मौलिक अधिकार कितने हैं और उनके नाम

अनुक्रम
मौलिक अधिकार कितने हैं और उनके नाम  भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के द्वारा भारत के नागरिकों को 6 प्रकार के मौलिक अधिकार दिए गए है -
  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
  5. सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

समानता का अधिकार

समानता का अधिकार प्रजातन्त्र का आधार स्तम्भ है, अत: भारतीय संविधान द्वारा सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता, राज्य के अधीन नौकरियों का समान अवसर और सामाजिक समानता प्रदान की गयी है एवं समानता की स्थापना के लिए उपाधियों का निषेध किया गया है।

अनुच्छेद 14 – 

राज्य किसी व्यक्ति को कानून के स्तर पर समान अवसर तथा समान रक्षा प्रदान करेगा ।अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र में राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं रहेगा। अनुच्छेद के प्रथम भाग के शब्द ‘कानून के समक्ष समानता’ ब्रिटिश सामान्य विधि की देन है और इसके द्वारा राज्य पर यह बन्धन लगाया गया है कि वह सभी व्यक्तियों के लिए एक-सा कानून बनायेगा तथा उन्हें एक समान लागू करेगा। 

अनुच्छेद 15 – 

किसी भी नागरिक के साथ जाति, लिंग, मूलवंश, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा और सभी को सार्वजनिक स्थानों तथा तालाब, घाट, सड़क, आश्रम, कुआँ, दुकान या होटल पर जाने से नहीं रोका जा सकेगा जिसे सरकारी खर्च से पूर्णत: या आंशिक रूप से बनाया गया हो । राज्य को विशेष व्यवस्था महिलाओं और बच्चों के लिए
करने का अधिकार होगा तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूपसे पिछड़े वर्ग के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए विशेष व्यवस्था की जा सकती है ।

अनुच्छेद 16 – 

सार्वजनिक (सरकारी) नियुक्तियों में जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर अवसर प्रदान करने से इन्कार नहीं किया जा सकता है । सरकार नियुक्तियों एवं प्रोन्नति में पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है ।

अनुच्छेद 17 – 

प्रचलित वर्ण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए छुआछूत को समाप्त करते हुए इसे दण्डनीय बनाया गया है । अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना एक दण्डनीय अपराध होगा। हिन्दू समाज से अस्पृश्यता के विष को समाप्त करने के लिए संसद के द्वारा 1955 ई. में ‘अस्पृश्यता अपराध अधिनियम’ (Untouchability offences Act) पारित किया गया है जो पूरे भारत पर लागू होता है। इस कानून के अनुसार अस्पृश्यता एक दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।

अनुच्छेद 18 –

भारतीय नागरिकों को विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, कहीं भी जाने, बिना शस्त्र के एकत्र होने, बसने या संघ बनाने, व्यवसाय करने की भी स्वतंत्रता है ।
ब्रिटिश शासन काल में सम्पत्ति आदि के आधार पर उपाधियाँ प्रदान की जाती थीं, जो सामाजिक जीवन में भेद उत्पन्न करती थीं, अत: नवीन संविधान में इनका निषेध कर दिया गया है। अनुच्छेद 18 में व्यवस्था की गयी है कि फ्सेना अथवा विद्या सम्बन्धी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोई उपाधियाँ प्रदान नहीं कर सकता। इसके साथ ही भारतवर्ष का कोई नागरिक बिना राष्ट्रपति की आज्ञा के विदेशी राज्य से भी कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।

स्वतन्त्रता का अधिकार

भारतीय संविधान का उद्देश्य विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है, अत: संविधान के द्वारा नागरिकों को विविध स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गयी हैं। इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 19 सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह अधिकार नागरिकों को 6 स्वतन्त्रताएँ प्रदान करता हैं:

अनुच्छेद 19 –

भारतीय नागरिकों को विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, कहीं भी जाने, बिना शस्त्र के एकत्र होने, बसने या संघ बनाने, व्यवसाय करने की भी स्वतंत्रता है । अनुच्छेद 19 के द्वारा भारतीय नागरिकों को 7 स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई थीं, जिसमें छठी स्ततन्त्रता, सम्पत्ति प्राप्त करने तथा उसे बेचने की स्वतन्त्रता थी। परन्तु 44वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अधिकार के साथ-साथ ‘सम्पत्ति की स्वतन्त्रता’ भी समाप्त कर दी गई है और इस प्रकार अब अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत नागरिकों को छ: स्वतन्त्रताएँ ही प्राप्त हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. भाषण देने तथा विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता ।
  2. शान्तिपूर्वक तथा बिना शस्त्रों के इकट्ठा होने की स्वतन्त्रता ।
  3. संघ बनाने का अधिकार ।
  4. भारत राज्य के क्षेत्र में भ्रमण करने का अधिकार ।
  5. भारत के किसी भाग में रहने या निवास करने की स्वतन्त्रता ।
  6. कोई भी व्यवसाय करने, पेशा अपनाने या व्यापार करने का अधिकार । 

अनुच्छेद 20 –

अनुच्छेद 20 से 22 तक ने नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। ब्रिटेन में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का आधार कानून का शासन है। यही सिद्वान्त भारत में भी अपनाया गया है।
  1. अनुच्छेद 20 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को सजा उस समय में प्रचलित कानून के अनुसार ही दी जा सकती है। 
  2. अनुच्छेद 20 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए दो बार सजा नहीं दी जा सकती है। 
  3. अनुच्छेद 20 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 –

प्रत्येक नागरिक को अपने ढंग से जीने का अधिकार होगा और सिवाय कानूनी प्रावधान के दैहिक एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकेगा । अनुच्छेद 21 के अनुसार कानून द्वारा स्थापित पद्धति (Procedure Established by Law) के बिना किसी व्यक्ति को उसके जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। 

अनुच्छेद 22 –

आपराधिक मामलों के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि गिरफ्तारी के आधार की सूचना उसे दी जायें और उसे अपने वकील से सलाह करने का भी अधिकार होगा ताकि वह अपना बचाव कर सके । गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है (कतिपय मामलों में, जैसे शत्रु अन्य देशीय या निरोधात्मक नियम के अन्तर्गत की गयी गिरफ्तारी आदि को छोड़कर)

  1. किसी भी व्यक्ति को उसका अपराध बताए बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। 
  2. गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को 24 घंटे के अन्दर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है।
  3. बिना मजिस्ट्रेट की आज्ञा के बन्दी को जेल में नहीं रखा जा सकता। 
  4. बन्दी को कानूनी सलाह प्राप्त करने का पूरा अधिकार है।

शोषण के विरुद्ध अधिकार

संविधान के 23 तथा 24वें अनुच्छेदों में नागरिकों के लिए शोषण के विरुद्ध अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इस अधिकार का यह लक्ष्य है कि समाज का कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय न कर सके।

अनुच्छेद 23 –

किसी मानव से बेगार या अन्य बलपूर्वक श्रम करवाना निषेध है तथा मानव व्यापार भी करना अपराध है । शोषण के विरूद्ध यह व्यवस्था की गयी है । अनुच्छेद 23 के अनुसार मनुष्यों का व्यापार, उनसे बेगार तथा इच्छा के विरुद्व काम करवाने की मनाही कर दी गई है और जो इस व्यवस्था का किसी प्रकार से उल्लंघन करेगा, उसे कानून के अनुसार दण्डनीय अपराध समझा जाएगा।

अनुच्छेद 24 –

कोई भी बच्चा, जिसकी आयु 14 वर्ष से कम है, से श्रम या मजदूरी नहीं करवायी जा सकती है और किसी भी कारखाना या खान या अन्य खतरनाक कार्य में कामगार के रूप में नहीं रखा जा सकता है । अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु वाले बालक को किसी भी कारखाने अथवा खान में नौकर नहीं रखा जाएगा। न ही किसी अन्य संकटमयी नौकरी में लगाया जाएगा। इसका अभिप्राय यह है कि बच्चों को काम में लगाने की बजाए उनको शिक्षा दी जाए। इसीलिए भारतीय संविधान के अध्याय 4 में निर्देशक सिद्वांतों के द्वारा राज्यों को यह निर्देश दिया गया है कि वह 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा का प्रबन्ध करें शिक्षा के अधिकार (Right to Education) अधिनियम को भी इसी लिए बनाया गया है।

धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार

संविधान के अगले 4 अनुच्छेदों (25 से 28) में भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाने की व्यवस्था की गई है। संविधान-निर्माताओं ने अनुच्छेद 15 तथा 16 में दिए इस अब अधिकार के साथ 42वें संशोधन के द्वारा धर्म-निरपेक्ष शब्द को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ दिया गया है।

अनुच्छेद 25 –

प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक शान्ति सदाचार एवं स्वास्थ्य आदि को बिना नुकसान पहुँचाए अपना धार्मिक कृत्य करने एवं धर्म अपनाने एवं धर्म का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है तथा कोई धार्मिक कार्य एवं पूजा करने के लिए स्वतंत्र है । अनुच्छेद 25 में यह व्यवस्था की गई है कि भारत में सभी नागरिकों को किसी भी धर्म की मानने, उसका अनुयायी बनने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार है।

अनुच्छेद 26 –

प्रत्येक सम्प्रदाय को अपने धर्म के प्रचार-प्रसार करने, धार्मिक कृत्य आदि के लिए संस्था स्थापित करने एवं संपति अर्जित करने का अधिकार होगा परन्तु यह अधिकार लेाक शान्ति आदि के अधीन होगा। अनुच्छेद 26 द्वारा सभी धार्मिक सम्प्रदायों को धार्मिक एवं परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थाएँ स्थापित करने उनसे सम्बन्धित विषयों का संचालन करने, चल तथा अचल सम्पत्ति खरीदने तथा कानून के अनुसार उनका प्रबंधन चलाने का अधिकार दिया गया है।

अनुच्छेद 27 –

अनुच्छेद 27 में यह निर्धारित किया गया है। कि किसी भी धर्म के प्रचार के लिए किसी व्यक्ति को कोई कर देने पर विवश नहीं किया जायेगा।

अनुच्छेद 28 –

कोई शैक्षणिक संस्थान, जो पूर्णत: राज्य निधि से चलाया जाता है, वह धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं करेगा । अनुच्छेद 28 द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि राज्य द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त किसी भी संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। परन्तु इसके अधीन वे संस्थाएँ नहीं आतीं जिनकी स्थापना किसी ट्रस्ट द्वारा धर्म के प्रचार के लिए की गई हो, चाहे उसका प्रशासन राज्य ही चलाता हो। इसी अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट किया गया है कि राज्य द्वारा जिन संस्थाओं को अनुदान (Grants) दिया जाता है, उनमें किसी व्यक्ति को धार्मिक समारोह में शामिल होने अथवा धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने पर विवश नहीं किया जा सकता।

सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार

सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों का उल्लेख संविधान की 29 व 30 अनुच्छेदों में किया गया है। इनके अनुसार भारत में निवास करने वाले अल्पमतों के हितों की सुरक्षा की उचित व्यवस्था की गई है ताकि वे अपनी संस्कृति तथा भाषा के आधार पर अपना विकास कर सवेंफ।

अनुच्छेद 29 –

प्रत्येक वर्ग को, जिसकी अपनी भाषा, संस्कृति, लिपि आदि है और जो दूसरे वर्ग से भिन्न है, उसे संरक्षित करने का अधिकार होगा । राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से सहायता पाने वाला शिक्षण संस्थान जाति, धर्म आदि के आधार पर किसी नागरिक का नामांकन करने से इन्कार नहीं करेगा । अनुच्छेद 29 के अनुसार, भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों के हर वर्ग या उसके भाग को, जिनकी अपनी भाषा, लिपि अथवा संस्कृति हो, उसे यह अधिकार है कि वह उनकी उनकी रक्षा करे। अनुच्छेद 29 के अनुसार, किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा या उसकी सहायता से चलायी जाने वाली शिक्षा संस्था में प्रवेश देने से धर्म, जाति, वंश, भाषा या इनमें किसी के आधार पर इनकार नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 30 –

अनुच्छेद 30 के अनुसार, सभी अल्पसंख्यकों को चाहे वे धर्म पर आधारित हों या भाषा पर यह अधिकार प्राप्त है कि वे अपनी इच्छानुसार शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करें तथा उनका प्रबन्ध करें। अनुच्छेद 30 के अनुसार, राज्य द्वारा सहायता देते समय शिक्षा संस्थाओं के प्रति इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा कि वह अल्पसंख्यकों के प्रबन्ध के अधीन है, चाहे वह अल्पसंख्यक भाषा के आधार पर या धर्म के आधार पर क्यों न हो। 44 वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि राज्य अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित व चलाई जा रही शिक्षा संस्थाओं की सम्पत्ति को अनिवार्य रूप से लेने के लिए कानून का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखेगा कि कानून के द्वारा निर्धारित की गई रकमों से अल्पसंख्यकों के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह परिवर्तन इसलिए करना पड़ा, क्योंकि 44वें संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 31 को हटाकर सम्पत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया गया है। अब सम्पत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

संविधान में मौलिक अधिकारों के उल्लेख से अधिक महत्त्वपूर्ण बात उन्हें क्रियान्वित करने की व्यवस्था है, जिसके बिना मौलिक अधिकार अर्थहीन सिद्व हो जाते। संविधान निर्माताओं ने इस उद्देश्य से संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी संविधान में स्थान दिया है, जिसका तात्पर्य यह है कि नागरिक अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की शरण ले सकते हैं। इन न्यायालयों के द्वारा व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित उन सभी कानूनों और कार्यपालिका के उन कार्यों को अवैधानिक घोषित कर दिया जायेगा जो अधिकारों के विरुद्ध हों। 

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए पाँच प्रकार के लेख जारी किये जा सकते हैं-

बंदी प्रत्यक्षीकरण 

जब कोई व्यक्ति विधि विरूद्ध बंदी बनाया गया हो तो वैसी स्थिति में अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए वह उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में आवेदन दे सकता है । व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह उस व्यक्ति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है जो यह समझता है कि उसे अवैध रूप से बन्दी बनाया गया है। इसके द्वारा न्यायालय, बन्दीकरण करने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह बन्दी बनाये गये व्यक्ति को निश्चित समय और स्थान पर उपस्थित करे, जिससे न्यायालय बन्दी बनाये जाने के कारणों पर विचार कर सके। दोनों पक्षों की बात सुनकर न्यायालय इस बात का निर्णय करता है कि नजरबन्दी वैध है या अवैध, और यदि अवैध होती है तो न्यायालय बन्दी को पफौरन मुक्त करने की आज्ञा देता है। इस प्रकार अनुचित एवं गैरकानूनी रूप से बन्दी बनाये गये व्यक्ति बन्दी प्रत्यक्षीकरण के लेख के आधार पर स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं।

परमादेश – 

यह किसी व्यक्ति, निगम, निम्न न्यायालय या सरकार के विरूद्ध निर्गत किया जाता है जब वह लोक कर्त्तव्य जिसे करने के लिए कानून बाध्य है, उस कर्त्तव्य को करने में विफल रहता है तो उस विशेष कर्त्तव्य को करने के लिए यह आदेश या रिट जारी किया जाता है । परमादेश का लेख उस समय जारी किया जाता है जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं करता। इस प्रकार के आज्ञा पत्र के आधार पर पदाधिकारी को उसके कर्त्तव्य पालन का आदेश जारी किया जाता है।

उत्प्रेषण – 

यह अधीनस्थ न्यायालय को क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कार्यवाही करने से रोकता है । यह आज्ञापत्र अधिकांशत: किसी विवाद को निम्न न्यायालय से उच्च न्यायालय में भेजने के लिए जारी किया जाता है, जिससे वह अपनी शक्ति से अधिक अधिकारों का उपभोग न करे या अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए न्याय के प्राकृतिक सिद्वान्तों को भंग न करे। इस आज्ञापत्र के आधार पर उच्च न्यायालय निम्न न्यायालयों से किन्हीं विवादों के सम्बन्ध में सूचना भी प्राप्त कर सकते हैं।

प्रतिषेध –

इस आज्ञापत्र के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों द्वारा निम्न न्यायालयों तथा अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी करते हुए यह आदेश दिया जाता है कि वे मामले में अपने यहाँ कार्यवाही स्थगित कर दें, क्योंकि यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है।

अधिकार पृच्छा – 

जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है, जिसके रूप में कार्य करने का उसे वैधानिक रूप से अधिकार नहीं है तो न्यायालय अधिकार पृच्छा के आदेश द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस आधार पर इस पद पर कार्य कर रहा है और जब तक वह इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर नहीं देता, वह कार्य नहीं कर सकता।

व्यक्तियों के द्वारा सामान्य परिस्थितियों में ही न्यायालयों की शरण लेकर अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है, लेकिन युद्व , बाहरी आक्रमण या आन्तरिक अशान्ति जैसी परिस्थितियों में, जबकि राष्ट्रपति के द्वारा संकटकाल की घोषणा कर दी गयी हो, मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई व्यक्ति किसी न्यायालय से प्रार्थना नहीं कर सकेगा। इस प्रकार संविधान के द्वारा संकट काल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलम्बिक करने की व्यवस्था की गयी है।

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