन्मति तर्क, न्यायावतार एवं बत्त्ाीसियां आदि। समंतभद्र की रचना आप्त-मीमांसा, युक्त्यनुशासन आदि।
  3. प्रमाणशास्त्र व्यवस्थाकाल- हरिभद्र नामक दर्शनिक के गं्रथ-षड्दर्शनसम्मूचय, अनेकांतजयपताका है व अकलंक के ग्रंथ- लघीस्त्रय, न्यायविनिश्चय, तत्वार्थवार्तिक आदि है।
  4. नवीनन्यायकाल- याशोविजय के ग्रंथ भाषारहस्य जैनतर्कभाषा, नयोपदेश, इनेकांतव्यवस्था आदि है।

बौद्ध-दर्शन

समाज में व्याप्त अंधविश्वास व रूढियों के विरूद्ध बौद्ध-दर्शन का उद्भव हुआ। यह ‘विज्ञान-प्रवाह’ को मानता है। वर्तमान मानसिक अवस्था का कारण पूर्ववती मानसिक अवस्था बताया गया है। बौद्ध-दर्शन के दो संप्रदाय माने गये है- हीनयान व महायान। यहाँ निर्वाण (मोक्ष) के लिये विवादों के प्रति उदासीनता, निराशावद, यथार्थवाद, व्यवहारवाद पर अधिक बल दिया। इसमें प्रमाण व्यवस्थावादी है। दिंगनाग ने ‘‘अज्ञातार्थज्ञापकता’’ के कारण ही दो प्रमेयों का प्रतिपादन किया है स्वलक्षण व सामान्यलक्षण। अत: इन दानों के लिए प्रमाण भी दो प्रकार के माने गये है- प्रत्यक्ष एवं अनुमान। प्रत्यक्ष का विषय स्वलक्षण है तथा अनुमान का विषय सामान्य लक्षण है। बौद्धदर्शन के सम्प्रदाय एवं शाखाओं के आधार पर ग्रंथ तथा गं्रथाकार विभाजित है-

  1. गौतमबुद्ध- बौद्ध-दर्शन के प्रर्ततक गौतक बुद्ध ही थे। इन्होंने अपने उपदेश पालि भाषा में लिखे है। 
  2. आनंद- इन्होंने ‘सुत्तपिटक’ का संकलन किया। 
  3. उपालि- इन्होंने ‘विनयपिटक’ का संकलन किया।
  4. नागार्जुन-’मूल माध्यमिक कारिका’ का संकलन किया।

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