प्रबंधन प्रशिक्षण: अर्थ और आवश्यकता

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प्रबंधन प्रशिक्षण किसी भी व्यवसाय अथवा क्षेत्र में कार्यरत लोगों को अत्यधिक कुशल बनाने तथा नई व आधुनिक तकनीकों से अवगत कराने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। यह प्रशिक्षण सेवारत होता है, अर्थात् नौकरी करते हुए प्रशिक्षण। प्रबंधन के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। प्रबंधन प्रक्रिया से संबंधित सभी क्षेत्रों तथा कार्यो में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे प्रबंधक सही दिशा में सुचारू रूप से कार्य कर सके तथा किसी भी कठिनाईया दुरूह परिस्थिति में समस्या का समाधान कर सके।

प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकता

आज के तकनीकी युग में हर समय किसी न किसी समस्या से प्रबंधाकों को जूझना पड़ता है इसलिए प्रबंधन प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है। ये आवश्यकताए हैं, जैसे-परिवर्तन, विकास इत्यादि।

परिवर्तन-जीवन तथा विश्व के बदलते परिवेश में जहाँ, प्रतिदिन नित-नई तकनीके, समस्याएं तथा उनके समाधान, प्रक्रियाए आ रही हैं। प्रबंधन को इन सब बातों का ज्ञान होना आवश्यक है, प्रबंधन में, विशेष रूप से शिक्षा प्रबंधन में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है, अत: बदलते शिक्षण परिवेश में प्रबंधक का प्रशिक्षित होना एक आवश्यक योग्यता है।

विकास-प्रबंधन का मुख्य लक्ष्य किसी भी संस्था का सही दिशा में विकास करना है, प्रशिक्षित प्रबंधाकों द्वारा किसी भी संस्था को सफलता तथा गुणवत्ता के शिखर पर ले जाया जा सकता है, अत: प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकता है। स्टाफ में सामंजस्य बनाने तथा कर्मचारियों की व्यावसायिक तथा मानसिक कुशलताओं का पूर्ण उपयोग करने में भी प्रबंधन प्रशिक्षण आवश्यक है। समाज की आवश्यकता तथा शैक्षिक लक्ष्यों के सन्दर्भ में बालकों तथा अभिभावकों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों का नियोजन करने के लिए भी प्रबंधन प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

प्रशिक्षण (Training) शब्द को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है- किसी दिये गये कार्य को उचित ढंग से संपादित करने के लिये किसी व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण (अभिवृत्ति), ज्ञान, कौशल एक्रम् व्यवहार के र्कमबद्ध विकास का नाम प्रशिक्षण है।,

प्रशिक्षण और शिक्षा में अन्तर

ग्लैसर ने अपनी पुस्तक ‘प्रशिक्षण अनुसंधान एवं शिक्षा में मनोवैज्ञानिक अनुदेशन तकनीकी’ में यह संकेत किया है कि निम्नलिखित दो कसौटियों के आधार पर शिक्षा क्रम प्रशिक्षण में अन्तर किया जा सकता है-

  1. उद्धेश्य की विशिष्टता की मात्रा।
  2. व्यक्तिगत भेदों की अल्पता एवं अधिकता।

प्रशिक्षण के उद्धेश्य अति विशिष्ट होते हैं तथा भेदों को कम करने का प्रयास करते हैं। दूसरी ओर शैक्षिक उद्धेश्य अति सामान्य होते हैं, और व्यक्तिगत विभेदों को बढ़ावा देते हैं। जब लोगों को शिक्षित किया जाता है तो उनके मध्य अन्तर बढ़ता है, लेकिन जब प्रशिक्षित किया जाता है तो उनके मध्य का अन्तर कम होता है। दोनों में अन्तर है-

1. प्रकृति का अन्तर-शिक्षा जीवन के प्रत्येक कार्य के लिये आवश्यक ज्ञान तथा नैतिक मूल्यों के विकास से सम्बन्धित र्कियाओं पर अधिक बल देती है। प्रशिक्षण किसी कार्य के उचित सम्पादन के लिये आवश्यक विशिष्ट ज्ञान, अभिवृनि, कौशल एक्रम् व्यवहार के विकास पर बल देता है। प्रशिक्षण से व्यवहार एक कार्य से दूसरे कार्य के लिये अलग-अलग होते हैं। यदि हम किसी व्यक्ति को अध्यापक के रूप में प्रशिक्षित करते हैं तो हम उस व्यक्ति के कौशलों का विकास करते हैं, जो अच्छा अध्यापक होने के लिये आवश्यक है।

2. उद्धेश्य का अन्तर-शिक्षा का उद्धेश्य बच्चों एक्रम् प्रौढ़ों को ऐसी आवश्यक परिस्थितिया प्रदान करना है, जो उन्हें उन सामाजिक परम्पराओं एवं विचारों का बोध् कराए, जो उस समाज को प्रभावित करते हैं, दूसरी संस्कृति तथा प्राकृतिक नियमों का ज्ञान कराये तथा उनमें भाषायी ज्ञान एवं अन्य कौशलों को विकसित कर सके जोकि अधिगम तथा व्यक्तिगत विकास और सृजनात्मकता का आधार है। प्रशिक्षण का उद्धेश्य किसी व्यवसाय विशेष में निपुणता प्राप्त करना है, जिसके लिये व्यक्ति को प्रशिक्षित किया जाता है। प्रशिक्षित का सम्बन्ध जन अधिगम से होता है ताकि कार्य का सम्पादन उचित प्रकार से विशिष्टता के साथ किया जा सके।

प्रशिक्षण की आवश्यकता

किसी विशेष कार्य एवं व्यवसाय में प्रभावी रूप से कार्य करने के लिये प्रशिक्षण आवश्यक होता है। यदि किसी व्यक्ति को कुछ दिन के प्रशिक्षण के उपरान्त, किसी व्यवसाय में नियुक्त किया जाता है, तो वह व्यवसाय के लिये योग्य सिद्ध होता है। यदि किसी व्यक्ति को नियुक्ति के पूर्व किसी कार्य में प्रशिक्षित किया जाता है तो इसे पूर्व प्रशिक्षण की संज्ञा दी जाती है, जो बड़ा महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी व्यक्ति को बिना किसी प्रशिक्षण के किसी कार्य पर नियुक्त किया जाता है तो यह एक जोखिम भरा कार्य होता है, क्योंकि उसे यन्त्रों के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता है। जब एक व्यक्ति किसी कार्य में असफल हो जाता है तो उस कार्य के प्रति उसमें नकारात्मक अभिवृनि का उदय होता है, और वह उस कार्य के लिये योग्य नहीं है। प्रशिक्षण के उपरान्त उसे अपने कार्य में सफलता मिलती है तथा सन्तुष्टि प्राप्त होती है। सामान्यत: प्रशिक्षण की आवश्यकता है-

  1. कार्य को सफलतापूर्वक प्रभावी ढंग से सम्पादित करने के लिये।
  2. प्रशिक्षित व्यक्ति थोड़े समय में प्रभावी ढंग से सीख लेते हैं। अप्रशिक्षित व्यक्तियों की तुलना में एक व्यक्ति उन कार्यो को बिना प्रशिक्षण के सीख लेता है, जिनमें वह लगा हो।
  3. अति जटिल कार्यो के लिये विशिष्ट ज्ञान, अभिवृनि, कौशल एक्रम् व्यवहार की आवश्यकता होती है। इसलिये अधिक विशिष्टता के लिये प्रशिक्षण का महत्व बढ़ जाता है। यदि कोई व्यक्ति कार्य या व्यवसाय में ही सब कुछ सीखता हो तो उसमें जोखिम का खतरा बना रहता है, और उसके जीवन के लिये भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। प्रयास और त्रुटि का परिणाम समय और शक्ति की बर्बादी के रूप में होता है। प्रशिक्षण के द्वारा अध्यापक के प्रयत्नों को व्यर्थ जाने से बचाया जा सकता है।
  4. सुव्यवस्थित क्रम प्रणालीबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रम कम समय में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य का ज्ञान कराते हैं। यदि किसी कार्य के लिये विशिष्ट ज्ञान (Knowledge), प्रयोग (Application), कौशल (Skill) तथा व्यवहार (Behaviour) (KASB) की आवश्यकता नहीं है तो प्रशिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन प्रत्येक कार्य के लिए कुछ विशिष्ट ज्ञान, प्रयोग, कौशल और व्यवहार की आवश्यकता होती है। इसलिए प्रत्येक कार्य या व्यवसाय के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है।

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