ध्वनि परिवर्तन के कारण एवं दिशाएँ

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अनुक्रम

ऐतिहासिक ध्वनि विज्ञान के किसी भाषा की विभिन्न ध्वनियों के विकास का विभिन्न कालों में अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ हिंदी के संबंध में देखेंगे कि वह हिंदी में किन-किन स्रोतों (संस्कृत, प्राकृति, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली, अंग्रेजी आदि) से आया है, साथ ही यह भी देखेंगे कि हिंदी में विभिन्न कालों में इसका विकास किन-किन रूपों में हुआ है। अक्षर, सुर, बलाघात आदि का इतिहास भी इसी प्रकार देखा जाता है। ऐतिहासिक ध्वनि विज्ञान ध्वनियों के विकास का अध्ययन है। यहाँ ध्वनि परिवर्तन के कारण एवं उसकी दिशाओं का अध्ययन प्रस्तुत है।

ध्वनि परिवर्तन के कारण

सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के समान ही भाषा की ध्वनियों में भी सतत परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन के कारण ही भाषा का जीवंत रूप सामने आता है। ध्वनि-परिवर्तन या विकास जीवंत भाषा का प्रमुख लक्षण है। ध्वनि-परिवर्तन के कारण को दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं- (क) बाह्य कारण, (ख) आभ्यंतर कारण।

बाह्य कारण

ये कारण बाहर से ध्वनि को प्रभावित करते है। ध्वनि-परिवर्तन के बाह्य कारण मुख्यत: हैं-

  1. व्यक्तिगत भिन्नता-प्रत्येक व्यक्ति की वा¯गद्रिय तथा श्रवणेंद्रिय अन्य व्यक्ति से भिन्न होती हैं। एक व्यक्ति किसी ध्वनि को जिस प्रकार बोलता है, दूसरा व्यक्ति पूर्ण प्रयत्न करने पर भी वैसा नहीं बोल सकता है। वाग्यंत्र की भिन्नता के ही कारण किन्हीं दो व्यक्तियों के उच्चारण में पूर्ण समानता नहीं हो सकती है। यह भिन्नता कभी सामान्य होती है, तो कभी रेखांकन योग्य होती है यथा-अंग्रेज ‘तुम’ को टुम कहता है। हम बच्चे के मुख से रोटी को ‘लोटी’ और हाथी को ‘आती’ सुनते ही हैं। इस प्रकार वा¯गद्रिय भिन्नता और श्रवण की अपूर्णता से अनेक ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता है।
  2. भौगोलिक कारण-ध्वनि-उच्चारण पर भौगोलिक परिस्थिति का विशेष प्रभाव पड़ता है। एक भाषा की विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण भिन्न भौगोलिक वातावरण के दूसरे भाषा-भाषियों के द्वारा संभव नहीं है। शीत-प्रधन वातावरण के व्यक्ति प्राय: बातचीत में मुख सीमित खोलते हैं। इस कारण ऐसे वातावरण के व्यक्ति दंत्य ध्वनियों का स्पष्ट उच्चारण नहीं कर पाते हैं। वे प्राय: त, थ, द को क्रमश: ट, ठ, ड बोलते हैं। आवागमन के साधन से रहित या ऐसे शिथिल साधन वाले भौगोलिक भाग की भाषाओं में ध्वनि-परिवर्तन अत्यंत मंद होता है।, जबकि उर्वर, समतल, आवागमन से मुक्त भू-भाग की भाषाओं की ध्वनियों में सतत-तीव्र गति से परिवर्तन होता रहता है।
  3. सामाजिक परिस्थिति-सामाजिक उन्नति तथा अवनति का भाषा पर विशेष प्रभाव पड़ता हैं सामाजिक उन्नति पर भाषा का शुद्ध रूप प्रयुक्त होता है, तो अवनति पर उसके परिवर्तित रूप का ही अधिक प्रयोग होना स्वाभाविक है। इस प्रकार सामाजिक स्थिति के कारण शब्दों में ध्वनि-परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। यजमान > जजमान, फरोहित > उपरेहित, वियरिग > बैंरग, वाराणसी > बनारस।
  4. अन्य भाषाओं का प्रभाव-एक भाषा-क्षेत्र में जब किसी अन्य भाषा का प्रयोग होने लगता है, तो उनकी ध्वनियाँ वहाँ की भाषा को प्रभावित करती हैं। मुसलमानों के भारत आगमन के पश्चात अरबी तथा फारसी भाषा का यहाँ प्रयोग होने लगा है। अरबी-फारसी के प्रभाव से हिंदी में क, ख़्, ग़, ज़्, फ आदि ध्वनियाँ बोली तथा लिखी जाने लगी हैं। अंग्रेजी के प्रभाव से हिंदी में ऑ ध्वनि का प्रयोग होने लग गया  हैयथा-डॉक्टर, बॉल आदि।

आभ्यंतर कारण

ध्वनि-परिवर्तन के संबंध में वक्ता और श्रोता से संबंधित कारणों को आभ्यंतर या आंतरिक कारण कहते हैं। इस वर्ग के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  1. मुखसुख-इसे प्रयत्नलाघव भी कहते हैं। यह कारण उच्चारण सुविध से जुड़ा है। मनुष्य अल्प श्रम से अधिक से अधिक कार्य संपन्न करना चाहता है। इसी प्रवृत्ति के अनुसार मनुष्य कम से कम उच्चारण से स्पष्ट तथा प्रभावशाली अभिव्यक्ति करना चाहता है। ऐसे में उच्चारण-सुविध के अनुसार अनेक क्लिष्ट ध्वनियाँ सरल रूप में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रयत्न में अनेक प्रकार के ध्वनि-परिवर्तन होते हैं। मुख-सुख ध्वनि-परिवर्तन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण है। इसमें कभी आगम होता है, तो कभी लोप। समीकरण विषमीकरण, घोषीकरण तथा अघोषीकरण आदि परिवर्तन प्राय: मुख-मुख के कारण होते हैं।
  2. भावावेष-प्रेम, क्रोध आदि संदर्भों के भावावेश में उच्चरित शब्दों की ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता हैं प्राय: देखा गया है कि प्रेम और क्रोध में सीध नाम न लेकर उसे तोड़-मरोड़ कर प्रयोग किया जाता हैयथा-रामेश्वर > रामे, रामसुरा, रामसर या राम श्याम > शामू, शामुआ, शमुआँ, शामों।i
  3. अशिक्षा-अशिक्षा या अज्ञानता के कारण शब्दों का उचित ज्ञान नहीं होता, इससे उनकी ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति जब शब्दों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते, तब भी ध्वनि-परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार से होने वाले परिवर्तन है-गार्ड > गारद, कंपाउंडर > कंपोडर, टाइम > टेम।
  4. बोलने में शीघ्रता-शीघ्रता से बोलने के कारण भी शब्दों की ध्वनियों में परिवर्तन होता है। ऐसे में प्राय: शब्द की मध्य ध्वनियाँ लुप्त हो जाया करती है। इस प्रक्रिया में शब्दों की लम्बार्इ भी कम हो जाती है यथा-उपामयाय > ओझा > झा, भ्रातृजाया > भौजी, तब ही > तभी, कब ही > कभी। शीघ्र उच्चारण में कभी-कभी कुछ का कुछ हो जाता है। यथा-दाल-चावल > दावल चाल, दाल-भात > दात-भाल आदि।
  5. बलाघात-जब बाद की किसी विशेष ध्वनि पर बल दिया जाता है, तो श्वास का अधिकांश भाग उसी के उच्चारण में लगता है। इसके परिणामस्वरूप शेष ध्वनियाँ निर्बल हो जाती हैं। ऐसे में कुछ ध्वनियाँ लुप्त हो सकती हैं यथा-अभ्यंतर > भीतर, निम्ब > नीम, बिल्ब > बेल।
  6. कलागत स्वातंत्रय-काव्य-रचना में कवि शब्दों को तोड़-मरोड़ कर प्रयोग करता है क्योंकि उसे छंद के नियमों का पालन करना पड़ता है। जिसके कारण ध्वनि-परिवर्तन होता है यथा-सुग्रीव > सुग्रीवा, चरण > चरन, प्रमाद > प्रमादा, रघुराज > रघुरार्इ आदि।
  7. अनुकरण की अपूर्णता-भाषा अनुकरण के आधार से सीखी जाती है। जब किन्हीं कारणों से अनुकरण अपूर्ण होता है। तब ध्वनि में परिवर्तन हो जाता है यथा-कोर्ट साहब > कोट साहब, कानूनगो > कानी गोह, बंदूक, > दंबूक, लिफाफा। अनुकरण की अपूर्णता प्रमाद, आलस्य या लड़कपन के कारण होती है। बच्चों के उच्चारण में ऐसे परिवर्तन प्राय: देखने को मिलते हैं यथा-अमरूद > अरमूत, जलेबी > जबेली।
  8. सहजीकरण-दूसरी भाषा के कठिन शब्दों को सरल बनाने के लिए यदा-कदा उनकी ध्वनियों में परिवर्तन कर देते हैं यथा-टेकनीक + तकनीक, ट्रेजडी > त्रासदी, > ऐकडमी > अकादमी। ऐसे परिवर्तन से गृहीत (विदेशी) शब्दों में अपनी भाषा की सहजता आ जाती है।
  9. लिपि-दोष-लिपि की अपूर्णता के कारण भी शब्द का शुद्ध उच्चारण कठिन हो जाता है। ऐसे में ध्वनि-परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। अंग्रेजी की लिपि-रोमन के प्रभाव से गुप्त का गुप्ता, मिश्र का मिश्रा, राम का रामा, कृष्ण का कृष्णा उच्चारण हो गया है, क्योंकि अंग्रेजी में Éस्व और दीर्घ के भिन्न रूप नहीं है। किसी उच्चारण को आसान बनाने के लिए भी ध्वनि में परिवर्तन किया जाता है यथा-एकेडमी के लिए अकादमी, टैकनीक के लिए तकनीक।

ध्वनि परिवर्तन की दिशाएँ

सोस्युर के अनुसार ‘ध्वनि-परिवर्तन के कारणों की खोज करना भाषा-विज्ञान की सबसे कठिन समस्या है। 81 मुख्य बात यह है कि ध्वनि-परिवर्तन के जो कारण बताये गये हैं उनमें से कोई एक कारण परिवर्तन के जो कारण बताये गये हैं उनमें से कोई एक कारण परिवर्तन के लिए उत्तरदायी नहीं होता, वरन् एकाध्कि कारणों से परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होती है।

ध्वनि-परिवर्तन की दिशाओं का उल्लेख करते हुए निरुक्ताकार यास्क ने आदि शेष, आदि लोप, अनालोप, उपधा-परिवर्तन, वर्ण लोप, द्विवर्ण लोप, आदि- विपर्यय, अंतविपर्यय, अंतविपर्यय, आद्यन्त विपर्यय, अंतिम वर्ण-परिवर्तन, वर्णोपजन (वर्ण का आगम) आदि का उल्लेख किया है।

वामन जयादित्य के अनुसार 1. वर्णागम, 2. वर्ण विपर्यय, 3. वर्ण विकार, 4. वर्णनाश, 5. धतु का अर्थान्तर से योग ध्वनि-परिवर्तन की दिशाएँ हैं।

पतंजलि ने महाभाष में 1. वर्ण व्यत्यय, 2. वर्णनाश, 3. वर्णोपजन (वर्णागम), 4. वर्णविकार को ध्वनि-परिवर्तन के मार्ग निर्देशित किए हैं। स्पष्ट है कि ध्वनि-परिवर्तन के फलस्वरूप नई ध्वनियों का आगम, विद्यमान किसी ध्वनि का लोप, ध्वनि विकार, ध्वनि विपर्यय आदि घटित होता है। इसके फलस्वरूप एकाध्कि ध्वन्यात्मक विशेषताएँ प्रकट होकर पद के रूप में परिवर्तन उपस्थित कर देती हैं।

स्वर भक्ति

भाष्यकार उवट ने स्वर-भक्ति को स्वर का प्रकार कहा है-’स्वर भक्ति: स्वर प्रकार इत्यर्थ:।’ भक्ति शब्द भज् धातु से व्युत्पन्न है। भक्ति का अर्थ है ‘विभक्त करना’। विभाजन करना। जहाँ व्यंजन-गुच्छ या संयुक्त व्यंजन होता है। वहाँ उच्चारण में व्यवधन उपस्थित हो जाता है। इस व्यवधन को दूर करने के लिए संयुक्त व्यंजनों के बीच में “स्व स्वर का आगम होता है। इससे संयुक्त व्यंजन का प्रभाव विभक्त हो जाता है। इसे ही स्वर भक्ति कहा गया है। स्वर भक्ति दो प्रकार की होती है- 1. “स्व स्वर भक्ति, 2. दीर्घ स्वरभक्ति। डॉ. पिशले के अनुसार अर्धमागधी तथा अपभ्रंश में ‘अ’ का प्रयोग स्वरभक्ति रूप में आता है। उ और इ का स्वर भक्ति में विशेष रूप से प्रयोग मिलता है। आर्य < अरिय, पद्य > पदुम, पउम, प्राण > पराण।

आगम

आगम का अभिप्राय है किसी नयी ध्वनि का आगम। उच्चारण की सुकरता के लिए शब्द में अविद्यमान किसी ध्वनि का आगम किया जाता है। इसके कई रूप होते हैं- 1. आदि स्वरागम, 2. मध्य स्वरागम, 3. अंत्य स्वरागम।

(क) आदि स्वरागम- आदि स्वरागम को फरोहित, पूर्वहिति या Prothesis भी कहते हैं। उच्चारण-सौकर्य के लिए आदि में स्वर का आगम ही आदि स्वरागम है। पालि, प्राकृत और आधुनिक आर्य भाषाओं में इसके उदाहरण सुलभ हैं। ध्यातव्य है कि आदि स्वरागम सदा “स्व होता है। जैसे, स्तुति > अस्तुति, स्थिति > इस्थिति, स्कूल > इस्कूल, स्टेशन, स्थायी > अस्थायी, स्तबल > अस्तबल, प्लेटो > प्लातौन > अफलातून।

(ख) मध्य स्वरागम- संयुक्त व्यंजन को विभक्त कर सुविधपूर्वक उच्चारण के लिए जब शब्द के मध्य में स्वर का आगम होता है तो उसे मध्य स्वरागम कहते हैं। जैसे, लग्न > लगन, मग्न > मगन, धर्म > धरम, कर्म > करम, जन्म > जनम पर्व > परब, सूर्य > सूरज, भक्त > भगत आदि।

(ग) अन्त्य स्वरागम- जहाँ शब्द के अंत में स्वर का आगम होता है, वहाँ अंत्य स्वरागम मानते हैं। जैसे दवा > दवाई, पिय > पिया, पत्र > पतई, फरवा > फरवाई, खंभ > खंभा, agon > agony। स्वर की तरह ही उच्चारण की सुविध के लिए शब्द के आदि, मध्य और अंत में व्यंजन ध्वनियों का भी आगमन होता है। व्यंजन के आगम को व्यंजनागम कहते हैं।

(अ) आदि व्यंजनागम- आदि व्यंजनागम के उदाहरण अत्यल्प हैं। जैसे ओष्ठ > ओठ > होठ, उल्लास > हुलास, औरंगाबाद > नौरंगाबाद, अस्थि > हड्डी। भाषाशास्त्री यह बताने में अक्षम हैं कि अ के स्थान पर ‘ह’ का आदि आगम केसे हो जाता है।

(आ) मध्य व्यंजनागम- मध्य व्यंजनागम में शब्द के बीच में नया व्यंजन आ जाता है। जैसे ववानर या वननर > बन्दर, सुनरी > सुन्दरी, सुनर > सुन्दर, शाप > श्राप या सराप, समुद्र > समुन्दर, जेल > जेहल, सिख > सिक्ख, हमेशा > हरमेशा, डजन > दरजन, समन > सम्मन, लाश-लहास, टालटूल > टालमटोल आदि।

(इ) अन्त्य व्यंजनागम- शब्द के अन्त में व्यंजन का आ जाना अन्त्य व्यंजनागम है। जैसे जम्बु > जामुन, राध > रािध्का, परवा > परवाह, दरिया > दरियाव, भ्रू > भौंह, उमरा (अमीर का ब. व.) > उमराव, रंग > रंगत आदि।

(ई) अक्षरागम

आदि अक्षरागम-गुंजा > घुंघुधी।

मध्य अक्षरागम-खल > खरल, आलस > आलकस, डेढ़ा > डेवढ़ा

अन्त्य अक्षरागम-बधु > बधूटी, आँक > आँकड़ा, आँख > आँखड़ी, संदेस > संदेसड़ा।

लोप

उच्चारण की सुविध, मुख-सुख, बोलने में शीघ्रता अथवा स्वराघात आदि के प्रभाव से शब्द की कुछ ध्वनियों का लोप हो जाता है। इनके तीन प्रकार होते हैं- 1. स्वर लोप, 2. व्यंजन लोप, 3. अक्षर लोप।

1. स्वर लोप

(अ) आदि स्वर लोप- शब्द के आदि में ही स्वर का लुप्त हो जाना। जैसे उपायन > बायन, अभ्यंतर > भीतर, अरघट्ट > रघट्ट > रहट, अधेला > धेला, अहाता > हाता, अनाज > नाज, अमीर > मीर, अफसाना > फसाना, अगर > गर, अदिध्सु > दिध्सुत।

(आ) मध्य स्वर लोप- इनमें मध्य में स्वर का लोप हो जाता है। जैसे हरिद्रा > हरद, शाबाश > साबस, Do not > don’t।

(इ) अन्त्य स्वर लोप- जिसके अन्त में स्वर का लोप हो। जैसे गंगा > गंग, जाति > जात, शिला > सिल, परीक्षा > परख, रीति > रीत, बाहु > बाँह, इक्षु > ईख, विल्व > वेल, लघु > हल आदि।

2. व्यंजन

लोप शब्द के आदि, मध्य और अन्त में व्यंजनों का लोप मुख-सुख, स्वराघात आदि के लिए होता है।

(क) आदि व्यंजन लोप- जहाँ शब्द के आदि में व्यंजन विलुप्त हो जाए। जैसे स्फोटक > फोड़ा, बीबीजी > बीजी, स्नेह > नेह, स्थल > थल, स्थान > थान, श्मशान > मसान, स्थिर > थिर, स्तन > थन, स्थाली > थाली, स्फुर्ती > फुर्ती, स्कन्ध > कंध, Knife > nife, Knight > night आदि।

(ख) मध्य व्यंजन लोप- शब्द के मध्य में आने वाले व्यंजन का लुप्त हो जाना मध्य व्यंजन लोप कहलाता है। जैसे नाक कटा-नकटा, कायस्थ > कायथ, भूमिहार > भुंइहार, डाकिन > डाइन, गर्भिणी > गाभिन, संदेश > सनेस, > दुगुना > दूना, फाल्गुन > फागुन, उपवास > उपास, कार्तिक > कातिक, सूची > सुई, Tack टाक, walk वाक, Night नाइट, Right राइट, daughter डाटर।

(ग) अन्त्य व्यंजन लोप- इसमें शब्द के अन्तिम व्यंजन का लोप हो जाता है। यथा, अम्र > आम, > असह्य, धान्य > धन, सत्य > सत्, अग्नि > आग, दुहिता > िध्या, Bomb > बम आदि।

3. अक्षर लोप

आदि अक्षर लोप- त्रिशूल > शूल, अम्माँ > माँ, आदित्यवार > इतवार, उपाध्याय > झा, शहतूत > तूत, सरदारजी > दारजी, University > Varsity, नेकटाफुर्ती > टाई, बाइसायकिल > सायकिल आदि। मध्य अक्षर लोप- अग्रहायण > अगहन, पर्यंक ग्रंथि > पलत्थी, भाण्डागार > भंडार, बरुजीवी > बरई, राजकुल्य > राउल > राउर, दस्तखत > दसखत आदि। अन्त्य अक्षर लोप- पाश्र्व > पास, जीव > जी, निम्बुक > नीबू, कर्तरिका > कटारी, विज्ञप्तिका > विनती, माता > माँ, दीपवर्तिका > दीवट, भ्रतृजाया > भावज, कुजिका > कुजी, मौक्तिक > मोती, नीलमणि > नीलम, सपादिक > सवा, उष्ट्र > उँट आदि।

समाक्षर लोप- (Haplology) की स्थापना ब्लूमफील्ड ने की है, जिसके अनुसार एक ध्वनि या अक्षर साथ-साथ दो बार आयें तो एक का लोप हो जाता है। खरीददार > खरीदार, नाककटा > नकटा, स्वर्गगंगा > स्वर्गघ्गा। अ आ = आ, इ ई = ई, उ फ = फ मूलत: समाक्षर लोप के उदाहरण हैं। प्रत्ययों और उपसर्गों के विकास में इन सभी लोपों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

4. विपर्यय

विपर्यय का अर्थ है उलटना। कभी-कभी किसी शब्द के स्वर, व्यंजना या अक्षर का क्रम उच्चारण में उलट जाता हैं इसे विपर्यय कहते हैं। गलत अनुकरण और बोलने में क्षिप्रता के कारण विपर्यय की क्रिया होती हैं अर्थात् उच्चारण क्रम में उपर्युक्त कारणों से एक ध्वनि दूसरी ध्वनि के स्थान पर तथा दूसरी ध्वनि पहली के स्थान पर आ जाती हैं पास की ध्वनियाँ जब तक दूसरे का स्थान लेती हैं तो उसे पाश्र्ववर्ती विपर्यय कहते हैं और दूर की ध्वनियों में विपर्यय हो तो उसे दूरवर्ती विपर्यय कहते हैं। यथा, पहुँचना का पहुँपना, अमरूद का अरमूद, मतलब का मतबल आदि।

विपर्यय के विविध भेद हैं- स्वर विपर्यय, व्यंजन विपर्यय, एकांगी विपर्यय, आद्य शब्दांश विपर्यय।

(क) स्वर विपर्यय- (1) पाश्र्ववर्ती: जानवर > जनावर, जाँघ > जंघा, कुछ > कुछ, ससुराल > सुसराल, खुजली > खजुली आदि।  (2) दूरवर्ती- पागल > पगला, अम्लिका > इमली, बिंदु > बूँद, जनरल > जरनैल, अनुमान > उनमान।

(ख) व्यंजन विपर्यय- पाश्र्ववर्ती: चिन्ह > चिन्ह, ब्राह्मण > ब्राम्हण, ब्रह्म > ब्रम्ह, डेस्क > डेक्स, तमगा > तगमा, कीचड़ > आदि।

(2) दूरवर्ती- वाराणसी > बनारस, अमरूद > अरमूद, महराष्ट्र > मराठा। अक्षर विपर्यय-मतलब > मतबल, अनुकसान > नुस्कान, डूबना > बूड़ना, पिशाच > पिचाश, पहुँचना > चहुँपना, आदि।

(ग) एकांगी विपर्यय- वान्द्रिये के अनुसार जब कोई ध्वनिग्राम अपना स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर चला जाता है और उसका स्थान रिक्त रहता है, क्योंकि दूसरा ध्वनिग्राम उस स्थान पर नहीं आता तो उसे एकांगी विपर्यय कहा जाता हैं यथा, बिन्दु > बूँद (इ का लोप तथा उ का फ के रूप में स्थान-परिवर्तन) Debri > Drebi, Fresta > Festra, उल्का > लूका।

(घ) आद्य शब्दांश विपर्यय- इसके दो शब्दों के आदि अंश परिवर्तित हो जाते हैं। इसे ध्वनि सम्मिश्रण अथवा लाभान्वित विपर्यय भी कहते हैं। यथा, चावल दाल > चाल दावल > चौका-चूल्हा > चूला-चौका, समय बताने में पौने नौ का नौने पौ आदि।

5. समीकरण

समीकरण में दो ध्वनियाँ समीप रहने से सम हो जाती हैं। अर्थात् एक ध्वनि दूसरी ध्वनि को प्रभावित कर से अपना रूप दे देती हैं जैसे चक्र का चक्काऋ यहाँ क ध्वनि र् के प्रभावित या समीकृत कर क् बना लिया गया है। समीकरण बोलने की सुविध की दृष्टि से होता है। इसे सावण्र्य, सारूप्य, अनुरूपता या समीभवन भी कहा जाता है। इसके दो भोद हैं- 1. स्वर समीकरण, 2. व्यंजन समीकरण। इनके फरोगामी और पश्चगामी दो-दो और भेद होते हैं। इन्हें भी दूरवर्ती और पाश्र्ववर्ती दो वर्गों में बाँटा जाता है।

(क) स्वर समीकरण- जब समीकरण दो स्वरों में हो तो उसे फरोगामी और जब दूसरी ध्वनि पहली को प्रीवित करती है तो पश्चगामी समीकरण कहते हैं। जब ध्वनियाँ पास-पास हरती हैं तो पाश्र्ववर्ती और जब दूर-दूर रहती हैं तो दूरवर्ती कही जाती हैं।

पाश्ववर्ती फरोगामी स्वर समीकरण- आइए > आइउ, अउर > अउर।

दूरवर्ती फरोगामी स्वर समीकरण-खुपरी > खुरुपी, सूरज > सुरुज, जुल्म > जुलुम।

पाश्र्ववर्ती पश्चगामी समीकरण- कब अइलाह > कब अइलह।

दूरवर्ती पश्चगामी समीकरण- अँगुली > उँगली, आदमी > अदमी, इक्षु > उक्खु, असूया > उसूया।

(ख) व्यंजन समीकरण- जब समीकरण दो व्यंजनों में हो तो व्यंजन समीकरण कहलाता है। इसके भी फरोगामी, पश्चगामी और पाश्र्ववर्ती, दूरवर्ती भेद होते हैं।

पाश्र्ववर्ती फरोगामी व्यंजन समीकरण- बग्घी > बग्गी, निद्रा > नींद, चक्र > चक्क, पत्र > पत्त, पथ्य > पथ, फत्र > पूत, रात्रि > रात।

दूरवर्ती फरोगामी समीकरण- कचपच > कचकच, खटपट > खटखट, प्रजावती > प्रजपती > प्रजापति।

पाश्र्ववर्ती पश्चगामी समीकरण- दूर्वा > दूब, वार्ता > बात, शर्करा > शक्कर, उफर्ण > उफन, दुग्ध > दूध, वल्कल > बाकल, मुद्ग > मूँग, आध्सेर > आस्सेर, रात-दिन > राद्दिन, भातदाल > भाद्दाल।

दूरवर्ती पश्चगामी सण्मीकरण- खरकट > करकट, लकड़बग्घा > बकड़लग्गा। ध्वनि परिवर्तन के भौगालिक कारणों की भूमिका का उल्लेख कीजिए।

6. विषमीकरण

समीकरण का उलटा विषमकरण है। जब दो निकटस्थ समान ध्विनों में से एक बदल जाय तो उसे विषमीकरण कहते हैं। इसके भी स्वर और व्यंजन तथा फरोगामी-पश्चगामी भेद होते हैं।

(अ) स्वर विषमीकरण- (1) फरोगामी समीकरण : पुरुष > पुरिस (प्राकृत), तिलक > टिकली।

(2) पश्चगामी विषमीकरण- मुकुट > मउर, बकुल > बउर, नूफर > नेड्र।

(आ) व्यंजन विषमीकरण-1. फरोगामी व्यंजन विषमीकरण: काक > काग, कंकण > कंगन, लांगूसी > लंगूर, लाला > लार।

2. पश्चगामी विषमीकरण- नवनीत > लयनू, दरिद्र > दलिद्दर, शाबाश >

7. विकार

जब उच्चारण की सुविध के लिए एक ध्वनि दूसरी ध्वनि में परिवर्तित हो जाती है तो वह विकार कहलाती है। जैसे कृष्ण > कान्ह, मेघ > मेह, स्तन > थन, हस्त > हाथ, शाक > साग सम्बन्धित > समधी, गर्भिणी > गाभिन, क्षीर > क्षीर > खीर, सौभाग्य > सुहाग, मुख > मुँह।

विकार के कारण शब्दों के रूप में तो परिवर्तन होता ही है, उनके अर्थ में भी परिवर्तन हो जाता है। जैसे समधी वर-वधू के पिता को कहते हैं। क्षीर (दूध) और खीर (दूध चावल से बनी), गर्भिणी (स्त्री) और गाभिन (पशु), स्तन (स्त्री) और थन (पशु) आदि में रूप-परिवर्तन के साथ ही अर्थ-परिवर्तन भी हो गया है।

8. मात्रा-भेद

स्वराघात के प्रभाव से कभी-कभी “स्व ध्वनि दीर्घ और दीर्घ ध्वनि “स्व हो जाती है। इसे मात्रा-भेद कहते हैं। इसके कई भेद होते हैं।

1. “स्व से दीर्घ- अक्षत > आखत, चिÉ > चीन्हा, अंकुर > आँकुश, मिल > मील, स्कन्ध > कंध, हरिण > हिरना, जिà > जीभ, अद्य > आज, काग > कागा, लज्जा > लाज, कंटक > काँटा, प्रिय > पीव। 2. दीर्घ से स्व- आलाप > अलाप, आम्ररस > अमरस, नारंगी > नवरंगी, आमीर > अहीर, वानर > बन्दर, बादाम > बदाम, आश्चर्य > अचरल, पाताल > पताल आदि।

9. घोषीकरण

उच्चारण की सुविधा के लिए अघोष ध्वनियों को सघोष कर देना घोषीकरण है। यथा, शकुन > सगुन, मकर > मगर, कंकण > कंगन, एकादश > एगारह, सकल > सगल > सगरो, बापू > बाबू प्रकट, कीट > कीड़ा, शाक > साग, शती > शदी आदि।

10. अघोषीकरण

मुख-सुख के लिए जब घोष ध्वनियों का अघोष उच्चारण किया जाता है तो अघोषीकरण होता है। जैसे, मदद > मदत, अदद > अदत, मेघ > मेख, खूबसूरत > खपसूरत, डंडा > डंटा आदि।

11. महाप्राणीकरण

इसमें अलपप्राण ध्वनियां को पहाप्राण ध्वनि के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। जैसे, पृष्ठ > पीठ, वेष > भेस, गृह > घर, परशु > फरसा, हस्त > हाथ, ग्रहण > घिरना, वृश्चिक > बिच्छू, वाष्प > भाप, ताक > ताख आदि।

12. अल्पप्राणीकरण

महाप्राण ध्वनियों का अल्पप्राण कहो जाना अल्पप्राणीकरण है जैसे सिन्धु हिन्दु, भगिनी > बहिन।

13. आनुनासिकता

कभी-कभी आलस्यवश हम ध्वनियों के उच्चारण को अननासिक कर देने के लिए विवश होते हैं अनु नासिकता के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह द्रविड़ प्रभाव हैं ब्लाक और टर्नर के अनुसार स्वर की मात्रा में परिवर्तन के कारण अनुनासिकता आ जाती हैं ग्रियर्सन इसे आधुनिक काल की प्रवृत्ति कहते हैं। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा की प्रवृत्ति के रूप में इसे स्वीकार करते हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी इसे मुख-सुख का परिणाम कहते हैं। आनुनासिकता अकारण भी होती है, क्योंकि शब्द में अनुनासिकता न होने पर भी उसे अनुनासिक रूप में उच्चरित किया जाता है। जिन शब्दों में आनुनासिकता- अश्रु > आँसू, सर्प > साँप, उष्ट्र > उँट, वक्र > बाँका, कूप > कुआँ, भ्रू > भौं, बाहु > बाँह, अक्षि > आँख, उच्च > उचा, श्वास > साँस, बेत्र > बेंत, सत्य > साँच आदि। सकारण आनुनासिकता- चंचु > चोंच, भंग > भांग, कंपन > काँपना, चन्द्र > चाँद, आमलक > आँवला, बिन्दु > बूँद आदि।

14. उष्मीकरण

जब अनूष्म ध्वनियाँ उफष्म में परिवर्तन हो जाती हैं तो उसे उष्मीकरण कहा जाता है। केन्तुम वर्ग की क ध्वनि शतम वर्ग में स हो जाती है। केन्तुम् > शतम् या सतम्।

15. संधि

तेजी में बोलने, प्रयत्नलाघव आदि के कारण कभी-कभी स्वर या स्वंजनों में संधि हो जाता है। इससे ध्वनि में परिवर्तन होता है। यह समीकरण से भिन्न रूप है। जैसे, मयूर > मउर > मोर, वचन > बइन > बैन, नयन > नइन > नैन, > अवध > अउध > औध, नवमी > नउमी > नौमी, सपत्नी > सवत > सउत > सोत, शत > शउ > सब > सउ > सौ, भ्रमर > भँवर > भँउर > भौंर।

कभी-कभी संधि में एक ध्वनि लुप्त भी हो जाती है। जैसे, उस ही = उसी, इस ही इसी, यही ही = जहीं, वह ही = पही आदि।

कभी-कभी संधि में एक ध्वनि लुप्त भी हो जाती है। जैसे, उस ही = उसी, इस ही इसी, यह ही = यही, यहाँ ही = यहीं, कहाँ ही = कहीं, वहाँ ही = वहीं, जहाँ ही = जहीं, वह ही = वही आदि।

कुछ लोग मार डाला > माड्डाला, भात दाल > भाद्दाल, मास्टर साहब > माट साहब, साध सेर > आस्सेर आदि को भी संधि मानते हैं, किन्तु डॉ. भोलानाथ इसे समीकरण कहते हैं।

16. भ्रामक व्युत्पत्ति

ठीक से न सुनने के कारण अथवा अज्ञानवश कुछ ध्वनियों को अपनी भाषा प्रकृति के अनुरूप बना लिया जाता है। इसे भ्रामक व्युत्पत्ति कहते हैं। जैसे इन्तकाल > अंतकाल, गार्ड > गारद, लार्ड > लाट, लाइब्रेरी > रायबरेली। इन परिवर्तनों के अतिरिक्त कुछ ऐतिहासिक परिवर्तनों का उल्लेख भी आवश्यक है। ये परिवर्तन उपर्युक्त रूपों में समाहित किए जा सकते हैं, किन्तु एंतिहासकि महत्त्व की दृष्टि से उनका कथन अपेक्षित है।

1. अभिश्रुति (Umlaut या Vowel Mutation)- अभिश्रुति का अर्थ है शब्द के किसी आंतरिक स्वर में बाद के अक्षर में आने वाले किसी अन्य स्वर (अन्य गुण वाला) के कारण होने वाला परिवर्तन। इसमें पूर्ववर्ती अक्षर का स्वर या तो परिवर्तित करने वाले व परवतर्ती अक्षर के स्वर के अनुरूप हो जाता है या परिवर्तित करने वाले परवर्ती स्वर का लोप हो जाता है। ब्लूमफील्ड इसे पश्चगामी स्वर समीकरण मानते हैं, किन्तु अभिश्रुति और पश्चगामी समीकरणा में अन्तर है। ग्रिम ने जर्मन भाषा में इस प्रवृत्ति को लक्षित किया और Umlaut नाम दिया था। डॉ. चटर्जी के अनुसार बँगला में भी यह प्रवृत्ति मिलती है। जैसे-करिया (Karia), कयरिया (Kairia), कउरे (K’re), कोरे (Kore)। हिन्दी में इसके उदाहरण विरल हैं, जैसे अँगुली > उँगली। बँगला-हारिया > हेरे (खोकर)।

2. अपश्रुति (Ablout)- किसी रूप या पद में स्वर-परिवर्तन या मात्रा भेद के कारण भिन्न व्याकरणिक अर्थ का जुड़ना या उसी पद्धति पर नये शब्द की रचना अपश्रुति हैं तात्पर्य कि अपश्रुति के कारण शब्द में अर्थगत परिवर्तन होता है। यह रूपात्मक ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत ही विचार्य हैं मात्रामूलक अपश्रुति में एक ध्वनि समान प्रकृतिवाली दूसरी ध्वनि में परिवर्तित हो जाती हैं गुणमूलक अपश्रुति में स्वर ध्वनि में गुणमूलक परिवर्तन होता है।

मात्रामूलक अपश्रुति-

जित > जीत, सुत > सूत, मिल > मेल आदि

गुणमूलक अपश्रुति-

भरद्वाज-भारद्वाज, वसुदेव-वासुदेव।

किताब-कातिब -कुतुब।

Rise- Rose Risen.

3. अपिनिहित (Epenthesis)- शब्द में पहले से विद्यमान किसी स्वर के अनुरूप अन्य स्वर के मध्यागम (शब्द के मध्य में आगमन) को अपिनिहिति कहते हैं। यह स्वर भक्ति या विप्रकर्ष के अन्तर्गत समाहित हो सकता है, फिर भी दोनों में अंतर हैं अपिनिहित में इ या उ का मध्यागम होता हैं जैसे, बेल > बेइल, रक्त > रकत, भक्त > भगत, पूर्व > पूरब आदि।

4. फरोहिति पूर्वहिति या (Prothesis)- शब्द में विद्यमान किसी स्वर के अनुरूप शब्द के आदि में स्वर का आगमन फरोहिति हैं यह आगम शब्द का कृत्रिम अंक होता हैं आगम प्राय: इ या उ का ही होता है। जैसे- स्तुति अस्तुति, स्थिति > इस्थिति, स्टेशन > इस्टेशन, स्कूल > इस्कूल आदि।

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