प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ, भारत में प्रौढ़ शिक्षा का विकास

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प्रौढ़ शिक्षा को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे-सामाजिक शिक्षा, आधारभूत शिक्षा, ग्रामोपयोगी शिक्षा तथा जन समूह की शिक्षा। सबसे पहले प्रौढ़ शिक्षा का संकुचन पढ़ना-लिखना तथा गणित का सामान्य ज्ञान प्राप्त करना था, किन्तु वर्तमान समय में प्रौढ़ शिक्षा का यह संकीर्ण रूप समाप्त हो चुका है। अब प्रौढ़ शिक्षा का उद्धेश्य व्यक्ति के बौद्धिक विकास के साथ ही उसका सामाजिक विकास करना भी है। प्रौढ़ शिक्षा कोई भी रोजगार करने वाला व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। समाज शिक्षा के दो प्रकार हैं-

  1. औपचारिक शिक्षा,
  2. अनौपचारिक शिक्षा।

इस सम्बन्ध में महात्मा गाधी का विचार है कि-प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ जीवन से, जीवन द्वारा तथा जीवन भर की शिक्षा से है।

के. जी. सैयदेन के शब्दों में-प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ जीवन से, जीवन द्वारा तथा जीवन भर की शिक्षा निहित है।

प्रौढ़ शिक्षा की नवीन धारणा

स्वाधीनता प्राप्ति के उपरान्त प्रौढ़ शिक्षा की नवीन धरणा का उदय हुआ। सन् 1949 ई. में शिक्षा सलाहकार बोर्ड के अधिवेशन में उस समय के शिक्षा मंत्री श्री अबुल कलाम आजाद ने अपने वक्तव्य में सामाजिक शिक्षा को एक नवीन रूप प्रदान करते हुए बताया कि-प्रौढ़ शिक्षा का केवल लोगों को साक्षर बनाने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिये, जो कि प्रत्येक नागरिक को जनतन्त्रीय सामाजिक व्यवस्था में भाग लेने के लिए तैयार करें। इस समय से प्रौढ़ शिक्षा का परिवर्तन सामाजिक शिक्षा में हो गया। प्रौढ़ शिक्षा के अर्थ को स्पष्ट करते हुए डॉ. एन. एन. मुखर्जी के द्वारा प्रौढ़ शिक्षा के दो पहलू बतलाये गये हैं-

  1. प्रौढ़ साक्षरता अर्थात् उन प्रौढ़ों को शिक्षा प्रदान करना जिनको विद्यालय में किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं हुई, तथा
  2. साक्षर प्रौढ़ों को लगातार शिक्षा प्रदान करना।

सामाजिक अथवा प्रौढ़ शिक्षा के अन्तर्गत तीन बातें मुख्य रूप से परिलक्षित होती हैं-

  1. अनपढ़ को साक्षर बनाती है।
  2. सामाजिक शिक्षा वह शिक्षा है जो लोगों को नागरिकता के आधरों तथा कर्तव्यों का ज्ञान कराती है, तथा
  3. साहित्य कला के अभाव में शिक्षित मस्तिष्क का विकास करती है।

सामाजिक शिक्षा के उद्धेश्य

सामाजिक शिक्षा के उद्धेश्यों को दो वर्गो में विभाजित किया जा सकता है-

  1. सामाजिक उद्धेश्य,
  2. व्यक्तिगत उद्धेश्य।

(1) सामाजिक उद्धेश्य-प्रौढ़ों को समाज का उत्तम नागरिक बनाने के लिए सामाजिक शिक्षा उनमें निम्न गुणों को विकास करती है-

  1. सामाजिक शिक्षा लोगों में सामाजिक एकता की भावना का विकास करती है। हमारे देश में अनेक धर्मो, मतों तथा जातियों के लोग निवास करते हैं। यहा पर लोगों में जातिगत, ध्र्मगत तथा वर्गगत भेदभाव को व्यापक रूप से देखा जा सकता है। इसके साथ-साथ मजदूर-पूजीपति, गरीब तथा अमीर के बीच एक दूरी है। सामाजिक शिक्षा का मुख्य उद्धेश्य इस दूरी को समाप्त करना है।
  2. सामाजिक शिक्षा का एक अन्य उद्धेश्य शिक्षित व्यक्तियों का बौद्धिक विकास करके, राष्टं के साधनों की सुरक्षा तथा प्रगति करना है।
  3. सामाजिक शिक्षा का मुख्य उद्धेश्य लोगों में समाज कल्याण के लिए अपने स्वार्थो तथा हितों का त्याग करने की क्षमता का विकास करना है। इस भावना के द्वारा ही उत्तम समाज का निर्माण सम्भव है। सामाजिक शिक्षा के द्वारा ही नागरिक आदर्शो का समावेश होता है।
  4. राष्टींय साधनों की सुरक्षा तथा प्रगति अनेक वर्गो में एकता स्थापित करने के लिए सरकारी समुदायों तथा संस्थाओं एवं समुदायों के अन्तर्गत ही व्यक्ति अपनी सामूहिक समस्याओं को निर्मित कर सकता है। सामाजिक शिक्षा व्यक्ति को सहकारी संस्थानों तथा समुदायों को निर्मित करने में सहायता देती है। अत: सामाजिक शिक्षा का एक अन्य उद्धेश्य व्यक्ति में सहकारी संस्थाओं तथा समुदायों के निर्माण के लिए चेतना का विकास करना है, जिसमें समाज की उन्नति में सभी व्यक्ति अपना पूर्ण सहयोग दे सके।

(2) व्यक्तिगत उद्धेश्य-सामाजिक शिक्षा के व्यक्तिगत उद्धेश्य हैं-

  1. सामाजिक शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक कुशलता के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। सामाजिक शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति परस्पर सहयोग से मिल-जुलकर रहना सीखते हैं। पारिवारिक जीवन को सुखी बनाने की जानकारी व्यक्तियों को देती है। इसके साथ-साथ उन्हें वर्तमान समस्याओं का ज्ञान कराकर उनके समाधन के लिए उपाय बताती है।
  2. सामाजिक शिक्षा प्रौढ़ों के सांस्छतिक विकास में भी अपना योगदान करती है।
  3. कई व्यक्ति भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के फलस्वरूप औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते जिससे उनका मानसिक विकास रुक जाता है। सामाजिक शिक्षा द्वारा ऐसे व्यक्तियों का मानसिक विकास किया जाता है।
  4. सामाजिक शिक्षा का एक अन्य उद्धेश्य शारीरिक विकास भी करना है। यह शिक्षा उन व्यक्तियों को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों तथा रोगों के बचाव हेतु विधियों आदि का ज्ञान कराती है जिन्होंने औपचारिक शिक्षा समय पर प्राप्त नहीं की।

भारत में प्रौढ़ शिक्षा का विकास

पहले समाजिक शिक्षा को प्रौढ़ शिक्षा के नाम से जाना जाता था। भारत में प्रौढ़ शिक्षा या समाज के क्रमिक विकास तथा उन्नति का अध्ययन दो भागों में बाटकर सरलतापूर्वक किया जा सकता है-

  1. स्वतंत्रता से पूर्व प्रौढ़ शिक्षा का विकास,
  2. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में प्रौढ़ शिक्षा का विकास।

स्वतंत्रता से पूर्व प्रौढ़ शिक्षा का विकास

स्वतंत्रता से पूर्व प्रौढ़ शिक्षा की प्रगति-20वीं शताब्दी से 18 वर्षो तक भारत में प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। यद्यपि 20वीं शताब्दी के शुरू में हुए राष्टींय आन्दोलन ने समस्त भारतवासियों में देशप्रेम की भावना का विकास कर दिया था। इसी भावना से प्रेरित होकर देश के नेताओं ने अंग्रेज सरकार से राष्टींय शिक्षा की माग करते हुए समाज शिक्षा की आवश्यकता का अनुभव किया। सन् 1910 से प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रयास होने के पश्चात् भी सन् 1912 में इस शिक्षा के प्रसार के लिए कोई भी एक निश्चित योजना को क्रियान्वित नहीं किया गया। सन् 1910 से 1912 के बीच बड़ौदा में सन् 1910 में सबसे पहले सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित किये गये तथा सन् 1910 में ही मैसूर में ग्रामीण प्रौढ़ों के लिए रात्रि पाठशालायें प्रारम्भ की गयीं।

सन् 1919 से 1937 तक समाज शिक्षा की प्रगति-सन् 1919 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारतीयों को मतदान का अधिकार प्राप्त होने के बाद उनकी प्रौढ़ शिक्षा में रुचि उत्पन्न हो गयी, जिसके परिणामस्वरूप देश में प्रौढ़ शिक्षा के लिए अनेक कार्य किये गये। पंजाब, बंगाल, मध्य प्रान्त आदि प्रान्तों में अनेक रात्रि विद्यालयों की स्थापना की गयी। सन् 1919 में इस अधिनियम को क्रियान्वित किया गया और हस्तान्तरित विषयों को मन्त्रियों को सौंपा गया। शिक्षा विभाग इन मन्त्रियों के हाथ में आने के परिणामस्वरूप शिक्षा प्रसार के लिए अनेक कदम उठाये गये। सन् 1919 में पंजाब में ‘निरक्षरता निवारण आन्दोलन’ प्रारम्भ हुआ और रात्रि विद्यालय खोले गये। सन् 1921 में ही संयुक्त प्रान्त की सरकार ने 6 नगरपालिकाओं को रात्रि पाठशालाओं की स्थापना के लिए अनुदान दिया। सन् 1927 में समाज शिक्षा अभियान तेजी से चलता रहा, परन्तु सन् 1929 में विश्वव्यापी आर्थिक संकट के कारण समाज शिक्षा का कार्य ढीला पड़ गया। इस समय मुम्बई तथा पंजाब में ही प्रौढ़ शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित किया गया। सन् 1937 में प्रौढ़ शिक्षा विद्यालयों की कुल संख्या 2,207 थी। इनके अलावा 11 विद्यालय स्त्रियों के लिए थे।

सन् 1937 से 1947 तक प्रौढ़ शिक्षा-सन् 1937 में स्वायन शासन कांग्रेस मन्त्रिमण्डल के हाथ में आ गया था। कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने प्रौढ़ शिक्षा के विकास कार्यक्रम में बहुत मदद की। सन् 1939 में केन्द्रीय सरकार द्वारा वयस्क शिक्षा समिति की स्थापना की गयी। इस समिति के अमयक्ष डॉ. सैयद महमूद थे। सन् 1947 से पूर्व अर्थात् स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारत के विभिन्न प्रान्तों में, प्रौढ़ शिक्षा क्षेत्र में किये गये कार्यो का संक्षिप्त विवरण है-

  1. असम-असम के प्रौढ़ों को शिक्षित करने हेतु एक शिक्षा विभाग का गठन किया गया है। इस शिक्षा विभाग ने अपने अधीन कार्यालयों की मदद से निरक्षरता उन्मूलन तथा शिक्षा का प्रसार किया। सन् 1947 तक यहा 580 प्रौढ़ पाठशालायें हो गयी थीं।
  2. बंगाल-कांग्रेस के मन्त्रिमण्डलों ने सन् 1939 तक बंगाल में प्रौढ़ शिक्षा के लिए अनेक कदम उठाये। परन्तु सन् 1939 में इसकी गति अत्यधिक ध्ीमी हो गयी। प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार की गति मन्द होने के उपरान्त सन् 1947 तक यहा प्रौढ़ विद्यालयों की संख्या 417 थी।
  3. बिहार-कांग्रेस के मन्त्रिमण्डलों ने बिहार में प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार सबसे अधिक किया। बिहार में ‘परिवार शिक्षित बनाओ’ नामक आन्दोलन चलाया और बिहार के कई गावों में भी प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार के बहुत-सी बाधयें आने के बाद भी सन् 1947 तक यहा अनेक प्रौढ़ विद्यालय खोले गये।
  4. उत्तर प्रदेश-सन् 1930 में उनर प्रदेश की सरकार ने यहा प्रौढ़ शिक्षा विभाग की स्थापना की और अगले 18 वर्षो में स्त्रियों के लिए 62 प्रौढ़ विद्यालय एवं पुरुषों के लिए 100 प्रौढ़ विद्यालयों की स्थापना की। साथ ही 1,319 पुस्तकालयों की भी स्थापना की गयी। उनर प्रदेश में कांग्रेस मन्त्रिमण्डल के समय प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार तेजी से हुआ, इसके लिए अनेक केन्द्र स्थापित किये गये, परन्तु इन मन्त्रिमण्डलों के त्यागपत्र के बाद यह कार्य रुक गया। सन् 1947 तक उनर प्रदेश में कुल 9,825 प्रौढ़ विद्यालय थे।
  5. पंजाब-यहा प्रौढ़ शिक्षा के लिए कोई प्रशंसनीय कार्य नहीं किये गये। यहाँ पर सन् 1947 तक केवल 96 प्रौढ़ विद्यालयों की स्थापना की गयी।
  6. मुम्बई-सन् 1939 में बम्बई में प्रौढ़ शिक्षा परिषद् की स्थापना की गयी। इस परिषद् ने प्रौढ़ शिक्षा क्षेत्र में तीव्र गति से प्रयास किये। यहा प्रौढ़ों को शिक्षित बनाने के लिए फ्मुम्बई नगर वयस्क शिक्षा समिति का गठन किया गया। सन् 1938 में मुम्बई सरकार ने निरक्षरता की समाप्ति के लिए एक बोर्ड का गठन किया। सन् 1939 में प्रौढ़ शिक्षा की पद्धति बहुत धीमी हो गयी, क्योंकि कांग्रेस मन्त्रिमण्डल ने त्याग-पत्र दे दिया था। सन् 1947 तक मुम्बई में 2,740 प्रौढ़ विद्यालयों की स्थापना हो चुकी थी।

भारत में सन् 1947 तक 51,617 विद्यालयों की स्थापना की गयी थी। कांग्रेस मन्त्रिमण्डल ने अपने अल्प शासन काल में ही प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार के लिए प्रशंसनीय कार्य किये।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में प्रौढ़ शिक्षा का विकास

(क) प्रान्तीय शिक्षा मन्त्रियों का सम्मेलन-21 मई सन् 1948 में केन्द्रीय सरकार ने, निरक्षर प्रौढ़ों की शिक्षा हेतु अपनी बारह सूत्रीय योजना, प्रस्तुत की। सन् 1949 में दिल्ली में, प्रान्तीय शिक्षा मन्त्रियों का एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में 3 वर्ष के भीतर 12 वर्ष से 50 वर्ष तक की आयु वाले निरक्षरों में से कम-से-कम 50% प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा गया, परन्तु आर्थिक समस्याओं के कारण इस लक्ष्य की प्राप्ति न हो सकी।

(ख) समाज शिक्षा का पंचमुखी कार्यक्रम-भारत सरकार द्वारा समाज शिक्षा के लिए एक कार्यक्रम बनाया गया, जिसे पंचमुखी कार्यक्रम कहा जाता है। इस कार्यक्रम के उद्धेश्य हैं-

  1. समाज तथा व्यक्तियों का आवश्यकतानुसार स्वस्थ मनोरंजन का प्रबन्ध्।
  2. वयस्कों को आर्थिक उन्नति के लिए उद्योग-धन्धें की शिक्षा देना।
  3. स्वास्थ्य तथा शिक्षा से सम्बिन्ध्त नियमों की जानकारी देना।
  4. साक्षरता के लिए प्रयास करना।
  5. प्रौढ़ों में अधिकार तथा जागरूकता उत्पन्न करना।

(ग) प्रौढ़ शिक्षा समाज शिक्षा के रूप में-स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त प्रौढ़ शिक्षा को समाज शिक्षा के नाम से जाना गया। समाज शिक्षा का प्रमुख उद्धेश्य प्रौढ़ों को शिक्षित बनाने के साथ-ही-साथ उनको नागरिकता ही शिक्षा प्राप्त करना भी था।

हमारा देश एक प्रजातांत्रिक देश है। इस प्रजातांत्रिक देश में प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों का ज्ञान कराने तथा अनपढ़ व्यक्तियों को साक्षर बनाने के लिए समाज शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है। इस सम्बन्ध में कोठारी आयोग के अनुसार-प्रजातन्त्र में प्रौढ़ शिक्षा का कार्य प्रत्येक प्रौढ़ नागरिक को इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देना है कि जिससे वह वैयक्तिक तथा व्यावसायिक उन्नति द्वारा सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग ले सके।

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