प्रोपेगेंडा का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

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प्रोपेगेंडा का अर्थ प्रोपेगंडा शब्द का उदभव लैटिन भाषा के प्रोपेगेटस से हुआ है, जिसका अर्थ है जारी रखना। यहां जारी रखने से तात्पर्य किसी भी संदेश को लगातार जारी रखने से है। किसी जानकारी को अधिक से अधिक प्रसारित करने के साथ साथ जब यह भी प्रयत्न हो कि जनता प्रसारित संदेश को न केवल स्वीकार करे अपितु उसके अनुरूप कोई कदम भी उठाएं या कारवाई भी करें तो यह प्रक्रिया सूचना या प्रकाशन से एक कदम आगे प्रचार या प्रोपेगंडा कहलाती है। जब किसी सूचना का प्रचार प्रसार किसी साज़िश या फिर अति से ज्यादा हो जाये तो सम्प्रचार या प्रोपेगंडा कहा जा सकता है।

डॉ सुशीला त्रिवेदी ने प्रोपेगंडा का पंचतन्त्र की एक लोककथा से उदाहरण देते हुये अत्यन्त सरलतम ढंग से स्पष्ट किया है, जिसमें एक ब्राण्मण एक गाय की बछिया को अपने कंधे पर ले जा रहा था, जिसे अलग अलग स्थान पर मिलने वाले चार ठगों ने गधा कहकर ब्राण्मण को भ्रमित कर दिया। जिससे चारे उठा लें। इस प्रकार प्रोपेगंडा में झूठ का नियमित प्रचार किया जा सकता है। चाल्र्स बर्ड ने इसके विशय में अपना मत व्यक्त करते हुये कहा है, प्रोपेगंडा व्यक्तियों के बड़े समूहों क े प्रति सुझाव का नियोजित तथा क्रमबद्ध उपयोग है, जिसका उद्देश्य उनकी मनोवृणियों को नियन्त्रित करना तथा व्यवहार के पूर्व निर्धारित ढंग को प्राप्त करना है। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ कम्युनिकेशन के अनुसार, प्रोपेगंडा व्यक्तिगत लाभ के लिए पक्षपात के द्वारा प्रेरित करने का इरादतन किया गया प्रयास है। जैसे चुनाव के समय हर पार्टी बहुमत प्राप्त करने का दावा पेश करती है। 

उदाहरण के लिए-शहर में अर्द्ध सौनिक बलों की भर्ती चल रही है। रेडियो व दूरदर्शन द्वारा बताया गया कि अमुक जगह पर अमुक तारीख तक अर्द्ध सैनिक बलों की भर्ती चल रही है तो यह है सूचना। इसके नियमों आदि के साथ विस्तृत जानकारी बार बार दी गई तो वह है प्रचार और यदि उसके साथ यह भी बताया जाए कि देश की रक्षा, आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए यह किया जा रहा है और इसके लिए चुने गए उम्मीदवारों को निर्धारित वेतन के साथ भणे भी दिए जाएंगे, आजीवन पेंशन दी जाएगी, यात्रा भाडे़ में छूट मिलेगी आदि तो अर्थ है कि आप लोगों को प्रेरित कर रहे हैं यह कहलाएगा प्रोपेगंडा।

प्रकाशन हो या प्रचार-कार्य उद्देश्य यही होता है कि जनता को कुछ तथ्यों से अवगत कराया जाए और समाज के सामने कोई विशेश सिद्धांत या कार्यण्म प्रस्तुत किया जाए। स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया में ध्यान केवल इस बात पर केन्द्रित होता है कि जनता में क्या प्रकाशित या प्रचारित किया जा रहा है। जनता की इस संम्बध में क्या प्रतिक्रिया है, उसे सरकार या नियोक्ताओं तक पहुंचाना यह काम लोक सम्पर्क का है विशुद्ध प्रकाशन या प्रचार का नही।लोक सम्पर्क के काम में सफलता के लिए आवश्यक है कि जनमत की विभिन्न प्रवृतियों का विधिपूर्वक अध्ययन किया जाए और उन्हीं के अनुरूप प्रचार को अपेक्षित दिशा, मोड़ या रूप दिया जाए।

सन 1633 ई. मिशनरी के कार्यों के प्रचार के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया । प्रोपेगंडा को मानवीय सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए अश्टम पोप के द्वारा सर्वप्रथम किया गया। इसका उद्देश्य रोमन कैथोलिक के विश्वासों का प्रचार करना था। इसमें प्रोपेगंडा का मतलब सिर्फ उपदेश देने के लिए किया गया था। प्रोपेगंडा का अभिप्राय लोगों के विश्वास एवं विचारों में परिवर्तन लाना है तथा उसे क्रियात्मक रूप से प्रेशित करना है। पोप अश्टम ने सम्प्रेश्ण के स्थानीय माध्यम अपनाने तथा धर्म सुधार विरोधी आंदोलन को प्रचारित करने के लिए जनसम्पर्क-कर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए प्रोपेगंडा कॉलेज की स्थापना की। इसी अवधि में संप्रचार कला के विकास में इंग्लैण्ड के कॉफी हाउसण् और णंस के सालो ने बहुत बडा योग दिया। 18वीं शताब्दी में लंदन में दो हजार से अधिक कॉफी हाउस थे, जिनमें बुद्धिजीवी, प्रमुख सदस्य, सभी वर्गों के लोग एकत्र होकर सामयिक समस्याओं पर विचार विमर्श करते थे। 1832 में तार सम्प्रेश्ण का आविष्कार, 1844 में अखबारी कागज का निर्माण आरम्भ हुआ और 1863 में मुद्रण की नवीन तकनीक का अविश्कार हुआ। इसी दिशा में वहॉ प्रेस एजेंटरी विकसित हुई। 

1928 में पहली बार छपी किताब प्रोपोगैंडा में बरनेस ने यह बताने का प्रयास किया कि लोगों की प्रयास प्रभावित की जा सकती है उसे बदला भी जा सकता है। पुस्तक में बरनेस यह बताते है कि आधुनिक पब्लिक रिलेशन का विकास आधुनिक जीवन में जटिलताओं के विस्तार के साथ ही हुआ क्योंकि इस दौर में यह आवश्यक हो गया था कि लोगों को एक समूह दूसरे समूह तक अपनी बात पहुंचा सके और उसे सहमत कर सके। सरकार किसी भी दल की हो उसके लिए यह आवश्यक है कि जनता उसके पक्ष में खड़ी हो उसकी कहीं हुई बात पर क्रिया करें।

राजनैतिक दलों का समाचार पत्रों में चुनाव के दौरान प्रोपेगेंडा

चुनाव राजनेताओं के लिए उनके कैरियर की सबसे पहली सीढ़ी माना जाता है। इसलिए राजनेता अपने चुनाव में ऐसी कोई भी कमी नही छोड़ना चाहते है जिससे चुनाव परिणाम आने के बाद उन्हें कुछ निराशा हाथ लगे। इसलिए राजनेता चुनाव के समय अपने क्षेत्र के समाचार पत्रों में अपनी नीतियों, पार्टी के घोषणा पत्र, चुनावी रैली, जनसम्पर्क, विज्ञापन के माध्यम से जनता के बीच पहुंच बनाते हैं। समाचार पत्र में प्रचार केवल एक व्यक्ति विशेष के लिए नहीं होता है वह एक समूह के लिए किया जाता है। जनसम्पर्क की इस विधा को सामाजिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण भी माना जाता है। समाचार पत्रों में संपादक भी उस सूचना को ज्यादा प्रकाशित करता है जिससे समाचार से ज्यादा लोग जुड़ सकें। क्योंकि प्रचार एक व्यक्ति से एक समूह की तरफ जाता है। समाचार पत्र नेताओं से जुडी हुयी खब़रों को अपने समाचार पत्रों में स्थान भी देते हैं। नेता चाहता है कि वह किसी विपक्षी के खिलाफ बोले हुये प्रत्येक भाषण को अक्षरश: अपने समाचार पत्र में स्थान दें लेकिन चुनाव के समय कुछ आचार संहिता निर्वाचन आयोग और अखबार की आचार सहिंता के अनुरूप ही संपादक अपने समाचार पत्र में राजनेताओं के प्रोपेगेंडा को स्थान देता है।

निर्वाचन अभियान की प्रविधियों में नारों का महत्वपूर्ण स्थान है। अत: नारों का उपयोग व्यापक रूप में किया गया । नारों ने दल व प्रत्याशी के हित में वातावरण तैयार किया है तथा मतदाताओं के मस्तिष्क को नारों में निहित आकर्शण से प्रभावित किया गया है। नारों का चयन राष्टण्ीय, प्रादेशिक व स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात हुए 1984 के महानिर्वाचन कई दृष्टि में अतिमहत्वपूर्ण था। कांग्रेस पार्टी ने इंदिरा गांधी के नारों को समाचार पत्रों के माध्यम से प्रचार करने का निर्णय लिया इसमें इंदिरा जी की अन्तिम इच्छा, बुद- बुद से देश की रक्षा  नारे का पुरजोर उपयोग किया। वोट हमारा राज तुम्हारा नही चलेगा नही चलेगा, जो लायेगा रेल की पटरी वह पायेगा वोट की गठरी€,  डिग्री कॉलेज खुलवायेगा-वोट हमारा पायेगा, €इंदिरा जी का यह बलिदान, याद करेगा हिन्दुस्तान€,  इंदिरा जी की याद में- राजीव जी के साथ में, इन सभी नारे को समाचार पत्रों में रैली और जनसम्पर्क के दौरान समाचार पत्रों में नेताओं के द्वारा प्रोपेगेंडा किया गया जिसको समाचारपत्रों में स्थान मिला। विज्ञापनों के माध्यम से राजनेता ने एक स्थान सुरक्षित करा लिया था जिससे साक्षर जनता तक राजनैतिक दलों के विचार पहुंचाने लगे थें इंदिरा कांग्रेस ने इंदिरा गॉधी व राजीव गांधी के साथ-साथ हाथ का पंजा, चुनाव चिन्ह लगे हुये विज्ञापनों में काण्ग्रेस शासन की उपलिब्धयों का भी वर्णन था। स्थानीय आधार पर छपे विज्ञापनों में सम्बन्ध प्रत्याशियों के चित्र भी छपे हुए थे। 

प्रोपेगंडा के प्रकार

पहला प्रकार विज्ञापन के तौर पर देखा जाता है । अगर कोई संस्था या व्यक्ति विज्ञापन के रूप में प्रोपेगंडा करेगा तो आवश्यक नहीं कि सभी लोग उसको सच मान लें, लेकिन इसमें कुछ सच्चाई है, ऐसा मान लेते है। अर्थात इस तरह का प्रोपेगंडा पूर्णत: सफल तो नहीं होता लेकिन कुछ हद तक असरकारी होता है। 

दूसरा प्रकार के प्रोपेगंडा को विज्ञापन का रूप न देकर समाचार का रूप दिया जाता है, तथा उसका प्रसारण माध्यम की सहायता से कर दिया जाए तो लोग यही कहेंगे कि यह पूर्णत: सत्य है तथा इस आधार पर प्रोपेगंडा के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

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