आधुनिक आर्य भाषा एवं उनका वर्गीकरण

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अनुक्रम -

आधुनिक आर्य भाषा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं-

1. आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में प्रमुखत: वही ध्वनियाँ हैं जो प्राकृत, अपभ्रंश आदि में थीं। किन्तु कुछ विशेषताएँ भी हैं-

(क) पंजाबी आदि में उदासीन स्वर ‘अ’ भी प्रयुक्त होने लगा है। अवधी आदि में जपित या अघोष स्वरों का प्रयोग होता है। गुजराती में मंर्मर स्वर का विकास हो गया है। प्राकृत-अपभ्रंश में केवल मूल स्वर थे, किन्तु अवहट्ट में ऐ, औ विकसित हो गए थे। कई आधुनिक भाषाओं में इनका प्रयोग होता है, यद्यपि कुछ बोलियों में केवल मूल स्वरों का प्रयोग हो रहा है, संयुक्त स्वरों का नहीं।

(ख) ‘ऋ’ का प्रयोग तत्सम शब्दों में लिखने में चल रहा है, किन्तु बोलने में यह स्वर न रहकर ‘र’ के साथ इ या उ स्वर का योग रह गया है। उत्तरी भारत में इसका उच्चारण ‘रि’ है और गुजराती आदि में ‘रु’।

(ग) व्यंजनों में जहाँ तक उष्मों का प्रश्न है, लिखने में तो प्रयोग स, ष, श तीनों का हो रहा है, किन्तु उच्चारण में स, श दो ही हैं। ‘ष’ भी ‘श’ रूप में उच्चरित होता है। चवर्ग के उच्चारण में आधुनिक काल में एकरूपता नहीं है। हिन्दी में वे ध्वनियाँ स्पर्श-संघष्री हैं, किन्तु मराठी में इनका एक उच्चारण त्स (च) द्ज (ज) जैसा भी है। सच पूछा जाय तो मराठी में दो चवर्ग हो गये हैं।

संयुक्त व्यंजन ‘ज्ञ’ के शुद्ध उच्चारण (ज् ञ) का लोप हो चुका है, उसके स्थान पर ज्यँ, ग्यँ और द्यँ, द्नँ आदि कई उच्चारण चल रहे हैं। (घ) विदेशी भाषाओं के प्रभाव-स्परूप आधुनिक भाषाओं में कई नवीन ध्वनियाँ आ गई हैं, जैसे क, ख़्, ग़्, ज़्, फ, ऑ, आदि।

इन ध्वनियों का लोकभाषाओं में तो क, ख, ग, ज, फ, आ के रूप में उच्चारण हो रहा है। किन्तु पढ़े-लिखे लोग इन्हें प्राय: मूल रूप में बोलने का प्रयास करते हैं। संगम (Juncture) तथा अनपुनासिकता प्राय: सभी में स्वनिमिक है।

2. जिन शब्दों के उपध (Penultimate) स्वर या अन्तिम को छोड़कर किसी और पर बलात्मक स्वराघात था, (क) उनके अन्तिम दीर्घ स्वर प्राय: ह्रस्व हो गए है। तथा (ख) अंतिक ‘अ’ स्वर कुछ अपवादों (संयुक्त व्यंजनादि) को छोड़कर प्राय: लुप्त हो गया है (राम्, अब् आदि)।

3. प्राकृत आदि में जहाँ समीकरण के कारण व्यंजनद्वित्त या दीर्घ व्यंजन (कर्म-कम्म) हो गए थे, आधुनिक काल में ‘द्वित्व’ में केवल एक रह गया और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घता आ गई (कम्म-काम, अठ्ठ-आठ)। पंजाबी, सिन्धी अपवाद है, उनमें प्राय: प्राकृत से मिलते-जुलते रूप ही चलते हैं (अठ्ठ, कम्म)।

4. बलात्मक स्वराघात ह। वाक्य के स्तर पर संगीतात्मक भी है।

5. अपभ्रंश के प्रसंग में कहा जा चुका है कि संस्कृत, पालि आदि की तुलना में रूप कम हो गए थे। आधुनिक भाषाओं में अपभ्रंश की तुलना में भी रूप कम हो गए है, इस प्रकार भाषा सरल हो गई है। संस्कृत आदि में कारक के तीनों वचनों में लगभग 24 रूप बनते थे। प्राकृत में लगभग 12 हो गए थे, अपभं्रश में 6 और आधुनिक भाषाओं में केवल दोन, तीन या चार रूप हैं। क्रिया के रूपों में भी पर्याप्त कमी हो गई है। क्रियार्थ या काल आदि तो सभी, बल्कि संस्कृत आदि से व्यक्त कर किए जाते हैं किन्तु सबके रूप अलग नहीं हैं। सहायक शब्दों से काम चल जाता है। मूल रूप थोडे़ हैं।

6. रचना की दृष्टि से संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि की भाषा योगात्मक थी। अयोगात्मकता अपभं्रशों से आरम्भ हुई और अब, आधुनिक भाषाएँ (नाम और धतु दोनों दृष्टियों से) पूर्णत: अयोगात्मक या वियोगात्मक हो गई हैं। कुछ रूप योगात्मक हैं भी तो उअवाद-स्वरूप। नाम रूपों के लिए परसर्गों का प्रयोग होता है और धतु-रूपों के लिए कृदंत और सहायक क्रिया के आधार पर संयुक्त क्रिया का।

7. संस्कृत में वचन 3 थे। मध्यकालीन आर्यभाषाओं में ही द्विवचन समाप्त हो गया था और आधुनिक काल में भी केवल दो वचन हैं। अब प्रवृति एकवचन की है। लगता है कि आगे चलकर रूप केवल एकवचन के रह जायँगे और दो, तीन या अधिक का भाव सहायक शब्दों से प्रकट किया जाएगा। उदाहरणार्थ, हिन्दी में ‘मैं’ के प्रयोग की प्रवृत्ति कम हो रही है। उसके स्थान पर ‘हम’ चल रहा है, जिसके बहुवचन का कोई अलग रूप नहीं होता, केवल ‘लोग’ या ‘सब’ जोड़कर काम चला लेते हैं।

8. संस्कृत में लिंग 3 थे। मध्ययुगीन भाषाओं में भी स्थित यही थी। आधुनिककाल में सिन्धी, पंजाबी, राजस्थानी तथा हिन्दी में 2 लिंग हैं (पुलिग, स्त्रीलिंग) सम्भवत: तिब्बत-बर्मी मुंडा आदि भाषाओं के प्रभाव के कारण बंगाली, उड़िया, असमी में लिंगभेद कम-सा है। बिहारी, नेपाली में भी समाप्त होता-सा दिखाई दे रहा है। तीन लिंग केवल गुंजराती, मराठी और (कुछ) सिंहली में हैं।

9. आधुनिक भाषाओं में प्राचीन तथा मध्ययुगीन से शब्द-भण्डार की दृष्टि से सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पश्तो, तुर्की, अरबी, फारसी, पुर्तगाली तथा अंग्रेजी आदि से लगभग 8-9 हजार नये विदेशी शब्द आ गए हैं। इनके पूर्व भाषाओं का प्रमुख शब्द-भण्डार तत्सम, तद्भव और देशज का ही था। मध्ययुगीन भाषाओं की तुलना में आज तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक हो रहा है और तद्भव का अपेक्षाकृत कम। इधर पारिभाषिक शब्दावली की कमी दूर करने के लिए नए शब्द बनाए और अपनाए जा रहे हैं। अनुकरणात्मक एवं प्रतिध्वन्यात्मक शब्द बहुत प्रयुक्त होने लगे हैं।

आधुनिक भारतीय आर्यभाषा में सिन्धी, गुजराती, लहँदा, पंजाबी, मराठी, उड़िया, बंगाली, असमिया, हिन्दी (पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कश्मीरी भी भारत की एक महत्त्वपूर्ण भाषा है, किन्तु मूलत: वह भारत-ईरानी की दरद शाखा में आती है। उर्दू, वस्तुत: भाषावैज्ञानिक स्तर पर हिन्दी की ही अरबी-फारसी से प्रभावित एक शैली है।

राजस्थानी, पहाड़ी तथा बिहारी को लोगों ने अलग रखा है, किन्तु ये हिन्दी प्रदेश में आती हैं, वस्तुत: अब भाषा के आकृतिमूलक या पारिवारिक वर्गीकरण से सांस्कृतिक वर्गीकरण को कम महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता और इस दृष्टि से ये सभी-राजस्थानी, पहाड़ी, बिहारी-हिन्दी के सांस्कृतिक वर्ग में आती हैं।

भारत के बाहर बोली जाने वाली आधुनिक आर्यभाषा में नेपाली, सिंहली तथा जिप्सी भी उल्लेख्य हैं।

नेपाली-यह ‘पहाड़ी’ का पूर्वी रूप है। पहाड़ी बोलियों के प्रदेश के पूर्वी भाग की भाषा होने के कारण इसे ‘पूर्वी पहाड़ी’ भी कहते हैं। ‘नेपाली’ को नैपाल में नैपाली कहते हैं। नेपाल में बोले जाने के कारण ही इसका नाम ‘नेपाली’ है। ‘नेपाल’ शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मत हैं। कुछ लोग नेपाल का सम्बन्ध ‘ने’ नामक Íषि से जोड़ते हैं। बौद्ध मत के अनुसार ‘नेपाल’, ‘ने’ + ‘पाल’ दो शब्दों से बना है। ‘ने’ का अर्थ है ‘स्वयंभू’ और ‘पाल’ का अर्थ है ‘पालन करने वाला’। अर्थात् ‘नेपाल’ का अर्थ है ‘जिसका पालक स्वयंभू हो।’ अधिक प्रामाणिक मत यह है कि ‘नेपाल’ का सम्बन्ध ‘नेपाल’ से है। नेपाल के कुछ भागों में ‘नेपाल’ (अब इसे ‘नेवार’ कहते हैं) जाति के लोग रहते हैं, कदाचित् उन्हीं के आधार पर देश को पहले ‘नेपार’ कहा गया। मागघी प्राकृत की सामान्य प्रवृत्ति के अनुसार ‘र’ का ‘ल’ हो जाने से ‘नेपार’ शब्द बाद में ‘नेपाल’ हो गया।

हिन्दी प्रदेश की सामान्य जनता ‘नेपाल’ को ‘नैपाल’ कहती है। ‘नेपाली’ का एक अन्य नाम ‘गोरखाली’ भी है। यहाँ के शासक, नेपाल के शासक बनने के पूर्व, ‘गोरखा’ नामक नगर, (काठमांडू से 70 मील दूर) में रहते थे, अत: उन्हें ‘गोरखे’ तथा उसी कारण नैपाल के लोगों को भी ‘गोरखे’ कहते हैं। इसी आधार पर ‘नेपाली’ भाषा का एक नाम ‘गोरखाली’ या ‘गुरखाली’ है। भाषा के अर्थ में ‘गोरखाली’ का प्रयोग ‘नेपाली’ से फराना है। शासकीय स्तर पर ‘गोरखाली’ भाषा के लिए ‘नेपाली’ नाम का प्रयोग 1932 के बाद हुआ है। पर्वतीय प्रदेश की भाषा होने के कारण इसे पर्वतिया या पर्बतिया भी कहते हैं। इसका एक अन्य नाम ‘खसकुरा’ भी है। ‘खसकुरा’ का अर्थ है ‘खसों की भाषा’ यहाँ ‘खस’ लोग भी काफी हैं।

‘नेपाल’ शब्द का प्राचीन प्रयोग कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है, किन्तु भाषा के अर्थ में ‘नेपाली’ का प्रयोग अत्याधुनिक है। ‘नेपाली’ नाम से लगता है कि यह पूरे नेपाल की भाषा है, किन्तु वस्तुत: बात ऐसी नहीं है। यहाँ के आर्य शासक तथा अन्य आर्य लोग ही इसका प्रयोग करते हैं। नेपाल के आदिवासियों की भाषा ‘नेवारी’ है जो चीनी परिवार की तिब्बती-बर्मी शाखा की एक बोली है। नेपाल के शासकों की भाषा होने के कारण ही नेपाली पूरे नेपाल की राष्ट्रभाषा है। ‘नेपाली’ अन्य पर्वतीय भाषाओं की तरह ग्रियर्सन के अनुसार ‘आवन्त्य’ अपभ्रंश से निकली है तथा डॉ. सपाुनीतिकुमार चटर्जी के अनुसार यह ‘खस अपभ्रंश’ से निकली है। ऐतिहासिक और भौगोलिक कारणों से इस पर राजस्थानी, मैथिली, दरद, खस तथा तिब्बती-बर्मी की ‘नेवारी’ आदि भाषाओं का प्रभाव पड़ा है। प्रमुखत: रूप की दृष्टि से यह ‘राजस्थानी’ तथा शब्द-समूह एवं मुहावरों आदि की दृष्टि से ‘नेवारी’ से बहुत अधिक प्रभावित है। इधर काफी दिनों से हिन्दी का भी नेपाल में पर्याप्त प्रचार रहा है और यहाँ हिन्दी के समाचार-पत्र आदि भी निकलते रहे हैं। 19वीं सदीं तक यहाँ, हिन्दी की बोली अवधी तथा भोजपुरी आदि में कविताएँ भी होती रही हैं।

इस प्रकार हिन्दी से नेपाली का पर्याप्त सम्बन्ध रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ है कि नेपाली भाषा में बहुत से हिंदी शब्द चले गए हैं। प्रमुखत: वर्तमान नेपाली में तो हिन्दी शब्दों की संख्या बहुत ही अधिक है। नेपाली भाषा का प्राचीनतम नमूना 1543 ई. के एक ताम्रपात्र में मिलता है। इसके प्राचीनतम प्रसिद्ध साहित्यकार प्रमनिधि पंत कहे जाते हैं, किन्तु उनकी कोई भी रचना उपलब्ध नहीं है। नेपाली के फराने कवियों में भानुदत्त (रचना-काल 19वीं सदी का मध्य) सर्वश्रेष्ठ हैं। इनकी रामायण बहुत सपुनदर रचना है। वर्तमान काल में नेपाली गद्य-पद्य की सभी विधओं में प्रगति कर रही है। पहाड़ी प्रदेश की भाषाओं में बोलियों-उपबोलियों का प्राय: बाहुल्य हो जाता है। यह बात नेपाली में भी है। पूरे नेपाल में इसके अनेक तिब्बती-बर्मी तथा कुमायूँनी आदि से प्रभावित स्थानीय रूप प्रचलित हैं। इनमें उल्लेख्य केवल चार हैं पाल्पा, दही, कुसवार तथा देनवार। पाल्पा नेपाल का कुमायूँनी से प्रभावित वह रूप हैं जो काठमांडू के पश्चिम ‘पाल्पा’ नगर के आसपास बोला जाता है। दही नेपाली का एक विकृत रूप है जो नेपाल की तराई में ‘दही’ नामक जाति के लोगों में व्यवहृत होता है। इसे दढी या दढ़ी भी कहते हैं।

नेपाल की तराई में देनवार नामक जाति के लोगों में भी नेपाली का एक विकृत रूप प्रयुक्त होता है जिसे देनदार या दोनवार कहते हैं। इसी प्रकार नेपाल की तराई में ही नेपाली का ‘कुसवार’ जाति में प्रयुक्त एक विकृत रूप कुसवार या कसवार कहलाता है। ‘कुसवार’ का व्याकरण चीनी परिवार की स्थानीय तिब्बती-बर्मी बोलियों से प्रभावित है। नेपाली लिखने के लिए नागरी लिपि का प्रयोग होता है। नेपाली बोलने वाले पर्याप्त लोग भारत में भी रहते हैं। 1921 की जनगणना के अनुसार नेपाली बोलने वालों की संख्या भारत में डेढ़ लाख से कुछ ही कम थी।

सिंहली-इसका क्षेत्र लंका के दक्षिणी भाग में है। लगभग 5वीं सदी ई. पू. में विजय नामक राजा के साथ कुछ भारतीय लंका में जाकर बस गए। इन्हीं लोगों के साथ यहाँ से यह भाषा भी अपने मूल रूप में गई। विजय राजा तथा उसके साथी कहाँ के थे, इस सम्बन्ध में विवाद है। ये लोग जहाँ के रहने वाले होंगे, वहीं की भाषा से सिंहली का सम्बन्ध होगा। कुछ लोगों ने इन्हें पश्चिमी बंगाल का माना है जिनके अनुसार सिंहली का सम्बन्ध उस समय बंगाल में प्रयुक्त भाषा से होगा, किन्तु कुछ लोगों ने सौराष्ट्र, लाट या गुजरात में उनका स्थान माना है। अधिक सम्भावना सौराष्ट्र की ही है। इस प्रकार सिंहली का सम्बन्ध सौराष्ट्र की पालि या पूर्व भाषा से है। बाद में बौद्ध धर्म के कारण मगध् से भी लंका का सम्बन्ध हो गया और इस पर पालि तथा संस्कृत का भी कुछ प्रभाव पड़ा।

सिंहली प्राकृत भारतीय प्राकृतों की तरह लंका की प्राकृत है। इसका अधिकांश साहित्य नष्ट हो चुका है, केवल कुछ अभिलेख ही शेष हैं। सिंहली में प्राप्त साहित्य 10वीं सदी के आसपास का है। सिंहली भाषा का प्राचीन रूप ‘एळु’ शब्द सिंहल का ही एक विकसित रूप एळु (सिंहल > सीहळु > हिअळु > हेळु > एळु) है। एळु एक प्रकार से अपभ्रंश है, अर्थात् सिंहली प्राकृत और वर्तमान सिंहली के बीच की भाषा है। एळू पर मराठी का कुछ प्रभाव भी पड़ा है। मालद्वीप तथा आसपास के द्वीपों की भाषा भी सिंहली का ही एक रूप है। इसे महल (Mahl) कहते हैं। यह 10वीं सदी को सिंहली से विकसित हुई है। अपने पूरे इतिहास में भारतीय आर्यभाषाएँ एक-दूसरे से पर्याप्त प्रभावित होती रही है, किंतु सिंहली का विकास प्राय: स्वतन्त्र रूप से हुआ है। हाँ, द्रविड़ परिवार का कुछ प्रभाव उस पर अवश्य है।

जिप्सी-घुमंतू लोगों द्वारा प्रयुक्त एक भाषा, जिसे हबूड़ी, रोमनी, बंजारा तथा बंजारी आदि भी कहते हैं। जिप्सी भाषाएँ मूलत: भारोपीय परिवार की हैं। 5वीं सदी ई.पू. में बंजारा या जिप्सी भाषियों के पूर्वज जहाँ-तहाँ इधर-उधर फैल गए। इस प्रकार इनकी भाषा मूलत: 5वीं सदी ई. पू. की प्राकृत भाषा से संबद्ध है। इस पर कुछ प्रभाव दरद भाषाओं का भी है। जिप्सी की भारत में प्रमुख भाषाएँ बेल्दारी, भाम्टी, डोम, गारोड़ी, गुलगुलिया, कंजरी (इसकी एक बोली ‘कुचबंधी’ है), कोल्हारी, लाड़ी, मचरिया, मलार, चूहरा या चूहड़ा, मनवाला या ल्हारी, नदी, ओड्की पेंढारी, कशाई, सांसी तथा सिकलगारी आदि है।

भारत में जिप्सी भाषाओं के बोलने वालों की संख्या 1924 की जनगणना के अनुसार 15,000 से अधिक थी। ग्रियर्सन ने अपने भाषा-सर्वेक्षण में इनकी संख्या 1 लाख से उपर दी है। ये लोग ईरान, तुर्की होते 12वीं सदी में मध्य यूरोप पहुँच चुके थे। अब पूरे यूरोप, मध्य एशिया, कुछ अर्कीकी भाग तथा अमेरिका तक य पहुँच गए हैं। इस समय जिप्सी भाषाएँ आर्मेनिया, तुर्की सीरिया, ईरान, रूस, इटली, र्कांस, बेल्ज आदि अनेक देशों में बोली जाती हैं। अकेले रूस में इनकी संख्या एक लाख से उपर है। अपने वर्तमान रूप में ये भाषाएँ स्थानीय भाषाओं से काफी प्रभावित हो गई हैं। संस्कृत मूल के शब्दों में इनमें घ, ध्, भ के स्थान पर प्राय: ख, थ, फ मिलता है। टवर्गीय ध्वनियाँ कई स्थानों पर पूर्णत: समाप्त हो गई हैं तथा ज़्, ज़् ख़्, मध्य स्वर इ आदि कई नई ध्वनियाँ विकसित हो गई हैं। प्रारंभ में इनको ‘इजिप्ट’ से आया समझा गया था।

‘इजिप्शियन’ शब्द ही विकसित होकर ‘जिप्सी’ बन गया है। प्रारंभ में लोग समझते थे कि जिप्सी भाषाओं का संबंध मूलत: पिश्मोत्तरी प्राकृत से है। किंतु डॉ. टर्नर ने अंतिम रूप से ध्वनि एवं रूपों के आधार पर (The position of Romani in Indo-Aryan, Edunburg. 1927) यह सिद्ध कर दिया कि इनका संबध मध्यदेशीय भाषा से है। वहाँ से ये पश्चिमोत्तरी क्षेत्र में गए और वहाँ से प्रभावित होते भारत के बाहर गए। इनकी भाषाओं में विभिन्न भाषाओं के शब्दों आदि के आधार पर इनके जाने के पथ का भी न्यूनाधिक रूप से निर्धारण कर दिया गया है।

आधुनिक आर्य भाषा का वर्गीकरण

विश्व के समस्त भाषा-कुलों में भारतीय भाषकुल का और इसमें भारतीय आर्य भाषाओं का विशेष महत्त्व है। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा से मध्ययुगीन भारतीय आर्य भाषाओं का उद्भव हुआ है और उससे आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का विकास हुआ है। वर्तमान समय की आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का विकास रेखांकन योग्य है। इसकी विभिन्न शाखाओं में भरपूर साहित्य रचना हो रही है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर इस परिवार की विभिन्न भाषाओं का वर्गीकरण किया गया है। यहाँ कुछ प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों का वर्गीकरण प्रस्तुत है-

हार्नले द्वारा प्रस्तुत आधुनिक आर्य भाषा का वर्गीकरण

भारतीय आर्य भाषाओं के वर्गीकरण के संबंध में प्रथम नाम हार्नले का आता है। उन्होंने आर्य के विषय में एक सैद्धांतिक तथ्य सामने रखा है कि आर्य बाहर से भारत में दो बार आए हैं। इनके भारत में प्रथम आगमन का मार्ग ¯सध्ु पार कर पंजाब से रहा है। दूसरी बार इनका आगमन कश्मीर की ओर से हुआ है। दूसरी बार आर्यों के आगमन पर पूर्वकाल में आए देश के कोने-कोने में फैल गए। दूसरी बार आए आर्य देश के मध्य भाग में बस गए। इस प्रकार हार्नले ने आर्यों के बहिरंग तथा अंतरंग वर्गों के आधार पर ही उनकी भाषाओं को भी वर्गीकृत किया है। इस आधार पर हार्नले ने अंतरंग और बहिरंग दो वर्ग बनाए।

हार्नले ने “Comparative Grammar of the Gaudian Languages” में एक भिन्न वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है। इसमें उन्होंने विभिन्न दिशाओं के आधार पर भाषा-सीमा बनाने का प्रयत्न किया है। ये भाषा-वर्ग हैं-

  1. पूर्वी गौडियन : पूर्वी हिंदी (बिहारी सहित), बंगला, उड़ीसा, असमी।
  2. पश्चिमी गौडियन : पश्चिमी हिंदी (राजस्थानी सहित), गुजराती, ¯सधी, पंजाबी।
  3. उत्तरी गौडियन : पहाड़ी (गढ़वाली नेपाली आदि)
  4. दक्षिणी गौडियन : मराठी।

इस प्रकार हार्नले द्वारा प्रस्तुत किया गया आधुनिक भारतीय भाषा का आदि वर्गीकरण भले ही विस्तृत और पूर्ण वैज्ञानिक नहीं सिद्ध हो सका है, किंतु इसका अपना विशेष महत्त्व है इस वर्गीकरण की प्रमुख विशेषता यह है कि परवर्ती वर्गीकरण अल्पाधिक रूप से इस पर आधरित हैं।

ग्रियर्सन द्वारा प्रस्तुत आधुनिक आर्य भाषा का वर्गीकरण

जार्ज इब्राही ग्रियर्सन ने आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का समुचित सर्वेक्षण करके उनकी विशेषताओं के आधार पर वर्गीकरण करने का प्रयत्न किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए दो वर्गीकरण इस प्रकार हैं-

प्रथम वर्गीकरण : ग्रियर्सन ने हार्नले के बाह्य और आंतरिक सिद्धांत-वर्गीकरण को आंशिक आधार बनाकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का वर्गीकरण किया है। उन्होंने इस वर्गीकरण में समस्त भाषाओं को मुख्यत: तीन वर्गों में विभक्त किया है।

आधुनिक भारतीय आर्य भाषा : ग्रियर्सन द्वारा प्रस्तुत प्रथम वर्गीकरण

1. बाहरी उपशाखा :

  1. पूर्वी वर्ग : उड़िया, बंगला, असमी, बिहारी।
  2. पश्चिमोत्तर वर्ग : लहंदा, ¯सधी
  3. दक्षिणी वर्ग : मराठी।

2. मध्यवर्ती उपशाखा : मध्यवर्ती वर्ग : पूर्वी हिंदी।

3. भीतरी उपशाखा :

  1. केद्रीय वर्ग : पश्चिमी हिंदी, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी।
  2. पहाड़ी वर्ग : नेपाली (पूर्वी पहाड़ी), मध्य पहाड़ी, पश्चिमी पहाड़ी।

ग्रियर्सन के मतानुसार विभिन्न उपशाखाओं में विभक्त भाषाओं की ध्वनियों, शब्दों तथा उनके व्याकरणिक रूपों में पर्याप्त भिन्नता है। उन्हीं आधारों पर उन्होंने विभिन्न भाषाओं को उपशाखाओं में विभक्त किया है। डॉ. सपाुनीतिकुमार चटर्जी और डॉ. भोलानाथ तिवारी ने इस वर्गीकरण की विभिन्न दृष्टियों से समीक्षा की है। इस वर्गीकरण के आधार पर विशेषताओं पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण से इस प्रकार विचार किया जा सकता है।

(क) ध्वन्यात्मक विशेषताएँ

ग्रियर्सन ने बाहरी उपशाखा की कुछ ऐसी ध्वन्यात्मक विशेषताएँ रेखांकित की हैं, जो भीतरी उपशाखा में नहीं हैं यथा-

  1. उनके अनुसार बाहरी उपशाखा की भाषाओं में इ, उ तथा ए स्वरांत शब्दों की उक्त ध्वनियों का लोप नहीं होता है, किंतु अंत: वर्ग की भाषाओं में इन ध्वनियों का लोप हो जाता है। यदि भीतरी उपशाखा की भाषाओं को ऐसी शब्दांत ध्वनियों के विषय में देखें, तो पाएँगे कि उनका लोप वहाँ भी नहीं होताऋ यथा-पति, पशु, मिले आदि।
  2. इस शाखा में इ ध्वनि ए और उ ध्वनि में परिवख्रतत हो जाती हैं। ऐसा ध्वनि-परिवर्तन बाहरी शाखा की भाषाओं में ही नहीं भीतरी शाखा की भाषाओं में भी मिलता हैं यथा-इ > ए : मिलना > मेल, मेला, तिल > तिल। उ > ओ : सुखाना > सोखना, मुग्ध > मोह, तुही > तोही।
  3. उक्त शाखा की भाषाओं की ‘इ’ तथा ‘उ’ ध्वनि आपस में एक-दूसरे के प्रयोग स्थान पर प्रयुक्त होती है। भीतरी शाखा की भाषाओं में भी यदा-कदा ऐसे प्रयोग मिल जाते हैं यथा-इ-उ : बुंद > बदु।
  4. ग्रियर्सन के अनुसार ‘ड़’ और ‘ल’ के स्थान पर ‘र’ का प्रयोग होता है। ऐसी ध्वन्यात्मक विशेषताएँ भीतरी शाखा की भाषाओं में भी यदाकदा मिल जाती हैं यथा-ड > र : किवाड़ > किवार, पड़ गए > पर गए सड़क > सरक, चिड़िया > चिरिया। ल > र : बल > बर, बिजली > बिजुरी, तले > तरे। यह प्रवृत्ति अवधी तथा ब्रज में पर्याप्त रूप से मिलने के साथ खड़ी-बोली में भी अल्पााधिक रूप मे मिल जाती है।
  5. उनकी मान्यता है कि बाहरी शाखा की भाषाओं में द तथा ड ध्वनियाँ आपस में एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। ऐसी प्रवृत्ति तो भीतरी शाखा की भाषाओं में भी मिलती है यथा- द > ड : दंशन > डसना, दंड > डंड या डंडा, ड्याढ़ी > देहली।
  6. बाहरी शाखा की भाषाओं में ‘म्ब’ से ‘म’ ध्वनि का विकास माना गया है, साथ ही यह भी संकेत किया गया है कि भीतरी शाखा में ‘म्ब’ का ‘ब’ रूप होता है दोनों उपशाखाओं के शब्दों की ध्वनियों के अध्ययन से यह तथ्य सामने आता है कि इसके विपरीत प्रवृत्ति भी मिलती है। पश्चिमी तथा पूर्वी हिंदी में निम्ब से नीम, निबोलीऋ जम्बुक से जामपाुन शब्द रूप हो जाते हैं तो बंगला में निम्बुक से लेंबू रूप हो जाता है।
  7. उनके अनुसार बाहरी शाखा की भाषाओं में ‘स’ ध्वनि श, ख या ह के रूप में मिलती है। यदि बाहरी शाखा की पूर्वी वर्ग की बंगला तथा दक्षिणी वर्ग की मराठी भाषाओं में देखें तो यह ध्वनि ‘श’ के रूप में प्रयुक्त होती है। बंगला की पूर्वी बोली तथा असमी में यह निर्बल ध्वनि ‘ख’ के रूप में प्रयुक्त होती है। पश्चिमोत्तर वर्ग की लहँदा तथा ¯सधी भाषाओं में यही ध्वनि ‘ह’ के रूप में मिलती है। ग्रियर्सन द्वारा संकेत की गई उपशाखा की यह प्रवृत्ति भीतरी उपशाखा में भी मिलती है यथा-द्वादश > बारह, केसरी झ केहरी, पंच-सप्तति > पचहत्तर, कोस > कोह।
  8. ग्रियर्सन के अनुसार बाहरी शाखा की भाषाओं की महाप्राण ध्वनियाँ अल्पप्राण हो जाती है। यदि भीतरी शाखाओं की भाषाओं के विषय में चिंतन करें, तो यह परिवर्तन इसमें भी मिलता है यथा-भगिनी > बहन या बहिन, ईठा (प्राकृत) (इष्टक) > र्इंट।
  9. उनके अनुसार संयुक्त व्यंजन के मध्य स्थिति अर्ध-व्यंजन का लोप हो जाता है। क्षतिपूरक दीघ्र्ाीकरण नियमानुसार पूर्व वर्ग का रूप दीर्घ हो जाता है। भीतरी शाखा की भाषाओं में भी ऐसे ध्वनि-परिवर्तन मिल जाते हैं यथा-कर्म झ काम, सप्त झ सात, हस्त झ हाथ, चर्म झ चाम आदि।
  10. इसमें अंतस्थ ‘र’ का लोप हो जाता है। वह प्रवृत्ति भीतरी शाखा की भाषाओं में भी मिलती है यथा-और > और > औ, पर > पै।
  11. इसमें ही ‘ए’ का ‘ऐ’ और ‘औ’ होने की बात कही गई है, भीतरी शाखा की भाषाओं के उच्चारण में यदा-कदा ऐस परिवर्तन मिल जाते हैं यदा-कदा ऐसे परिवर्तन मिल जाते हैं यथा-सेमैस्टर > सैमेस्टर।
  12. बाहरी शाखा की भाषाओं में द और ध् के ज और > होने की बात कही गई है। ये परिवर्तन भीतरी शाखा की भाषाओं में भी मिल जाते हैं।

(ख) व्याकरणिक विशेषताएँ

  1. ग्रियर्सन ने ‘ई’ प्रत्यय के प्रयोग के आधार पर बाहरी शाखा की भाषाओं को अलग किया है, किंतु भीतरी शाखा की भाषाओं में ऐसी प्रवृत्ति संज्ञा, क्रिया, विशेषण आदि शब्दों के स्त्रीलिंग बनाने में मिलती है यथा- संज्ञा : लड़का > लड़की, मामा > मामी, दादा > दादी। विशेषण : अच्छा > अच्छी, गंदा > गंदी, पीला > पीली क्रिया : जाता > जाती, रोता > रोती, गाता है > गाती है।
  2. उन्होंने बाहरी शाखा की भाषाओं के विशेषण शब्दों में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग संरचना में ‘ला’ तथा ‘ली’ प्रयोग की बात कही है, जो भीतरी भाषाओं में भी मिलती है यथा- पुल्लिंग विशेषण : गठीला, रँगीला, खर्चीली, कटीली।
  3. ग्रियर्सन के अनुसार संस्कृत संयोगात्मक भाषा थी। उसके पश्चात की भाषाएँ क्रमश: वियोगात्मक होती गई हैं। बाहरी शाखा की भाषाओं में आगे के विकास की बात कही गई है, अर्थात् उसमें पुन: संयोगात्मक रूप विकसित हो गए हैं। ‘राम की किताब’ का बंगला रूपांतरण ‘रामेर बोई’ होता है। भीतरी शाखा की भाषाओं के कारक के संयोगात्मक प्रयोग में भी ये रूप देखे जा सकते हैं यथा-अपने काम से मतलब है। तुमसे भी कहूँ। उनकी बात है।
  4. क्रिया शब्दों तथा धतु रूपों में समानता की बात कही गई है। यह तथ्य न तो बाहरी शाखा की भाषाओं में पूर्णत: मिलता है और न ही भीतरी शाखा की भाषाओं में। दोनों ही शाखाओं की भाषाओं में मिलने वाली ऐसे प्रवृत्ति को भेदक आधार रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  5. भूतकालिक क्रिया का रूप कर्त्ता के अनुरूप प्रयुक्त होता है। यह बाहरी शाखा की भाषाओं के अतिरिक्त पूर्वी हिंदी में भी मिलती है, यथा- हम इमिली खायेन-(मैंने इमली खाई) हम आम खायेन-(मैंने आम खाया) बाहरी शाखा की भाषाओं में यह प्रवृत्ति केवल अकर्मक क्रिया के संदर्भ में ही मिलती है।
  6. ग्रियर्सन के अनुसार भूतकालिक क्रिया के साथ आने वाला सर्वनाम क्रिया के साथ अंतभ्र्ाूत होता है। बाहरी शाखा की सभी भाषाओं में यह प्रक्रिया नहीं मिलती है। इस प्रकार यह भी स्पष्ट भेदक आधार नहीं है।
  7. बाहरी शाखा की भाषाओं के सभी वर्गों के शब्दों को सप्रत्यय माना है। यदि भीतरी शाखा की भाषाओं के शब्दों पर विचार करें तो ऐसी ही प्रकृति इसमें भी मिलती है यथा-मैं (मैंन), तै (तूने), बालहि (बालक को)।

(ग) शब्दगत विशेषताएँ

ग्रियर्सन के अनुसार बाहरी शाखा की सभी भाषाओं के शब्दों में पर्याप्त समानता है। यदि तुलनात्मक दृष्टिकोण से भीतरी तथा बाहरी शाखाओं की विभिन्न भाषाओं का अध्ययन करें, तो पाएँगे कि बंगला-लहँदा या बंगला-मराठी की अपेक्षा कहीं अधिक समता बंगला तथा हिंदी में मिलती है। तो वास्तव में हिंदी का एक रूप है। इस प्रकार बाहरी तथा भीतरी शाखाओं की भाषाओं के विभिन्न शब्द वर्गों और उनकी रचना में पर्याप्त समानता होने से वर्गीकरण का यह आध् ार भी वैज्ञानिक नहीं सिद्ध होता है।

(घ) वंशानुगत विशेषताएँ

आधुनिक भारतीय आर्य भाषा के बाहरी तथा भीतरी उपशाखा आधरित वर्गीकरण को फष्ट आधार देने के लिए आर्य परिवार को दो उपवर्गों में विभक्त किया गया है। मंतव्य के अनुसार बाहरी क्षेत्र के आर्य एक जाति के थे और भीतरी क्षेत्र के आर्य दूसरी जाति के थे। इस प्रकार भिन्न जाति के होने के कारण उनकी भाषा भी भिन्न बताई गई है। इस विचार के अनुसार बंगाल, ¯सध् तथा महाराष्ट्र क्षेत्र के आर्य एक जाति के और उत्तर-प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान आदि क्षेत्रों के आर्य दूसरी जाति के थे, किंतु ऐतिहासिक दृष्टिकोण में यह मंतव्य गलत सिद्ध होता है। अधिकांश इतिहासवेत्ताओं के अनुसार आर्य एक ही परिवार के थे।

द्वितीय वर्गीकरण : ग्रियर्सन ने बाद में पश्चिमी-हिंदी को विशेष महत्त्व देते हुए एक नए ढंग का वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। इसमें पश्चिमी हिंदी को केद्र में रखा गया है। इस वर्गीकरण में विभिन्न भाषाओं की समान विशेषताओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उनके इस वर्गीकरण को इस प्रकार रेखांकित कर सकते हैं:

  1. मध्य देशीय भाषा-पश्चिमी हिंदी
  2. अंतर्वर्ती भाषाएँ-पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, पहाड़ी (पश्चिमी हिंदी से अधिक समता रखने वाली भाषाएँ)
  3. बाहरी भाषाएँ-1. पश्चिमोत्तरी भाषाएँ-लहँदा, ¯सधी 2. दक्षिणी भाषा-मराठी 3. पूर्वी भाषाएँ-बिहारी, उड़िया, बंगला, असमी।

डॉ. ग्रियर्सन के द्वारा किए गए दोनों ही वर्गीकरण पूर्ण वैज्ञानिक कोटि में नहीं आते हैं, क्योंकि प्रथम वर्गीकरण की दोनों उपशाखाओं की ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक तथा शब्दगत विशेषताओं में स्पष्ट भेदक रेखा खींचना संभव नहीं है। आर्यों को बाहरी तथा भीतरी दो जातियों में विभक्त करना इतिहास के तथ्यों के विपरीत है। इनके द्वारा प्रस्तुत द्वितीय वर्गीकरण अधिक उपयोगी तथा अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक है। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के अब तक हुए वर्गीकरणों में ग्रियर्सन का वर्गीकरण निश्चय ही महत्वपूर्ण है। इस वर्गीकरण के माध्यम से आधुनिक भारतीय आर्य भाषा की विभिन्न भाषायी विशेषताओं के अध्ययन का अवसर मिल जाता है।

डॉ. सपुनीतिकुमार चटर्जी द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण

डॉ. चटर्जी ने ओरिजन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ बेंगाली लैंग्वेज में डॉ. ग्रियर्सन द्वारा किए गए आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के बाहरी और भीतरी वर्गीकरण के ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक तथा शब्दगत आधारों की आलोचना की है। इस प्रकार उदाहरण फष्ट आलोचना करने से जहाँ ग्रियर्सन के वर्गीकरण की वैज्ञानिकता तथा उसकी सीमा स्पष्ट होती है, वहीं नए वर्गीकरण का आधार बनता है। इसी पुस्तक में उन्होंने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की आपसी समीपता तथा पारस्परिक विशेषताओं को महत्त्व देते हुए उनको वर्गीकृत किया है।

इस वर्गीकरण में उन्होंने वैदिक काल से वर्तमान समय तक मध्यक्षेत्र की भाषा की महत्ता-संकेत करते हुए उसी भाषा को वर्गीकरण का आधार बनाया है। वर्तमान समय में पश्चिमी हिंदी उसी महत्त्वपूर्ण भूमिका के रूप में सामने आती है। इस प्रकार सर्वप्रथम मध्यप्रदेश भाषा वर्ग बनाकर उसमें पश्चिमी हिंदी रखी गई। पश्चिमी हिंदी के पश्चिमी क्षेत्र की भाषाओं-गुजराती तथा राजस्थानी को आपसी समता के कारण ये एक साथ पश्चिमी भाषा-वर्ग में रखी गई हैं। समता की दृष्टि से ¯सधी तथा लहँदा के साथ ही पंजाबी भाषा भी एक वर्ग में रखी गई हैं।

इस वर्गीकरण में भी मराठी एक अलग दक्षिणी वर्ग में रखी गई है। पूर्वी वर्ग में आने वाली बिहारी, बंगला, असमी तथा उड़िया के साथ ही पूर्वी हिंदी भी रखी गई है यथा-

  1. (क) उत्तरी (उदीच्य) वर्ग- 1. ¯सधी, 2. लहँदा। 3. पंजाबी।
  2. (ख) पश्चिमी (प्रतीच्य) वर्ग- 4. गुजराती। 5. राजस्थानी।
  3. (ग) मध्य (मध्यदेशीय) वर्ग- 6. पश्चिमी हिंदी।
  4. (घ) पूर्वी (प्राच्य) वर्ग- 7. पूर्वी हिंदी। 8. बिहारी। 9. बंगला। 10. असमी। 11. उड़िया।
  5. (घ) दक्षिणी (दक्षिणात्य) वर्ग- 12. मराठी।

इस वर्गीकरण की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  1. डॉ. ग्रियर्सन डॉ. धीरेंद्र वर्मा आदि ने भारतीय आर्य भाषाओं के वर्गीकरण में ‘पहाड़ी’ भाषा को महत्व देते हुए माध्य शाखा के उपवर्ग तथा उत्तरी भाषा के रूप में स्थान दिया है। डॉ. चटर्जी के वर्गीकरण में ‘पहाड़ी’ का नाम न आने से उनके द्वारा उस भाषा को महत्त्व न देने की बात स्पष्ट होती है। उन्होंने पहाड़ी को दरद तथा राजस्थानी भाषा को सम्मिलित रूप माना है।
  2. आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के वर्गीकरण के संदर्भ में ग्रियर्सन तथा कुछ अन्य भाषा वैज्ञानिकों ने भीली तथा खानदेशी को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकार कर एक वर्ग में स्थान दिए हैं। डॉ. चटर्जी इन दोनों ही भाषाओं को स्वतंत्र रूप में स्वीकार नहीं किया है। इस कारण इन्हें वर्गीकरण में स्थान नहीं मिल सका है।
  3. यह वर्गीकरण विभिन्न भाषाओं की विशेषताओं की समानता के आधार पर किया गया है, इसलिए सुविधजनक है। इस वर्गीकरण के विषय में डॉ. सरयूप्रसाद अग्रवाल ने भाषाविज्ञान और हिंदी (द्वितीय संस्करण) के पृष्ठ 138 पर अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया है-फ्यह अंधनुकरण नहीं वरन् विशेषताओं की दृष्टि से समीचीन वर्गीकरण हैं। डॉ अग्रवाल ने इस वर्गीकरण की सरलता को स्पष्ट करते हुए आगे कहा है-सुविधा की दृष्टि से श्रेयस्कर है। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के वर्गीकरण में डॉ. चटर्जी के वर्गीकरण का अपना महत्त्व है।

आधुनिक आर्य भाषा एवं उनका वर्गीकरण

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