ईसाई विवाह के नियम और विशेषताएं

By Bandey No comments
अनुक्रम -

जिस प्रकार हिन्दू अनेक जातियों में तथा मुसलमान शिया और सुन्नियों में विभाजित हैं, उसी प्रकार ईसाइयों में भी स्तरीकरण मिलता है। वे दो समूहों में विभाजित हैं केथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट। केथोलिक लेटिन केथोलिक तथा सीरियन केथोलिक में उप विभाजित हैं। प्रत्येक समूह और उप समूह अन्तर्विवाही (endogamous) होता है। केथोलिक लोग प्रोटेस्टेन्ट्स में विवाह नहीं करते तथा लेटिन केथोलिक सीरियन केथोलिक समूह में विवाह नहीं करते। ईसाइयों में उक्त सामाजिक स्तरीकरण की पृष्ठभूमि में ईसाई विवाह का विश्लेषण किया जा सकता हैं और हिन्दू व मुस्लिम से तुलना भी।

व्यवहारिक रूप से हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई विवाहों का एक उद्धेश्य तो सामान्य (common) है-यौन सम्बन्धों को सामाजिक मान्यता प्रदान करना तथा संतान उत्पन्न करना। किन्तु हिन्दुओं में विवाह धार्मिक भावनाओं (sentiments) पर आधारित है, मुस्लिम विवाह में इसका कोई बड़ा महत्व नहीं है। ईसाई विवाह में धर्म बहुत महत्वपूर्ण है। ईसाई सोचते हैं कि विवाह का मानवीय जीवन सम्बन्धी ईश्वर के उद्धेश्य (God’s purpdzse) में एक विशेष स्थान है। ईसाई समाज में यौन समागम एक आवश्यक बुराई नहीं समझी जाती और न इसे सन्तानोत्पनि के लिए एक सामान माना जाता है। ईसाइयों की मान्यता है कि विवाह ईश्वर की इच्छा से ही सम्पन्न होता है। विवाह के बाद स्त्री पुरुष एक-दूसरे में समा जाते हैं।

अत: विवाह उनमें न केवल जैविकीय सम्बन्ध परन्तु मानसिक और धार्मिक सम्बन्ध भी स्थापित करता है। ईसाई विश्वास के अनुसार विवाह के तीन उद्धेश्य प्रमुख हैं-सन्तान उत्पनि, बिना विवाह के यौन सम्बन्धों से संरक्षण और पारस्परिक सहयोग व सान्त्वना। इन उद्धेश्यों के आधार पर ईसाई विवाह को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है एक पुरुष और स्त्री के बीच यौन सम्बन्ध, पारस्परिक साहचर्य व परिवार की स्थापना के लिए एक अनुबंध है, जो सामान्यत: पूरे जीवन के लिए होता है। हिन्दू और मुसलमान की तरह ईसाई भी दो समूहों में विभाजित है केथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट।

जीवन-साथी का चुनाव व वैवाहिक संस्कार

ईसाई समाज में हिन्दुओं की तरह जीवन-साथी का चुनाव दो प्रकार से होता हैμबच्चों द्वारा स्वयं चुनाव व माता-पिता द्वारा चुनाव। परन्तु 10 में से 9 प्रकरणों में चुनाव माता-पिता के द्वारा ही होता है। जीवन-साथी के चुनाव में रक्त सम्बन्धों को दूर रखा जाता है तथा सामाजिक स्थिति, परिवार की स्थिति, शिक्षा, चरित्र, एवं स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इस प्रकार समरक्तता (consanguinity) व विवाह सम्बन्धी (affinity) प्रतिबन्धों के संदर्भ में ईसाई व हिन्दू विवाह में बहुत कम अन्तर पाया जाता है। मुसलमानों की भांति विवाह में वरीय व्यक्ति (preferred person) का चुनाव नहीं होता है।

जीवन साथी के चुनाव के पश्चात सगाई (betrothal) की रस्म निभाई जाती है। माता-पिता अपनी सम्मति पादरी को बता देते हैं जिसे पादरी पंचों तक पहुंचाता है। यह रस्म लड़की के घर ही होती है। लड़का लड़की को अंगूठी पहनाता है तथा लड़की भी अक्सर लड़के को अंगूठी पहनाती है। सगाई के बाद दोनों ही पक्षों को कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होती है जैसे, गिरजे की सदस्यता का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना, चरित्र प्रमाण-पत्र देना, तथा विवाह की निश्चित तिथि के तीन सप्ताह पूर्व चर्च में विवाह हेतु प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करना।

चर्च का पादरी इसके पश्चात विवाह के विरुद्ध लिखित आपनि मांगता है। एक निश्चित अवधि में कोई आपनि न आने पर पादरी विवाह की तिथि निश्चित कर देता है। कन्या जिस गिरजे की सदस्य होती है उसी में विवाह सम्पन्न होता है। पादरी वर व कन्या दोनों से पूछता है कि क्या वे एक-दूसरे को पति-पत्नि के रूप में स्वीकार करते हैं और जब वे अपनी सहमति दे देते हैं तब पादरी गवाहों के समक्ष दम्पत्ति को यह घोषित करने को कहता है व विवाह सम्पन्न करता है-मैं (नाम) ईश्वर की उपस्थिति में तथा प्रभु ईशु के नाम पर तुम को (नाम) वैधानिक पति/पत्नि स्वीकार करता/करती हूं।

ईसाई विवाह की विशेषताएं

ईसाई एक-विवाह (monogamy) को आदर्श मानते हैं तथा बहु-विवाह निषेधित है। 1869 का भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम जिसमें 1891, 1903, 1911, 1920 तथा 1928 में संशोधन किया गया था, ईसाई विवाह के सभी पक्षों पर प्रकाश डालता है, जैसे, विवाह कौन सम्पािकृत करेगा, किस स्थान पर (यानि चर्च में) सम्पन्न होगा, किस समय सम्पन्न होगा (6 बजे प्रात: से 7 बजे सांय तक), विवाह के समय वर व वधू की कम से कम आयु क्या हो और वे शर्ते जिनके अन्तर्गत विवाह सम्पन्न होना है (विवाह के समय दोनों पक्षों के जीवित प्रेम साथी नहीं होने चाहिए)।

ईसाई विवाह-विच्छेद को भी मानते हैं, यद्यपि चर्च इसकी अनुमति नहीं देता। सन् 1896 के भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम के द्वारा भारतीय ईसाइयों को विवाह-विच्छेद की वैधानिक अनुमति प्राप्त है। इस अधिनियम में विवाह-विच्छेद, विवाह को अवैध घोषित करना, न्यायिक पृथक्ककरण, सुरक्षा आदेश, तथा विवाह सम्बन्धी अिमाकार की पुन: स्थापना शामिल है।

विवाह को निम्नलिखित आधारों पर अवैध घोषित किया जा सकता है-पति-पत्नि के बीच निकट का रक्त सम्बन्ध, पति नपुंसक हो, साथी के पागल होने पर, और पति के दूसरी शादी करने पर। पति के क्रूर तथा व्यभिचारी होने पर न्यायिक पृथक्करण (judicial separation) भी लिया जा सकता है। ईसाइयों में मेहर दहेज की पृथा नहीं है। विधवा विवाह न केवल मान्य है, बल्कि उसको प्रोत्साहन भी दिया जाता है।

अन्त में कहा जा सकता है कि ईसाई विवाह हिन्दू विवाह की भांति पवित्र बन्धन (sacrament) नहीं है। यह स्त्री और पुरुष के बीच एक समझौता है जिसमें यौन सम्बन्धों पर कम बल दिया जाता है, किन्तु आपसी सहयोग तथा सहायता पर अधिक बल दिया जाता है।

ईसाई विवाह के नियम और विशेषताएं

Related Posts

Leave a Reply