भारतीय भाषा परिवार- द्रविड़, नाग

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अनुक्रम

पाँच से अधिक आर्य तथा अनार्य परिवारों की भाषाएँ देश में मिलती हैं। दक्खिन के साढ़े चार प्रांतों अर्थात् आंध्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू और आधे सिंहल में सभ्य द्रविड़ भाषाएँ बोली जाती हैं भारत के शेष प्रांतों में आर्य भाषाओं का व्यवहार होता है आंध्र, उड़ीसा, बिहार, चेदि-कोशल, राजस्थान और महाराष्ट्र के सीमांत पर वन्य प्रदेशों में और सिंध् की सीमा के पार कलात में भी केछ अपरिष्कृत द्रविड़ बोलियाँ भी हिमालय और विंध्य-मेखला के पड़ोस में बोली जाती हैं। इनके बोलने वालों की संख्या लगभग एक करोड़ है उसमें से कोई बयालीस लाख आस्ट्रिक (अथवा आग्नेय) परिवार की बोलियाँ हैं शेष सब तिब्बत-बर्मी अर्थात् चीनी परिवार की हैं। नागाभाषाएँ तिब्बत चीन परिवार के अंतर्गत तिब्बती-बर्मी उपरिवार की परिभाषाएँ हैं।

द्रविड़ परिवार

आर्य भाषा परिवार के पीछे प्रधानता में द्रविड़ परिवार ही आता है और प्राय: सभी बातों में यह परिवार मुंडा से भिन्न पाया जाता है। मुंडा में कोई साहित्य नहीं है, पर द्रविड़ भाषाओं में से कम-से-कम चार में तो सुंदर और उन्नत साहित्य मिलता है। मुंडा का संबंध भारत के बाहर भी है पर द्रविड़ भाषाओं का एकमात्र अभिजन दक्षिण भारत ही है। कील के प्रो. श्रेडर (O. Schrader of Kiel) ने द्रविड़ और फिनो-अग्रिक परिवारों में संबंध दिखाने का यत्न किया है। पेटर श्मिट ने आस्टे्रलिया की भाषाओं से द्रविड़ भाषाओं का घनिष्ठ संबंध सिद्ध करने का बड़ा यत्न किया है तो भी अभी तक पूरा निश्चय नहीं हो सका कि द्रविड़ परिवार का कोई संबंध विदेशों से भी है। इसीलिए कुछ लोगों की यह कल्पना भी मान्य नहीं हो सकी कि एक द्रविड़ बोली ब्राहुई भारत के उत्तर-पश्चिमी द्वार पर मिलती है, अत: द्रविड़ लोग भारत में उत्तर-पश्चिम से आये होंगे। हो सकता है कि व्यापारी द्रविड़ पश्चिमी देशों के संबंध से वहाँ पश्चिमोत्तर में जा बसे हों।

विद्यमान द्रविड भाषाए चार वर्गों में बाटँी जाती ह-ैं (1) द्रविड वर्ग, (2) आंध्र वर्ग, (3) मध्यवर्ती वर्ग और (4) बहिरगं वर्ग अर्थात् ब्राहुई बोली। तमिल, मलयालम, कनाडी और कनाडी की बोलिया, तुलु और कोडगू (कुर्ग की बोली) सब द्रविड़ वर्ग में हैं। तेलुगु या आंध्र भाषा अकेली एक वर्ग में है। इन परिष्कृत भाषाओं की उत्तरी सीमा महाराष्ट्र (सी. पी.) का चाँदा जिला है। उसके आगे कुछ अपरिष्कृत बोलियाँ पाई जाती हैं। वे दूसरी भाषाओं के प्रवाह से घिरकर द्वीप-सी बन गई हैं और धीरे-धीरे लुप्त भी हो रही हैं।

मध्यवर्ती वर्ग

इन सब बोलियों में अधिक प्रसिद्ध गोंडी बोली है। इस गोंडी का अपनी पड़ोसिन तेलुगु की अपेक्षा द्रविड़ वर्ग की भाषाओं से अधिक साम्य है। उसके बोलने वाले गोंड लोग आंध्र, उड़ीसा, बरार, चेदि-कोशल (बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़) और मालवा के सीमांत पर रहते हैं। पर उनका केंद्र चेदि-कोशल ही माना जाता है। गोंड एक इतिहास प्रसिद्ध जाति है, उसकी बोली गोंडी बोली का प्रभाव उत्तराखंड में भी ढूँढ निकाला गया है पर गोंडी बोली न तो कभी उन्नत भाषा बन सकी, न उसमें कोई साहित्य उत्पन्न हुआ और न उसकी कोई लिपि ही है। इसी से गोंडी शब्द कभी-कभी भ्रमजनक भी होता है। बहुत से गोंड अब आर्य भाषा अथवा उससे मिली बोली बोलते हैं, पर साधरण लोग गोंड मात्र की बोली को गोंडी मान लेते हैं। इसी से गोंडी की ठीक गणना करना सहज नहीं होता। सन् 1921 में गोंडी की जनसंख्या सोलह लाख से उपर थी, पर अब विचार किया जा रहा है कि उनकी संख्या बाहर लाख से कम न होगी। गोंड लोग अपने आपको ‘कोइ’ कहते हैं।

गोंडी के पड़ोस में ही उड़ीसा में इसी वर्ग की ‘कुई’ नाम की बोली पाई जाती है। उसकी जनसंख्या चार लाख अस्सी हजार है। इसका संबंध तेलुगु से विशेष देख पड़ता है। इसमें क्रिया के रूप बड़े सरल होते हैं। इसे बोलने वाले सबसे अधिक जंगली हैं उसमें अभी तक कहीं-कहीं नर-बलि की प्रथा पाई जाती है। उड़िया लोग उन्हें कोंधी, कांधी अथवा खोंध् कहते हैं।

कुई के ठीक उत्तर छत्तीसगढ़ और छोटा नागपुर में (अर्थात् चेदि-कोशल और बिहार के सीमांत पर) कुरुख लोग रहते हैं। ये ओराँव भी कहे जाते हैं। इनकी संख्या गोंडों से कुछ कम अर्थात् आठ लाख छियासठ हजार है। इनकी भाषा कुरुख अथवा ओराँव भी द्रविड़ से अधिक मिलती-जुलती है। जनकथा के आधार पर यह माना जाता है कि ये लोग कर्नाटक से आकर यहाँ बसे हैं अर्थात् उनकी बोली कर्नाटकी से संबंध रखती है। इस बोली में कई शाखाएँ अर्थात् उपबोलियाँ भी हैं। गंगा के ठीक तट पर राजमहल की पहाड़ियों में रहने वाली मल्तो जाति की बोली ‘मल्तों’ कुरुख की ही एक शाखा है। बिहार और उड़ीसा में कुरुख बोलियों का प्रभाव दिनोंदिन अधिक पड़ रहा है। राँची के पास के कुछ कुरुख लोगों में मुंडारी का अधिक प्रयोग होने लगा है। गोंडी, कुई, कुरुख, मल्तो आदि के समान इस वर्ग की एक बोली कोलामी है। वह पश्चिमी बरार में बोली जाती है। उसका तेलुगु से अधिक साम्य है उस पर मध्यभारत की आर्य भीली बोलियों का बड़ा प्रभाव पड़ा है। टोडा की भाँति वह भी भीली के दबाव से मर रही है। आजकल उसके बोलने वाले लगभग तेईस-चौबीस हजार हैं।

ब्राहुई वर्ग

सुदूर कलात में ब्राहुई लोग एक द्रविड़ बोली बोलते हैं। इनमें से अनेक ने बलूची अथवा सिंधी को अपना लिया है, तो भी अभी ब्राहुई के वक्ता डेढ़ लाख से उपर हैं। यहाँ के सभी स्त्री पुरुष प्राय: दुभाषिये होते हैं। कभी-कभी स्त्री सिंधी बोलती है और पति ब्राहुई। यहाँ किस प्रकार अन्यवर्गीय भाषाओं के बीच में एक द्रविड़ भाषा जीवित रह सकी, यह एक आश्चर्य की बात है।

आंध्र वर्ग

आंध्र वर्ग में केवल आंध्रा अथवा तेलुगु भाषा है और अनेक बोलियाँ। वास्तव में दक्षिण-पूर्व के विशाल क्षेत्र में केवल तेलुगु भाषा बोली जाती है। उसमें कोई विभाषाएँ नहीं हैं। उसी भाषा को कई जातियाँ अथवा विदेशी थोड़ा विकृत करके बोलते हैं पर इससे भाषा का कुछ नहीं बिगड़ता। विभाषाएँ तो तब बनती हैं जब प्रांतीय भेद के कारण शिष्ट और सभ्य लोग भाषा में कुछ उच्चारण और शब्द-भंडार का भेद करने लगे और उस भेदों वाली बोली में साहित्य-रचना भी करें। ऐसी बातें तेलुगु के संबंध में नहीं हैं। तेलुगु का व्यवहार दक्षिण में तमिल से भी अधिक होता है उत्तर में चाँदा तक, पूर्व में बंगाल की खाड़ी पर चिकाकोल तक और पश्चिम में निजाम के आधे राज्य तक उसका प्रचार है। संस्कृत ग्रंथों का यही आंध्र देश है और मुसलमान इसी को तिलंगाना कहते थे। मैसूर में भी इसका व्यवहार पाया जाता है। बंबई और मध्य प्रदेश में भी इसके बोलने वाले अच्छी संख्या में मिलते हैं। इस प्रकार द्रविड़ भाषाओं में संख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ी है। संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से यह तमिल से कुछ ही कम है। आधुनिक साहित्य के विचार से तो तेलुगु अपनी बहिन तमिल से भी बढ़ी-चढ़ी है। विजयानगरम् के कृष्णराय ने इसकी उन्नति के लिए बड़ा यत्न किया था, पर इसमें वाघõमय बारहवीं शताब्दी के पहले का नहीं मिलता। इसमें संस्कृत का प्रचुर प्रयोग होता है। इसमें स्वर-माधुर्य इतना अधिक रहता है कि कठोर तमिल उसके सौंदर्य को कभी नहीं पाती। इसके सभी शब्द स्वरांत होते हैं, व्यंजन पद के अंत में आता ही नहीं, इसी से कुछ लोग इसे पूर्व की इटाली भाषा (Italy of the East) कहते हैं। द्रविड़ वर्ग की भाषाओं में तमिल सबसे अधिक उन्नत और साहित्यिक भाषा है। उसका वाघõमय बड़ा विशाल है। आठवीं शताब्दी से प्रारंभ हो कर आज तक उसमें साहित्य-रचना होती आ रही है। आज भी बँगला, हिंदी, मराठी आदि भारत की प्रमुख साहित्यिक भाषाओं की बराबरी में तमिल का भी नाम लिया जा सकता है। तमिल की विभाषाओं में परस्पर अधिक भेद नहीं पाया जाता, पर चलती भाषा के दो रूप पाये जाते हैं-एक छंदस्-काव्य की भाषा जिसे वे लोग ‘शेन’ (= पूर्ण) कहते हैं और दूसरी बोलचाल की जिसे वे कोडुन् (गँवारू) कहते हैं।

आंध्र वर्ग में केवल आंध्र अथवा तेलुगु भाषा है और अनेक बोलियाँ। तेलगू भाषा की विभाषाएँ नहीं है।

मलयालम

मलयालम ‘तमिल की जेठी बेटी’ कही जाती है। नवीं शताब्दी से ही वह अपनी माँ तमिल से पृथक् हो गई थी और भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र-तट पर आज वही बोली जाती है। वह ब्राहमणों के प्रभाव के कारण संस्कृत-प्रधन हो गई है। कुछ मोपले अधिक शुद्ध और देशी मलयालम बोलते हैं क्योंकि वे आर्य संस्कृति से कुछ दूर ही हैं। इस भाषा में साहित्य भी अच्छा है और त्रावणकोर तथा कोचीन के राजाओं की छत्रछाया में उसका अच्छा वर्ध्न और विकास भी हो रहा है।

कनारी

कनारी मैसूर की भाषा है। उसमें अच्छा साहित्य है, उसकी काव्यभाषा अब बड़ी प्राचीन और आर्ष हो गई है। उसका अधिक संबंध तमिल भाषा से है, पर उसकी लिपि तेलुगु से अधिक मिलती है। इस भाषा में भी स्पष्ट विभाषाएँ कोई नहीं हैं।

इस द्रविड़ वर्ग की अन्य विभाषाओं में से टुळु एक बहुत छोटे क्षेत्र में बोली जाती है। यद्यपि इसमें साहित्य नहीं है। पर काल्डवेल ने उसको विकास और उन्नति की दृष्टि से बहुत उच्च भाषाओं में माना है। कोडगू कनारी और टुळु के बीच की भाषा है। उसमें दोनों के ही लक्षण मिलते हैं। भूगोल की दृष्टि से भी वह दोनों के बीच में पड़ती है। उसमें दोनों के ही लक्षण मिलते हैं। भूगोल की दृष्टि से भी वह दोनों के बीच में पड़ती है। टोडा और कोटा नीलगिरि के जंगलियों की बोलियाँ हैं। उनके बोलने वाले भी दो हजार से कम ही हैं। इनमें से टोडा जाति और उनकी भाषा मरणोन्मुख है।

नाग परिवार

नागा-भाषाएँ मुख्यत: नागालैण्ड में बोली जाती हैं। नागालैण्ड 1882 ई. से 1957 ई. तक असम राज्य के अन्तर्गत ‘नागा हिल्स’ जिले के नाम से जाना जाता था। 1957 ई. से 1969 ई. तक यह ‘नागा हिल्स और तुएनसाघ एरिया’ के नाम से प्रसिद्ध रहा। पहली दिसम्बर 1969 ई. को ‘नागालैण्ड’ राज्य के रूप में घोषित हुआ। इसका क्षेत्रफल 6966 वर्ग मील है तथा भारतीय जनगणना 1972 ई. के अनुसार जनसंख्या 5,16,449 है।

नागालैण्ड में अब सात जिले हैं-कोहिमा, मोकोकचूघ, तुएनसाघ, फेक, वोखा, जुनहेबोतो तथा मोन। कोहिमा नागालैण्ड की राजधानी है जो समुद्र-तल से 4800 फीट की उचाई के एक सुरम्य पहाड़ी पर बसी हुई है।

नागा-भाषाएँ

नागा-भाषाएँ तिब्बती-चीनी परिवार के अन्तर्गत तिब्बती-बर्मी उप-परिवार की भाषाएँ हैं। नागा भाषा समुदाय बोलियों की एक लम्बी श्रृंखला से निर्मित है। इन बोलियों में पर्याप्त भिन्नताएँ वर्तमान हैं। नाथन ब्राडन (1837) ने इन नागा-भाषाओं को तीन वर्गों-’नोक्ते’, ‘कोन्याक’ और ‘आओ’-में विभाजित किया। सर. जी. ग्रियर्सन (1903) ने नागा-भाषाओं के वर्गीकरण का प्रथम स्मरणीय कार्य किया। आर. शेफर (1967) ने उत्तरी नागा-भाषाओं का वर्गीकरण किया। जी. ई. मेरीसन (1967) का उत्तर-पूर्वी भारत के नागा-भाषाओं का वर्गीकरण अपेक्षाकृत आधुनिक तथा प्रारूपात्मक (Typological) अध्ययन पर आधरित है।

नागालैण्ड में बोली जाने वाली कुल बोलियों की संख्या लगभग 22 है-आओ, अंगामी, सेमा, लोथा, कोन्याक, चौक्री, चाघ, साघ्तम, फोम, यीमचूघ्र, कुकी, रेघ्मा, खेजा, रोघ्मेई, जैमी, लियाघ्मेइ, पीचुरी, खियाघ्गण, कचारी, माओ, माकवारे और तिरखिर।

नागाभाषी परस्पर विचारों के आदान-प्रदान के लिए भाषा के एक मिलते-जुलते रूप का प्रयोग करते हैं, जिसे नागामिज की संज्ञा दी जाती है। नागमिज एक पिजिन (Pidgin) भाषा है जो सम्पूर्ण नागालैण्ड में बोली और समझी जाती है। अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोगों के बीच यह सम्पर्क भाषा का काम करती है। आकाश-वाणी, कोहिमा से इस भाषा में समाचार प्रसारित होता है। यह असमी, बंगला, हिन्दी तथा नागा भाषाओं के सम्मिश्रण से निर्मित एक खिचड़ी भाषा है।

नागा उपभाषाएँ, उनका क्षेत्र तथा जनसंख्या

भौगोलिक आधार पर नागालैण्ड की 22 नागा-भाषाओं की तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है:

वर्ग 1-आओ, लोथा, साघ्तम, यीमचुघ्र, खियाघ्गण, माकवारे और तिरखिर।

वर्ग 2-अंगामी, सेमा, कचारी, कुकी, जैमी, लियाघ्मेइ, रोघ्मेइ, रेघ्मा, चाक्री, खेजा, पोचुरी ओर आओ।

वर्ग 3-कोन्याक, फोम और चाघ।

इन 22 भाषाओं में आओ, लोथा, अंगामी एवं सेमा ही प्रमुख हैं क्योंकि शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में अन्य भाषाओं की अपेक्षा इनकी प्रमुखता है।

आओ भाषा

नागा-भाषाओं में आओ भाषा का प्रमुख स्थान है। ‘आओ’ शब्द का अर्थ ‘गया’ होता है जो आओबा (Aoba) क्रिया (जाना) का भूतकालिक रूप है। बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से कोन्याक भाषा के बाद इसका दूसरा स्थान है। आओ भाषा बोलने वाले आओ या आओर कहलाते हैं तथा नागालैण्ड के मोकोकचूघ जिले के लगभग 69 गाँवों में बसे हुए हैं। आओ भाषी लोग अपने निवास-क्षेत्र को ‘आओ लिमा’ (Ao lima) कहते हैं। ‘लिमा’ शब्द का अर्थ ‘देश’ या ‘प्रदेश’ है। ‘आओ’ लोगों के मुख्य गाँव मेलोघयीमसेन, लोघ्पा, मापाघ्चुकित, उफघ्मा, तुली और चाघ्की हैं। उघ्मा इनका सबसे बड़ा गाँव है। अधिकांश आओ ईसाई धर्मांवलम्बी हैं। आओ क्षेत्र के दक्षिण-पूर्व में फोम ओर चाघ् भाषा-भाषी हैं। आओ भाषा की दो मुख्य बोलियाँ हैं-मुघ्सेन और चोघ्ली। मुघसेन मोकोकचूघ् गाँव में मानक रूप में प्रयुक्त होती है। इसमें लोकगीतों की समृद्ध परम्परा है।

चाघ्की (मुख्य रूप से चाघ्की गाँव की बोली) मुघ्सेन की एक उपबोली है जो आओ क्षेत्र के दक्षिण-पूर्व में बोली जाती है।

चोघ्ली आओ क्षेत्र के उत्तरी ओर पूर्वी भाग में आधे से अधिक जनसंख्या द्वारा बोली जाती है। ईसाई धर्म-प्रचारकों ने इसी बोली के माध्यम स धर्म-प्रचार का कार्य प्रारम्भ किया। इसका परिणाम यह हुआ कि चोघली का प्रचार धीरे-धीरे समस्त आओ क्षेत्र में हो गया। आज चोघ्ली ही आओ की साहित्यिक भाषा है। शिक्षा का माध्यम यही चोघ्ली है तथा मैट्रिकुलेशन तक के लिए मातृभाषा के रूप में स्वीकृत है। आओ भाषा के इसी रूप को प्रस्तुत अध्ययन का आधार माना गया है।

लोथा भाषा

लोथा वोखा जिले के निवासियों की मातृभाषा है। इसके बोलने वाले लोथा कहे जाते हैं। लोथा-भाषी अपने को ‘क्योन’ (Kyon) कहते है जिसका अर्थ ‘आदमी’ होता है। असमियों ने सबसे पहले इनके लिए ‘ओता’ (Ota) का प्रयोग किया जिसका अर्थ ‘लता’ होता है। तत्पश्चात् अंग्रेजी ने इसका उच्चारण ‘ल्होता’ (Lhota) किया। स्वतन्त्रता के बाद यही ‘ल्होता’ आज के लोथा के रूप में परिवर्तित हो गया।

लोथा भाषियों के उत्तर में आओ, पूर्व में सेमा, पश्चिम में मिकिर और अंगामी तथा दक्षिण में रेघ्ता भाषा-भाषी हैं। भारतीय जनगणना 1971 ई. के अनुसार लोथा बोलने वालों की संख्या 36,949 हैं।

लोथा की दो बोलियाँ हैं-लोयो (Loyo) और घ्ड्रेघ (Ndreng)। लोयो दोयाघ नदी के उत्तर में तथा घ्ड्रेघ दोयांग नदी के दक्षिण में बोली जाती है। वोखा जो लोथा का जिला मुख्यालय है, घ्डे्रघ के क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। यही बोली शिक्षा का माध्यम है तथा इसी में पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण हुआ है। लोथा भाषी क्षेत्र में लोथा छठवीं कक्षा तक मातृीभाषा के रूप में तथा आठवीं कक्षा तक अतिरिक्त भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है।

अंगामी भाषा

नागालैण्ड के कोहिमा जिले में बोली जाने वाली भाषाओं में अंगामी का सर्व-प्रमुख स्थान है। यह अंगामी कबीले की मातृभाषा है। कोहिता जिले में बसने वाले चाखेसांग, रेगमा, पोचुरी, जेलियांग इत्यादि कबीले भी अंगामी भाषा को समझ और बोल लेते हैं। कोहिमा जिले के नागाओं की सम्पर्क भाषा के रूप में अंगामी को स्वीकार किया जा सकता है। यह भाषा पश्चिम में दीमाफर तक, पूर्व में चिचामा तक बोली जाती है।

अंगामी क्षेत्र के दक्षिण में माओ और तांखुल नागा, दक्षिण-पश्चिम में जेमी, पश्चिम में असम राज्य के मिकिर, उत्तर-पूर्व में सेमा और पूर्व में चोक्री भाषाभाषी हैं। ये अंगामी कोहिमा तथा कोहिमा के चारों तरफ कई गाँवों में घने रूप से बसे हुए हैं। ‘कोहिमा बस्ती’ इनका सबसे बड़ा गाँव का आदमी दूसरे गाँव की बोली को अच्छी तरह समझ लेता है। अंगामी भाषा की तीन मुख्य बोलियाँ चोक्री, खोनोमा और कोहिमा हैं। चाक्री को अब पूर्वी अंगामी के रूप में एक भिन्न भाषा माना जाने लगा है।

ग्रियर्सन ने भारतीय भाषा सर्वेक्षण में श्री मैकावे (1887) के व्याकरण के आधार पर अंगामी व्याकरण की रूपरेखा प्रस्तुत की है। श्री हट्टन (1921) ने भी अपनी पुस्तक ‘अंगामी नागा’ में श्री मैकावे जी के व्याकरण को आधार मानकर अंगामी व्याकरण पर सामग्री प्रस्तुत की है। किन्तु श्री मैकावे जी का व्याकरण मुख्य रूप से जोत्समा, खोनोमा और मोजेमा गाँव की बोलियों पर आधरित है। आज खोनोमा बोली अंगामी की मानक बोली नहीं है। अंगामियों ने कोहिमा बोली को शिक्षा का माध्यम स्वीकार किया है। सीाी प्रकार की साहित्यिक रचनाएँ कोहिमा बोली में ही हैं। प्रस्तुत अध्ययन का आधार भी यही बोली है। अंगामी भाषा का अध्यापन पहली कक्षा से लेकर दसवीं तक मातृभाषा के रूप में होता है।

सेमा भाषा

सेमा एक नागा भाषा है इसके बोलने वाले भी सेमा कहे जाते हैं। सेमा शब्द अपने मूल रूप ‘समी’ (Sumi) से निकला है। ‘समी’ एक यौगिक शब्द है। इसमें दो शब्द ‘स’ (Su) और ‘मी’ (mi) है। ‘स’ शब्द ‘बहुत’ का पर्याय है और ‘मी’ शब्द का अर्थ आदमी होता है। इसी प्रकार ‘समी’ शबद का अर्थ बहुत आदमी होता है।

सेमा नागालैण्ड के केन्द्र भाग जुनहेबोतो जिले की भाषा है। इसके उत्तर में आओ, दक्षिण में अंगामी, पूरब में यीमचुँगर तथा पश्चिम में लोथा हैं, सांगतम और रेंगमा क्रमश: इनकी उत्तरी और दक्षिणी-पश्चिमी कोण से सटे हुए हैं। भारतीय जनगणना 1971 ई. के अनुसार सेमा बोलने वालों की संख्या 64,227 है।

सेमा भाषा की मुख्य चार बोलियाँ है-

  1. दोयांग नदी के तट पर बसे लेजामी और उसके चारों तरफ बोली जाने वाली पश्चिमी बोली।
  2. खेजा क्षेत्र के अन्तर्गत चिजेमी गाँव में बोली जाने वाली पूर्वी सेमा।
  3. चिजोलिमी गाँव और उसके चारों तरफ बोली जाने वाली ‘चिजोलिमी’ बोली।
  4. जुनहेबोतो शहर में तथा उसके चारों तरफ बोली जाने वाली ‘केन्द्रीय बोली।’

पूर्वी सेमा पर खेजा का प्रभाव है। ‘केन्द्रीय बोली’ ही सेमा की मानक बोली है तथा सेमा भाषा के सभी प्रकाशन इसी बोली में हैं। प्रस्तुत अध्ययन का आधार यही केन्द्रीय बोली है। जुनहेबोतो जिले के सभी विद्यालयों में कक्षा पाँचवीं तक प्राय: सभी विषयों की शिक्षा का माध्यम सेमा भाषा है। राज्य सरकार ने मातृभाषा के रूप में सेमा का शिक्षण कक्षा छठवीं तक स्वीकार किया है। सेमा भाषा का शिक्षण सेमा भाषी क्षेत्र में भाषा के रूप में कक्षा आठवीं तक होता है।

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