राष्ट्रवाद अर्थ, परिभाषा व स्वरूप

अनुक्रम

सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के मुख्य दौर में राष्ट्रों का जन्म हुआ। राष्ट्र का जन्म हुआ तो राष्ट्रीयता का स्वरूप भी सामने आया व उसके बाद राष्ट्रवाद का जन्म हुआ जो कि राष्ट्रीयता के सनातन रूप का प्रगतिशील स्वरूप है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह देश की उन्नति व समृद्धि के लिए हमेशा तत्पर रहे।

 राष्ट्रवाद का अर्थ

राष्ट्रवाद का अर्थ है कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा, उसकी प्रगति और उसके प्रति सभी नियम आदर्शों को बनाए रखने का सिद्धान्त। डॉ.हेडगेवार ने कहा है कि “किसी एक विशिष्ट भू-भाग में लोग केवल रहते हैं, इसलिए राष्ट्र नहीं बनता। उसके लिए तो उस भू-भाग के अन्दर सदियों से रहते हुए उसके साथ एक रागात्मक, भावात्मक संबंध स्थापित होना पड़ता है। यह भूमि मेरी माँ हैं, मैं इसका पुत्र हूँ और पुत्र होने के नाते हम सब एक है, हमारे पूर्वज एक है, हमारी संस्कृति एक है।” राष्ट्र के प्रति ऐसी भावना रखते हुए उसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से जोड़ देना राष्ट्रवाद है।

 राष्ट्रवाद का स्वरूप

जब आधुनिक युग की शुरूआत हुई तो उसी समय ‘राष्ट्रवाद’ का अपने नए रूप में आया। उसका यह नया रूप है कि विश्व-बंधुत्व पर उसकी आस्था। इससे पहले राष्ट्रवाद को वाद का रूप देकर इसे शोषण एवं औपनिवेशक विस्तारवाद का प्रतीक मानकर नकार दिया जाता था। इसलिए कुछ विचारकों ने ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा को विश्व शान्ति के प्रतिकूल बताया। लेकिन आज इस धारणा में बदलाव आया है यह ऐसा राष्ट्रवाद है जिसकी आस्था मानव प्रेम में है यह किसी से घृणा नहीं करता, साथ ही अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व को भी बनाए रखता है। यह राष्ट्रवाद विश्व परिकल्पना को पूर्ण रूप से मान्यता प्रदान कर विश्व मैत्री का आकांक्षी है। यही वह राष्ट्रवाद है जो अनेकता में एकता के सूत्र खोजता है। उन सूत्रों का प्रयोग विश्वबन्धुत्व और लोककल्याण के लिए करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साहित्यकार भी मानवतावादी, सांस्कृतिक एकता राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक है। उनके साहित्य में विश्व प्रेम, जातीय एकता, विज्ञान का विध्वंस रूप में बचाकर सांस्कृतिक धरोहर को संभालकर रखना सम्बन्धी पद यंत्र तंत्र बिखरे पड़े हैं। यही वह राष्ट्रवाद है, जिसे हजारों वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति ने अपना आधार माना है लेकिन आज भारत का यह सांस्कृतिक चिन्तन विश्व में वह स्थान नहीं पा सका जो उसे मिलना चाहिए था। 

इसका एक कारण है क्योंकि वर्तमान भारतीय अंग्रेजियत प्रभाव से सराबोर होने के साथ-साथ पश्चिमी प्रचार के दुष्प्रभाव अपना इतिहास, अपनी परम्परा, अपनी संस्कृति और पहचान को भूलता जा रहा है। राष्ट्रवाद में राष्ट्र की भौगोलिक सीमा का भी विशेष महत्त्व है भले ही आज इसकी अवहेलना की जा रही हो लेकिन मन के स्तर पर उसका बहुमूल्य स्थान सदैव बना रहेगा। क्योंकि इसकी विविधता एवं वैशिष्ट्य से ही इसकी पहचान होती है। राष्ट्रवाद की संकल्पना के पीछे यदि राजनीति साम्राज्यवादी उग्रता और साम्प्रदायिकता नहीं है तो ऐसी स्वच्छ संकल्पना अवश्य ही मानवता के विकास में सहायक सिद्ध होगी।

जी. एन. बर्गस. - अंग्रेजी शब्द नेचर को राष्ट्रवाद का मूल माना है। उनके अनुसार ‘मानव मन नैसर्गिक रूप में ही समूह निर्माण में प्रवृत होता है और उसी का सहज विकास कालान्तर में, राष्ट्र के रूप में प्रतिफलित हुआ।’

 राष्ट्रवाद की भारतीय दृष्टिकोण

बीसवीं शताब्दी में अनेक ऐसे विचारक हुए जिन्होंने राष्ट्रवाद की व्याख्या विश्व प्रेम के संदर्भ में की है। उनमें महात्मा गांधी का नाम सबसे पहले आएगा। गांधी जी ने हिंसा प्रधान उग्र राष्ट्रवाद का विरोध हर स्तर पर किया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के पीछे बुनियादी तौर पर अहिंसा एवं प्रेम को जो महत्त्व प्रदान किया, उससे उनके द्वारा प्रतिपादित राष्ट्रवाद विश्व बंधुत्व का एक आवश्यक अंग बना चुका है। गांधी जी कहा करते थे - “उग्र राष्ट्रवाद जो साम्राज्यवाद के नाम से प्रसिद्धि है अभिप्राय है, किन्तु अहिंसात्मक राष्ट्रवाद समूह जीवन अथवा सभ्य जीवन की आवश्यक शर्त है।”

गांधी जी ने इस व्यापक प्रेम को ही, राष्ट्र धर्म माना है, राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद की परिकल्पना में गांधी ने ‘धर्म दर्शन’ और अध्यात्म का जैसा सम्मिश्रण किया वैसा बीसवीं शताब्दी के किसी अन्य विचारक ने नहीं किया और कम से कम गांधी से पहले तो मिलता ही नहीं है। भारत सारी दुनिया से सद्विचार लेने को आज भी तैयार रहता है। भारतवासी आज भी नदियों को प्रणाम करते है। 

योगी अरविन्द के विचारानुसार “हम भारतीयों के लिए सनातन धर्म ही राष्ट्रवाद है धर्म के साथ यह राष्ट्र गति करता है।” भारत आस्था का विश्वास का देश है। दुनिया में केवल भारत ही विश्वास और तर्क की परस्पर विरोधी धारणा में जिया है। 

स्वामी विवेकानन्द जी ने भी राष्ट्रवाद सम्बन्धी अवधारणा ही है इन्हीं विचारों के कारण उन्हें एक राजनीतिक चिन्तक की भी संज्ञा दी जा सकती है। उनके राजनीतिक विचार, धार्मिक एवं सामाजिक विचारों के सहगामी है स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रवाद का आध्यात्मिकरण करने के पक्षपाती थे। हिन्दू धर्म के महत्त्व के कारण ही उन्हें राष्ट्रवाद के समीप ला खड़ा किया। वे हिन्दू धर्म को सब धर्मों का प्रमुख स्रोत मानते थे। उनके अनुसार ‘धर्म की व्यक्ति और राष्ट्र को शक्ति प्रदान करता है।’ विवेकानन्द हेगल की तरह राष्ट्र की महत्ता के प्रतिपादक थे।  

लेकिन मानवेन्द्रनाथ राय स्वामी विवेकानन्द की आलोचना करते हुए कहते हैं कि स्वामी जी का राष्ट्रावाद आध्यात्मिक साम्राज्यवाद था। उन्होंने ब्रिटिश शासन को खदेड़ने के लिए हिंसा तथा आतंक का सहारा लिया।

बाल गंगाधर तिलक संकीर्ण राष्ट्रवादी भावना का विरोध करते थे। उन्होंने वेदान्त की मानव एकता की धारणा को राष्ट्रवाद के माध्यम से प्राप्त कर विश्वबन्धुत्व की स्थापना की। वे अन्तर्राष्ट्रवाद को ही राष्ट्रवाद का उन्नत रूप मानते है।

 लाला लाजपत राय की राष्ट्रवाद सम्बन्धी धारणा उन्नीसवीं शताब्दी के इटली के राष्ट्रवादियों की धारणा से मिलती जुलती थी। उनका मत था ‘हर राष्ट्र को अपने आदर्शो के निश्चित और कार्यान्वित करने का मूल अधिकार है। इसमे किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना अस्वाभाविक है। इसलिए उन्होंने भारत को शक्तिशाली स्वतंत्र जीवन का निर्माण करके अपने आप को सबल बनाना चाहिए।

विपिन चन्द्र पाल ने भी आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का समर्थन करते हुए कहा है “जो राष्ट्रवाद धर्म की जड़ों से पोषण प्राप्त करता है वही स्थायीत्व प्राप्त करता है।”

 पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ‘राष्ट्र को राजनीतिक नहीं अपितु सांस्कृतिक इकाई मानते हैं।’ लेकिन राजनीतिक रूप से अखण्ड के वे प्रबलतम समर्थक है। उपाध्याय जी पश्चिम के राष्ट्रवाद को अवधारणा को विश्व शान्ति के प्रतिकूल मानते हैं। 

राष्ट्रवाद का पाश्चात्य दृष्टिकोण

राष्ट्रवाद का पाश्चात्य दृष्टिकोण में वह राष्ट्रवाद क जन्म एक सहज प्रवृत्ति को मानते हैं तो कुछ विद्वान आध्यात्मिक तत्त्व को भी मानते हैं।

एनी बेसेंट ने भी फिक्टे, हेगेल और अरविन्द की भांति राष्ट्रवाद के आध्यात्मिक पक्ष का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार राष्ट्र एक आध्यात्मिक सत्ता है और ईश्वर की एक अद्भुत अभिव्यक्ति है। वे राष्ट्र को एक गंभीर आंतरिक जीवन से स्पन्दित आध्यात्मिक सत्ता मानती है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की जड़े भारत के प्राचीन साहित्य और उस साहित्य में साकार हुए अतीत में ढूँढ निकाली थी। उनके अनुसार ‘राष्ट्रवाद एक आध्यात्मिक तत्त्व है। वह जनता की अन्तरात्मा की अभिव्यक्ति है। राष्ट्र ईश्वर का साक्षात् रूप है किन्तु राष्ट्रवाद केवल एक प्रक्रिया है सामाजिक विकास की अवस्था है न कि उसकी परिणति है। वह पूर्णत्व को तभी प्राप्त होगा जब विश्वबन्धुत्व का आदर्श पूरा होगा।

रेनन के अनुसार राष्ट्रवाद की विशेषत: आध्यात्मिक रूप में है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के जनक मैजिनी है उनके अनुसार ‘भगवान से प्रदत्त राष्ट्र हमारे घर जैसा है।’

इन सभी विचारकों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर राष्ट्रवाद के संबंध में यही कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद विश्व बन्धुत्व मानव मैत्री पर आधारित होना चाहिए। कुछ विचारकों ने राष्ट्रवाद के आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक बल दिया। उनका मानना है कि इससे राष्ट्रवाद की जड़ें अधिक गहरी होगी। हम भी यही मानते है कि राष्ट्रवाद का सीधा संबंध राष्ट्र के जनता के कल्याण से जुड़ा हुआ है। इसलिए उसे देश के प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रवादी भावना की जड़ें जमाएँ रखती है। प्रत्येक मनुष्य को देश की सुरक्षा के लिए मर मिटने को तैयार रहना है।

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