न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ और परिभाषा एवं विशेषताएँ

By Bandey No comments
अनुक्रम

न्यायिक पुनरावलोकन न्यायालय की वह शक्ति होती है जिसके आधार पर संविधान की व्याख्या की जाती है और विधानपालिका, कार्यपालिका या प्रशासन के उन कार्यों को रद्द किया जाता है जो सर्वोच्च कानून अर्थात् संविधान के विरुद्व पाए जाते हैं। डिमॉक और डिमॉक के शब्दों में, न्यायिक पुनरावलोकन न्यायलयों की ओर से उन मुकदमों से किया जाने वाला परीक्षण है जो वास्तव में वैधानिक अधिनियमों और कार्यकारिणी या प्रशासनिक कार्यों से उनके सामने होते हैं और यह निर्णय करने के लिए है कि उनका लिखित संविधान के द्वारा निषेध किया गया है या इसको दी शक्तियों से अधिक है कि नहीं। लिखित संविधान की न्यायालय की ओर से व्याख्या करने के पश्चात् यदि यह पाया जाता है कि कोई कानून या कानून का कोई भाग संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन करता है तो उस कानून या उस कानून के किसी भाग को न्यायालय असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर देता है। साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि न्यायिक पुनरावलोकन न्यायालय की शक्ति है जिसके द्वारा यह:

  1. विधानपालिका और कार्यपालिका के कानूनों का पुनर्निरीक्षण करता है, केवल उन मुकदमों में जो इसके सामने आते हैं।
  2. कानूनों की संवैधानिक वैधता का निर्धारण करता है।
  3. उस कानून या इसके किसी भाग को रद्द कर देता है जो असंवैधानिक या संविधान के विरुद्व पाया जाता है।

न्यायिक पुनरावलोकन स्वचालित नहीं होता है। न्यायालय अपने-आप न्यायिक पुनन्र्यायिक नहीं कर सकता। इस शक्ति का प्रयोग न्यायालय द्वारा तब ही किया जा सकता है जब किसी मुकदमे के दौरान या किसी विशेष मुकदमे के द्वारा किसी कानून को उसके सामने चुनौती दी जाती है। इससे आगे, यदि न्यायालय किसी कानून या इसके किसी भाग को रद्द करता है, तो निर्णय, निर्णय देने की तिथि से लागू हो जाता है तथा पिछली समस्त कार्यवाही जो इस कानून के आधार पर की जा चुकी हो रद्द नहीं होती। जब न्यायालय किसी कानून को गैर-संवैधानिक घोषित करके रद्द करता है तो उसको यह स्पष्ट करना पड़ता है कि इस कानून ने किस संवैधानिक अनुच्छेद का उल्लंघन किया है। न्यायालय को कानून को रद्द करने के कारणों को भी स्पष्ट करना होता है। इस शक्ति का प्रयोग करके, वैधनिक और कार्यकारिणी के अनावश्यक और आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप के विरुद्व लोगों के मौलिक अधिकारों और संविधान की सुरक्षा और व्याख्या करने का कर्त्तव्य न्यायालय निभाता हैं।

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की उत्पत्ति को समझाते हुए, जस्टिस पी. बी. मुखर्जी ने स्पष्ट किया, भारत में यह संविधान ही है जो सर्वोच्च है और संसद के साथ-साथ राज्य विधान सभाओं को न केवल संविधान की सातवीं सूची में दर्ज तीन सूचियों में वर्णित उन संबंधित क्षेत्रों की सीमाओं के अंदर ही कार्य करना होता है, बल्कि इसके साथ-साथ संविधान के भाग III के अधीन दिए गए मौलिक अधिकारों को दी गई संवैधानिक सुरक्षा को विश्वसनीय बनाना होता है। न्यायालय किसी भी ऐसे कानून को रद्द कर देती हैं जोकि संविधान का उल्लंघन करने का दोषी पाया जाता है।

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन का संवैधानिक आधार

संविधान का कोई भी एक अनुच्छेद न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन की व्याख्या नहीं करता। इसकी संवैधनिक स्थिति और विधि अनुवूफलता उन व्यवस्थाओं से उत्पन्न होती है जो यह घोषित करती है कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून है और संविधान की सुरक्षा और व्याख्या करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय के पास है। संविधान के कई अनुच्छेद न्यायिक पुनरावलोकन संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं:

  1. अनुच्छेद 13 (Article 13)–यह अनुच्छेद न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति को आधर प्रदान करता है। इसमें लिखा गया है : फ्राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो भाग III के द्वारा दिए अधिकारों को वापस लेता या कम करता हो और इस अनुच्छेद के उल्लंघन में बनाया कानून विरोध के कारण रद्द हो जाएगा। दूसरे शब्दों में यह निर्धारित करता है कि कानून, जौ मौलिक अधिकारों के विरुद्व हैं, रद्द किए जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के पास उनकी संवैधानिकता का निर्णय करने की शक्ति है।
  2. अनुच्छेद 32 (Article 32)–यह अनुच्छेद संविधान के भाग III में दिए मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच करने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करता है।
  3. अनुच्छेद 131 और 132 (Article 131 & 132)–यह दो अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक और अपीलीय अधिकार-क्षेत्रों का क्रमवार वर्णन करते हैं। इसमें केन्द्र-राज्य झगड़ों से निपटने, राज्यों के मध्य झगड़ों को निपटने की शक्ति और संविधान की व्याख्या करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति शामिल है। इन शक्तियों का प्रयोग करते समय, सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करता है।
  4. अनुच्छेद 226 (Article 226)–अनुच्छेद 226 राज्य उच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग का आधार प्रदान करता है जो संविधान के भाग iii की ओर से दिए लोगों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रयोग की जाती है।
  5. अनुच्छेद 246 (Article 246)–अनुच्छेद 246 के अधीन संघ और राज्यों में वैधानिक शक्तियों का विभाजन किया गया है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय को संघ-राज्य झगड़ों के सभी मुकद्दमों का निर्ण करने की शक्ति दी गई है जो उनके बीच शक्तियों के विभाजन के संबंध में पैदा होतो हैं, यह अनुच्छेद भी न्यायिक पुनरावलोकन को आधार प्रदान करता है।
  6. अनुच्छेद 124 (6) और 219 (Article 124 (6) & 219)–इन अनुच्छेदों के अधीन, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को क्रमवार कानून के द्वारा स्थापित संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ उठानी पड़ती है।

इन सभी विशेष लोगों ने न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति को आधार प्रदान किया जाता है। डॉ एस सी डैश के शब्दों में, न्यायपालिका का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह संविधान को विधानपालिका और कार्यपालिका के आक्रमणों के विरुद्व सर्वोच्च रखे…। यह सभी अनुच्छेद भारत में न्यायालयों के न्यायिक पुनरावलोकन की कानूनी और संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्त संविधान की कई अन्य विशेषताएँ भी न्यायालयों के न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति को आधार प्रदान करती हैं।

  1. सीमित सरकार का सिद्वान्त–संविधान स्पष्ट रूप में सरकार की शक्तियों को परिभाषित करता है। सरकार केवल परिभाषित शक्तियों का ही प्रयोग कर सकती है और असीमित शक्तियां नहीं। सरकार का कोई अंग अपने निर्धारित अधिकार-क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकता। यह देखना न्यायालयों का उत्तरदायित्व होता है कि सरकार और इसका प्रत्येक अंग संविधान के द्वारा परिभाषित अधिकार क्षेत्र के अंदर ही कार्य करें और यदि इस सिद्वान्त का उल्लंघन हो तो न्यायालय उल्लंघन करने वाले कार्य को रद्द कर सकते हैं।
  2. संघवाद–संघीय प्रणाली में, न्यायपालिका के पास अतिरिक्त उत्तरदायित्व अर्थात् संविधान की सर्वोच्चता की सुरक्षा करना होता है और संघ व राज्य सरकारों द्वारा अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों से बाहर जाने पर प्रतिबन्ध भी होता है। इसके लिए भी न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का न्यायालय के द्वारा प्रयोग अनिवार्य हो जाता है।
  3. लिखित अधिकार–जब कभी संविधान लोगों के लिए लिखित तथा कानून द्वारा लागू करने योग्य अधिकारों की व्यवस्था करता है तो न्यायिक पुनरावलोकन की नींव रखता है। न्यायालयों को इन अधिकारों को लागू करने और इनकी सुरक्षा करने की शक्ति मिल जाती है। भारत में संविधान में लिखित अधिकारों का बिल संवैधानिक उपचारों के अधिकार सहित शामिल है जो संविधान की मौलिक संरचना का एक भाग है। इसके लिए यह न्यायिक पुनरावलोकन प्रदान करता है।
  4. न्यायपालिका की ओर से न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग–1950 में संविधान के लागू होने के पश्चात् से आज तक भारत में न्यायपालिका निरन्तर न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग करती आ रही है। इसने इस शक्ति को विधानपालिका और कार्यपालिक के कई कानूनों/आदेशों को रद्द करने केलिए प्रयोग किया जिनको इसने असंवैधानिक पाया। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय जो इन मुकदमों में दिए गए-गोपालन मुकद्दमा, गोलकनाथ मुकदमा, केशवानंदा भारती मुकदमा, मिनर्वा मिलष मुकदमा और कई अन्यों में भारत में न्यायिक पुनरावलोकन के कापफी प्रमाण मिलते हैं और इसकी मान्यता सरकार और लोगों की ओर से मिलती है।
  5. 42वें और 43वें संशोधन–42वें और 43वें संशोधन ने न्यायिक पुनर्निरीक्षण प्रणाली की संवैधानिक उचित को शक्तिशाली किया है। 42वें संशोधन अधिनियम के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और राज्य उच्च न्यायालयों की न्यायिक पुनरावलोकन शक्तियों पर कोई प्रतिबन्ध लगाए गए और 43वें संशोध्न अधिनियम के द्वारा यह प्रतिबन्ध हटा दिया गए। इस प्रक्रिया में, न्यायिक पुनरावलोकन की प्रणाली को भारतीय संवैधनिक प्रणाली के मूल्यवान और अभिन्न भाग के रूप में मान्यता मिली है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पास विधानपालिका और कार्यपालिका के कानूनों/आदेशों/नियमों की संवैधानिक उचितता का निरीक्षण करने की शक्ति है और इस शक्ति को न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति कहा जाता है।

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की विशेषताएँ

भारत में न्यायिक पुनरावलोकन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ हैं:

  1. सर्वोच्च न्यायालय और राज्य उच्च न्यायालयों दोनों न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करते हैं, परन्तु किसी कानून के संवैधानिक औचित्य का निर्णय करने की अंतिम शक्ति भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
  2. सभी संघीय और राज्य कानूनों, कार्यपालिक आदेशों और संवैधानिक संशोधनों के संबंध में न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है।
  3. संविधान की 9वीं सूची में दर्ज अधिनियमों के संबंध में न्यायिक पुनरावलोकन नहीं किया जा सकता।
  4. न्यायिक पुनरावलोकन स्वचालित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय कानूनों पर न्यायिक पुनरावलोकन करने की कार्यवाही स्वयं अपने आप नहीं रकता। यह तब ही कार्यवाही करता है जब कानूनों को इसके सामने चुनौती दी जाती है जब किसी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान किसी कानून के संवैधानिक औचित्य का प्रश्न इसके सामने उठाया जाता है।
  5. सर्वोच्च न्यायालय चुनौती दिए कानूनों/आदेशों के पुनर्निरीक्षण के पश्चात् यह निर्णय कर सकती है: (i) कानून संवैधानिक रूप में उचित है। इस मामले में कानून पहले की तरह लागू रहता है, अथवा (ii) कानून संवैधानिक रूप में अनुचित है। इस संबध में कानून निर्णय की तिथि से लागू होना बंद हो जाता है, अथवा (iii) कानून के केवल कुछ भाग या एक भाग अनुचित है। इस स्थिति में केवल अनुचित भाग लागू नहीं रहता और दूसरे भाग लागू रहते हैं। परन्तु यदि अनुचित पाए भाग कानून के लिए इतने महत्वपूर्ण हों कि दूसरे भाग इनके बिना न लागू हो सवेंफ, तो समस्त कानून को ही अनुचित ठहराया जाता है और रद्द कर दिया जाता है।
  6. न्यायालय की ओर से असंवैधानिक और अयोग्य घोषणा करने के दिन से पहले कानून के आधार पर किए गए कार्य विद्यमान रहते हैं।
  7. सर्वोच्च न्यायालय अपने पहले निर्णयों में संशोधन कर सकता है या उनको रद्द कर सकता है।
  8. कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया बनाम कानून की उचित प्रक्रिया (Procedure Established by Law vs. Due Process of Law) : भारत में न्यायिक पुनरावलोकन जिस सिद्वान्त के आधार पर शासित किया जाता है वह है : कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रियाय् न कि कानून की उचित प्रक्रिया जो अमेरिका में लागू है। ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ के अधीन न्यायपालिका कानून की संवैधानिकता की परख करने के लिए दोहरी परीक्षा करती है। पहला, न्यायालय परख करता है कि क्या कानून बनाने के लिए संस्था ने प्राप्त शक्तियों की सीमाओं के अंदर कार्यवाही की है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य किया है अथवा नहीं। दूसरा, न्यायालय परख करता है कि क्या कानून प्राकृतिक न्याय के उद्देश्यों को पूर्ण करता है कि क्या यह एक उचित कानून है या नहीं। यदि कानून इन दोनों आधारों में से किसी एक पर भी पूरा नहीं उतरता तो इसको असंवैधानिक मान कर रद्द कर दिया जाता है। इससे विपरीत ‘कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के सिद्वान्त के अधीन जैसे भारत के संविधान में दर्ज किया गया है न्यायालय केवल यह तय करता है कि क्या कानून बनाने वाली संस्था ने संविधान के द्वारा दी गई शक्तियों के अनुसार कानून बनाया है और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है या नहीं। इस सिद्वान्त के अधीन न्यायिक पुनर्निरीक्षण का क्षेत्र ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ सिद्वान्त के अधीन क्षेत्र से सीमित होता है। ‘कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ अधीन, न्यायालय केवल कानून का पुनर्निरीक्षण यह निर्णय करने के लिए करता है कि क्या इसको संविधान के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बनाया गया है या नहीं, और इसके लिए इसका क्षेत्र सीमित होता है। गोपालन बनाम मद्रास राज्य मुकदमे में दोषी की ओर से यह तक्र दिया गया कि ‘कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ और ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ में कोई अन्तर नहीं होता। परन्तु भारत के अटारनी जनरल ने यह मत दिया कि कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया की गारंटी ‘योग्य विधानपालिका’ के द्वारा बनाए कानून के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया की सुरक्षा या अन्य कुछ नहीं। न्यायालय अटारनी जनरल की ओर से प्रकट किए गए विचार से सहमत हो गया। इस प्रकार भारत में न्यायालय उस समय ही कानून को रद्द घोषित कर सकता है जब वह पाए कि कानून बनाने वाली विधानपालिका ने उचित प्रक्रिया का प्रयोग कानून-निर्माण के समय नहीं किया था। परन्तु वास्तविक व्यवहार में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के औचित्य का निर्णय करने के लिए बहुत बार कानूनों ने औचित्य की जांच व्यापक रूप में की है। इसने कभी भी संवैधानिक संशोधनों या कानूनों के द्वारा मौलिक अधिकारों पर संसद की ओर से लगाए प्रतिबन्धों के औचित्य का पुनर्निरीक्षण करने में झिझक नहीं दिखाई। ‘कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का पालन करते हुए और ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ को रद्द करते हुए भारतीय संविधान न्यायिक सर्वोच्चता और संसदीय प्रभुसत्ता के दोनों सिद्वान्तों को रद्द करता है जैसे यह क्रमवार अमरीका और इंग्लैण्ड में प्रचलित हैं। यह केवल मध्य मार्ग ग्रहण करता है। विधानपालिका के पास सर्वोच्चता है, परन्तु संविधान से प्राप्त क्षेत्र के संबंध में ही और इसका प्रयोग यह कानून के द्वारा स्थापित प्रक्रिया की सीमाओं के अंदर ही करती है।
  9. किसी कानून को रद्द घोषित करते हुए, सर्वोच्च न्यायलय को संविधान की उन व्यवस्थाओं/धाराओं जिनका कानून उल्लंघन करता है, के बारे स्पष्ट बतलाना होता है। इसको उस कानून की अवैधता और असंवैधनिकता को सिद्व करना होता है जिसको रद्द किया होता है।

न्यायिक पुनरावलोकन का आलोचनात्मक मूल्यांकन

कुछ आलोचकों ने न्यायायिक-पुनर्निरीक्षण के विरुद्व आपत्तियाँ उठाई हैं।

  1. अलोकतन्त्रीय-आलोचक न्यायिक पुनन्र्यायिक की प्रणाली को अलोकतन्त्रीय प्रणाली मानते हैं जो न्यायालय को राष्ट्रीय जनमत और लोगों की प्रभुसत्तापूर्ण इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली विधनपालिका की ओर से पास किए कानूनों के भाग्य का निर्णय करने के योग्य बनाती है।
  2. स्पष्टता की कमी–भारत का संविधान न्यायिक पुनरावलोकन की प्रणाली की स्पष्ट व्याख्या नहीं करता। यह शक्ति अधिकतर संविधान की कई धाराओं की व्याख्या पर गर्भित शक्तियों (Implied Powers) के सिद्वान्त पर निर्भर करती है।
  3. प्रशासनिक समस्याओं का श्रोत–यह प्रणाली समस्याओं का एक श्रोत रही है। जब किसी कानून या इसका किसी भाग/भागों को सर्वोच्च न्यायालय की ओर से असंवैधनिक घोषित करके रद्द किया जाता है तो निर्णय उस तिथि से लागू हो जाता है जिस दिन यह दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालयों की ओर से सुने जाते मुकदमे में जब किसी कानून की असंवैधानिकता का प्रश्न उठता है तो ही न्यायिक पुनर्निरीक्षण किया जाता है। कानून के लागू होने के 5 या 10 या अधिक वर्षों के पश्चात् अब ऐसा मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय के सामने आ सकता है। इस प्रकार जब न्यायालय इसको रद्द करता है तो यह प्रशासनिक समस्याएँ पैदा करता है। कई बार न्यायिक पुनरावलोकन एक समस्या समाधान करने से अधिक समस्याएँ पैदा कर देता है।
  4. प्रतिक्रियावादी–कई आलोचक न्यायिक पुनरावलोकन प्रणाली को प्रतिक्रियावादी प्रणाली समझते हैं। यह समझते हैं कि किसी कानून के संवैधानिक औचित्य का निर्णय करते समय, सर्वोच्च न्यायालय सामान्य रूप में कानूनी और रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाता है और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विधानपालिका की ओर से निर्मित प्रगतिशील कानून रद्द कर देता है। न्यायिक पुनरावलोकन, इस प्रकार विधानपालिका पर एक रूढ़िवादी रोक है।
  5. देरी करने वाली प्रणाली–न्यायिक पुनरावलोकन प्रणाली एक देरी और अकुशलता का एक श्रोत रही है। जब एक कानून अस्तित्व में आ जाता है तो कई बार लोग और विशेषकर कानून लागू करने वाली एजेंसियाँ धीरे चलने का निर्णय करती हैं या किसी कानून को लागू करने के संबंध में हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाती हैं। वह तब तक प्रतीक्षा करने को प्राथमिकता देती हैं जब तक सर्वोच्च न्यायालय अपने किसी मुकदमे में इसके संवैधानिक औचित्य का निर्णय नहीं कर लेता। न्यायिक पुनरावलोकन की प्रक्रिया अपने-आप में एक धीमी और देरी करने वाली प्रक्रिया है। इस प्रकार न्यायिक पुनरावलोकन देरी और अकुशलता का प्राय: एक श्रोत बनती है।
  6. संसद को गैर-उत्तरदायी बनाती है–आलोचक आगे तक्र देते हैं कि न्यायिक पुनरावलोकन की प्रणाली संसद को कई बार गैर-उत्तरदायी बनाती है क्योंकि यह किसी कानून को पास करते समय यह सोच लेती है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने-आप इसकी संवैधानिकता/औचित्य का निर्णय कर लेगा।
  7. न्यायिक निरंकुशता–सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ, संवैधनिक मुकदमा जो इसके सामने आता है, को सुनती है और साधारण बहुमत से इसका निर्णय करती है, बहुत बार इस ढंग से एक ही न्यायधीश का तक्र ही किसी उस कानून के भागय का निर्णय देता है जो प्रभुसत्ताधारी लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के बहुमत के द्वारा पास किया गया होता है।
  8. सर्वोच्च न्यायालय की ओर से अपने ही निर्णयों को परिवर्तित करना–यह देखा गया है कि कई अवसरों पर सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णयों को स्वयं ही रद्द कर देता है अथवा परिवर्तित कर देता है। गोलकनाथ मुकदमे में दिए निर्णय ने पहले निर्णयों को बदल दिया और केशवानंद भारती मुकदमे में निर्णय ने पहले वाली स्थिति पुन: स्थापित कर दी। उसने एक कानून को पहले उचित ठहराया, फिर इसे अनुचित ठहराया और फिर इसको उचित ठहराया। ऐसे परिवर्तन उसकी एक ही जैसे मुकदमों के संबंध में अलग-अलग पीठों के द्वारा और निर्णयों में व्यक्तिगत सोच के तत्त्व का प्रदर्शन करते हैं।
  9. न्यायालय के सम्मान पर तनाल का एक श्रोत–सर्वोच्च न्यायालय कई बार न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करते हुए राजनीतिक चर्चा का केन्द्र बन जाता है। गोलकनाथ मुकदमे के निर्णय के पश्चात् नाथ पाई बिल पर हुई संसद चर्चा ने स्पष्ट रूप में इस तथ्य को उभारा था। न्यायिक पुनरावलोकन न्यायालय के सम्मान के सम्मान को कम कर सकता है और इसको राजनीतिक चर्चा के अखाड़े में ला सकता है।
  10. न्यायपालिका और संसद के मध्य गतिरोधों की संभावना–जब सर्वोच्च न्यायालय किसी कानून को असंवैधानिक घोषित करके रद्द करता है, तो प्राय: संसद संविधान के संशोधन से या अन्य कानून बनाने के निर्णयों के द्वारा इस पर नियंत्रण करने का प्रयास करती है। इस प्रक्रिया में न्यायपालिका और संसद के मध्य गतिरोध और विवाद पैदा हो जाते हैं। मौलिक अधिकारों (भाग III) और राज्य नीति के निर्देशक सिद्वान्तों (भाग IV) के मध्य संबंधों के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय और संसद के दृष्टिकोणों और व्यवहार में अन्तर ने दोनों के मध्य गतिरोध उत्पन्न कर दिया था। ऐसे गतिरोध और विवाद भविष्य में भी उत्पन्न हो सकते हैं।

इन सभी आधारों पर आलोचकों ने भारत में चल रही न्यायिक पुनरावलोकन प्रणाली की आलोचना की है।

Leave a Reply