कंप्यूटर का अर्थ, पीढ़ी और वर्गीकरण की व्याख्या

कंप्यूटर का अर्थ (Meaning of computer)

कंप्यूटर अंग्रेजी भाषा का शब्द हैं जिसे हिन्दी मे ‘अभिकलन’ कहते है। जो अंगे्रजी के कंप्यूटर शब्द से बना है, जिसका अर्थ हैं-गणना करना। कंप्यूटर का अर्थ हैं-गणना करने वाली एक इलेक्ट्रॉनिक मशीन। प्रारम्भ मे कंप्यूटर का उपयोग गणितीय कार्यों के लिए किया जाता था। और उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसकी खोज की गई थी, परन्तु आज कंप्यूटर का उपयोग गणितेत्तर सूचनाओं के लिए अधिक किया जाता हैं। 

कंप्यूटर वास्तव मे एक ऐसा इलेक्ट्रानिक यन्त्र हैं जिससे विविध सूचना तथा आंकड़ो का संग्रहण किया जाता हैं। यह डाटा गणितीय व तार्किक कुछ भी हो सकता हैं। कंप्यूटर के निवेश युक्ति माध्यम से इस डाटा को स्वीकार कर प्रक्रियाकरण के पश्चात निर्गत द्वारा इस सूचना का प्रसारण किया जाता है। यह क्रिया कंप्यूटर में बहुत तीव्र गति से सम्पन्न की जाती है। तकनीक विकास के साथ ही कंप्यूटर के कार्यों में बढोत्तरी होती गई। ये सभी कार्य चार चरणों में पूरे होते हैं-
  1. आंकडे ग्रहण करना अथवा निवेश
  2. आंकडे का संचुनाव
  3. आंकडों का संसाधन
  4. परिणाम (निर्गत) या जानकारी देना।
ये आंकडे आवाज द्वारा, लिखित या प्रकाशित, ग्राफ के रूप में या अन्य किसी भी रूप मे दिए जा सकते है।

अत: कंप्यूटर को उपरोक्त जानकारी के अनुसार इस तरह परिभाषित किया जा सकता हैं- ‘‘कंप्यूटर वह युक्ति है जो स्वचालित रूप से विविध तरह के आंकडो को संचित तथा संशोधित कर पुन: प्राप्त कर सके।’’

शुरू में मनुष्य ने आसानी से गणना करने और स्मृति के भार को हल्का करने के लिए कंप्यूटर का आविष्कार किया। जिस तरह सभ्यता की ओर बढ़ते मानव विकास में कई अवस्थाएं आई, उसी तरह कंप्यूटर के विकास मे भी कई अवस्थाएं आई। तीन हजार ई0पू0 में प्रचलित अबेकस से लेकर आज तक की माइक्रो प्रोसेसर चिप तक का इतिहास कंप्यूटर का इतिहास हैं। अदिकाल और पाशाणकाल मे मानव सभ्यता विकसित अवस्था में नहीं थी। सर्वप्रथम मानव पत्थरों के टुकडो तथा अंगुलियों के माध्यम से गणना करता था। धीरे-धीरे मानव में ज्ञान का विकास हुआ और मध्यकाल तक उसने गणक फलक का आविष्कार कर लिया था।

17वीं सदी मे यूरोप मे क्रांतिकारी सामाजिक एवं वैज्ञानिक बदलाव हुए। स्कॉटलैण्ड के महान् गणितज्ञ ज्ञान जॅान नेपियर (1552-1917) ने इसी समय नेपियर बासें व लघुगणक का आविष्कार किया। सन् 1642 मे ब्लेज पास्कल नामक एक फ्रासींसी वैज्ञानिक ने एक ऐसे यन्त्र की खोज की जो जोडने व घटाने की क्रियाएं करता था। सन् 1680 मे जर्मन वैज्ञानिक चाल्र्स बैवेज ने ‘डिफरेंसियल इन्जिन’ नामक यन्त्र की खोज की। इसके बाद चाल्र्स बैवेज ने एनॉलिटिकल इन्जिन नामक कंप्यूटर की कल्पना की जिसमें निवेश, भण्डार, गणितीय एकक, नियत्रंण एकक और निर्गत एकक की व्यवस्था की गई थी। आधुनिक कंप्यूटर प्रारूप उनके इन्जिन की संचरना से काफी मिलता है। अत: उन्हं आधुनिक कंप्यूटर के सिद्धांत का जनक भी कहा जाता है।

कंप्यूटर के स्वरूप की सही रूपरेखा उस वक्त सामने आयी जब सन् 1889 मे अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ0 हर्मन हालरिथ ने कार्डो मे छापें कर गणना करने की नवीन पद्धति की खोज की। गणना करने की यह मशीन विद्युत चालित थी। इस यन्त्र ने कंप्यूटर के विकास मे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। हालरिथ ने कंप्यूटर विज्ञान को विस्तृत रूप देने के लिए ‘कंप्यूटर निर्माण संस्था’’ की स्थापना की और विविध तरह के ‘एकाउण्ट यन्त्र‘ बनाए। विशयों की जरूरत के अनुरूप जटिल प्रक्रियाओं से युक्त कंप्यूटरों का निर्माण कार्य शुरू हो गया। द्वितीय विश्व-युद्ध के पहले कंप्यूटर विज्ञान का तीव्रता से विकास हुआ। कंप्यूटर की मदद से विमानो के डिजाइन बनने लगे। कंप्यूटर द्वारा गणना कर शस्त्रों को वांछित निशाने पर छोड़ा जाने लगा। वृहद् आकार के कारण इनका प्रयोग सुगमता से करना सम्भव नहीं था। 

हार्वड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एकेन ने आई0 बी0 एम0 कम्पनी के वैज्ञानिको की मदद से प्रथम स्वचालित कंप्यूटर बनाया जिसका नाम ऑटोमेटिक सिक्वेन्स कन्ट्रोलक केलकुलेटर रखा गया। इसका प्रसिद्ध नाम हार्वर्ड मार्क-1- था। इस मशीन मे निवेश के लिए पंचटेप तथा अन्य विविध क्रियाओं के लिए स्विच का प्रयोग किया गया था। इसका आकार 50 फीट लम्बा तथा 8 फीट ऊंचा था, यह 23 संस्थाओ तक के जोड़ को चौथाई सेकेण्ड मे और उसका गुण लगभग 6 सेकेण्ड मे कर सकता था। विश्व का सबसे पहला कंप्यूटर अमेरिका की पसिलवेनिया विश्वविद्यालय में सन् 1946 मे बनाया गया, इसे ‘एनियाक’ नाम दिया गया। यह इतना अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि आनेवाले समय मे इसी तरह के कई अन्य कंप्यूटर बनाए गए। ये समस्त कंप्यूटर वैक्यूम ट्यूबो से बने थे जिन्हे हम पहली पीढी़ के कंप्यूटर कहते है।

कंप्यूटर

सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज हुई जिसमें कंप्यूटरों के विकास को एक नया मोड़ प्रदान किया। ट्रंजिस्टरों के उपयोग से कंप्यूटर आकार में छोटे एवं सस्ते हो गए साथ ही तकनीकी विकास की वजह से इनकी कार्य क्षमता भी बढ़ गई। इनको हम दूसरी पीढी के कंप्यूटर कहते है। पतली फिल्मो के इलेक्ट्रॉनिक परिपथ के साथ सातवें दशक मे कंप्यूटर की तीसरी पीढी अस्तित्व मे आई। लार्ज स्केल इंटीगे्रटेड सर्किट की तकनीक के विकास के साथ कंप्यूटर की चौथी पीढी भी विकसित हुई। डाक टिकट के आकार के छोटे-से सिलिकान चिप्पड पर लाखों ट्रांजिस्टरों को स्थापित कर सर्किट बनाए जाने के कारण इन कंप्यूटरों का आकार अत्यन्त छोटा हो गया और इनकी क्षमता एवं गति में वृद्धि हो गई। कंप्यूटर की पांचवीं पीढी अभी प्रयोगात्मक अवस्था में है। जिसमे कृत्रिम बुद्धि विकसित करने का प्रयास किया जा रहा ह जो बहुत तेजी से काम करने वाले और अधिक मेमोरीवाले होग।विकास-क्रम के आधार पर कंप्यूटर का वर्गीकरण- सन् 1946 के पश्चात कंप्यूटर के क्षेत्र में नवीन तकनीक का विकास होता रहा है। इन अनुसंधानों के आधार पर कंप्यूटर की पीढ़ी और वर्गीकरण को पांच वर्गों में विभाजित किया जाता है-

कंप्यूटर की प्रथम पीढ़ी (1946-1955) (First generation of computers (1946–1955) )

 सर्वप्रथम अमेरिका के दो विद्युत इन्जीनियर जे0पी0एकर्ट और जॉन मॉकले ने पहला इलेक्ट्रॅानिक डिजिटल कंप्यूटर बनाया जो ‘एनियाक’ के नाम से जाना जाता है। यह पहली पीढी का कंप्यूटर था इसे सैन्य उपयोग हेतु आविष्कृत किया गया था। यह आकार मे 100 फीट लम्बा तथा 10 फीट चौड़ा था। इस कंप्यूटर मे 19,000 निर्वात नलिकाएं थी और इसका वजन लगभग 30 टन था। एनियाक कंप्यूटर द्वारा कार्य करते समय इसके द्वारा अत्यधिक ऊर्जा का उत्सर्जन होता था। एनियाक कंप्यूटर की मुख्य समस्या इसके ऑपरेशन की थी। जिसमें प्रत्येक नई गणना से पूर्व इसके तारों का संयोजन करना पड़ता था। सन् 1951 में अमरीका जनगणना हेतु एनियाक कंप्यूटर के एक विकसित रूप यूनिवैक का निर्माण किया गया। इसका निर्माण वाणिज्यिक जगत् मे इसकी उपयोगिता को देखते हुए किया था। 

पहली पीढ़ी के कंप्यूटर की विशेषताएं (Features of first generation computers)- 

पहली पीढ़ी के कंप्यूटरों में निर्वात नलिकाओ का प्रयोग होता था। कंप्यूटर द्वारा कार्य करते समय ये निर्वात नलिकाएं जल्दी ही गरम होकर ऊर्जा का उत्सर्जन करती थी। इस कारण कंप्यूटरों को A.C मे रखता पड़ता था। पहली पीढी़ के कंप्यूटरों में प्रमुखत: दो तरह की भाषा-मषीनी भाषा तथा एसेम्बली भाषा का प्रयोग होता था।

द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटर (1955-1964) (Second Generation  of Computers (1955–1964) )

 सन् 1955 से 1964 के मध्य निर्मित कंप्यूटर दसूरी पीढी के कंप्यूटर कहलाते है। इस पीढी के कंप्यूटरों मं निर्वात नलिका का स्थान ट्रांजिस्टर ने ले लिया। इनका कार्य निर्वात नलिका के समान ही था, लेकिन इनका आकार निर्वात नलिका की अपेक्षा कम था। ट्रांजिस्टर की खोज के बाद दूसरी पीढी के कंप्यूटरों की कार्य करने की गति पहली पीढी के कंप्यूटरों से अधिक तीव्र हो गई दूसरी पीढी के कंप्यूटर एक सेकेण्ड मे 10,00000 क्रिया करने मे समर्थ हो गए। आकार की दृष्टि से ये कंप्यूटर पहली पीढी के कंप्यूटर की तलना में छोटे थे। टं्राजिस्टर अनेक गुणों के कारण निर्वात से अच्छे थे। इसमें ऊष्मा का उत्सर्जन कम होता था, ऊर्जा की खपत कम थी व कार्य करने की गति अधिक थी। आई0 बी0 एम0 1401 हॉन 200 व सी0डी0सी0 1604 आदि द्वितीय पीढी के कंप्यूटरों के कुछ उदाहरण है। 

दूसरी पीढी के कंप्यूटर के गुण (Properties of second generation computers)- 

दूसरी पीढी के कंप्यूटरों मे सूचना को संग्रह करने के लिए चुम्बकीय टेप और डिस्क का उपयोग होने लगा। चुम्बकीय ड्रम का स्थान अब चुम्बकीय कोर ने ले लिया। इस पीढी के कंप्यूटर मे उच्च-स्तरीय भाषा का प्रयोग हुआ। इस पीढी़ के कंप्यूटरों का क्षेत्र अधिक विशाल हो गया। इस पीढी के कंप्यूटरों का उपयोग प्रबन्ध, सूचना-पद्धति, यातायात व संचार क्षेत्र में किया जाने लगा जिससे विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव आए इस समय के कंप्यूटर का उपयोग उपग्रह प्रक्षेपण आदि मे किया जाने लगा। इन कंप्यूटर के आविश्कार ने सूचना के क्षेत्र में नये आयाम स्थापित किए। उपग्रहों के माध्यम से मौसम व संचार सम्बन्धी सूचनाएं प्रदान की जाने लगी।

कंप्यूटर की तीसरी पीढी (1964-1975) (Third Generation of Computers (1964–1975) )

सन् 1964 से सन् 1975 तक का समय तीसरी पीढी के कंप्यूटर का समय कहलाता है। सन् 1953 में Mr. H. Johnosn ने mos {metal oxide semiconductor}का प्रयोग कर IC का निर्माण किया। तीसरी पीढी के कंप्यूटरों में इन्हीं IC {Integrated Circuit} का प्रयोग किया गया। IC का प्रयोग करने से इस पीढी के कंप्यूटर की गणना करने की गति, द्वितीय पीढी़ के कंप्यूटर से ज्यादा तीव्र हो गई और आकार अपेक्षाकृत कम हो गया। तृतीया पीढी के कंप्यूटर मे एक छोटी-सी चिप पर अनेक ट्रांजिस्टर और उसके कोडों को स्थापित किया जा सकता था। इस पीढी के कंप्यूटर एक सेकेण्ड मे 10000000 से भी अधिक गति से कार्य कर सकने में समर्थ थे। आई0 बी0 एम0 3700 आदि दसूरी पीढी के कंप्यूटरों के कुछ उदाहरण है। 

तीसरी पीढी के कंप्यूटर के गुण (Properties of third generation computers)- 

इन कंप्यूटर की समस्त प्रक्रियाओं को ऑप रेटिंग सिस्टम द्वारा नियत्रिंत किया जाता हे। इस पीढी के सॉफ्टवेयर मं भी सुधार किया गया उपयोगकर्ता को ध्यान मे रख नयी भाषा का विकास किया गया। इस पीढी के कंप्यूटर के लिए एक उच्च-स्तरीय भाषा को विकसित किया गया। इसी समय में नाम की एक कम्पनी द्वारा मिनी कंप्यूटर को विकसित किया गया।

चौथी पीढी के कंप्यूटर (1975-1995) (Fourth Generation Computers (1975–1995) )

सन् 1975 से सन् 1995 तक का समय चौथी पीढी़ के कंप्यूटरों का समय कहलाता है। इस समय मे सूक्ष्म चिप पर ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में सर्किट को स्थापित करने का प्रयत्न किया जाने लगा। चौथी पीढी़ के कंप्यूटरो के लिए बृहत् श्रेणी के इंटीगटेड सर्किट का निर्माण होने लगा। सन् 1971 मे अमेरिका ने इंटेल कॉर्पोरेशन के सहयोग से एक सिलिकॉन चिप की खोज की। इस सिलिकॉन चिप पर केन्द्रीय संसाधन के पूरे सर्किट को बनाया जा सकता था। इस तरह के चिप को माइक्रो प्रोसेसर नाम दिया गया तथा इससे निर्मित कंप्यूटर को माइक्रो कंप्यूटर कहा गया। चौथी पीढी के कम्प्यटर मे माइक्रो प्रोसेसर के प्रयोग से इसकी गणना करने की गति मे तीव्र बढ़ोत्त्ारी हुई और इनका आकार व भार तीसरी पीढी की तुलना मे बहुत कम हो गया। वर्तमान समय मे माइक्रो कंप्यूटर ने कंप्यूटर के क्षेत्र मे अपना एकाधिकार जमा लिया है। चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर का उपयोग विविध क्षेत्रों में किए जा सकने के साथ ही व्यक्तिगत उपयोग के लिए भी किया जाने लगा। वर्तमान में शिक्षा, शोध, व्यापार, संचार, यातायात परिवहन आदि में चौथी-पीढी के कंप्यूटर का ही अधिक प्रयोग किया जाता है।

चौथी पीढी के कंप्यूटर के गुण (Features of fourth generation computers)- 

 इस पीढी़ के कंप्यूटर मे बृहत् श्रेणी इन्टीगे्रटेड सर्किट चिप का प्रयोग किया जाने लगा। चौथी पीढी के सॉफ्टवेयर को और अधिक विकसित किया गया। अलग-अलग क्षेत्र और व्यवसाय के लिए पृथक्-पृथक सॉफ्टवेयर का निर्माण किया जाने लगा। जिसमे कंप्यूटर का क्षेत्र और अधिक विस्तृत हो गया। चौथी पीढी़ क कंप्यूटर की संग्रह क्षमता को अधिक बढाया गया। चौथी पीढी के कंप्यूटर मे सेमी कन्डक्टर पदार्थ की संग्रह क्षमता का प्रयोग किया जाने लगा। तीसरी पीढी के कंप्यूटर का आकार विशाल था, निरन्तर होने वाले शोधो और सुधारां के कारण वर्तमान मे कंप्यूटर का आकार काफी छोटा हो गया है।

पांचवी पीढी के कंप्यूटर (1995) (Fifth Generation Computers (1995) )

सन् 1995 के पश्चात से वर्तमान समय तक का काल पांचवीं पीढी के कंप्यूटर का काल माना जाता है विविध देशों के वैज्ञानिको द्वारा कंप्यूटर पर अनेक अनुसंधान किए जा रहे है। पाचंवी पीढी के कंप्यूटर मे पैरेलल प्रोसेसिग के स्थापत्य की व्यवस्था होगी। यह ऐसे कंप्यूटर होगे जिनमे कृत्रिम बुद्धि होगी, जिसमं सोचने की क्षमता मनुष्य जैसी होगी व यह अपना निर्णय स्वयं कर सकेगे। पाचवीं पीढी के कंप्यूटर द्वारा नई तार्किक क्षमता का पता लगेगा। इस पीढी के कंप्यूटर मे चिप का आकार बहुत सूक्ष्म होगा व कार्य करने की क्षमता बहुत तीव्र होगी।

वर्तमान कंप्यूटरो की वर्गीकरण (Classification of current computers)

कंप्यूटर एक ऐसी इलेक्ट्रानिक युक्ति है जिसके द्वारा गणितीय एवं तार्किक डाटा का प्रक्रियाकरण कर शुद्ध परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। कंप्यूटर अपने कार्य, उद्देश्य, आकार, क्षमता, रूप, के आधार पर अनेक तरह के हो सकते है। वर्तमान में उपलब्ध कंप्यूटरों को निम्न तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है- 

1- अंकीय कंप्यूटर (Digital computer) - 

अंको की गणना करने के लिए प्रयोग किया जाने वाला कंप्यूटर अंकीय कंप्यूटर कहलाता है। यह कंप्यूटर अंकीय पद्धति पर आधारित होता है। अंकीय कंप्यूटर द्विआधारी पद्धति पर निर्भर है। यह प्राप्त होने वाली किसी भी सूचना को 0 से 1 रूप मे बदलकर अपनाता है जिसे बाद मे प्रोग्रामिंग भाषा में प्रदर्शित करता है। यह कंप्यूटर प्राप्त होने वाली किसी भी सूचना का संग्रह व विश्लेषण डिजिटल रूप मे करता है। इसलिए इसे डिजिटल कंप्यूटर कहा जाता है। डिजिटल कंप्यूटर के माध्यम से एक ही समय मे अनेक कार्यो को तेज गति से परूा किया जा सकता है। डिजिटल कंप्यूटर की स्मरण-षक्ति बहुत तीव्र होती है। इसमे बडी-बडी संख्याओं, आंकडो को संगृहीत किया जा सकता है और आवश्यकतानुसार उन्हें तत्काल प्राप्त किया जा सकता ह। शिक्षा, व्यापार, शोध, अनुसंधान, यातायात मनोरंजन व व्यक्तिगत कार्यों के लिए अधिकांशतः: डिजिटल कंप्यूटर का ही प्रयोग किया जाता है।

2- संकर कंप्यूटर (Hybrid computer) - 

संकर कंप्यूटर में डिजिटल और एनालॉग दोनो के गुणो का समावेश होता है। हाइब्रिड कंप्यूटर एनालॉग कंप्यूटर के समान मापन में समर्थ होता है। जिसे डिजिटल कंप्यूटर के समान अंको में परिवर्तित कर प्रदर्शित कर दिया जाता है।

3- अनुरूप कंप्यूटर (Analog computer) - 

अनुरूप कंप्यूटर का प्रयोग मापन आदि के लिए किया जाता है। मापन में प्राप्त परिणामों को बाद मे अंको मे परिवर्तित कर दिया जाता है। इस तरह के कंप्यूटरों का उपयोग आमतौर पर विभिन्न तरह के दबाव व तापमान के मापन में किया जाता है। भू-विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान, इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में इस तरह के कंप्यूटरों का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। वोल्टेज को मापने में प्रयोग किया जाने वाला स्टेबलाइजर जिसके द्वारा वोल्टेज की कमी या बढोत्त्ारी को मापा जा सकता है। तथा पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल की मात्रा को मापने के लिए उपयोग कंप्यूटर अनुरूप कंप्यूटर के उदाहरण है।

4- सुपर कंप्यूटर (Super computer) - 

विविध क्षेत्रों मे प्रयुक्त होने वाले विभिन्न प्रकार के कंप्यूटरों मे सुपर कंप्यूटर सर्वश्रेष्ठ हैं सुपर कंप्यूटर का प्रयोग व्यापक क्षेत्र मे किया जाता है। शोध व अनुसन्धान करने मे, अन्तरिक्ष विज्ञान मे, उपग्रह के प्रक्षेपण, अन्य ग्रहो की गणनाएं, दूरियों को मापने मे और मौसम के पूर्वानुमान मे सुपर कंप्यूटर महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। सुपर कंप्यूटर का आकार व संग्रह क्षमता व कार्य करने की गति अन्य सभी कंप्यूटरो की तुलना मे बहुत अधिक होती हे। सुपर कंप्यूटर एक सेकेण्ड मे 9 अरब से भी अधिक निर्दषों का निश्पादन एक साथ कर सकता है। सुपर कंप्यूटर मे एक साथ अनेक (लगभग 300) कंप्यूटरों को सम्बन्धित किया जा सकता है। वर्तमान में, सुपर कंप्यूटर के क्षेत्र मे अनेक राश्ट्रों मे शोध व अनुसंधान कार्य किया जा रहा ह। जिससे इसके उपयोग के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत किया जा सके व इसकी संग्रह क्षमता व सामर्थ्य मे और बढोतरी की जा सके। भारत ने भी अपना सुपर कंप्यूटर विकसित कर लिया है। जिसें परम 10000 के नाम से जाना जाता है। 

5- मेनफ्रेम कंप्यूटर (Mainframe computer) - 

इन कंप्यूटरो का आकार काफी बडा़ होता है तथा इस पर एक समय मे एक साथ कई व्यक्ति कार्य कर सकते हैं। मेनफ्रेम कंप्यूटर को एक स्थान पर स्थापित करके अनेक टर्मिनलों को इससे जोड दिया जाता है। इन टर्मिनलों पर अनेक उपयोगकर्ता एक साथ कार्य करते हुए मेनफ्रेम कंप्यूटर से सम्बन्धित रहते हैं। मेनफ्रेम कंप्यूटर बहुत अधिक डाटा पर एक साथ क्रिया-प्रतिक्रियाकरण कर सकता है। मेनफ्रेम कंप्यूटर टाइम “ोयर्ड सिस्टम द्वारा इससे परस्पर सम्बन्धित कंप्यूटरां के कार्यो का निश्पादन कर सकता है। अधिकांश बडी-बडी कम्पनियां, बैक, संस्थाएं, आदि अपने कार्यो के निश्पादन के लिए मेनफ्रेम कंप्यूटर का ही प्रयोग करती है। आई0बी0एम0 4381, मेनफ्रेम कंप्यूटर के उदाहरण है।

6- मिनी कंप्यूटर (Mini computer) - 

मध्यम आकारवाले इन कंप्यूटरों की कार्य क्षमता माइक्रो कंप्यूटर की अपेक्षा ज्यादा तथा मेनफ्रेम कंप्यूटर की तुलना मे कम होती है। मिनी कंप्यूटर पर एक साथ कई कर्मचारी कार्य कर सकते है, लेकिन इनकी संख्या मेनफ्रेम पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की अपेक्षा कम होती है। मेनफ्रेम कंप्यूटर छोटी कम्पनियो, कार्यालय, बैक आदि के लिए लाभदायक होते है। जहां इनके द्वारा कर्मचारियों के वेतनमान, कम्पनी के वित्तीय कार्य, उत्पादन, खर्च आदि के कार्यो का निष्पादन किया जा सकता है। मेनफ्रेम कंप्यूटरों से वित्तीय कार्यो के अलावा यातायात, उ़द्योग पद्धति की सरक्षा आदि कार्यो को भी पूर्ण किया जा सकता है।

7- माइक्रो कंप्यूटर (Micro computer) - 

माइक्रो कंप्यूटर सिंगल यूजर होते है, अर्थात माइक्रो कंप्यूटर पर मात्र एक उपयोगकर्ता ही कार्य कर सकता हैं। माइक्रो कंप्यूटर मिनी कंप्यूटरों की अपेक्षा कम कीमत तथा कम क्षमता के होते है। सामान्यत: इनका प्रयोग निजी उपयोग के लिए किया जाता है। माइक्रो कंप्यूटरों को पर्सनल कम्प्यटर अथवा पीसी के नाम से भी जाना जाता है, कालेज, पुस्तकालय मे षिक्षा के लिए, कार्यालय मे अपनी फाइलों व डाटा को सुरक्षित व संग्रहीत करने के लिए, मनोरंजन के क्षेत्र मे इन्हीं कंप्यूटरो का उपयोग किया जाता है। वर्तमान मे माइक्रो कंप्यूटर सबसे अधिक प्रचलित है। इनका आकार भी पर्वू की अपेक्षा कम होता जा रहा है अब ऐसे पीसी भी है। जिन्हें एक स्थान से दसूरे स्थान पर कहीं भी ले जाकर कार्य किया जा सकता है।

8. प्रकाशीय (ऑप्टिकल) कंप्यूटर (Optical computer) -

यह पंचम पीढी का कंप्यूटर है जिसमे एक अवयव को दूसरे से जोड़ने का कार्य ऑप्टीकल फायबर के तारों से किया जाता है। इसके विद्युतीय प्रवाह की गति 3 लाख किमी0 प्रति संकेण्ड होती है। किन्तु इतनी गति से भी 1 मीटर तक जाने मे किसी भी विद्युतीय संकेत को 3 नैनो सकेण्ड का समय लगता है। गणना को इससे भी कम समय से करने के लिये बिना तारों के कंप्यूटर बनाने का प्रयास हो रहा है। जिसे आप्टीकल फायबर पद्धति से हल किया जा रहा है। 

9. एटॉमिक कंप्यूटर (Atomic computer) - 

कार्नेगी विश्वविद्यालय मे ऐसे परमाण्विक कंप्यूटर पर खोज कार्य जारी है। जो कि किसी खास प्रोटॉन परमाणुओं को एकीकृत परिपथ मे बदल दे और कंप्यूटर को इतनी अधिक स्मृति क्षमता प्रदान कर दं कि ऐसा कंप्यूटर आज के कंप्यूटरो से 10000 गुनी क्षमता वाला हो जाये। बैक्टीरियों -हार्डोप्सिन नामक इस प्रोटॉन मे 10000 गीगाबाईट के बराबर जानकारी को संगृहीत किया जा सकता है और 10 माइक्रो सेकेण्ड की क्षमता से कार्य लिया जा सकता है। इस प्रकार के कंप्यूटरों को शायद इस सदी के अंत तक विकसित कर लिया जायेगा।

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