कृषि का इतिहास एवं विकास

अनुक्रम
विश्व में कृषिकर्म सबसे पहले भारत में ही प्रारम्भ हुआ था। हल द्वारा भूमि जोतने की तकनीकि सर्वप्रथम अश्वनीकुमारों ने दी थी। (ऋग्वेद 1/117/21)। वैदिककाल का जीवन सामूहिक था, खेती सामूहिक थी, लोक समूहों (गणों-जनों) में रहते थे, बुवाई, सिंचाई एवं कटाई सामूहिक कर्म थे। (ऋग्वेद 8.78.10 व 1.48.7)। सामूहिक प्रार्थना थी ‘हमारे हल ठीक से चले। हम सुखपूर्वक हल चलाये। पर्जन्य वर्षा द्वारा सुख पहुॅचाये। 

मानव-प्रकृति सम्बन्धा ें मे कृषि का आगमन सवार्धिक महत्वपूर्ण घटना है। कृषि से साक्षात्कार होते ही कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है, जिन्हें हम मानव व प्रकृति के सम्बन्ध में एक नये युग के आरम्भ के रूप में ले सकते है। कृषि के आगमन के बहुत दूरगामी परिणाम आने पा्ररम्भ हुए तथा कृषि कार्य ने सुनिश्चित परिवर्तन को निर्धारण किया। कदाचित् सबसे आधारभूत विकास कृषि के साथ पशुओं तथा वनस्पति की अनेक प्रजातियों को अनुकूल बनाकर पालना था।

कृषि विकास

भोजन मानव की मूलभूत आवश्यकता है। मानव का भोजन प्रकृति की विभिन्न दशाओं से उपलब्ध होता है। कृषि कार्य उनमें से प्रमुख है और कृषि का परम उद्देश्य मानव को ऐसा भोजन प्रदान करना है, जिससे मानव स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सके। ऐसा तभी सम्भव हो सकता है, जब मानव को पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन प्राप्त हो। मानव का अधिकांश भोजन कृषि से ही प्राप्त होता ह।

खाद्य-पदार्थों का प्रमुख स्रोत कृषि है, इसे ‘प्रगति का इंजन’ भी कहा जाता है। कृषि से खाद्य पदार्थो के साथ-साथ औद्योगिक क्रियाकलापों के लिये कच्चा माल भी प्राप्त होता है। अत: स्पष्ट है कि हमारे देश मे कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है। कृषि आदिकाल से ही मानव का प्रमुख व्यवसाय एवं आजीविका का सर्वप्रमुख साधन रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान आज तक सर्वोच्च है। कृषि कार्य के माध्यम से भारत की 80 प्रतिशत जनसंख्या को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर प्रत्यक्ष रूप से तथा 15 प्रतिशत जनसंख्या कृषि से सम्बन्धित उद्योगों तथा सम्बन्धित गतिविधियों से अपनी जीविका उपार्जित कर रही है।

कृषि की शोध प्रगति

कृषि की शोध प्रगति को दो स्पष्ट भागों मे विभक्त किया जा सकता है -
  1. स्वतंत्रता पूर्व काल (सन 1947 से पूर्व)
  2. स्वतंत्रता पश्चात् काल (सन 1947 के उपरांत)

1. स्वतन्त्रता पूर्व काल (सन् 1947 से पूर्व) -

हिन्दू सम्राटों के युग मे भारतीय ग्रामों में धन धान्य, सुख शान्ति एवं समृद्धि भरपूर थी, जनता सुखी थी तथा सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धान्त पर सभी चलते थे। मध्य काल में मुसलमानो ने भारतवर्ष पर आक्रमण किया। महमूद गजनवी के आक्रमण काल में भूमि की उपज एवं व्यापार में हानि हुई। अलाउद्दीन खिलजी ने हिन्दुओं को दी जाने वाली कृषि सुविधाओं पर रोक लगा दी एवं कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत कर के रूप में लेने लगे। तत्पश्चात् मुहम्मद तुगलक ने भूमि सुधार के सम्बन्ध में अभिरूचि दिखाई इन्होनें भूमि सुधार के लिये शासन व्यवस्था में नया विभाग ‘दीवाना’ को स्थापित किया। इस विभाग का काम कृषि योग्य बेकार भूमि को कृषि योग्य बनाना था।

इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी ने 50 मील लम्बे, 25 मील चौड़े, भू-भाग को कृषि योग्य बनवाकर गरीब कृषकों को वितरित की। इस युग के पश्चात् मुगल साम्राज्य प्रारम्भ हुआ। इन शासकों में से कुछ ने कृषि की उन्नति एवं विकास के लिये बहुत प्रयत्न किये। जैसे शेरशाह के समय में भूमि की नाप जोख हुई एवं उपजाऊपन के अनुसार कृषि का वर्गीकरण भी किया गया। सिंचाई के लिये कुंओं, तालाबों एवं नहरों के निर्माण किये गये। अकबर, शाहजहॉ एवं जहॉगीर के समय में भी इसी प्रकार राज्य की ओर से कृषि की उन्नति के लिये प्रयत्न किये गये। इस प्रकार मुगलकाल में भी कृषि प्रमुख व्यवसाय रहा। इस काल के प्रारम्भिक अवस्था में कृषि बिल्कुल प्रकृति की कृपा पर निर्भर थी, बाद में सिंचाई की सुविधायें जुटाई गई। कृषि विकास में लिये प्रसिद्ध बन्दोवस्त अकबर के शासन काल में हुआ। शासन के उन्नीसवें वर्ष में कृषि उपज एवं क्षेत्र में वृद्धि करने के उद्देश्य से साम्राज्य की सम्पूर्ण भूमि की नाप एवं सर्वेक्षण किया गया जिससे प्रत्येक प्रकार की भूमि को जोत के अन्दर लाया जा सके। अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने कृषि सम्बन्धी दोषों (लगान की वसूली एवं उसे खजाने मे जमा करने में फैला भ्रष्टाचार आदि) को दूर करते हुये भूमि व्यवस्था की। इसके अनुसार भूमि को तीन भागों में बॉटा गया, पहिले भूखण्ड का सामान्य लगान दर 2/3 या दूसरे भूखण्ड का लगान गल्ले के रूप में सामान्य रूप से लिया जाता था। तीसरे भूखण्ड का लगान नाम मात्र होता था। जहॉगीर (1605 - 1658) के शासन काल में जागीर प्रथा की ओर ध्यान दिया गया। इसके शासन काल में एक विशेष कार्य नहरों का निर्माण किया गया।

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासको के समय भारतीय कृषकों की दशा दयनीय एवं सोचनीय हो गयी। मध्यस्थों एवं जमीदारों द्वारा कृषकों का भरसक शोषण किया गया। कुटीर उद्योग का हास असह दरिद्रता, निरक्षरता, शोषण एवं अत्याचार का बोलबाला हो गया। परिणामस्वरूप भारतीय कष्ृाक निराशावादी, हतात्ेसाहित एव ंकिकंतर्व्यविमढू़ हो बैठे। परन्तु 1857 की क्रांति ने अंग्रेजों को यह स्पष्ट आभास करा दिया कि जनता की भावनाओं के साथ खिलबाड़ नही किया जा सकता। परिणामस्वरूप सरकार की कृषि नीति में भी परिवर्तन हुआ। यातायात के साधनों में वृद्धि हुई। अंग्रेजों के समय में ग्राम की स्वावलम्बता का ह्रास हुआ। संयुक्त परिवारों का विघटीकरण प्रारम्भ हुआ। यातायात, सिंचाईं एवं कृषि का उन्नत होना प्रारम्भ हुआ। कृषि कार्य व्यापारिक उद्देश्य से किया जाने लगा। कृषि उत्पादित वस्तुयें संसार के दूसरे देशों को बिक्री के लिये भेजी जाने लगी।

औद्योगिक क्रांति, भूमि के मूल्य में वृद्धि, व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना में वृद्धि जनसंख्या की वृद्धि कुटीर उद्योगों का ह्रास तथा ऋण ग्रस्तता आदि कार्यो से इस देश की कृषि भूमि तेजी के साथ छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित होने लगी, तथा एक व्यक्ति के अधिकार मे रहने वाले खेत के टुकड़े दूसरे से पर्याप्त दूरी पर स्थित हो गये। इस प्रकार कृषि में उपखण्डन एवं उप- विभाजन की समस्या हो गयी। बड़े उद्योगों ने कुटीर उद्यागों को नष्ट कर दिया और ग्राम में भूमिहीन कृषि मजदूर वर्ग उत्पन्न हो गया।

सर्वप्रथम दुर्भिक्ष आयोग ने 1880 में कृषि की उन्नति के लिये उत्पादन वृद्धि सम्बन्धी सुझाव दिये तत्पश्चात डॉ0 वोयलर (1889) तथा शिमला कान्फ्रेंस (1890) ने कृषि विकास सम्बन्धी रचनात्मक सुझाव दिये किन्तु विदेशी सरकार ने विभिन्न सुझावों पर गम्भीरता पूर्वक अमल नहीं किया। सन 1901 मे कृषि क े लिये एक इन्सपक्ेटर जनरल एव माइकमाेिजस्ट तथा 1908 में एक कृषि कालेज स्थापित किया। सन् 1905 में केन्द्र एवं प्रान्तों में कृषि विभागों का पुनर्गठन किया गया और इनके कार्यों में समन्वय किया गया। कार्यों में समन्वय के लिये एक अखिल भारतीय बोर्ड बनाया गया।

सन् 1919 में संवैधानिक सुधारों के फलस्वरूप कृषि एक प्रान्तीय विषय बन गया। सन् 1926 में शाही कृषि आयोग की नियुक्ति, पशु सिचांइर्, सहकारिता, गा्रमीण शिक्षा, गा्रमीण पनुनिर्मार्ण आदि विषया ें पर महत्वपण्र्ूा सुझाव दिये। शाही कृषि आयोग के सुझाव पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (इण्डियन कांउसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च) की स्थापना हुई। सन् 1937 में प्रान्तीय स्वशासन प्रचलित हुआ और प्रान्तों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डल बने जिन्होनें प्रथमवार कृषि के सम्बन्ध में कृषि विकास सम्बन्धी गतिविधियों में रूचि ली। भारतीय कृषि आज भी उन्हीं रास्तों पर चल रही है जिन पर वह शताब्दियो से चलती आ रही है। कृषकों का वही दृष्टिकोण उनका संगठन उनके उत्पत्ति के तरीके तथा उनकी प्रति एकड़ उपज सभी में कुछ विशेष परिवर्तन नही हुआ है। इतना अवश्य हुआ कि भारतीय कृषक जहॉ खाद्य पदार्थों के उत्पादन पर अधिक बल दिया करता था, वहॉ अब व्यापारिक फसलों की मॉग के कारण पदार्थो का विक्रय कृषकों के कार्य का मुख्य अंग बन गया है।

2. स्वतंत्रता पश्चात् काल (सन 1947 के उपरांत) -

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषकों के जीवन मे नवीन योजना एवं जागृति का प्रादुर्भाव हो चुका है। आवागमन के साधनों मे विकास, बहुमुखी सिंचाई योजनाओं, भूमि व्यवस्था में सुधार, सामुदायिक एवं कृषि वैज्ञानीकरण के कारण भारतीय कृषि जीवन नवीन आभा से जगमगा उठा। अब भारतीय कृषक अपनी भूमि का स्वयं मालिक एवं भाग्य का स्वयं निर्माता है। कृषि विकास कायर्कम्र मे निधार्रित लक्ष्य तक पहचॅुाना सम्भव है। दश् क े उपविभाजन एवं पंजाब और सिंधु खाद्यान्न क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने के कारण स्वतंत्रता के साथ ही भारत की खाद्य समस्या अत्यधिक गम्भीर हो गई। इसे हल करने के लिये भारत सरकार ने एक व्यापक खाद्यान्न आत्म निर्भरता आन्दोलन चलाया। वर्ष (1950-1951) में विस्तृत रूप देने की अपेक्षा गहन रूप दिया गया। जिसके लिये एक समन्वित कार्यक्रम बनाया गया। देश के पुनर्निर्माण एवं विकास की दर को तेज करने के लिये पंचवष्र्ाीय योजनाओं का शुभारम्भ किया गया।

कृषि क्षेत्र में हमारी श्रम शक्ति का लगभग 64 प्रतिशत भाग आजीविका प्राप्त कर रहा है। सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 26 प्रतिशत इसी कृषि क्षेत्र से प्राप्त होता है। देश के कुल निर्यात में इसका योगदान लगभग 18 प्रतिशत हैं। गैर कृषि क्षेत्र के लिये भी बड़ी मात्रा में उपभोक्ता वस्तुओं तथा उद्योगों के लिये कच्चा माल कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। इसलिये भारतीय नियोजन मे कृषि विकास को आधारभूत दृष्टिकोण के रू प मे स्वीकार किया गया है। यह कृषि नियोजन ही है कि जिसके कारण जनसंख्या में अपरिमित वृद्धि के बावजूद खाद्यान की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 467 ग्राम (वर्ष 2000) प्रतिदिन है।

छठे दशक के दौरान’ हरित क्रांति’ के समय 1963-64 में देश की जनसंख्या लगभग सैंतीस करोड़ 50 लाख थी। तब हम खाद्यान्न के संदर्भ में परमुखापेक्षी थे। अब हम न केवल अपनी आवश्यकता भर का खाद्यान उत्पन्न कर रहे है, बल्कि 20 देशों को अनाज का निर्यात भी करने लगे है। गेंहूॅ निर्यातक देशों मे तो भारत का स्थान सातवॉ हो गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि देश हरितक्रांति12, श्वेतक्रांति13, नीली क्रांति14 और पीत क्रांति15 भूरी क्रांति16 के बाद कृषि में विविधता और प्रौद्योगिकी के रूप में तीसरी बड़ी कृषि क्रांति ‘इन्द्रधनुषी क्रांति’17 की ओर कदम बढ़ा रहा है। वर्तमान में भारत काली क्रांति की ओर अग्रसर है।

सन्दर्भ
  1. ऋषभदेव सिंह ‘‘कृषि को औद्योगिक दर्जा’’, योजना, नवम्बर, 1990, प0ृ 16 
  2. हरीश अग्रवाल ‘‘कृषि विकास एवं भावी संभावना योजना, सितम्बर, 1996, पृ020 

Comments