राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या है?

अनुक्रम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक देशव्यापी सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है। देशभर में सभी राज्यों के सभी जिलों में 58,967 हजार से शाखाओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य चल रहा है। प्रत्येक समाज में देशभक्त, अनुशासित, चरित्रवान और नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों की आवश्यकता रहती है। ऐसे लोगों को तैयार करने का, उनको संगठित करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में एक संगठन ना बनकर सम्पूर्ण समाज को ही संगठित करने का प्रयास करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अर्थ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर हम तीनों ही शब्दों के अर्थ को विस्तार से समझेंगे। सर्वप्रथम राष्ट्रीय शब्द का अर्थ है कि जिसकी अपने देश, उसकी परम्पराओं, उसके महापुरुषों, उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति अव्यभिचारी एवं एकान्तिक निष्ठा हो, जो देश के साथ पूर्ण रूप से भावात्मक मूल्यों से जुड़ा हो अर्थात् जिसको सुख-दु:ख, हार-जीत व शत्रु-मित्र की समान अनुभूति हो वह राष्ट्रीय कहलाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक विभाग के कार्यकर्ता के अनुसार, ‘‘अपने देश के राष्ट्रीयता हेतु सभी आवश्यक तत्वों की पूर्ति हिन्दू समाज के जीवन में हो जाती है। अत: हिन्दू समाज का जीवन ही राष्ट्रीय जीवन है, अर्थात् हिन्दू ही राष्ट्रीय है’’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार व्यवहारिक रूप से राष्ट्रीय, भारतीय तथा हिन्दू शब्द पर्यायवाची है।

स्वयंसेवक से अभिप्राय है कि स्वयं प्रेरणा से राष्ट्र, समाज, देश, धर्म तथा संस्कृति की सेवा करने वाले व उसकी अभिवृद्धि के लिये प्रमाणिकता तथा नि:स्वार्थ बुद्धि से कार्य करने वाले व्यक्तियों को स्वयंसेवक कहते हैं।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के अनुसार, ‘‘राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं प्रेरणा से अग्रसर लोग।’’ मा.स. गोलवलकर ने स्वयंसेवक को निस्वार्थ रूप से देश की सेवा करने वाला कहा है, उन्होंने समाज में इनका व्यक्तित्व ऐसा हो कि लोग उनके बारे में कहें कि, ‘‘यह व्यक्ति विश्वास करने योग्य है, इसमें अपने प्रति निष्कपट, नि:स्वार्थ प्रेम है।’’ श्री गुरुजी ने एक स्वयंसेवक के गुणों की चर्चा भी विस्तारपूर्वक की है जो इस प्रकार है-

1. जो नि: संग एवं निर्लेप है, जिसमें अहंकार नही है, जो धैर्यवान है, जिसके मन में आकांक्षा और उत्साह है, उसी प्रकार कर्म की सफलता से या असफलता से अथवा लाभ-हानि से जो विचलित नहीं होता उसे ही हमारे यहाँ सात्विक कार्यकर्ता (स्वयंसेवक) कहा गया है।

2. उत्तम कार्य करने का अर्थ है, हम जनता के विश्वास-भाजन बनें। हमारा आचरण शुद्ध हो, तभी जनता हमारा विश्वास करेगी। हमारा व्यक्तिगत जीवन इतना निष्कलंक हो कि किसी के भी मन में सपने में भी हमारे प्रति कोई संदेह-निर्माण नहीं होना चाहिए एक समय था जब हमारा यह समाज शील एवं चरित्र से सम्पन्न था। आज भी ग्रामीण प्रदेश में हमें इस सत्शीलता के अनेक उदाहरण देखने को मिल जाते हैं।

3. ध्येय के साथ हम जितना एकरूप होंगे, उठते-बैठते, जागते-सोते, सदा सर्वकाल हमारे अन्तकरण में अपने जीवन के इसी ध्येय का स्पन्दन चलता रहेगा तो हमारे शब्दों में सामथ्र्य आयेगा हम जिनसे बात करेंगे वे हमारी बात मानेंगे। जिसे हम कुछ करने के लिए कहेंगे, वह उसे करने के लिए तैयार हो जायेगा किसी के सामने हम अपना सिद्धान्त रखेंगे, तो वह उस सिद्धान्त को स्वीकार करेगा हमने लाख कहा, किन्तु हमारे सम्मुख जो बैठा है, वह हमारे सिद्धान्त को मान्य न करता हो, तो उसका अर्थ यह लेना चाहिए कि हमारी तपस्या कम पड़ी है, उसे बढ़ाना होगा अपना ध्येयचिन्तन कुछ कम पड़ गया है, दुर्बल हो गया है, उसे तेजस्वी और बलवान बनाना होगा इस बात को हमें ठीक से समझ लेना चाहिए दूसरों को दोष न देकर हमारे अन्दर किस बात की त्रुटि है, इसका विचार करना चाहिए

4. हमारी वाणी मधुर हो। सत्य और अच्छा किन्तु मधुर बोलना चाहिए कटु सत्य नहीं बोलना चाहिए यह नहीं कहना चाहिए कि मैं बहुत अक्खड़ आदमी हूँ और उद्दण्ड बातें करूँगा सत्य तो बोलना चाहिए, किन्तु उसे ऐसे मीठे शब्दों में बोलना चाहिए कि सुनने वाले के हृदय में कोई चोट न पहुँचे और वह उस सत्य को सुन भी ले।

अत: जो स्वयं प्रेरणा से, बिना किसी प्रतिफल या पुरस्कार की इच्छा के, अनुशासन पूर्वक, निर्धारित पद्धति से, निरन्तर व योजनाबद्ध रूप के मातृभूमि की सेवा करे, वह स्वयंसेवक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शाब्दिक अर्थ संगठन या समुदाय होता है। समान विचार वाले, समान लक्ष्य को समर्पित, परस्पर आत्मीय भाव वाले व्यक्तियों के निकट आने से संगठन बनता है। ये सभी एक ही पद्धति, रीति व पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करते हैं।

कृष्णकुमार अष्ठाना ने कहा है कि, ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन है। हिन्दू समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाकर राष्ट्र को परमवैभव सम्पन्न बनाना, यह उसका इष्ट है।’’

आन्ध्र के एक प्रमुख सर्वोदयी नेता श्री प्रभाकर राव ने 1977 में आन्ध्र के पूर्व तट पर समुद्री चक्रवात के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की सेवा भावना, तत्परता व निष्ठा, नि:स्वार्थ भावना को देखकर आर.एस.एस. की व्याख्या ‘‘Ready for Selfless Service’’ की थी, जिसका अर्थ है, नि:स्वार्थ सेवा के लिए सदा सिद्ध। इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र के प्रति समर्पण, त्याग, सेवा की भावना से ओत-प्रोत संगठन है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

प. पू. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण किन परिस्थितियों में किया, सर्वप्रथम हम इस पर विचार-विमर्श करेंगे कि ऐसा क्या हुआ, अथवा किसके अभाव या कमी के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विकास करना पड़ा। हेडगेवार एक देशभक्त व सक्रिय क्रान्तिकारी, एक चिन्तनशील व्यक्ति थे। उन्होंने इतिहास में पढ़ा था कि किस प्रकार हमारे देश की संस्कृति व सभ्यता, विश्व की सर्वोपरि संस्कृति है और कैसे हमारी हिन्दू संस्कृति को विदेशी आक्रमणों व अंग्रेजों के द्वारा धाराशायी की जा रही है। इसके पीछे उन्होंने जो कारण पाया वह था राष्ट्रीय एकता की कमी व हमारा समाज हिन्दुत्व की श्रेष्ठता, गौरवशाली अतीत व सामाजिक समरसता के भाव का विस्मरण करता जा रहा है। व्यक्ति आत्मकेन्द्रित, व्यक्ति बनकर स्वार्थ में लिप्त हो रहा है, जिसके कारण सामूहिक अनुशासन का अभाव हो रहा है। हमारे समाज में भाषा, शिक्षा, जीवन मूल्यों व हिन्दू में व्यक्ति हीनता की भावना का विकास हो रहा था।

अंग्रेजों से अपने देश को आजाद करने के लिए भी आदि कारण रहे, जिसकी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। सही मायने में हमारा देश जो गुलाम हुआ, कभी मुस्लिम, कभी अंग्रेजों के द्वारा इसका सही कारण हमारे देश की सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता की कमी ही रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा उस जड़ को ही समाप्त करना था ताकि भविष्य में हमें ऐसी समस्या से जूझना ना पड़े।

27 सितम्बर, 1925 को विजयादशमी के दिन प्रखर राष्ट्रवादी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने विश्वस्त साथियों के साथ विचार-विमर्श कर नागपुर में एक नए संगठन एवं कार्यपद्धति का श्रीगणेश किया। आनन्द आदीश के शब्दों में:-

‘‘विजयदशमी का पावन दिन

उन्नीस सौ पच्चीस का प्रभात,

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जन्म

कितना अनुपम, कितना उदात्त!’

’ हर रविवार को समता संचालन का प्रशिक्षण प्रारम्भ हुआ जबकि हर गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर भाषण प्रारंभ हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लिखित रूप में कोई उद्देश्य नहीं था, आश्चर्य होता है। इस संगठन ने अपना कोई प्रचार नहीं किया था। 6 महीने तक तो नामकरण भी नहीं हुआ था। 17 अप्रैल 1926 को संगठन का नामकरण किया गया। नागपुर के मोहित बाड़ा में प्रतिदिन 1 घण्टे की मिलन नित्य शाखा 28 मई, 1926 से प्रारम्भ हुई और आज भारतवर्ष के प्रत्येक राज्य एवं प्रत्येक जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 58,967 शाखाओं के माध्यम से सामाजिक कार्य कर रहा है।

इस प्रकार डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से सम्पूर्ण देश को जागृत करना व उपर्युक्त कमियों, जो देश में थी, उनको दूर करने के लिए डॉक्टर जी ने स्वाभिमानी, संस्कारित, अनुशासित, चरित्रवान, शक्तिसम्पन्न, विशुद्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत, व्यक्तिगत अंहकार से मुक्त व्यक्तियों का ऐसा संगठन बनाया। जो स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ होने के साथ ही राष्ट्र व समाज पर आने वाली प्रत्येक विपत्ति का सामना भी कर सकेगा आज विश्व के अन्य 471 देशों में भी यह संगठन हिन्दू संस्कृति की रक्षा कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना

उत्तर भारत में जो वंदना गायी जाती थी उसका कुछ भाग तथा मराठी प्रार्थना का भाग दोनों मिलाकर प्रार्थना की रचना हुई और उद्घोष के रूप में ‘राष्ट्र गुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी की जय’ के साथ उसकी पूर्णता की। समर्थ गुरु रामदास ने ही छत्रपति शिवाजी को प्रेरणा दी जिन्होंने कालान्तर में हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की थी। पहले बोली जाने वाली प्रार्थना निम्न प्रकार से है:-

नमो मातृ भूमि जिथे जन्मलो मी,

नमो आर्य भूमी जिथे वाढ़लो मी।

नमो धर्म भूमि जियेच्याय कामीं,

पड़ो देह माझा सदा तो नमी मी।।1।। (मराठी पद)

हे गुरो श्री रामदूता! शील हमको दीजिए,

शीघ्र सारे सद्गुणों से पूर्ण हिन्दू कीजिए

लीजिए हमको शरण में रामपन्थी हम बनें,

ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीरव्रतधारी बने।।2।। (हिन्दी पद)

‘राष्ट्रगुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी की जय’, उक्त मराठी और हिन्दी पदों में कुछ संशोधन के साथ प्रार्थना की रचना की गयी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार जब सम्पूर्ण भारत में हो गया तब प्रार्थना में परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। समय के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में परिवर्तन होते रहे हैं, कभी गणेश, शारीरिक कार्यक्रमों में। इन बातों का विचार करने के लिए सन् 1939 में वर्धा जिले के सिन्दी ग्राम में एक बैठक का आयोजन हुआ।

इस बैठक में प. पू. सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार जी के अतिरिक्त श्री गुरुजी, श्री बालासाहब देवरस, श्री आप्पाजी जोशी, श्री बाबा साहब आप्टे, श्री तात्याराव तेलंग, श्री नरहरि नारायण भिड़े तथा सिन्दी गाँव के ही डॉक्टर जी के मित्र श्री नानासाहब टालाटुले इत्यादि प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थिति थे। यह बैठक दस दिन तक चली तथा गहन मंथन और मंत्रणा के उपरान्त श्री नाना साहब टालाटुले ने गद्य का भाव व श्री नरहरि नारायण भिड़े ने पद्य में इसकी रचना की।

गद्य व पद्य दोनों का ही संस्कृत भाषा में स्वरूप आया, प्रार्थना में तीन श्लोक और बारह पंक्तियाँ हैं- तेरहवीं पंक्ति ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष है। पहले श्लोक का छन्द ‘भुजंग प्रयात’ है। दूसरे व तीसरे श्लोक में प्रथम चरणार्थ ‘भुजंग प्रयात’ में है, उत्तरार्ध में दो मात्रा कम है। पूरे श्लोक का छन्द ‘मेघ निर्घोष’ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना का स्वरूप इस प्रकार है:-

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि

त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।

महामड़्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे।

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।।1।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राड़्गभूता

इमें सादरं त्वां नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं

शुभामाशिष देहि तत्पूर्तये।

अजच्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं।

सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत्

श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमार्ग

स्वयं स्वीकृत न: सुगं कारयेत्।।2।।

समुत्कर्ष नि: श्रेयसस्यैकमुग्रं

परं साधनं नाम वीरव्रतम्

तदन्त: स्फरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा

हृदन्त: प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

विजेत्री च न: संहता कार्यशक्त्रि

विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्

परं वैभव नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं

समर्था भवत्वाशिषा ते भ्रशम्।।3।।

।।भारत माता की जय।।

प्रार्थना का अनुवाद इस प्रकार है कि-

हे वत्सल मातृभूमि! मैं तुझे निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे हिन्दुभूमि! तूने ही मेरा सुखपूर्वक संवर्धन किया है। हे महामड़्गलमयी पुण्यभूमि! तेरे लिए ही मेरी यह काया काम आये। मैं तुझे बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! हम हिन्दुराष्ट्र के अंगभूत ये घटक, तुझे आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दे। विश्व के लिए जो अजेय हो ऐसी शक्ति, सारा जगत् जिससे विनम्र हो ऐसा विशुद्ध शील तथा बुद्धिपूर्वक स्वीकृत हमारे कण्टकमय मार्ग को सुगम करने वाला ज्ञान भी हमें दे।

ऐहिक और परलौकिक कल्याण तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए वीरव्रत नामक जो एकमेव श्रेष्ठ उत्कट साधन है, उसका हम लोगों के अन्त:करण में स्फुरण हो। हमारे हृदय में अक्षय तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत रहे। तेरे आशीर्वाद से हमारी विजयशालिनी संगठित कार्यशक्ति स्वधर्म का रक्षण कर अपने इस राष्ट्र को परमवैभव की स्थिति में ले जाने में पूर्णतया समर्थ हो।

इस प्रार्थना को सर्वप्रथम 23 अप्रैल, 1940 को पुणे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग में गाया था। श्री यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था। स्त्रियों की शाखा राष्ट्र सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली हिन्दू स्वयंसेवक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों के इस प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गणवेश

गणवेश किसी भी संस्था, संगठन या समुदाय की एक बाह्य पहचान होती है, परंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए गणवेश श्रद्धा का विषय व साध्य को पूर्ण करने का साधन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गणवेश लगाने के पीछे उद्देश्य रहे हैं कि समान वेश, अनुशासन, शौर्य, उत्साहपूर्ण वातावरण बनाना, पुरूषार्थ भाव जागरण करना है। किसी भी संस्था का विशेष कार्यक्रम हो तो वह गणवेश में ही अच्छा लगता है।

गणवेश में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। 1927-1940 तक सभी कार्यकर्ता खाकी नेकर, खाकी कमीज, काला जूता (लॉन्ग बूट), खाकी रंग की पोंगली पट्टी, चमड़े का लाल पट्टा (पेटी), काली टोपी, दण्ड तथा आर.एस.एस. का बैच। 1940-1973 के काल में खाकी कमीज की जगह सफेद कमीज व शेष गणवेश पर्ववत् रही। शासन के प्रतिबन्ध के कारण पदवेश में नीले मौजे व सफेद रंग के कपड़े के जूते रहे। 1974 के बाद खाकी नेकर, सफेद कमीज, चमड़े की लाल पेटी, काली टोपी, खाकी मौजे, चमड़े या प्लास्टिक का सादा काला फीते वाला जूता प्रारम्भ हुआ। मार्च 2011 में लाल चमड़े के पट्टे की जगह नाईलोन का लाल पट्ट्रे की शुरूआत हुई। ‘‘मार्च 2016 में गणवेश में खाकी नेकर की जगह कॉफी रंग की पेन्ट की शुरूआत हुई।’’

मनमोहन वैद्य, ने गणवेश के परिवर्तनों के बारे में कहा कि, ‘‘Any Mass organisation can not grow withoutA change.’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गणवेश समय-समय पर बदलता रहा है और आवश्यकता पड़ने पर भी बदल सकता है। परन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में आने का आकर्षण गणवेश कभी नहीं रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का मुख्य आकर्षण रहा है भारत शक्ति या देशभक्ति। अपने समाज की वर्तमान स्थिति के बारे में मन में वंदना। इसमें परिवर्तन लाने का संकल्प और इस हेतु प्रेरणा, यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ वर्षों तक व्यक्ति को जोड़े रखता है। दूसरा आकर्षण है यहाँ पर मिलने वाला अकृत्रिम स्नेह, निस्वार्थ भाव से मिलने वाली संबंधों उष्मा। तीसरा महत्व का आकर्षण है यहाँ पर एकदम नजदीक दिखने वाले, जिनसे हम खेल सकते हैं, बात कर सकते हैं, परख सकते हैं, ऐसे आदर्श जीने वाले लोग। और एक महत्त्व की बात है, वह यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में हर रोज आने के लिए गणवेश पहनना अनिवार्य नहीं है। वहाँ खेल या शारीरिक कार्यक्रम अधिक होते है। ऐसे कार्यक्रम हेतु कोई समुचित वेश पहनकर कोई भी आ सकता है। बड़े शिविर या विशेष कार्यक्रमों में ही गणवेश पहनना पड़ता है। दैनिक शाखा में आने के लिए ऐसे शिविर आदि कार्यक्रमों में सहभागी होना अनिवार्य नहीं है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ने के लिए गणवेश बाधा है, ऐसा नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों के लिए लगा दिया तो वे अपने आप में संन्यासी हैं, डॉ. हेडगेवार ने उनके लिए कोई अलग से वेश धारण करने को नहीं बताया है। समाज के अन्दर अपना अलगपन दिखना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मान्य नहीं है। लोगों के लिए अलौकिक यानी असामान्य न रहे, यह सीख सन्त ज्ञानेश्वर की है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह सीख आचरण में उतारी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज एक रूप हो, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका है, अपेक्षा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरुदक्षिणा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कभी-भी किसी से आर्थिक सहायता नहीं ली जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सारे कार्य आत्मनिर्भर होकर किये जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता स्वयं अपना खर्च उठाते हैं, वह किसी दूसरे पर आश्रित नहीं होते हैं, आगे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नये कार्यकता आते रहे अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ते रहे और उनके पालन-पोषण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु दक्षिणा की पद्धति प्रारम्भ हुई। ताकि उनके लिए आवश्यक गुणों का भी ठीक प्रकार से परिपोषण होता रहे। इस दृष्टि से डॉक्टर साहब ने शाखा पद्धति में कुछ मौलिक अंश जोड़ दिये। उदाहरण के लिए, किसी भी संगठन के सुचारू रूप से चरित्र और अनुशासन के साथ-साथ चलते रहने के लिए उसके सदस्यों में धन के बारे में पवित्र भावना रहना अनिवार्य है। इसलिए डॉक्टर साहब ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शुल्क या दान की कल्पना के स्थान पर समर्पण का दृष्टिकोण सामने रखा।

इसी दृष्टि से गुरुदक्षिणा की परिपाटी प्रारम्भ की। भगवाध्वज को ही अपना गुरु मानकर स्वयंसेवक व्यास पूर्णिमा (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा) के शुभ दिन पर उसके सामने अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा चढ़ाते हैं। उसी के बल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना सारा कामकाज चलाता है। इस पद्धति के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के अंदर स्वावलम्बन का भी संस्कार पनपता है। इस दृष्टिकोण को स्वयंसेवकों को समझाते हुए डॉक्टर साहब कहते थे कि, ‘‘देखो भाई, कोई कितने भी गरीब हो, उस परिवार के लोग अपने यहाँ मंगल या अमंगल प्रसंग होने पर आम लोगों के पास जाकर भीख नहीं मांगते, कठिनाई होने पर भी कैसे भी उस प्रसंग को निभा लेते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में अपने को ऐसा ही सोचना है।’’ यही दृष्टिकोण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हर कार्यक्रम में भाग लेते समय स्वयंसेवक अपने व्यवहार में लाते हैं।

गुरुदक्षिणा का विषय स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने लिखा है- ‘‘अपने कार्य में गुरु-पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण अवसर है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। व्यास महर्षि ने हमारे राष्ट्र-जीवन के श्रेष्ठतम गुणों को निर्धारित करते हुए, उनके महान् आदर्शों को चित्रित करते हुए, विचार तथा आचारों का समन्वय करते हुए न केवल भारतवर्ष का अपितु सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया। इसलिए वेदव्यास जगत के गुरु हैं। इसलिए कहा गया है- ‘व्यासों नारायणं स्वयं’। इसी दृष्टि से व्यास पूजा, को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। जिसे हमने श्रद्धा-पूर्वक मार्गदर्शक या गुरु माना है, उसकी हम इस दिन पूजा करते हैं, उसके सामने अपनी भेंट चढ़ाते हैं, उसे आत्म-निवेदन करते हैं और आगामी वर्ष के लिये आशीर्वाद मांगते हुए, हम अपनी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार यह पूजा का, आत्म निवेदन का अवसर है।’’

गुरुदक्षिणा के रूप में श्रद्धा के साथ कुछ कष्ट उठाते हुए, कुछ स्वार्थों को तिलांजलि देते हुए जो दिया जाता है, वह सच्चा समर्पण है। गुरुदक्षिणा कितनी देनी चाहिए, इसका कुछ निश्चित आँकड़ा नहीं रहता। चन्दा, सहायता, दान जैसा इसका स्वरूप नहीं रहता है। न यहाँ किसी भी प्रकार की सख्ती है। कौन कितना देगा, यह हर किसी की श्रद्धा, स्वेच्छा और क्षमता पर निर्भर है। एक पैसा भी चल सकता है। हम कितना देते हैं, इसका महत्व नहीं है। हम कितने प्रयास से और किस भावना से देते हैं, इसका महत्त्व है।

इस प्रकार गुरुदक्षिणा में दी गई राशि से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे वर्ष का खर्च चलाता है, उसके अनुसार ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम प्रबंध किये जाते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य

हर समुदाय या संस्था, संगठन की जब स्थापना की जाति है तो सबसे पहले उसके उद्देश्य ही निर्धारित किये जाते हैं। उसके उद्देश्यों के अनुरूप ही उसके कार्यक्रमों, कार्यपद्धति को निर्धारित किया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी अपना एक उद्देश्य है, जिसको लेकर डॉ. हेडगेवार जी ने इसकी स्थापना की थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है कि हमारा भारत विश्व का सर्वश्रेष्ठ देश बने व आर्थिक दृष्टि से यह स्वावलम्बी और सम्पन्न हो। भारत ने कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं किया है, लेकिन भारत पर युद्ध लादा जाए तो युद्ध में भारत हमेशा अजेय हो। मा. स. गोलवलकर के शब्दों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुओं के राष्ट्रीय चरित्र का साक्षात्कार कर उनमें भारत व उसकी राष्ट्रीय प्रकृति के प्रति प्रखर निष्ठा का संचार करने, उनमें सद्गुण, सच्चरित्र एवं पूर्ण समर्पण की भावना जगाने, सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने, प्रस्थ-सद्भाव, सहयोग एवं स्नेह का भाव उद्बुद्ध करने, राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च मानने एवं जाति, भाषा तथा पंथ को गौण स्थान देने की मनोवृत्ति विकसित करने और उसे आचरण में उतारने, उनमें विन्रमता एवं अनुशासन के साथ समस्त सामाजिक दायित्वों के निर्वहन हेतु शारीरिक सौष्ठव एवं कठोरता के महत्व का अभ्यास कराते हुए जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त अनुशासन द्वारा हिमालय से कन्याकुमारी पर्यंत संगठित, समरस राष्ट्र के निर्माण हेतु योजनाबद्ध प्रयास कर रहा है।’’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, स्वयंसेवकों को अपने आचरण में लाना होगा समरसता की बात करते हैं तो स्वयंसेवकों को समरसता का व्यवहार करना होगा राष्ट्र की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए हमारी हिन्दू संस्कृति के प्रति सम्मान रखना चाहिए समाज में हो रही कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए

‘हम सब एक हैं’, इस भावना को सबके अन्दर जगाना चाहिए स्वयंसेवक सभी के साथ ऐसा व्यवहार करेंगें तो धीरे-धीरे समाज के अन्य व्यक्ति भी उस से प्रभावित होंगे। और एक राष्ट्र की भावना का जन्म होगा, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य है। देश के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्पूर्ण देश में निवास करने वाले बन्धु-बान्धवों के प्रति एकात्मता का बोध कराने वाले मंत्रों का उच्चारण शाखा में कराया जाता है, जैसे-

‘‘रत्नाकराधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम्।

ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम्।।’’

सागर जिसके चरण धो रहा है, हिमालय जिसका मुकुट और जो ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि रूपी रत्नों से समृद्ध है। ऐसी भारत माता की मैं वन्दना करता हूँ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में राष्ट्र की एकता की भावना के लिए मंत्रों का उच्चरण भी नित्य पाठ में कराया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक

सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सर्वोच्च अधिकारी होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन व निर्देशन इनके द्वारा ही किया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करके ही, सर्वसम्मति के आधार पर ही सरसंघचालक कार्य करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आजतक के प्रमुख सरसंघचालकों का व्यक्तित्व का वर्णन इस प्रकार है-

आद्य सरसंघचालक

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम आद्य सरसंघचालक वेदपाठी परिवार में 1 अप्रैल 1889 में नागपुर में हुआ। उस दिन विक्रम संवत् 1946 की वर्ष प्रतिपदा थी। उनकी माता का नाम रेवती बाई, पिता का नाम बलिराम था। आनन्द आदीश के शब्दों में:-

‘‘भरपूर मिला साहस-संबल

नैतिक बल भली प्रकार मिला,

संस्कार मिले अतिशय निर्मल

माता का अतुल दुलार मिला।’’

कम उम्र में ही केशव जी के माता-पिता उन्हें छोड़कर चले गए इतने कम समय में ही उन्हें साहसी व संस्कारी बना गये थे।

केशव के मन में बाल्यकाल से ही देश की स्वतंत्रता की आकाँक्षा इतनी तीव्र हो चुकी थी कि आठ वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी के राज्यारोहण की हीरक जयन्ती पर दी गई मिठाई उन्होंने कूड़े में फेंक दी। ‘वन्देमातरम’ के नारे को सम्मान दिया न कि स्कूल में पढ़ना। उस स्कूल में इस नारे के कारण विद्याथ्र्ाी को स्कूल से निकाल दिया था परन्तु बाद में हेडगेवार जी ने उनके साथ कोई समझौता नहीं किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार उनके मन में स्वतंत्रता को प्राप्त करने की आकांक्षा थी। देश फिर से गुलाम न हो उन कारणों का पता लगाकर डॉ. हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, 1925-1940 तक का समय उनका था। इस दौरान 1930-31 तक डॉ. लक्ष्मण वामन परापजंपे को अल्प सरसंघचालक बनाया गया था। क्योंकि 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था।

अकोला कारागर में उनका संपर्क अन्य देशभक्त नेताओं से हुआ और उसके बाद शाखा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखएँ विदर्भ से प्रारम्भ हुई। इस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर उन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दिया था, जिससे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का विस्तार होता गया। 9 जून 1940 को नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग के दीक्षान्त समारोह में डॉक्टर जी ने कहा था, ‘आज अपने सम्मुख में हिन्दू राष्ट्र के छोटे स्वरूप को देख रहा हूँ।’

इस प्रकार से भारत, देश को हिन्दू राष्ट्र के जिस रूप में वे देखना चाहते हैं, उसका एक लघुरूप उनके सामने ही तैयार हो गया था।

अपने छोटे से जीवन काल में ही वो बहुत बड़े- कार्य कर, हमे छोड़कर 21 जून 1940 को अमरतत्व में विलीन हो गये थे और दिवंगत होने से पूर्व ही अपना कार्यभार माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सौंप गये थे।

द्वितीय सरसंघचालक -श्री गुरुजी

श्री गुरुजी का पूरा नाम माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर था। प्राणिशास्त्र के अध्यापक के रूप कार्य करने के कारण उनको यह उपनाम मिला था। आगे चलकर यही नाम अधिक प्रसिद्ध हो गया।

विक्रम संवत् 1962 फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन गुरुजी का जन्म हुआ। ईसाई दिनांक के अनुसार 19 फरवरी 1906 को। पिता जी का नाम सदाशिव व माता का नाम लक्ष्मीबाई था। गुरुजी की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा अनेक स्थानों से जुड़ी है, कारण पिता का नौकरी में स्थानांतरण था। नागपुर के हिस्लाप कॉलेज से उन्होंने इण्टर साइन्स की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद काशी विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में एम.एस.सी. की और बाद में वही पर प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए वहीं से उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ।

श्री गुरुजी, डॉ. हेडगेवार से बहुत प्रभावित हुए और उनसे घनिष्ठता भी बढ़ गई। परन्तु उनका ध्यान आध्यात्मिक की तरफ अधिक था, जिसके कारण वे बंगाल के सारगाछी आश्रम में पहुँचे। स्वामी विवेकानन्द के गुरु भाई स्वामी अखण्डानन्द इस आश्रम के प्रमुख थे। गुरुजी ने उनसे संन्यास की दीक्षा ली। स्वामी अखण्डनाद ने उन्हें डॉ. हेडगेवार के साथ मिलकर देश की सेवा करने को कहा और उनकी मृत्यु के पश्चात् वह नागपुर लौट आये। अब गुरुजी का सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक हो गया था। 1938 के नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी नियुक्त हुए 1939 में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार्यवाह बनाया। डॉ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद, उनके आज्ञानुसार सरसंघचालक बनाया गया।

अभी तक सभी सरसंघचालकों में से सबसे अधिक समय, 33 वर्ष, श्री गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार में इनका योगदान बहुमूल्य है। इन्हेांने अनेक समविचारी संगठनों की स्थापना की ताकि हम समाज के अन्य व्यक्तियों से जुड़ सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहला प्रतिबन्ध 1948 में लगा, उसका सामना किया।

भारत-चीन के युद्ध में, कश्मीर की समस्या में अपनी अह्म भूमिका निभाई। समाज में आई अनेक विपदाओं का सामना किया। उनके गुरु ने कहा था, ‘‘नर-सेवा, नारायण सेवा’’, जिसके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर सदा समाज-सेवा के कार्यो में वे अग्रणी भूमिका में रहे। कर्क रोग के कारण 5 जून 1973 को उन्होंने इस संसार में अन्तिम सांस ली और अपने उत्तराधिकारी के रूप में श्री बालसाहब देवरस को मनोनीत कर गये।

तृतीय सरसंघचालक – श्री बालासाहब देवरस

इनका पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था। ‘बालासाहब’ उपनाम से ही उन्हें अधिक लोग जानते थे। इनका जन्म विक्रम संवत 1985 मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन हुआ। ईसाई दिनांक के अनुसार- 11 दिसम्बर 1915 को। बालासाहब को बचपन में सब ‘बाल’ कहकर गोद में उठाते थे, जिसके कारण आगे ही नाम प्रचलित हो गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाखा में प्रथम बाल स्वयंसेवकों में इनका नाम आता है। यह 10 वर्ष की आयु में ही स्वयंसेवक बन गये थे। बालासाहब प्रथम बाल स्वयंसेवकों की टोली के नेता थे। उनकी सारी शिक्षा भी नागपुर में हुई थी। शिक्षा के साथ शाखा में जाना उनका नित्य कार्यक्रमों में शामिल हो गया था। बालासाहब एक बुद्धिमान बालक था, जिसके कारण उनके पिता भय्या जी उन्हें आई.सी.एस. होकर उच्च शासकीय पद का सम्मान दिलाने चाहते थे, लेकिन बालासाहब को तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जाना था, वह देश की सेवा करनी थी, जिसके कारण पिता से कई बार डांट भी खाई, परन्तु माँ पार्वतीबाई सदा ही उन्हें बचा लेती थी। देश सेवा के लिए बालासाहब जाते हैं, कोई गलत काम करने नहीं जाते है। माँ का आशीर्वाद सदा उनके साथ रहा और बाल व उसका भाई भाऊ दोनों ने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रहकर खूब नाम कमाया, जिसके कारण उत्तर भारत में एक बार उनके पिता आये तो उनको बहुत मान सम्मान हुआ, जिसके कारण भय्याजी ने डॉ. हेडगेवार का धन्यवाद किया कि उनके बच्चों को ऐसे संस्कार दिये।

बालासाहब बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गये थे, जिसके कारण उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से ही इनकी गतिविधि देख रहे थे। अनेक गतिविधियों में इन्होंने भी भाग लिया। डॉ. हेडगेवार ने इन्हें प्रथम बार बंगाल में प्रान्त कार्य के लिए भेजा। 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बनाया गया। 1965 में सरकार्यवाह और 1973 में श्री गुरुजी के बाद सरसंघचालक बने। 21 वर्षों तक बालासाहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस पद पर कार्यरत रहे। बालासाहब ने श्री गुरुजी के साथ मिलकर अनेक कार्य किये थे। और अपने समय में नये समविचारी संगठन की रचना की, जैसे- सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, बाल संस्कार केन्द्र, आदि।

बालासाहब देवरस जी के समय में सबसे बड़ी विपत्ति आपातकालीन समय 1975 की थी, जिसके कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा इस समय पर अनेक स्वयंसेवकों को यातनाएँ सहन करनी पड़ी। बिना कारण के ‘मीसा’ कानून के तहत जेल में डाल दिये गये। इन सबके खिलाफ व जनतंत्र को दोबारा लाने के लिए अनेक आन्दोलन करके इसे सफल बनाया, जो बालासाहब जी की देखरेख में हुए इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार में इनका अह्म योगदान रहा है।

सन् 1992 से बालासाहब का स्वास्थ्य बिगड़ता गया, जिसके चलते उन्होंने स्वयं को निवृत्त कर 1994 में प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी अर्थात् सरसंघचालक नियुक्त किया। ‘मैं कार्य नहीं कर सकता’, यह देखते ही दायित्व से हटने की उत्तम पद्धति बालासाहब ने आरम्भ की। 17 जून, 1996 के दिन पूणे के ‘रूबी शल्य क्लीनिक’ चिकित्सालय में उनका निधन हुआ।

चतुर्थ सर संघचालक- प्रो. राजेन्द्र सिंह

प्रो. राजेन्द्र सिंह, जिसे सारे लोग ‘रज्जू भैया’ के नाम से जानते हैं। 11 मार्च 1994 में चतुर्थ सरसंघचालक बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में यह पहली घटना थी कि सरसंघचालक के जीवित रहते उनके उत्तराधिकारी की घोषणा की गई।

प्रो. राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी 1922 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ अभियन्ता के घर में हुआ। उनके पिता जी श्री कुंवर बलवीर सिंह सिंचाई विभाग में अभियन्ता थें। उनकी माता जी का नाम ज्वाला देवी था, जिन्हें वे ‘‘जियाजी’’ कहकर पुकारते थे। प्राथमिक शिक्षा उनकी नैनीताल में हुई थी। बाद की शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में व एम.एस.सी. भौतिक शास्त्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की। यहाँ पर ही 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रति उनका प्रथम आकर्षण हुआ था। एम.एस.सी. करने के बाद वही पर इनको प्राध्यापक नियुक्त कर दिया गया।

1966 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आवश्यकता को देखते हुए, इन्होंने स्वेच्छा से इस पद से त्यागपत्र दे दिया और वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये। 1978 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह बने। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण यह पद छोड़ा व 1987 में हो. वे. शेषाद्रि के सह-सरकार्यवाह बने। 11 मार्च 1994 में बालासाहब देवरस जी ने इन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक बनाया।

प्रो. राजेन्द्र सिंह पहले सरसंघचालक हैं, जिन्होंने विदेश में जाकर हिन्दू स्वयंसेवक संघ के कार्य का निरीक्षण किया। इस हेतु इंग्लैण्ड, मॉरिशस, केनिया आदि देशों में उनका प्रवास हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन व समय-समय पर करते रहे। उनको इस बात का बड़ा दु:ख था कि रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नाम पर भारत में कोई स्मारक नहीं है। 1999 में पूणे में में अचानक गिर जाने से उनकी कमर की हड्डियां टूट गई, जिसके कारण वह अस्वस्थ हो गये और 10 मार्च 2000 को श्री सुदर्शन जी को सरसंघचालक का भार सौंप दिया। 6 वर्ष के कार्यकाल में उनका योगदान अह्म है। 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पूणे में स्वर्गवास हो गया।

पंचम सरसंघचालक- श्री कुप. सी. सुदर्शन

इनका पूरा नाम श्री कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन था। 18 जून 1931 में रायपुर, छत्तीसगढ़ में इनका जन्म हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा चन्द्रपुर, रायपुर में ही हुई थी। 1954 में जबलपुर, सागर विश्वविद्यालय से बी.ई. (ऑनर्स) दूरसंचार विषय में उपाधि प्राप्त की। वहीं से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक भी बन निकले। 1964 में उन्हें मध्य भारत प्रान्त-प्रचारक का दायित्व मिला।

1969 से 1971 तक अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षण प्रमुख का दायित्व तथा 1979 में अखिल भारतीय बौद्धिक शिक्षण प्रमुख का दायित्व मिला। 1990 में सह सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया।

अन्ततोगत्वा स्वास्थ्य के कारणों से ही नागपुर में मार्च, 2009 में सम्पन्न हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री सुदर्शन जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गौरवशाली परम्परा का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक की नियुक्ति परम्परा, उसमें हुए परिवर्तनों का संदर्भ देते हुए नवीन सरसंघचालक के रूप में श्री मोहनराव भागवत जी घोषणा कर दी। और स्व. बबुआ जी का कथन उद्धृत किया, ‘इन्हें देखते हुए डॉक्टर साहब की याद आती है।’1 श्री सुदर्शन जी ने भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्ग दर्शन में अपनी अह्म भूमिका निभाई है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी देशभर में प्रचार करते रहे थे। 15 सितम्बर 2012 को अपने जन्म के स्थान रायपुर में ही अकस्मात् उनका निधन हो गया।

षष्टम् सरसंघचालक- श्री मोहनराव भागवत

इनका जन्म 11 सितम्बर 1950 को चन्द्रपुर, महाराष्ट्र में हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिले थे। उनके पिता नाम मधुकरराव भागवत था जो कि गुजरात में प्रान्त प्रचारक के रूप में कार्यरत थे। मोहनराव भागवत जी ने चन्द्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नात्कोत्तर अध्ययन अधूरा छोड़ वे आपातकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए 1977 में अकोला में प्रचारक बने।

1991 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रमुख बने और 1999 तक इस कार्य को संभाला। सन् 2000 में वे सरकार्यवाह के पद पर निर्वाचित हुए और सन् 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छठे सरसंघचालक के रूप में नियुक्त हुए वे अविवाहित हैं। आज भी वही कार्यरत हैं। भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मार्गदर्शन करते हुए 9 वर्ष हो गए हैं और हम देख भी रहे हैं कि आज अधिकतर व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानते हैं। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व की दृष्टि को समझ भी रहे हैं। भागवत जी ने राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका, समरसता, जातिवाद, धर्म, अस्पृश्यता, देशभक्ति ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें समाज में स्पष्ट करके, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक अच्छी छवि प्रस्तुत की है। हम आशा करते हैं, हिन्दू संस्कृति के प्रति वो इस तरह कार्य करते रहे हैं।

संदर्भ –

  1. अमर उजाला, 11 मार्च 2018, पृ.-8 2 विषय बिन्दु, शरद प्रकाशन, आगरा, पृ.-15
  2. सी.पी भिशीकर, केशव: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निर्माता, पृ.-36
  3. श्री गुरुजी, दृष्टि और दर्शन, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-268
  4. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघगाथा, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-10
  5. अमर उजाला, 11 मार्च, 2015, पृ.-8
  6. अमर उजाला, दिसम्बर 2015, पृ.-1
  7. हरिश्चन्द्र बथ्र्वाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ 11-12
  8. विजय कुमार गुप्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रार्थना, पृ 13-14
  9. दा ट्रिब्यून, 14 मार्च, 2016, पृ.-7
  10. दा ट्रिब्यून, 14 मार्च, 2016, पृ.-7
  11. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाथा, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-27
  12. मा.स. गोलवलकर, गुरु दक्षिणा, पृ.-3
  13. मा.स. गोलवलकर, विचार नवनीत, पृ.-173
  14. शाखा सुरभि, सुरुचि प्रकाशन, पृ.-12
  15. हरिश्चन्द्र बथ्र्वाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक परिचय, पृ.-27

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