सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा, परिभाषा एवं विशेषताएं

अनुक्रम

सामाजिक स्तरीकरण एक सार्वभौमिक प्रघटना है। कोई भी मानव समाज इससे वंचित नहीं है, यद्यपि स्तरीकरण विभिन्न रूपों और अंशों में पाया जाता है। किसी भी समाज में, व्यक्ति, पद और समूह विशिष्ट मानकों और कसौटियों के आधार पर विभेदीकृत किये जाते हैं। वे मानक और कसौटियां, जिनके आधार पर लोग विभेदीकृत किये जाते हैं, एक समयावधि में उभर कर आती हैं। एक समाज की प्रकृति, उसकी संस्कृति, अर्थव्यवस्था, और राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर स्तरीकरण सरल या कम विस्तृत या जटिल और अधिक विस्तृत होता है। किसी भी समाज में स्तरीकरण में विचारणीय बिन्दु एक व्यक्ति विशेष, या उसके परिवार या समुदाय की विभिन्न अनुपातों में उपलब्धियां हो सकती हैं। अत: एक व्यक्ति, एक परिवार, और एक समूह या तीनों विभिन्न सन्दर्भो और परिस्थितियों में या एक-दूसरे के संग, एक समाज में श्रेणीकरण की इकाइयां हो सकती हैं।

सामाजिक स्तरीकरण का संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण

मेलविन एम. ट्यूमिन ने शक्ति, सम्पत्ति, सामाजिक मूल्यांकन, और मानसिक संतोष (लाभ) की असमानता के आधार पर किसी सामाजिक समूह या समाज को पदों के सोपान में व्यवस्था को सामाजिक स्तरीकरण का नाम दिया है। किसी भी समाज में प्राय: शक्ति, सम्पत्ति (वर्ग) और सामाजिक मूल्यांकन (प्रस्थिति और प्रतिष्ठा), पद/स्थान अत्यिमाक आधार माने जाते हैं। मेक्स वेबर के अनुसार ‘वर्ग, प्रस्थिति और पार्टी, अर्थात् आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक, समाज की तीन महत्वपूर्ण व्यवस्थायें/रचनायें हैं, जिनके द्वारा पद-स्थानों, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का वितरण किया जाता है। इसी प्रकार, टालकट पार्सन्स का भी सामाजिक स्तरीकरण से अभिप्राय: उन व्यक्तियों के विभेदी श्रेणीकरण से है, जिनसे एक सामाजिक व्यवस्था निर्मित होती है। उन व्यक्तियों को, सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण सन्दर्भो में, एक-दूसरे से श्रेष्ठ और कमजोर समझा जाता है। पार्सन्स ने सतर्कता से ‘स्तरीकरण’ और ‘विभेदीकरण’ में अन्तर किया है, क्योंकि कसौटियां भी ‘सामाजिक’ और ‘गैर-सामाजिक’, क्रमश: विभाजित की गई हैं। एक सामाजिक व्यवस्था में इकाइयों के विभेदीय मूल्यांकन का आधार सामाजिक कसौटियां हैं। ये कसौटियां हैंμ नातेदारी, व्यक्ति विशेष की विशेषतायें, उपलिब्मायां, व्यवस्था, सत्ता, शक्ति आदि। गैर-सामाजिक कसौटियां मात्र विभेदीकरण का आधार हैं। आयु और यौन ( लिंग) ऐसे आधार हैं। इस प्रकार, पार्सन्स के अनुसार, स्तरीकरण इकाइयों के रूप में व्यक्तियों (मानव) के मानकीय रुझान (प्रवृत्ति) का मुख्य पहलू है।


पार्सन्स की तरह, कारे सालासतोगा ने विभेदीकरण,और स्तरीकरण,में अन्तर नहीं किया है। सामाजिक अन्तरक्रिया की प्रक्रिया द्वारा, व्यक्तियों, सामाजिक पदों या समूहों के बीच जो भी अन्तर उभरते हैं, उनको सालासतोगा ने सामाजिक स्तरीकरण, के बजाय सामाजिक विभेदीकरण, का नाम दिया है। वास्तव में, यह दृष्टिकोण ट्यूमिन और पार्सन्स द्वारा दी गई परिभाषाओं से बहुत भिन्न नहीं है। सालासतोगा की तरह, ट्यूमिन का भी मत है कि स्तरीकरण सामाजिक अन्तरक्रिया की प्रक्रिया से भी उभरता है। फिर भी, सालासतोगा स्तरीकरण की परिभाषित करने में अधिक नपे-तुले व स्पष्ट हैं। सालासतोगा के अनुसार, विभेदीकरण के चार प्रमुख प्रकार हैं (1) प्रकार्यात्मक विभेदीकरण या श्रम विभाजन, (2) श्रेणी विभेदीकरण, (3) प्रथा विभेदीकरण, और (4) प्रतियोगीय विभेदीकरण। सालासतोगा के अनुसार, श्रेणी विभेदीकरण का अभिप्राय स्तरीकरण-विभेदीकृत प्रस्थिति, या स्तरीकृत समूह, संगठन, या समाज से है। श्रेणी विभेदीकरण सभी मानव समाजों और बहुत से पशु समाजों में विद्यमान है। सालासतोगा ने श्रेणी विभेदीकरण और सोपान में विभेद नहीं किया है। उनके अनुसार, सोपान एक स्थिर प्रघटना है, और विशेष सुविधाओं के बंटवारे के लिये वितरण व्यवस्था का कार्य करता है। इस प्रकार सोपान द्वारा, सोपान और असमान वितरण अधिक दृढ़ होता है और इससे असमानता का चक्र जटिल बनता है। समाज के सुसंचालन के लिये प्रकार्यात्मक विभेदीकरण या श्रम का विभाजन एक वांछनीय आवश्यकता है। एक मानव समाज की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्रकार्यात्मक विभाजन के साथ गैर-विरोधात्मक श्रेणियों की रचना की जा सकती है। प्रथा विभेदीकरण का अभिप्राय उन नियमों से है, जिनके द्वारा विभेदीय उचित व्यवहार स्थापित किया जा सकता है। प्रतियोगीय विभेदीकरण का प्रयोजन सामान्य या एक विशेष सन्दर्भ में समाज के सदस्यों के रूप में व्यक्तियों की सफलता और असफलता से है। इस प्रकार, श्रेणी विभेदीकरण ही, व्यक्तियों, सामाजिक पदों/स्थानों, समूहों और यहां तक कि समाजों पर लागू होता है और इसीलिये यह सर्वव्याप्त है। पार्सन्स की तरह सालासतोगा भी स्तरीकरण की जैविकीय और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं का उल्लेख करते हैं। जैविकीय व्याख्याओं में समय और स्थान और स्तरीकरण में भिन्नता जैसे कारकों को नकारा जाता है। समाजशास्त्रीय व्याख्या में व्यक्तियों और समूहों के बीच में सहयोग और द्वंद दोनों पर बल दिया जाता है।

पी.ए. सोरोकिन ने स्तरीकरण की एक विस्तृत परिभाषा दी है। सोरोकिन के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण का तात्पर्य एक निश्चित जनसंख्या के विभेदीकरण से है, जिसमें सोपानीयता से वर्ग, एक-दूसरे के साथ व्यवस्थित किये गये हैं। उच्च व निम्न स्तरों के अस्तित्व से यह प्रकट होता है। इस प्रकार, स्तरीकरण का आशय एक विशिष्ट समाज के सदस्यों के बीच अधिकारों और विशेष-सुविधाओं, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों, सामाजिक मूल्यों और निजी-विचारों, सामाजिक शक्ति और प्रभावों के असमान वितरण से है। सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न और अनेक स्पष्ट स्वरूप हैं। उदाहरण के लिये आर्थिक रूप से स्तरीकृत, राजनीतिक दृष्टि से स्तरीकृत, और व्यवसाय के आधार पर स्तरीकृत स्वरूप प्रमुख हैं। ये सभी एक-दूसरे से अन्तर्सबंधित हैं।

उपरोक्त वर्णित सामाजिक स्तरीकरण के अवधारणाकरण, आधुनिक उदार पश्चिमी दुनिया में व्याप्त प्रस्थिति विभेदों पर लागू होते हैं, जो पूंजीवाद द्वारा वशीभूत हैं। वास्तविकता तो यह है कि गैर-पश्चिमी दुनिया उसी तरह की औद्योगिक और पूंजीवादी शक्ति नहीं है। हमारी मान्यता है कि श्रम विभाजन या एक जैसी क्रियाओं की आवश्यकता या प्रकार्यता की एकरूपता सब मानव समाजों में सही नहीं हो सकती। इसलिये, उपरोक्त उपगम के अन्तर्गत, स्तरीकरण की मान्य सर्वव्यापकता और प्रकार्यता के विषय में एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पर औद्योगिक (आदिम) समाजों में सामाजिक स्तरीकरण के विश्लेषण के बारे में एम.जी. स्मिथ का कहना है कि स्तरीकरण कभी भी विभिन्न पद-स्थानों के मात्र अस्तित्व या उन पर स्थापित होने पर नहीं पाया जाता है, बल्कि स्तरीकरण उन सिद्धान्तों में पाया जाता है जिनके द्वारा पहुंच और अवसरों का वितरण नियंत्रित होता है।, स्मिथ के अनुसार, औद्योगिक समाजों में आयु पुज और यौन (लिंगभेद), सामानों तक पहुंच व अवसरों के लिये प्रमुख निर्धारक हैं। आयु और यौन भेद मात्र जैविकीय कसौटियां नहीं हैं। पर-औद्योगिक समाजों में, आयु और यौन सामाजिक और सांस्कृतिक प्रघटनायें हैं। पार्सन्स और सालासतोगा ने इनको मात्र जैविकीय या गैर-सामाजिक कसौटियां करार दिया है। जैविकीय आधार पर राजनीतिक शक्ति को वैधता दी जा सकती है, क्योंकि बुजुर्गो को युवा लोगों और महिला सदस्यों को नजरअंदाज करके अपने समुदायों में नेतृत्व प्रदान करने आ अवसर प्राप्त होता है। विश्लेषणिक और साकार संरचनाओं या सदस्य इकाइयों और सामाजिक प्रक्रिया के सामान्यकृत पहलुओं की तरह, स्मिथ ने स्तरीकरण की विश्लेषणिक अवधारणाओं का उल्लेख किया है। विश्लेषणात्मक दृष्टि से, टयूमिन और पार्सन्स जैसे प्रकार्यवादियों ने स्तरीकरण को सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की एक निराकार आवश्यकता माना है। साकारिक दृष्टि से, स्तरीकरण विशिष्ट समाजों से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार स्मिथ के अनुसार स्तरीकरण प्रक्रिया और प्रस्थितियों की स्थिति दोनों है। भारत में सामाजिक स्तरीकरण की प्रवृत्तियों की व्याख्या में योगेन्द्र सिंह ने स्तरीकरण को सिद्धांत, संरचना और प्रक्रिया के परिप्रेक्ष्य में समझा है। सिंह का यह भी मत है कि प्रक्रिया अन्य दो बिन्दुओं, अर्थात, सिद्धान्त और संरचना से अधिक आधारभूत है। स्मिथ के अनुसार प्रस्थितियों की अवस्था सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम व अवस्था दोनों हैं।

स्मिथ द्वारा की गई व्याख्या बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके मत में एक समाज में संस्थाकरण और समूहों/इकाइयों के बीच सामाजिक सम्बन्धों का आधार है। दूसरे शब्दों में, क्रमश: आकस्मिकता और झगड़ा एक श्रेणीकरण व्यवस्था के आधार कतई नहीं बन सकते। इसलिये, संरचनात्मक सिद्धांतों द्वारा एक सामाजिक स्तरीकरण व्यवस्था की प्रकृति व कार्यविधि निर्धारित होती है। वर्तमान लाभ के वितरण (वितरण की प्रक्रियायें) संरचनात्मक सिद्धान्तों द्वारा नियंत्रित की जाती है। संरचना की अवधारणा द्वारा इन सिद्धान्तों (वितरणों) और उनके समायोगों की पहचान सुलभ होती है। संरचनात्मक परिवर्तन का अभिप्राय संरचनात्मक इकाइयों, अर्थात् प्रस्थितियों में परिवर्तनों या आंशिक बदलावों से है। इस प्रकार, स्तरीकरण का अभिप्राय मात्र श्रेणीकृत सोपान से नहीं है, बल्कि, विभिन्न प्रस्थिति परतों में समानरूपी गुणवना से भी है, लेकिन समरूपता ‘स्थिर’ व्यवस्थाओं और जाति व्यवस्थाओं में नहीं पाई जा सकती। असमानता और स्तरीकरण एक सीमा तक एक-दूसरे से भिन्न हैं। स्तरीकरण सामान्यतया मानकीय-रचित सिद्धान्तों और मूल्यों पर आधारित है, जबकि असमानता की उत्पनि वंशावलियों और आयु-फंजों जैसी पूर्व-निर्धारित स्थिर व्यवस्थाओं में दिखाई देती है। सामाजिक गैर-बराबरी के पेतों को आधार मान कर, स्तरीकरण और असमानता में भेद किया जा सकता है, या दूसरे शब्दों में, आधुनिक औद्योगिक समाजों और पर-औद्योगिक समाजों में अन्तर कर सकते हैं।

सामाजिक स्तरीकरण का मार्क्सवादी दृष्टिकोण

सामाजिक स्तरीकरण के विषय में शास्त्रीय मार्क्सवादी दृष्टिकोण, उपरोक्त वर्णित संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक अवधारणाकरण की तुलना में, विश्लेषणात्मक दृष्टि से बिल्कुल भिन्न है। यह कहना सही नहीं होगा कि कार्ल मार्क्स ने प्रौद्योगिकी या आर्थिक निर्धारण के एक साधारण सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। मार्क्स ने समाज के बारे में एक वृहद् संरचनात्मक व्याख्या की उद्घोषणा की थी, जिसमें वर्ग वर्ग-संघर्ष और परिवर्तन की अवधारणायें प्रमुख थीं। अपने शास्त्रीय ग्रंथ केपिटल में मार्क्स ने लिखा हैμमात्र श्रमशक्ति के स्वामी, पूंजी के मालिक, और भूस्वामी, जिनकी आय के सामान, क्रमश:, वेतन, लाभ और लगान हैं, दूसरे शब्दों में, वेतनभोगी-श्रमिक, पूंजीपति और भूस्वामी उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति पर आधारित आधुनिक समाज के तीन दीर्घ वर्ग हैं।, मार्क्स यह भी कहते हैं कि सर्वत्र मध्यम और बीच के प्रस्थिति स्तरों को अलग रखने की रेखायें भी समाप्त हो जाती हैं। पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के विकास में यह प्रवृत्ति अधिक बढ़ जाती है। इसमें श्रम वेतन श्रम में और उत्पादन के सामान पूंजी में रूपान्तरित हो जाते हैं। विरासत सम्पत्ति भी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में परिवर्तित हो जाती है। मार्क्स ने दो प्रश्न प्रस्तावित किये हैं

  1. वर्ग में क्या पाया जाता है?
  2. केसे तीन दीर्घ सामाजिक वर्ग श्रमिक, पूंजीपति और भूस्वामी बनते हैं?

यद्यपि, मार्क्स ने सामाजिक स्तरीकरण की एक स्पष्ट अवधारणा प्रस्तुत नहीं की है, फिर भी उसने वर्ग और वर्ग संघर्ष के बारे में आनुभविक सन्दर्भो पर बल दिया है। मार्क्स के अनुसार, इतिहास के प्रत्येक युग में एक प्रमुख उत्पादन विधि रही है और उसके आधार पर वर्ग संरचना बनी है, जिसमें शासक वर्ग और शोषित वर्ग, अर्थात् समाज के दो प्रस्थिति स्तर देखे जा सकते हैं। इन वर्गो के बीच संघर्ष द्वारा मनुष्यों और समूहों के बीच सामाजिक संबंमा निर्धारित होते हैं। उत्पादन के सामानों पर नियंत्रण द्वारा यह और अधिक निर्धारित होता है और इससे लोगों के सम्पूर्ण नैतिक और बौण्कि जीवन का भी निर्धारण होता है। कानून और सरकार, कला और साहित्य, विज्ञान और दर्शन ये सब कुल मिलाकर प्रत्यक्ष रूप में, शासक वर्ग के हितों की संतुष्टि करते हैं।

मार्क्सवादी उपागम के आधार पर हम कह सकते हैं कि स्तरीकरण का निर्धारण उत्पादन के सम्बन्धों की व्यवस्था से होता है, और ‘प्रस्थिति’ का निर्धारण इस व्यवस्था में उत्पादन के सामानों के स्वामित्व और अस्वामित्व के सन्दर्भ में व्यक्ति के स्थान (पद) द्वारा होता है। मार्क्सवादी सिद्धान्त में, हमें ‘वर्ग’ और ‘प्रस्थिति’ के बीच या वर्ग सोपान और सामाजिक स्तरीकरण में स्पष्ट अन्तर नहीं दिखाई देता है। मार्क्स ने यह स्पष्ट किया है कि उत्पादन ‘सामाजिक व्यक्तियों’ द्वारा किया जाता है, और इसको एक विशेष ‘सामाजिक संदर्भ’ में समझने की आवश्यकता है। सामाजिक स्तरीकरण के सन्दर्भ में, मार्क्सवादी विचार में ‘प्रभुत्व’ और ‘अधीनता’ या ‘प्रभावकारी श्रेष्ठता-निम्नता सम्बन्ध’ पर बल दिया गया है। इस तरह दो वर्ग पूंजीपति और सर्वहारा पाये जाते हैं।

इस प्रकार मार्क्स के अनुसार एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों का कोई भी संकलन है, जो उत्पादन की व्यवस्था में समान कार्य करता है। ऐतिहासिक दृष्टि से, स्वतंत्र मनुष्य और दास, संरक्षक और साधारण व्यक्ति, मालिक और नौकर संघ-मालिक और आम आदमी, या संक्षेप में, शोषक और शोषित द्वारा सामाजिक वर्गो की संरचना होती है। मार्क्स के मतानुसार वर्ग एक सामाजिक वास्तविकता, एक विद्यमान तथ्य है। एक वर्ग अपने अस्तित्व, स्थिति और उद्धेश्यों के बारे में विकसित चेतना रखने वाला एक वास्तविक समूह है। मार्क्स के लिये वर्ग एक दर्पण है, जिससे एक विशिष्ट समाज में संबंधों की सम्पूर्णता को देखा जा सकता है।

सामाजिक स्तरीकरण का मेक्स वेबर का दृष्टिकोण

सामाजिक स्तरीकरण के बारे में मेक्स वेबर का गहन और तर्कसंगत दृष्टिकोण वर्ग और स्तरीकरण पर मार्क्सवादी अवधारणा की एक आलोचनात्मक टिप्पणी के रूप में समझा जा सकता है। वेबर के सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धान्त की विशिष्टता ‘शक्ति’ है। वेबर ने समाज की तीन ‘व्यवस्थाओं’, अर्थात्, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं में, एक स्पष्ट रेखा अंकित की है। वेबर के अनुसार, एक समुदाय में ‘वर्ग’, ‘प्रस्थिति समूह’, और ‘पार्टियां’ (शक्ति समूह), शक्ति-वितरण की प्रघटनायें हैं। इस विभेद के आधार पर वेबर का सिद्धान्त बहुआयामी कहा जाता है। इसके विपरीत मार्क्स द्वारा प्रतिपािकृत सिद्धांत एकल-आयामी हैं। वर्ग के सन्दर्भ में, वेबर के अनुसार, निम्न तीन बिन्दु महत्वपूर्ण हैं (अ) बहुत से लोगों के लिये उनके जीवन के अवसरों का एक विशेष कारक (तत्व) समान होता है। (ब) यह तत्व वस्तुओं के संग्रह और आय के अवसरों के रूप में पूर्णत: आर्थिक हितों के सन्दर्भ में देखा जाता है। (स) इसके अतिरिक्त, यह तत्व वस्तु/पदार्थ की अवस्थाओं या श्रम बाजारों के अन्तर्गत पाया जाता है। इन तीन बिन्दुओं को एक साथ रखने पर ‘वर्ग स्थिति’ इंगित होती है। वर्ग स्थिति का निर्धारण ‘बाजार स्थिति से होता है। ‘वर्ग’ शब्द का अभिप्राय लोगों के किसी भी ऐसे समूह से है जो एक जैसी वर्ग स्थिति में पाया जाता हैं इसलिये, ‘सम्पत्ति’ और ‘सम्पत्ति का अभाव’ सब वर्ग परिस्थितियों की आधारभूत रेणियां हैं। बाजार-स्थिति में प्रतियोगिता के कारण कुछ खिलाड़ी (कर्ता) बाहर हो जाते हैं, और कुछ को संरक्षण प्राप्त होता है। इस प्रकार अंत में वर्ग-स्थिति बाजार-स्थिति बन जाती है। बाजार में अवसर की प्रकृति ही निर्णयकारी क्षण होती है।

एक समाज में सामाजिक सम्मान का जिस प्रकार से वितरण होता है, उसके द्वारा ‘सामाजिक संगठन’ (व्यवस्था) को परिभाषित किया जाता है। सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था दोनों राजनीतिक व्यवस्था (संगठन) से जुड़ी हुई हैं। परन्तु, दोनों एक समान नहीं हैं। बहुत हद तक सामाजिक व्यवस्था का निर्धारण आर्थिक व्यवस्था द्वारा होता है और फिर इस पर सामाजिक व्यवस्था की प्रतिक्रिया होती है। यहां पर हमें वेबर की वर्ग की व्याख्या में मार्क्सवादी विचार का बुद्धिमतापूर्ण उपयोग दिखाई देता है। एच.एच. गर्थ और सी. डब्ल्यू. मिल्स के अनुसार वेबर के कार्य का एक भाग मार्क्स के आर्थिक भौतिकवाद को राजनीतिक और सैनिक भौतिकवाद द्वारा ‘घुमा-िपुरा कर’ प्रस्तुत करने का प्रयास कहा जा सकता है, लेकिन वेबर ने यह स्पष्ट कहा है कि ‘प्रस्थिति समूह’ और ‘वर्ग’ एक-दूसरे से अलग हैं। प्रस्थिति समूह केवल बाजार सिद्धान्त से कार्य नहीं करते हैं। वर्गो के विपरीत, प्राय: प्रस्थिति समूह समुदाय होते हैं और सामान्यतया उनका स्वरूप अनिश्चित होता है। ‘वर्ग-स्थिति’ की तरह ही ‘प्रस्थिति-स्थिति’ पाई जाती है, और इसमें सम्मान का सामाजिक मापन होता है, जो अधिकतर लोगों को मान्य होता है। यह तथ्य वर्ग-स्थिति से बंधा हुआ हो सकता है, और इसके विपरीत वर्ग-स्थिति, प्रस्थिति-स्थिति से बंधी हुई पाई जा सकती है, लेकिन प्रस्थिति-सम्मान अनिवार्यत: वर्ग-स्थिति से जुड़ा हुआ नहीं हो सकता। प्राय: यह केवल सम्पत्ति के भावों के स्पष्ट विरोध में पाया जाता है। सम्पत्तिवान और सम्पत्तिविहीन दोनों लोग एक ही प्रस्थिति समूह में पाये जा सकते हैं, लेकिन मार्क्सवादी पैराडाइम में पूंजीपति और सर्वहारा के बीच इस प्रकार की समानता की सोच संभव नहीं है। पूंजीपति और सर्वहारा दो विपरीत दिशाओं में हैं, क्योंकि वे वर्ग पर आधारित दुश्मन हैं, और उनकी प्रस्थितियां भी उत्पादन व्यवस्था में उनके विरोधी स्थानों के कारण भिन्न होती हैं।

प्रस्थिति सम्मान के सन्दर्भ में, वेबर ने ‘प्रस्थिति स्तरीकरण की गारन्टीज’ का उपयोग किया है, और यह एक विशिष्ट जीवन-शैली द्वारा प्रदर्शित की जाती है। यहां अत्यधिक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि सामाजिक मेल-मिलाप पर बंमान रहते हैं और यह आर्थिक प्रस्थिति के अधीन नहीं है। ‘प्रस्थिति चक्र’ विवाहों द्वारा स्पष्ट दिखाई देता है। प्रस्थिति समूहों को गलियों, पड़ोसों, समूहों, मंदिरों, विशेष स्थानों आदि पर एकत्रित होते हुए देख सकते हैं। ‘सजातीय अलगाव’ और ‘जाति’, प्रस्थिति चक्रों के उनम उदाहरण हैं। प्रस्थिति स्तरीकरण की व्यवस्था को स्थिरता कानून द्वारा मान्य सामाजिक व्यवस्था और परम्पराओं व संस्कारों दोनों से प्राप्त होती है। प्रस्थिति समूहों से जीवन के ‘शैलीकरण’ की उत्पनि होती है। वस्तुओं का उपभोग और ‘जीवन शैलियां’ प्रस्थिति समूहों के स्तरीकरण के सूचक हैं।

वेबर के सामाजिक स्तरीकरण की सोच में अतिमहत्वपूर्ण तत्व ‘शक्ति’ हैं वेबर के अनुसार, शक्ति एक व्यक्ति या बहुत से व्यक्तियों के द्वारा, अन्य लोगों के विरोध के बावजूद भी, जो उस क्रिया में भागीदारी करते हैं, एक सामूहिक कार्य में अपनी इच्छा को पूरा करने का अवसर है।, शक्ति आर्थिक या सामाजिक तौर पर निर्धारित हो सकती है। परनतु शक्ति अपने-आप में आर्थिक और सामाजिक आधार पर निर्धारित शक्ति से भिन्न है। इसके विपरीत, आर्थिक शक्ति अन्य आधारों पर विद्यमान शक्ति का परिणाम हो सकती है। एक व्यक्ति अपने आपको आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने के लिये ही दौड़भाग नहीं करता। शक्ति (आर्थिक शक्ति सहित) केवल शक्ति पाने के लिये महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं अनेक बार शक्ति प्राप्त करने की इच्छा ‘सामाजिक सम्मान’ द्वारा भी निर्धारित होती है, लेकिन केवल आर्थिक शक्ति या रुपये की नग्न शक्ति, किसी भी तरह सामाजिक सम्मान का आधार नहीं मानी जा सकती है। शक्ति को भी सामाजिक सम्मान का एकमात्र आधार नहीं मान सकते। प्रेरित/प्रदन सामाजिक सम्मान या प्रतिष्ठा भी राजनीतिक या आर्थिक शकित का आधार हो सकते हैं। शक्ति और सम्मान दोनों विधि व्यवस्था से आश्वस्त किये जा सकते हैं, परन्तु प्राय: यह उनका प्राथमिक पेत नहीं है। विधि व्यवस्था एक अतिरिक्त पेत है, और इसलिये इसके द्वारा शक्ति और सम्मान हमेशा प्राप्त नहीं किये जा सकते।

वेबर ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘क्लास, स्टेटस, पार्टी’ में कहा है कि पार्टियां (राजनीतिक दल) शक्ति के मकान में रहती हैं। पार्टियों का कार्य ‘सामाजिक शक्ति’ की प्राप्ति की ओर अग्रसर रहता है, अर्थात् शक्ति सार्वजनिक कार्य को, बिना उसकी विषयसूची जाने, प्रभावित करती है। शक्ति किसी भी संगठन या एक विशेष सन्दर्भ में विद्यमान रहती है, जहां पर कार्यकर्ताओं व भागीदारों में अन्तक्रिया पाई जाती है। पार्टियां हमेशा समाज में ढलती हैं, एक उद्धेश्य को लेकर बढ़ती हैं, चाहे वह निजी कारण से ही हो। ‘वर्ग स्थिति’ और ‘प्रस्थिति स्थिति’, ‘पार्टियों का निर्धारण कर सकती है, लेकिन पार्टियां न तो ‘वर्ग’ ही हो सकती हैं, और न ही ‘प्रस्थिति समूह’। वे आंशिक रूप में ‘वर्ग’ हैं और आंशिक रूप में ‘प्रस्थिति पार्टियां’ हैं और कभी-कभी वे दोनों ही नहीं हैं। पार्टियां समुदाय में प्रभुत्व की संरचना को दिखाती हैं। शक्ति प्राप्ति के सामान, नग्न हिंसा से लेकर मान प्रलोभन द्वारा, मतों के लिये प्रचार, सामाजिक प्रभाव, जोशीले भाषण, सुझाव, भपे झूठ आदि हो सकते हैं।

आलोचनात्मक टिप्पणी

सामाजिक स्तरीकरण की विभिन्न अवधारणाओं के विवेचन के पश्चात् उन पर अलोचनात्मक टिप्पणी भी आवश्यक है। परन्तु सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धान्त पर लिखे गये अमयाय में अधिक विस्तार से विश्लेषण किया जायेगा। डेरेनडार्फ के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण सामाजिक व्यवहार के नियंत्रण के सकारात्मक और नकारात्मक नियमनों का एक तात्कालिक परिणाम है। नियमन हमेशा ‘वितरणीय प्रस्थिति की श्रेणी व्यवस्था’ उत्पन्न करते हैं। सब मानव समाजों की विशिष्ट विशेषताओं में, जो उनके लिये आवश्यक है, उनमें स्तरीकरण पाया जाता हैं एक समाज में एक सत्ता संरचना होती, और उसके द्वारा मानकों और नियमनों को स्थापित रखा जाता हैं समाज में ‘संस्थाकृत शक्ति’ होती है। इस प्रकार स्तरीकरण की उत्पनि मानक, नियमन और शक्ति की निकटता से जुड़ी हुई तिकड़ी से होती है। सत्ता के सम्बन्ध सदैव आधिपत्यता और अधीनस्थता के सम्बन्ध होते हैं।

स्तरीकरण के बारे में पार्सन्स, मार्क्स और वेबर की अवधारणाओं की आलोचनात्मक टिप्पणी के रूप में, स्तरीकरण के बारे में डेरेनडार्क के विचार बहुत ज्ञानक्रर्माक और तार्किक दृष्टि से गहन है। डेरेनडार्क के अनुसार, फ्वर्ग का एक सिद्धान्त जो उत्पादन के सामानों के आधार पर समाज का विभाजन स्वामियों और गैर-स्वामियों में करता है, ऐसे समाज में जैसे ही वैध स्वामियों और गैर-स्वामियों में करता है, ऐसे समाज में जैसे ही वैध स्वामित्व और वास्तविक नियंत्रण में अन्तर किया जाता है तो वर्ग के उस सिद्धान्त का विश्लेषणात्मक महत्व समाप्त हो जाता है।, डेरेनडार्क का मत है कि समाजों में सत्ता के स्थानों (पदों) के विभेदीय वितरण और उनकी संस्थात्मक व्यवस्थाओं द्वारा सामाजिक वर्ग और उनके संघर्ष उत्पन्न होते हैं। इसलिये, उत्पादन के सामानों पर नियंत्रण, सत्ता का विशिष्ट उदाहरण है। वर्ग सामाजिक संरचना का तत्व है, जिसका निर्धारण सत्ता और उसके वितरण द्वारा होता है। इस प्रकार, वर्ग सामाजिक संघर्ष समूह है, जो कि अनिवार्यत: किसी संयोजित संगठन में सत्ता की कार्यवाही या गैर-कार्यवाही द्वारा निर्धारित होते हैं।

स्तानिसला ओस्सोवस्की की वर्ग की अवधारणा में सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा की एक आलोचनात्मक टिप्पणी दिखाई देती है। ओस्सोवसकी के अनुसार सामाजिक संरचना में वर्ग अत्यंत व्यापक समूहों के रूप में गठित है। वर्ग विभाजन का सम्बन्ध सामाजिक प्रस्थिति से है, जो विशेषाधिकारों और भेदभावों की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है और जिसका निर्धारण जैविकीय कसौटियों से नहीं होता है। एक सामाजिक वर्ग में व्यक्तियों की सदस्यता सापेक्षिक दृष्टि से स्थायी रहती है। ओस्सोवस्की ने जो सुझाया है, वह मार्क्स और वेबर के विचारों से बहुत भिन्न है। ओस्सोवस्की का अभिमत ट्यूमिन और पार्सन्स के दृष्टिकोणों के अधिक निकट है। सामाजिक संरचना को समझने के लिये, ओस्सोवस्की ने ‘श्रेणी’ की योजना का सुझाव दिया है। श्रेणी वैयक्तिक तौर पर अनुमानित और वस्तुपरकता से मापे हुए पद (स्थान) दोनों को इंगित करती है। ओस्सोवस्की ने श्रेणी को सरल और सम्मिश्रित भागों में विभाजित किया है। आय, मान और सम्पत्ति जैसी वस्तुनिष्ठ कसौटियों पर श्रेणी आधारित है। ये वर्ग विभाजन के आधार हैं, और श्रेणी सम्मिश्रित तब बनती है, जब दो या दो से अधिक बेमेल कसौटियां शामिल होती हैं।

स्तरीकरण की परम्परागत अवधारणा की एक अन्य आलोचनात्मक टिप्पणी भी उस मत में है, जिसके अनुसार वर्गो को वैयक्तिक कसौटियां और स्तरणों को वस्तुनिष्ठ इकाइयां माना जाता है। एक सामाजिक वर्ग एक समूह है, क्योंकि वर्ग श्रेणी (स्थान) व हितों और एक समान दृष्टिकोण के द्वारा समूह वर्ग के बारे में सोचता है। रिचार्ड सेन्टर्स के अनुसार, ‘वर्ग’ एक ‘वैयक्तिक तत्व’ है, और ‘स्तरण’ व्यवसाय, आय, शक्ति, जीवन स्तर, शिक्षा, कार्य बुद्धि आदि वस्तुनिष्ठ आयामों से निर्धारित होता है। वर्ग की प्रकृति वैयक्तिक है, क्योंकि वह वर्ग चेतना (अर्थात् समूह की सदस्यता की भावना) पर निर्भर है। एक व्यक्ति का वर्ग उसकी आत्मा का हिस्सा है। वर्ग के बारे में ऐसा दृष्टिकोण बिल्कुल अटपटा लगता है, फिर भी इसके द्वारा वर्ग और स्तरीकरण की मनोवैज्ञानिक व्याख्या का बोध होता है।

सामाजिक स्तरीकरण के विषय में डाहरेडोर्क के मत से मेल रखता हुआ अभिमत जरहार्ड लेन्सकी ने प्रस्तुत किया है। ट्यूमिन और पार्सन्स के दृष्टिकोणों के विपरीत, लेन्सकी ने सामाजिक स्तरीकरण के परिणामों के बजाय इसके कारणों पर बल दिया है। लेन्सकी का मयान प्रतिष्ठा के बजाय शक्ति और विशेषाधिकार पर है। मानव समाजों में सामाजिक स्तरीकरण और विपरित प्रक्रिया में अन्तर नहीं है, दोनों एक समान हैं। स्तरीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा जो मूल्य (पदार्थ, वस्तुयें और सामान) कम उपलब्ध हैं, उनका वितरण एक प्रमुख प्रघटना के रूप में किया जाता है।

सामाजिक स्तरीकरण पर उपलब्ध पर साहित्य पर एक नजर डालने से स्पष्ट होता है कि मानव समाज में तीव्र परिवर्तन के कारण ‘प्रक्रिया’ का तत्व बहुत प्रबल हो गया है। ‘पूंजीपतिकरण’, ‘निजीकरण’, ‘असर्वहाराकरण’, ‘प्रस्थिति बेमेल’, ‘प्रस्थिति पारदश्र्ाीकरण’, ‘वर्गविहीनता’, ‘समतावाद’, ‘अस्तरीकरण’, ‘पपाुन:स्तरीकरण’, ‘भूमण्डलीकरण’ आदि धारणाओं से स्तरीकरण के अवधारणाकरण में और अधिक सामग्री एकत्रित हुई है, लेकिन इससे सामाजिक स्तरीकरण को परिभाषित करने का कार्य बहुत कठिन और जटिल भी हुआ है।

‘सामाजिक गतिशीलता’ की अवधारणा पर मंथन करने से पूर्व, सामाजिक स्तरीकरण की अवधारणा पर चर्चा को समेटते हुए, हम पपाुन: उल्लेख करना चाहेंगे कि स्तरीकरण के दो स्वरूप हैं (i) श्रेणीकृत पैमाना या गैर-बराबरी और (ii) विभेदीय सामाजिक स्थापना। दीपांकर गुप्ता के अनुसार प्रथम को सोपान कहा जा सकता है और दूसरे में क्षितिजीय विभेद या अन्तर देखे जा सकते हैं। शक्ति, प्रस्थिति और प्रभाव के सोपान हो सकते हैं। जैविकीय या भाषायी अन्तर प्राय: गैरμसोपानीय होते हैं, जबकि आय, मान, शक्ति आदि पर आधारित विभेद श्रेणीकृत होते हैं, और निश्चय ही वे सोपानीय भी होते हैं। चूंकि, सोपान और विभेद (अन्तर) एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिये सामाजिक व्यवस्था और गतिशीलता निरन्तर एक ही वास्तविकता के भाग हैं, अर्थात् एक समाज में सामाजिक सम्बन्धों के व्यवस्थापन के भाग हैं। सामाजिक स्तरीकरण की कोई भी व्यवस्था पूर्णत: स्थिर, जड़ व बन्द नहीं हैं और न ही कोई व्यवस्था पूर्णत: गतिमान, परिवर्तनकारी और खुली है। देखने की बात यह है कि एक व्यवस्था कि सीमा/अंश तक बन्द या खुली है।

सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा एवं विशेषताएं

वह प्रक्रिया जिसके द्वारा मनुष्यों और समूहों को प्रस्थिति के पदानुक्रम में न्यूनािमाक स्थायी रूप से श्रेणीबण् किया जाता है, स्तरीकरण कहलाती है। रेमण्ड मुरे (Raymond W. Murray) के अनुसार, सामाजिक स्तरीकरण समाज का ‘उच्च’ और ‘निम्न’ सामाजिक इकाइयों में सामान्तर विभाजन है। प्रत्येक समाज पृथक समूहों में विभक्त है। प्राचीनतम समाजों में भी किसी न किसी प्रकार का सामाजिक स्तरीकरण था। जैसा कि सोरोकिन (Sorokin) ने कहा है अस्तरीकृत समाज जिसके सदस्यों में वास्तविक समानता हो, केवन एक कल्पना है, जो मानव-इतिहास में कभी साकार नहीं हुई। कोई भी समाज अस्तरीकृत नहीं है। स्तरीकरण में समाज के सदस्यों में असमान अधिकारों एवं विशेषाधिकारों का वितरण निहित है। गिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार, फ्सामाजिक स्तरीकरण का आशय समाज का विभिन्न ऐसी स्थायी श्रेणियों और समूहों में विभाजन है, जो उच्चता और अधीनता के सम्बन्धों से परस्पर-सम्बद्ध होते हैं। टालकाट पारसन्स के शब्दों में, साामाजिक स्तरीकरण से अभिप्राय किसी सामाजिक अवस्था में व्यक्तियों का ऊचे और नीचे के पदानुक्रम में विभाजन है। जान एफ. क्यूबर एवं विलियम एफ. केन्फल (John F. Cuber and Willian F. Kenkel) ने इसे विभेदक विशेषाधिकार की अधिरोपित श्रेणियों का प्रतिमान कहा है। ये विशेषाधिकार किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की बजाय प्रस्थिति का निर्धारण करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उच्च या निम्न, श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ व्यक्तियों की स्थिति होती है। कुर्ट बी. मेयर (Curt B. Mayer) के अनुसार, सामाजिक स्तरीकरण विभेदीकरण की एक विधि है, जिसमें सामाजिक पदों का वंशानुक्रम निहित होता है,जिसमें इन पदों के स्वामी को एक-दूसरे के संदर्भ में महत्वपूर्ण सामाजिक बातों में श्रेष्ठ, समान या निम्न समझा जाता है। लुंडबर्ग (Lundberg) ने लिखा है, स्तरीकृत समाज वह है, जिसमें असमानता होती है तथा ऐसे विभेद होते हैं, जो उनके द्वारा निम्न और उच्च आंके जाते हैं।

सामाजिक स्तरीकरण विभेदीकरण की एक विधि है, जिसमें सामाजिक पदों का वंशानुक्रम निहित होता है,जिसमें इन पदों के स्वामी को एक-दूसरे के संदर्भ में महत्वपूर्ण सामाजिक बातों में श्रेष्ठ, समान या निम्न समझा जाता है।

प्रस्थिति की असमानता – सामाजिक स्तरीकरण की विशेषता

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रस्थिति की असमानता अथवा पद का विभेदीकरण, सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषता है। यहां सामाजिक स्तरीकरण होगा, वहां सामाजिक असमानता होगी। यद्यपि मानव ने सदैव ऐसे संसार का स्वप्न देखा है जिसमें प्रस्थिति का भेदभाव न हो और सभी व्यक्ति समान हों। फिर भी, यह कटु सत्य है कि समाज विभिन्न पदों को विभिन्न अधिकार एवं सुविधाएं प्रदान करता है। कुछ व्यक्तियों और समूहों को उनके द्वारा भोगे जाने वाली सुविधाओं और विशेषाधिकारों के आधार पर दूसरों की अपेक्षा उच्च माना जाता है। उदाहरण के लिए भारत में डाक्टरों या इंजीनियरों को अमयापकों की अपेक्ष उच्च माना जाता है। श्रेणी के रूप में पूर्वोक्त का उच्च सामाजिक मान है। विभिन्न पदों से संलग्न मान या प्रतिष्ठा सामाजिक व्यवस्था का एक भाग बन जाती है और यही स्तरीकरण हैं

हां, यह स्मरण रखना चाहिए कि विभिन्न पदों से संलग्न मान या मर्यादा का प्रकार अथवा इसकी मात्रा सभी समाजों में समान नहीं होते। और भी, विभिन्न पदों से विभिन्न मानों को संलग्न करने का आधार भी तर्कसंगत होना आवश्यक नहीं। मान के विभेदों के अनेक कारण हो सकते हैं इनमें से कुछ पूर्णतया अंधविश्वासी, अतार्किक तथा विस्मृत एवं पुरातन मत में छिपे हुए कारण हो सकते हैं। संभव है कि किसी पद को धार्मिक आस्था के कारण कल्पित देवी आदेश द्वारा उच्च मान प्रदान किया गया हो।

स्तरीकरण से अंत:क्रिया सीमित हो जाती है, जिसके फलस्वरूप विभिन्न श्रेणियों के बीच अंत:क्रिया की अपेक्षा किसी विशेष श्रेणी के मनुष्यों के बीच अंत:क्रिया अधिक हो जाती है। किसी विशिष्ट स्तरीकरण प्रणाली में, कुछ प्रकार की अंत:क्रिया अन्य की अपेक्षा अधिक प्रतिबिन्मात हो सकती है। जीवन-साथी के चपापाुनाव में, व्यवसाय के चपापाुनाव में, मित्रों को बनाने में स्वचालित टैंफिक के प्रवाह की अपेक्षा अधिक प्रतिबन्मा हो सकते हैं। मोटर-चालन निर्धारित नियमों के अनुसार न कि अपनी अथवा दूसरे चालकों की सामाजिक प्रस्थिति के अनुसार आगे-पीछे गुजर जाने का रास्ता देता या लेता है।

स्तरीकरण का आरम्भ केसे हुआ?

गम्प लोविज (Gumplowicz), ओपेनहीमर (Oppenheimer) तथा अन्य समाजशास्त्रियों का विचार है कि सामाजिक स्तरीकीण का प्रारम्भ एक समूह द्वारा दूसरे की विजय में ढूंढा जा सकता है। विजयी समूह प्राचीन काल में विजित श्रेणी पर प्रभुत्व स्थापित कर स्वयं को उच्च श्रेणी का समझता था, जिससे विजित श्रेणी निम्न बन गई। सीसल नार्थ (Cesil North) भी एक समूह की दूसरे समूह पर विजय को विशेषाधिकार की उत्पनि का कारण मानता है। उसने तो यहां तक कहा है कि फ्जब तक जीवन का शांतिपूर्ण क्रम चलता रहा तब तक कोई तीव्र और स्थायी श्रेणी-विभाजन प्रकट नहीं हुआ। परन्तु सोरोकिन (Sorokin) इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, संघर्ष स्तरीकरण को सुग बनाने वाला तो हो सकता है, परन्तु उसे आरम्भ करने वाला नहीं। स्तरीकरण सभी समाजों, शांतिपूर्ण एवं युद्धप्रिय, में पाया जाता है। उसने स्तरीकरण का कारण वंशानुगत मानवीय विभेदों एवं पर्यावरण-सम्बन्धी दशाओं के अन्तरों को माना है।

स्पेंगलर (Spengler) के अनुसार, स्तरीकरण का आधार अभाव है। अब समाज में प्रकार्यो एवं शक्तियों के संदर्भ में विभिन्न पदों में विभेद किया जाता है एवं इन पदों को विशेष अधिकार एवं विशेषाधिकार प्रदान किये जाते हैं तो अभाव उत्पन्न होता है। इस आधार पर कुछेक पद अधिक वांछनीय बन जाते हैं क्योंकि इन पदों पर विशेष लाभ प्राप्त हैं। अतएव, दुर्लभ विशेषाधिकारों एवं शक्तियों के आबंटन से स्तरीकरण का जन्म होता है।

नि:संदेह प्रस्थिति के अंदर सभी समाजों में पाए जाते हैं। डेविस (Davis) ने स्तरीकरण की प्रकार्यात्मक आवश्यकता पर बल दिया है। उसके अनुसार, समाज में ऐसे पुरस्कार होने चाहिए, जिनका प्रयोग वह प्रलोभनों के रूप में कर सके तथा ऐसी विधि होनी चाहिए, जिनसे इनका वितरण पद के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप में हो सके। सामाजिक पदों के अनुसार पुरस्कारों का वितरण सामाजिक स्तरीकरण को जन्म देता है। ये पुरस्कार आर्थिक प्रलोभनों, सौंदर्यात्मक प्रलोभनों एवं प्रतीकात्मक के रूप में हो सकते हैं। प्रतीकात्मक प्रलोभन ऐसे प्रलोभन हैं, जो व्यक्ति के मान एवं अहं की वृद्धि करते हैं। पुरस्कारों का वितरण सामाजिक असमानता को जन्म देता है। डेविस के अनुसार, सामाजिक असमानता, अचेतन रूप से अपनाई हुई ऐसी विधि है, जिसके द्वारा विभिन्न समाज यह विश्वास दिलाते हैं कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदों पर चेतन रूप से सर्वाधिक योग्य व्यक्तियों को रखा गया है। अतएव प्रत्येक समाज में आवश्यक रूप से संस्थागत असमानता अथवा सामाजिक स्तरीकरण रहना चाहिए।

परन्तु अन्य समाजशास्त्री स्तरीकरण की प्रकार्यात्मक व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार, स्तरीकरण व्यवस्था इसलिये उपस्थित है क्योंकि सर्वोच्च स्तर पर वासी समाज के व्यक्ति इस व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। स्तरीकरण को समझने की कुंजी प्रकार्यात्मक आवश्यकता नहीं है अपितु सत्ता है। मुखिया, राजा, कुलीन अथवा उच्च वर्ग सभी का अपने पद को सुरक्षित बनाये रखने, एवं दूसरे व्यक्तियों को अपने समू से बाहर रखने में समान हित है ताकि सत्ता सम्बन्धों को नियंत्रित करने में उनका आधिपत्य बना रहे। अतएव, प्रकार्यात्मक आवश्यकता दिखाई देने वाला तत्व वास्तव में अभिजन नियंत्रण का तत्व है।

सामाजिक स्तरीकरण समाज में वर्ग-विभाजन का रूप धारण करता है। इतिहास के दौर में विभिन्न समयों पर विभिन्न सामाजिक वर्ग वर्तमान रहे हैं। इस प्रकार, दास एवं स्वामी, सामन्त एवं क्ृषक, पूंजीपति एवं श्रमिक प्रमुख वर्ग हुये हैं। भारत में वर्ग ने जाति का रूप धारण किया है।

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