राष्ट्रभाषा क्या है?

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अनुक्रम

राष्ट्रभाषा किसी भी भाषा का प्रारंभिक रूप बोली होती हैं सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि कारणों से कोई बोली विकसित होकर भाषा का रूप धारण कर लेती है। उसका प्रयोग क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। भिन्न-भिन्न बोलियों के प्रयोक्ता समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। विद्वानों के प्रयासों से भाषा के रूप को स्थायित्व मिलता है और इसका एक आदर्श तथा मानक रूप बन जाता है। शिष्ट जन उस मानक रूप का प्रयोग करने लगते हैं तथा सामान्य जन यत्किंचित क्षेत्रीय प्रभाव के साथ उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। विद्वानों के प्रयासों से भाषा के रूप को स्थायित्व मिलता है आरै इसका एक आदशर् तथा मानक रूप बन जाता है शिष्ट जन उस मानक रूप का प्रयोग करने लगते हैं तथा सामान्य जन यत्किंचित क्षेत्रीय प्रभाव के साथ उस भाषा का प्रयोग करते रहते हैं। धीरे-धीरे उन्नत होकर यह मानक भाषा संपूर्ण राष्ट्र की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करने लगती है। उस क्षेत्र के निवासियों का उस भाषा के प्रति भावात्मक लगाव हो जाता है। वे अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान ही उसके प्रति गौरव की भावना रखते हैं। तब उस भाषा को राष्ट्रभाषा कहा जाता है।

डॉ. भोलानाथ तिवारी के शब्दों में ‘जब कोई आदर्श भाषा बनने के बाद भी उन्नत होकर और भी महत्त्वपूर्ण बन जाती है तथा पूरे राष्ट्र या देश में अन्य भाषा क्षेत्र तथा अन्य भाषा परिवार क्षेत्र में भी उसका प्रयोग सार्वजनिक कामों आदि में होने लगता है तो वह राष्ट्रभाषा का पद पा जाती है। राष्ट्रभाषा के संबंध में उपर्युक्त मत से यह स्पष्ट है कि जिन देशों में किसी एक भाषा का प्रयोग होता है वहाँ की भाषा ‘राष्ट्रभाषा’ का पद आसानी से प्राप्त कर सकती है। परंतु भारत जैसे बहुभाषाभाषी देशों में राष्ट्रभाषा का स्वरूप उतना स्पष्ट नहीं हो पाता। ऐसे देशों के निवासी अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रति भी भावनात्मक लगाव रखते हैं, उसकी प्रगति के लिए प्रयासरत रहते हैं। कभी-कभी ऐसी स्थिति में भाषायी प्रतिस्पर्द्धा भी दिखाई देती है। हिंदी भारत के अधिकांश भू-भाग के निवासियों की भाषा है। हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ प्रदेशों की भाषा तो यह है  जम्मू क्षेत्र, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश आदि प्रदेशों की भी प्रमुख भाषा है। यों, हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या भारत के सभी प्रदेशों में पर्याप्त है। हिंदी को भारत के सभी प्रदेशों में अपेक्षित महत्व मिला है।

राष्ट्रभाषा हिंदी का स्वरूप

राष्ट्रभाषा हिंदी के स्वरूप से तात्पर्य है, सर्वसाधारण से लेकर शिक्षित वर्ग तक सबके द्वारा प्रयुक्त की जानेवाली भाषा का सर्वमान्य रूप। इसका प्रयोग भारत के अधिकांश भू-भाग में किया जाता है। पश्चिम में राजस्थान, हरियाणा से लेकर उत्तर में हिमाचल प्रदेश और पूर्व में बिहार, झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ तक प्राय: सभी इसका प्रयोग करते हैं। हिंदी लगभग ग्यारहवीं शताब्दी से ही भारत के अधिकांश भू-भाग में बोली जाती रही हैं।

सन् 1915 ई. में भरुच में होने वाले गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन के सभापति-पद से गाँधीजी ने जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि कौन-सी भाषा भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है। गाँधीजी के विचार में राष्ट्रभाषा के लिए लक्षण होने चाहिए :

  1. यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत-से लोग उस भाषा को बोलते हों।
  2. उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवहार संभव हो।
  3. राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।
  4. अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।
  5. उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।

गाँधीजी के अनुसार अंग्रेजी भाषा में इनमे से एक भी लक्षण नहीं है। ढंग से विचार करने पर हम देखेंगे कि आज भी अमलदारों के लिए यह भाषा सरल नहीं है।

‘‘दूसरे लक्षण पर विचार करने पर हमें पता चलता है कि जब तक अंग्रेजी भाषा को हमारा जनसमाज बोलने न लग जाए, जब तक यह मुमकिन न हो, तब तक हमारा धार्मिक व्यवहार अंग्रेजी में चल ही नहीं सकता। समाज में अंग्रेजी का इस हद तक फैल जाना नामुमकिन मालूम होता है।’’

तीसरा लक्षण अंग्रेजी में हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह भारतवर्ष के बहुजन-समाज की भाषा नहीं है।

चौथा लक्षण भी अंग्रेजी में नहीं है, क्योंकि सारे राष्ट्र के लिए वह उतनी आसान नहीं।

पाँचवां यह कि अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाना स्वयं को एवं अपनी भाषा को अक्षम सिद्ध करना है। आज सम्पूर्ण हिंदी भाषी क्षेत्र तथा कतिपय हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। इन क्षेत्रों में यह बोलचाल की भाषा तो है  साहित्य राजनीति, शिक्षा, व्यवसाय, संचार माध्यम, धर्म के साथ ही विभिन्न शास्त्रों एवं विज्ञान की भाषा भी यह बन चुकी है। भारत में हिंदी जानने वालों की संख्या लगभग 75 करोड़ है। हिंदी भारतीयों की आस्था, रीति-रिवाज की भाषा है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक सभी तीर्थों और धार्मिक स्थलों पर पर हिंदी का प्रयोग देखा जा सकता है। होली, दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन सभी त्योहारों के भजन, गीत और मस्ती की भाषा है हिंदी। हिंदी में लोकगीत, लोकनाटक आदि लोक साहित्य भरा पड़ा है। अलग-अलग प्रदेशों के लोगों की आशा-आकांक्षाओं, स्वप्न तथा निराशा को व्यक्त करने में राष्ट्रभाषा हिंदी पूरी तरह सफल है। इन प्रदेशों की कुछ स्थानीय मान्यताएँ और समस्याएँ हो सकती हैं, परन्तु मूल स्वर पूरे भारत का एक है। पूरी भारतीय संस्कृति इस लोक साहित्य में प्रतिबिम्बित हुई है। भारत के विभिन्न प्रदेशों के संतों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों से शब्द ग्रहण कर जैसे पूरे हिंदी प्रदेश को एक किया, उसी प्रकार पूरे भारत की आत्मा को स्वर प्रदान किया। कबीर जैसे संतों की वाणी इसका प्रमाण है।

राष्ट्रभाषा हिंदी सिर्फ हिन्दुओं की भाषा नहीं है। भक्तिकाल के सूफी कवियों का प्रमाण है। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बम्बइया हिंदी, कलकतिया हिंदी आदि के नाम से हिंदी अहिंदी प्रदेशों में अपनी जड़ें जमा चुकी हैं। इन प्रदेशों में हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्वरूप प्रदान करने में जहाँ ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ जैसी संस्थाओं ने योग दिया है, वहीं हिंदी फिल्मों और दूरदर्शन ने भी इसमें प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से अपना योगदान दिया है। समवेतत: हिंदी आज राष्ट्रभाषा है जो अपनी सहोदर भाषाओं-मराठी, गुजराती, असमी, बंगला, आदि के साथ-साथ दक्षिण भारतीय भाषाओं तथा पूर्वांचलीय भाषाओं को साथ लेकर चल रही है। हिंदी इन प्रदेशों में तो अपनी पैठ बना ही रही है, इन प्रदेशों की भाषाओं से शब्द ग्रहण कर स्वयं को समृद्ध भी कर रही है।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का विकास

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्र हुआ था। 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को भारतीय संविधान में राजभाषा के रूप में स्थान दिया गया। सरकार का दायित्व निश्चित किया गया कि वह हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य करेगी। आम आदमी की बोलचाल, अस्मिता, साहित्य की भाषा के रूप में हिंदी भारत की प्रमुख भाषा रही है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के विकास को तीन कालखण्डों में विभाजित कर देखा जा सकता है।

  1. आदिकाल 1000 ई.-1300 ई.
  2. मध्यकाल 1300 ई.-1800 ई.
  3. आधुनिककाल 1800 ई.-अद्यतन

हिंदी के आदिकाल का प्रारम्भ लगभग सन् 1000 ईसवी से माना जाता है। यद्यपि हिंदी का प्रारम्भिक दर्शन सातवीं शताब्दी में हिंदी के प्रथम कवि माने जाने वाले सरहपाद की रचनाओं में किया जा सकता है-

जह मन पन न संचरइ, रवि शशि नाह पवेश।

तह वट चित्त विसाम करु, सरहे कहिउ उवेश।।

तथापि लगभग 200 वर्षों के अन्तराल के बाद तो हिंदी साहित्य की अविच्छिन्न धारा दिखाई देती है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि कोई भी भाषा अपनी उत्पत्ति से ही काव्य की भाषा नहीं बनती, इसके लिए कम-से-कम सौ-दो सौ वर्षों का समय अपेक्षित है। इसका तात्पर्य है कि हिंदी सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही बोलचाल की भाषा के रूप में भारत में प्रचलित रही होगी। यह अवश्य है कि साहित्य की दृष्टि से वह अपभ्रंश का काल था। यों, अपभ्रंश लगभग 15वीं शताब्दी तक साहित्य की भाषा रही है, उत्तर अपभ्रंश को कुछ विद्वान फरानी हिंदी और कुछ अवहट्टò का नाम देते रहे हैं, परन्तु वास्तव में वह हिंदी थी। डॉ. रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’ के शब्दों में, ‘‘यद्यपि अपभ्रंश अपने मूल रूप में पन्द्रहवीं शताब्दी तक साहित्य की भाषा बनी रही, तथापि आठवीं शताब्दी से ही बोलचाल की भाषा पृथक् होकर उसके समानान्तर साहत्य-रचना का माध्यम बन गई थी। इसी भाषा को ‘अवहट्टò’ नाम देना भ्रम उत्पन्न करना है। जिन विद्वानों ने ये नाम दिए हैं, वे भी अपने मत के अन्तर्गत प्राय: उक्त तथ्य का समर्थन करे रहे हैं। चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ पहले विद्वान है जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की थी कि ‘उत्तर अपभ्रंश’ ही फरानी हिंदी है। यहाँ ‘उत्तर’ श्ब्द काल का बोधक न होकर साहित्यिक अपभ्रंश से इतर बोलचाल की उस भाषा का बोधक है जो साहित्यिक अपभ्रंश के एक रूप की स्वीकृति के पश्चात उसके बाद के रूप में स्थापित होती जा रही थी।’’

14 सितंबर 1949 में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया।

रामचन्द्र शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुनदर दास आदि आलोचकों ने मुक्तभाव अथवा कुछ संकोच के साथ ‘उत्तर अपभ्रंश’ की रचनाओं को हिंदी साहित्य में स्थान दिया है। इस काल में नाथों, सिद्धों, जैन साधुओं, योगियों, महात्माओं ने सम्पूर्ण उत्तर, उत्तर-पूर्व तथा पश्चिम भारत में हिंदी की विभिन्न बोलियों और लोकभाषाओं में अपने सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार किया। भारत की जनता की आत्मा में समान रूप से अनुस्यूत धार्मिक-आध्यात्मिक- सांस्कृतिक चेतना को उसकी भाषा में ही प्रचारित-प्रसारित किया जा सकता था। इतना ही नहीं चन्दबरदाई और उनके समान अन्य चारण-भाट कवियों ने वीर काव्य की जिस भाषा में रचना की है उसे नाम भले ही ‘डिंगल’ दिया जाए, किंतु वह हिंदी का रूप है। इसी प्रकार इस काल में मधुर भावों के लिए प्रचलित ‘पिंगल’ भी हिंदी है। मिथिला प्रदेश में अपनी जिस ललित-सुमधुर भाषा में विद्यापति ने रचना की, और जिसे उन्होंने ‘देसिल बयना’ कहा, वह भी हिंदी का ही एक रूप है। आदिकाल में हिंदी के लिए हिन्दवी, हिन्दुई या हिन्दुवी का प्रयोग भी होता रहा है।

तेरहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने इसका प्रयोग किया है। अमीर खुसरो सूफी थे, यद्यपि दिल्ली के शाही दरबार की ओर से उन्होंने युद्धों में भी सक्रिय भाग लिया। उन्होंने फारसी के अतिरिक्त हिंदी की भी बोलियों में रचनाएँ लिखीं। इनमें प्रमुख हैं-ब्रज, बुंदेलखंडी, कनौजी, बाँगरू और कौरवी। तेरहवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक दिल्ली की खिलजी सल्तनत का दक्षिण तक विस्तार हो गया था। परिणामस्वरूप उत्तर भारत की भाषा और बोलियों का भी प्रसार वहाँ प्रारम्भ हो गया। बीजाफर, गोलकुंडा, अहमद नगर, विजयवाड़ा, देवगिरी, बरार आदि दक्षिण भारतीय प्रदेशों में सूफियों, संतों तथा अन्य साहित्यकारों ने बोलचाल और साहित्य के माध्यम से जिस भाषा का प्रचार-प्रसार किया, वह फारसी और हिंदी का मिला-जुला रूप था। इसी को सत्रहवीं शताब्दी में दक्खिनी या दक्कनी कहा गया।

इस प्रकार अपने उद्भव को दो-तीन सौ वर्षों में ही हिंदी सम्पूर्ण भारतवर्ष के भाषिक व्यवहार और साहित्य की भाषा बन गई और दक्षिण भारत के भी कुछ क्षेत्रों में इसका प्रचार-प्रसार प्रारम्भ हो गया। यह सही है कि इस समय तक खड़ी बोली का महत्त्व अन्य भाषा रूपों से अधिक नहीं था। साहित्य के क्षेत्र में तो कम-से-कम हिंदी की अन्य बोलियों और शैलियों को पर्याप्त महत्त्व मिला।

मध्यकाल

मध्यकाल भारत के लिए सांस्कृतिक पुनरुत्थान का काल कहा जा सकता है। सांस्कृतिक दृष्टि से सारा भारत एक ही रहा है। ‘विविधता में एकता’ ही भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न धर्मों के जो तीर्थस्थान हैं, उन्होंने हिंदी को देश के कोने-कोने में पहुँचाने में बहुत मदद की है। हिंदीतर प्रदेशों के लोग हिंदी प्रदेशों में अपने तीर्थ स्थानों पर आते थे और हिंदी प्रदेश के निवासी भी आंध्रप्रदेश, तमिलनाऊ आदि प्रदेशों में अपने तीर्थ स्थानों पर आते थे और हिंदी प्रदेश के निवासी भी आंध्रप्रदेश, तमिलनाऊ आदि प्रदेशों में अपने तीर्थों पर जाते थे। ऐसे में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता थी जो उन भिन्न भाषा-भाषियों के बीच सेतु का कार्य कर सके। हिंदी ने उस काल में इस दायित्व का निर्वाह किया।

आधुनिक काल

आधुनिक काल में हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता और अभिमान की प्रतीक बन गई। हिन्दी भाषा के सन्दर्भ में आधुनिक काल का प्रारम्भ सन् 1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से स्वीकार किया जा सकता है। इस कॉलेज में अन्य विषयों के साथ अरबी, फारसी, संस्कृत हिन्दुस्तानी, बंगला, ग्रीक आदि भाषाओं को पढ़ाने की भी व्यवस्था थी। हिन्दुस्तानी विभाग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. जान गिलक्रिस्ट ने हिन्दुस्तानी का गम्भीर अध्ययन किया था। गिलक्रिस्ट की भाषा-नीति हिन्दी के विरोध् में पड़ती थी। इसके कारण आगे चलकर हिन्दी-उर्दू का भयंकर विवाद खड़ा हुआ। सन् 1823 में विलियम प्राइस के विभागाध्यक्ष बनने तक हिन्दुस्तानी के स्थान पर हिन्दी का अध्ययन प्रारम्भ हो गया था। प्राइस हिन्दी और हिन्दुस्तानी में लिपि और शब्दों का ही अन्तर मानते थे। गिलक्रिस्ट की भाषा-नीति के कारण हिन्दी का विशेष लाभ तो नहीं हुआ परन्तु फिर भी खड़ी बोली को विकसित होने का कुछ अवसर अवश्य मिला। कॉलेज ने खड़ी बोली में ‘गद्य रचना’ को प्रोत्साहित किया। कॉलेज द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकों द्वारा भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सहायता मिली। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह सब कार्य हिन्दी क्षेत्र में नहीं बल्कि बंगला भाषी कलकत्ता को केन्द्र बनाकर हो रहा था।

1857 में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया। इस संग्राम में हिन्दी ही भाषायी दायित्व निभा रही थी। सभी क्रान्ति-समाचार, संवाद और संदेश हिन्दी मे ही प्रसारित किए जाते थे। परन्तु फिर भी यह माना गया कि उपयुक्त सार्वदेशिक भाषा के अभाव में क्रान्ति का संदेश करोड़ो लोगों तक नहीं पहुँचा तथा देशी भाषाओं में उचित शिक्षा के अभाव में जनमानस को अंग्रेजी के विरुद्ध तैयार नहीं किया जा सका। फलत: आगे चलकर राष्ट्रीय आन्दोलन के उन्नायकों ने यह अनुभव किया कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार से ही देश की स्वाधीनता में मदद मिल सकती है। इस सम्बन्ध में हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों ने नेतृत्व की बागडोर संभाली। इस समय जिन चिन्तकों, नेताओं ने हिन्दी की राष्ट्रभाषा के रूप में कल्पना की, उनमें केशवचन्द्र सेन मूर्धन्य हैं। सन् 1873 में अपने बंगाली पत्र ‘सुलभ समाचार’ में उन्होंने लिखा, यदि भाषा एक न होने पर भारतवर्ष में एकता न हो तो उसका उपाय क्या है? समस्त भारतवर्ष में एक भाषा का प्रयोग करना इसका उपाय है। इस समय भारत में जितनी भी भाषाएँ प्रचलित हैं, उनमें हिन्दी भाषा प्राय: सर्वप्रचलित है। इस हिन्दी भाषा को यदि भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बनाया जाये तो अनायास ही यह (एकता) शीघ्र ही सम्पन्न हो सकती है।

प्रसिद्ध बंगला साहित्यकार और ‘वन्देमातरम्’ के रचियता बंकिमचन्द्र चटर्जी ने भी हिन्दी की सहायता से पूरे भारत को एकसूत्र में बाँधने की कल्पना की थी।

सन् 1916 के लगभग महात्मा गाँधी राष्ट्रीय परिदृश्य पर आए। गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने स्वाध्याय से हिन्दी का ज्ञान प्राप्त किया था। वे जानते थे कि हिन्दी के बिना देश को एक कर अंग्रेजों के विरुद्ध सफल आन्दोलन नहीं चलाया जा सकता। सन् 1925 में कांगे्रस ने यह प्रस्ताव पास किया कि कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम-काज आमतौर पर हिन्दुस्तानी में चलाया जाएगा। इस घोषणा से हिन्दुस्तानी आंदोलन को पर्याप्त बल मिला। राजगोपालाचारी भी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। सन् 1939 में जब भारत के कई प्रदेशों में कांगे्रस की निर्वाचित सरकारों का गठन हुआ तो मद्रास के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने मद्रास (वर्तमान तमिलनाऊ) के सभी विद्यालयों में हिन्दी शिक्षण अनिवार्य कर दिया। उनके इस प्रयासों को गाँधी जी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। जब गाँधी जी और राजा जी के प्रयात्नों पर कुछ लोगों ने शंका उठाई तो गाँधी जी ने कहा, कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि हम प्रान्तीय भाषाओं को नश् करके हिन्दी को सारे भारत की एकमात्र भाषा बनाना चाहते हैं। इस गलतफहमी से प्रेरित होकर वे हमारे प्रचार का विरोध् करते हैं। मैं हमेशा से यह मानता रहा हूँ कि हम किसी भी हालत में प्रान्तीय भाषााओं को मिटाना नहीं चाहते। हमारा मतलब तो सिर्फ यह है कि विभिन्न प्रान्तों के पारस्परिक सम्बन्ध के लिए हम हिन्दी भाषा सीखें। हिन्दी को राष्ट्रभाषा की ओर अग्रसर करने में उस समय अन्य अनेक लोगों ने अपनी भूमिका निभाई। ब्रह्मसमाज के केशवचन्द्र सेन के विचारों का उल्लेख पहले हो चुका है। इन्हीं की प्रेरणा से महर्षि दयानन्द ने हिन्दी में भाषण देना प्रारम्भ किया और हिन्दी में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की। ब्रह्मसमाज के संस्थापक राजा राममोहन राय मानते थे कि केवल हिन्दी ही अखिल भारतीय भाषा बन सकती है। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती मूलत: गुजराती थे परन्तु अपने भाषणों, ग्रंथों, लेखों में उन्होंने हिन्दी को वरीयता दी। आर्यसमाज के दस नियमों के पाँचवाँ नियम कहता है कि प्रत्येक आर्यसमाजी के लिए हिन्दी पढ़ना अनिवार्य है। आर्यसमाज की हिन्दी सेवा के सम्बन्ध में श्री रामगोपाल लिखते हैं, आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द ने अपने निजी उदाहरण से अपने हिंदी भाषी अनुयायियों को भी हिन्दी का प्रयोग करने की प्रेरणा दी। वह स्वयं गुजराती थे। उन्होंने हिन्दी सीखी और केवल उसे ही अपने व्याख्यानों तथा लेखनी का माध्यम बनाया। उनका उद्देश्य आर्यसमाज के सिद्धान्तों का प्रसार करना था, परन्तु उनके अनुयायियों के धर्म से जो अधिक उत्तम चीज जीवन को प्राप्त हुई, वह था राष्ट्रभाषा का प्रचार।

आर्यसमाज के ही समान सनातनधर्म सभा ने भी भारत के विभिन्न प्रदेशों में हिन्दी को प्रोत्साहन दिया। पं. मदनमोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश्दत्त तथा श्रद्धाराम फिल्लौरी आदि ने पंजाब में हिन्दी की लगभग दो सौ सायंकालीन पाठशालाओं की स्थापना, लाहौर से ‘विश्वबन्ध्ु’ हिन्दी दैनिक का प्रकाशन तथा रोचक उपदेशों एवं व्याख्यानों द्वारा हिन्दी-सेवा का कार्य किया। महाराष्ट्र में ‘प्रार्थना समाज’ के महादेव गोविन्द रानाडे के अतिरिक्त ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’, (अन्तर्राश््रीय कार्यालय मद्रास) की श्रीमती एनी बेसेंट ने भी हिन्दी का समर्थन किया। श्रीमती बेसेंट ने हिन्दी को सर्वािधाक प्रचलित भारतीय भाषा स्वीकार करते हुए उसे राष्ट्र की एकता का मुख्य साधन माना। रामकृष्ण मिशन राधस्वामी सम्प्रदाय काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्ध गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबादऋ बम्बई हिन्दी विद्यापीठ बम्बई महाराष्ट्र राष्ट्रसभा, पुणे हिन्दी विद्यापीठ, देवध्र असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गोहाटी हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद मैसूर रिसायत हिन्दी प्रचार समिति, बंगलौरऋ मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद्, बंगलौर केरल हिन्दी प्रचार सभा, त्रिवेन्द्रम कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति, बंगलौर उड़ीसा राष्ट्रभाषा परिषद्, पुरी सौराराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति, राजकोट मणिपुर हिन्दी परिषद् इम्फाल आदि अनेक संस्थाएँ इस दिशा में सक्रिय रही हैं। उपर्युक्त सूची से स्पश् है कि आधुनिक युग में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का कार्य हिन्दी क्षेत्रों के अलावा हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी पर्याप्त गति से हुआ है।

वास्तव में आज भी ये सभी संस्थाएँ हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की उसी दिशा में सक्रिय है, जिसका स्वप्न गाँधी जी ने देखा था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद उन्होंने कहा था, हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्कृतिक नुकसान पहुँचाना है।… इस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीननेवाले अंग्रेजों की सियासी हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति को दबानेवाली अंग्रेजी भाषा को भी यहाँ से निकाल बाहर करना चाहिए।

इन संस्थाओं की ओर से हिन्दी शिक्षण की दृष्टि से विभिन्न परीक्षाओं का आयोजन होता है। पुस्तके और पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास की ओर से सभा में ‘स्नातकोत्तर अध्ययन और अनुसंधन विभाग’ की स्थापना की गई है तथा ‘हिन्दी प्रचार समाचार’ और ‘दक्षिण भारत’ नामक मासिक पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्ध भी ‘राश््रभाषा’ और ‘राष्ट्रभारती’ नामक पत्रिकाएँ प्रकाशित करती है। गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद और बम्बई हिन्दी विद्यापीठ, बम्बई की ओर से आयोजित हिन्दी परीक्षाओं में हजारों परीक्षाथ्र्ाी सम्मिलित होते हैं।’

स्वातंत्रयोत्तर काल स्वतंत्रता के पश्चात् भी राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास का कार्य रुका रहा है। सत्य तो यह है कि आज इसकी गति तीव्र हुई है। आवागमन की अधिक सुविधा के कारण पर्यटन को बढ़ावा मिला है। आज पहले से अधिक पर्यटक और तीर्थयात्री दूसरे प्रदेशों में जा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से ऐसी स्थितियों में हिन्दी ही सम्पर्क भाषा का काम करती है, जिससे उसके प्रयोग क्षेत्र में वृद्धि हो रही है।

ऊपर जिन संस्थाओं का नामोल्लेख किया गया है, वे भारत के हिन्दीतर क्षेत्रों, विशेषत: दक्षिण भारत में हिन्दी की प्रगति के लिए प्रयासरत हैं। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आजादी के कुछ समय बाद दक्षिण, विशेष रूप से तमिलनाऊ में हिन्दी विरोधी आंदोलन हुए थे। लेकिन ये आंदोलन राजनीतिक आधार पर टिके हुए थे। इनका नेतृत्व करुणानिधि सदृश नेता कर रहे थे। राजनीतिक रोटियाँ सेंक लेने के बाद उनका यह आंदोलन शांत हो गया। यहाँ यह भी उल्लेख्य है कि उन्हीं करुणानिधि के अपनी एक पुस्तक के हिन्दी संस्करण का विमोचन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कराने की खबर समाचार पत्रों में छपी है। इससे यह स्पश् होता है कि दक्षिण भारतीयों के मन में भी हिन्दी के लिए अपार स्नेह है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी को आगे बढ़ाने में अनुवाद कार्य का विशेष योगदान रहा है। हिन्दी में अनुवाद लम्बे समय से होते रहे हैं, परन्तु इन्हें विशेष गति स्वतंत्रता के पश्चात् ही मिली। भारतीय संविधान का हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है। तमाम वैज्ञानिक, तकनीकी और विधि साहित्य का हिन्दी में अनुवाद हुआ है। लेकिन राष्ट्रभाषा की दृष्टि से सर्वोपरि अहिन्दी भाषियों की रचनाओं का हिन्दी में और हिन्दी की रचनाओं का अन्य भाषाओं पर्याप्त मात्रा में अनुवाद हो रहा है। साहित्य अकादमी की ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ और भारतीय अनुवाद परिषद् की ‘अनुवाद’ पत्रिका इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इस दृष्टि से अनेक प्रयास किए गए हैं। भारतीय संविधान में सरकार ने शिक्षा के लिए ‘त्रिभाषा फार्मूला’ प्रस्तुत किया है जिसके अंतर्गत प्रत्येक हिन्दी भाषी को हिन्दी तथा हिन्दी भाषी को एक क्षेत्रीय भाषा पढ़ाने की बात की गई है। संविधान के इस प्रावधान का अपेक्षित लाभ तो नहीं हुआ है तथापि एक सीमा तक सभी भाषाएँ एक-दूसरे के निकट आई हैं। विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी के पठन-पाठन का प्रबंध किया गया है। विद्यालय के स्तर पर देखें तो इसका पर्याप्त प्रचार बढ़ा है। यहाँ तक कि उत्तर पूर्व के प्रदेशों में से अरुणाचल प्रदेश ने प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है।

हिन्दी की प्रगति और सम्पूर्ण भारत में उसके प्रचार-प्रसार की दृष्टि से कुछ संस्थाओं की भी स्थापना हुई है। इनमें केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा तथा केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, दिल्ली विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। निदेशालय ने हिन्दी को राश््रव्यापी बनाने के लिए हिन्दी भाषा और लिपि के मानकीकरण का सफल प्रयास किया है। इसके प्रयासों से ही हिन्दी में संयुक्त वर्ण को अलग-अलग लिखा जाने लगा है, जिससे हिन्दी सरल हो रही है। हिन्दी की सरलता इसके राष्ट्रव्यापी होने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान अपनी कक्षाओं, शोधपरक कार्यों और ‘गवेषणा’ पत्रिका के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के निकट लाकर हिन्दी को आगे बढ़ाने का काम कर रही है। राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रगति में सर्वाधिक योगदान फिल्मों, रेडियो और दूरदर्शन का है। बॉलीवुड फिल्मों का बहुत बड़ा निर्माण केन्द्र है। हिन्दी फिल्में विदेशों तक में पसन्द की जाती हैं, तब भारत की तो बात ही क्या? पूरे दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत में हिन्दी फिल्में देखी और पसंद की जाती हैं। स्वाभाविक रूप से इससे हिन्दी को भी प्रचार-प्रसार मिलता है। हिन्दी क्षेत्र के कलाकार हिन्दीतर भाषाओं की फिल्मों में और अहिन्दी भाषी कलाकार हिन्दी फिल्मों मे काम करने को आतुर रहते हैं। रेडियो ने भी हिन्दी के मानचित्र को विस्तृत किया है। रेडियो पर आने वाले फिल्मी गानों, नाटकों तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों की हिन्दीतर क्षेत्रों में भी खूब माँग है। दूरदर्शन ने तो इस क्षेत्र में क्रांति ही कर दी है। यह आज का सर्वािधाक लोकप्रिय संचार माध्यम है। इस माध्यम पर हिन्दी की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि अनेक विदेशी चैनलों ने अपने कार्यक्रम हिन्दी में ‘डब’ ही नहीं किए हैं, अंग्रेजी चैनलों की भाषा ही हिंदी कर दी है। कार्टून नेटवर्क से लेकर विदेशी फिल्में तक हिंदी में दिखाई जाती हैं, जिससे हिंदी का हिंदी भाषी क्षेत्रों में पर्याप्त विस्तार हुआ है।

आर्थिक उदारीकरण से भी हिंदी के राष्ट्रभाषा स्वरूप में प्रगति हुई है। अनेक विदेशी कंपनियाँ भारत में आई हैं। उन्होंने भारत की सभी दिशाओं में अपने कार्यालय और फैक्ट्रियाँ भारत में आई हैं। उन्होंने भारत की सभी दिशाओं में अपने कार्यालय और फैक्ट्रियाँ शुरू की हैं। देश की कंपनियाँ भी सर्वत्र अपना व्यापार बढ़ा रही हैं। अच्छे रोजगार की तलाश में नवयुवक-युवतियाँ अन्य प्रदेशों में जाने में तनिक भी संकोच नहीं करते, कुछ उत्तर भारत में आकर हिंदी सीखते हैं तो कुछ दक्षिण भारत में जाकर परोक्ष रूप से हिंदी का प्रचार करते हैं। इस प्रकार अनेकानेक कारणों से हिंदी भारत भर में फैलती जा रही है। आज अनेक स्थानों पर हिंदी की स्थिति एक नई शैली जैसी हो गई है। बंबइया हिंदी और कलकतिया हिंदी इसका प्रमाण हैं। भारत सरकार ने भी इस दिशा में काफी सहयोग दिया है।

यद्यपि आज नागर परिवेश को देखने पर लगता है कि देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है। राजभाषा के रूप में अंग्रेजी की समय सीमा को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा चुकी है। पूँजीपति, अधिकारी वर्ग और नेताओं के बच्चे अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। पूरे देश में आज भी अधिकांश जनता हिंदी बोलती अथवा समझती है। सरकार का ऐसा कोई कार्य आज भी सफल नहीं हो पाता जिसका प्रचार हिंदी के माध्यम से न किया जाए। वास्तव में हिंदी जन-जन की भाषा है पूरे, राष्ट्र की भाषा है, राष्ट्र की आत्मा इसमें बसती है। पूरे भारत में इसका निरंतर प्रचार-प्रसार हो रहा है।

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